AtharvaVeda kand 4 Sukta 26

भूमिका

यह मंत्र द्यावा-पृथिवी (आकाश और पृथ्वी) की स्तुति करता है। ऋषि कहते हैं — हे द्यावा और पृथिवी! आप दोनों पोषण देने वाले, चेतन और अनंत विस्तार वाले हैं। आप ही समस्त संपदाओं की आधार-भूमि हैं। आप हमें संकट से मुक्त करें। ---

शब्दार्थ

- मन्वे = मैं मानता/विचार करता हूँ - वाम् = आप दोनों को - द्यावा-पृथिवी = आकाश और पृथ्वी - सुभोजसौ = उत्तम पोषण देने वाले - सचेतसौ = चेतन, जागरूक - ये = जो - अप्रथेथाम् = फैल गए, विस्तृत हुए - अमिता योजनानि = अनगिनत योजन (असीम विस्तार) - प्रतिष्ठे = आधार, स्थिरता - हि = निश्चय ही - अभवतं = बने - वसूनाम् = संपदाओं के - ते नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें संकट से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

मैं द्यावा और पृथिवी को प्रणाम करता हूँ, जो पोषण देने वाले और चेतन हैं, जिनका विस्तार असीम है। वे समस्त संपदाओं के आधार हैं। वे हमें संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ द्यावा = चेतना का उच्च आकाश ✔ पृथिवी = स्थिरता और आधार ✔ सुभोजस = पोषण देने वाली प्रकृति ✔ प्रतिष्ठा = जीवन की जड़ें यह मंत्र सिखाता है कि उच्च चेतना और स्थिर आधार — दोनों मिलकर जीवन को संतुलित करते हैं। ---

योगिक दृष्टि

✔ द्यावा = सहस्रार (ऊर्ध्व चेतना) ✔ पृथिवी = मूलाधार (स्थिरता) ✔ विस्तार = ऊर्जा का संपूर्ण प्रवाह ✔ प्रतिष्ठा = संतुलित चक्र व्यवस्था जब साधक ऊर्ध्व और अधो दोनों का संतुलन करता है, तब जीवन स्थिर और प्रकाशमय होता है। ---

दार्शनिक दृष्टि

✔ आकाश = अनंत संभावना ✔ पृथ्वी = मूर्त वास्तविकता ✔ दोनों का संतुलन = पूर्णता जीवन में ऊँचे आदर्श और व्यावहारिक आधार दोनों आवश्यक हैं। ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** पृथ्वी जीवन का आधार है और आकाश ऊर्जा का क्षेत्र। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** चेतना (द्यावा) और स्थिरता (पृथिवी) का संतुलन ही समृद्धि है। - **संदेश:** ऊँचाई + आधार = सुरक्षा और उन्नति। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ द्यावा = उच्च चेतना ✔ पृथिवी = स्थिर आधार ✔ सुभोजस = पोषण ✔ प्रतिष्ठा = संपदा का मूल ✔ मुञ्चतमंहसः = संकट से मुक्ति ---

English Insight

I contemplate Heaven and Earth— nourishing, conscious, and vast in their expansion. They became the foundation of all treasures. May they free us from distress.

भूमिका

यह मंत्र द्यावा-पृथिवी की महिमा और कल्याणकारी स्वरूप का वर्णन करता है। ऋषि प्रार्थना करते हैं कि वे दोनों देवियाँ हमारे लिए मंगलमय और सुखद बनें तथा हमें संकट से मुक्त करें। ---

शब्दार्थ

- प्रतिष्ठे = आधार, स्थिर स्थिति - हि = निश्चय ही - अभवतं = बने - वसूनाम् = संपदाओं के - प्रवृद्धे = अत्यंत विकसित, विस्तृत - देवी = दिव्य शक्तियाँ - सुभगे = सौभाग्य देने वाली - उरूची = व्यापक प्रकाश वाली - द्यावा-पृथिवी = आकाश और पृथ्वी - भवतम् = बनें - मे = मेरे लिए - स्योने = कल्याणकारी, सुखद - ते नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें संकट से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

हे द्यावा और पृथिवी! आप संपत्तियों का आधार हैं, अत्यंत विस्तृत और सौभाग्यदायिनी हैं। आप मेरे लिए मंगलमय बनें और हमें संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ प्रवृद्धे = चेतना का विस्तार ✔ सुभगे = सौभाग्य का स्रोत ✔ उरूची = व्यापक प्रकाश ✔ स्योने = आंतरिक शांति यह मंत्र दर्शाता है कि जब जीवन में स्थिरता और प्रकाश दोनों हों, तभी सच्चा सौभाग्य प्रकट होता है। ---

योगिक दृष्टि

✔ पृथिवी = मूलाधार चक्र (स्थिरता) ✔ द्यावा = सहस्रार चक्र (प्रकाश) ✔ उरूची = प्राण का विस्तार ✔ स्योने = संतुलित ऊर्जा जब मूलाधार और सहस्रार संतुलित होते हैं, तब साधक स्थिर भी रहता है और ऊर्ध्वगामी भी। ---

दार्शनिक दृष्टि

✔ आधार + विस्तार = समृद्धि ✔ प्रकाश + स्थिरता = संतुलन ✔ सौभाग्य = प्रकृति के साथ सामंजस्य जीवन में स्थिर जड़ें और ऊँचे आदर्श दोनों आवश्यक हैं। ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** पृथ्वी संसाधनों का आधार है और आकाश ऊर्जा का विस्तार। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** स्थिरता और चेतना का समन्वय ही दिव्य सौभाग्य है। - **संदेश:** आधार मजबूत हो, चेतना विस्तृत हो — तभी जीवन स्योने (कल्याणकारी) बनता है। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ द्यावा = ऊर्ध्व चेतना ✔ पृथिवी = स्थिर आधार ✔ प्रवृद्धे = विस्तार ✔ सुभगे = सौभाग्य ✔ स्योने = मंगलमय जीवन ✔ मुञ्चतमंहसः = संकट से मुक्ति ---

English Insight

Heaven and Earth, foundations of all wealth, vast, radiant, and auspicious— be gracious and благessing to me. Free us from distress.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि द्यावा-पृथिवी को शांति, तप और गाम्भीर्य का स्वरूप मानकर आह्वान करते हैं। वे कहते हैं — मैं उन दोनों विस्तृत और गम्भीर देवियों को पुकारता हूँ, जिन्हें ज्ञानीजन नमस्कार करते हैं। वे मेरे लिए कल्याणकारी बनें और हमें संकट से मुक्त करें। ---

शब्दार्थ

- असन्तापे = जो संताप रहित हैं, शांति स्वरूप - सुतपसौ = उत्तम तप वाली, तेजस्विनी - हुवे अहम् = मैं आह्वान करता हूँ - उर्वी = विशाल - गम्भीरे = गहरी, गंभीर - कविभिः = ज्ञानी पुरुषों द्वारा - नमस्ये = नमस्कार योग्य - द्यावा-पृथिवी = आकाश और पृथ्वी - भवतम् = बनें - मे = मेरे लिए - स्योने = मंगलकारी, सुखद - ते नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें संकट से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

मैं उन विशाल और गंभीर द्यावा-पृथिवी का आह्वान करता हूँ, जो शांति और तप से युक्त हैं और ज्ञानीजन जिनको नमस्कार करते हैं। वे मेरे लिए मंगलमय बनें और हमें संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ असन्तापे = आंतरिक शांति ✔ सुतपस = आत्मशुद्धि की अग्नि ✔ उर्वी = चेतना का विस्तार ✔ गम्भीरे = गहराई जब साधक के भीतर शांति और तप दोनों हों, तभी उसका जीवन गम्भीर और दिव्य बनता है। ---

योगिक दृष्टि

✔ पृथिवी = स्थिरता (मूलाधार) ✔ द्यावा = ऊर्ध्व चेतना (सहस्रार) ✔ तप = आंतरिक ऊर्जा शोधन ✔ गाम्भीर्य = ध्यान की गहराई यह मंत्र ध्यान और साधना में स्थिरता तथा गहराई का प्रतीक है। ---

दार्शनिक दृष्टि

✔ विशालता + गहराई = पूर्णता ✔ शांति + तप = आत्मविकास ✔ नमस्ये = विनम्रता विनम्रता और तप से ही सच्ची प्रगति संभव है। ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** पृथ्वी की गहराई और आकाश की विशालता जीवन को संतुलित रखते हैं। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** तप और शांति का संतुलन चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है। - **संदेश:** भीतर शांति, बाहर विस्तार — यही दिव्य संतुलन है। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ असन्तापे = तनाव रहित जीवन ✔ सुतपसौ = शुद्धि और ऊर्जा ✔ उर्वी गम्भीरे = विशाल और गहन चेतना ✔ स्योने = कल्याण ✔ मुञ्चतमंहसः = संकट से मुक्ति ---

English Insight

I invoke Heaven and Earth— vast, profound, free from distress, radiant with sacred discipline. Revered by the wise, may they be gracious and free us from suffering.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि द्यावा-पृथिवी को अमृत, यज्ञ और मानव जीवन के धारक के रूप में स्मरण करते हैं। वे कहते हैं — आप दोनों अमृत का पोषण करती हैं, यज्ञ की हवियों को धारण करती हैं और मनुष्यों का पालन करती हैं। आप हमारे लिए मंगलमय बनें और हमें संकट से मुक्त करें। ---

शब्दार्थ

- ये = जो - अमृतम् = अमरत्व देने वाला तत्व, दिव्य रस - बिभृथः = धारण करती हैं - हवींषि = यज्ञ की आहुतियाँ - स्रोत्या = प्रवाहमान जल, नदियाँ - मनुष्यान् = मनुष्यों को - द्यावा-पृथिवी = आकाश और पृथ्वी - भवतम् = बनें - मे = मेरे लिए - स्योने = कल्याणकारी - ते नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें संकट से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

हे द्यावा-पृथिवी! आप अमृत का पोषण करती हैं, यज्ञ की आहुतियों को स्वीकारती हैं, नदियों और मनुष्यों को धारण करती हैं। आप हमारे लिए मंगलमय बनें और हमें संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ अमृत = आत्मज्ञान ✔ हवींषि = समर्पण ✔ स्रोत्या = जीवन का प्रवाह ✔ मनुष्य = चेतन साधक जब जीवन में समर्पण, ज्ञान और प्रवाह बना रहता है, तब आत्मा अमृत का अनुभव करती है। ---

योगिक दृष्टि

✔ अमृत = सहस्रार का सोमरस ✔ स्रोत्या = नाड़ी प्रवाह (इड़ा-पिंगला-सुषुम्ना) ✔ हवि = तप और साधना ✔ पृथिवी = स्थिरता यह मंत्र ऊर्जा प्रवाह और आंतरिक अमृत अनुभव का प्रतीक है। ---

दार्शनिक दृष्टि

✔ आकाश = चेतना ✔ पृथ्वी = जीवन आधार ✔ यज्ञ = कर्म ✔ अमृत = आत्मतत्व जीवन स्वयं एक यज्ञ है, जिसमें समर्पण से अमृत फल प्राप्त होता है। ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** पृथ्वी जीवन को पोषण देती है और जल-चक्र जीवन को बनाए रखता है। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** समर्पण और चेतना का संतुलन अमृत अनुभव कराता है। - **संदेश:** प्रकृति को समझो, सम्मान दो, और जीवन यज्ञ को पवित्र बनाओ। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ अमृत = ज्ञान ✔ हवींषि = समर्पण ✔ स्रोत्या = जीवन प्रवाह ✔ मनुष्य = साधक ✔ स्योने = कल्याण ✔ मुञ्चतमंहसः = संकट से मुक्ति ---

English Insight

You who bear immortality, who uphold the sacred offerings, who sustain the flowing waters and humanity— O Heaven and Earth, be gracious to us and free us from distress.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि द्यावा-पृथिवी को समस्त पोषण और सृष्टि के आधार के रूप में वंदन करते हैं। वे कहते हैं — आप दोनों गौओं (उस्रिया = प्रकाशमान गौ) तथा वनस्पतियों को धारण करती हैं, और आप दोनों के भीतर समस्त भुवन स्थित हैं। आप हमारे लिए मंगलमय बनें और हमें पाप/संकट से मुक्त करें। ---

शब्दार्थ

- ये = जो - उस्रिया = गौएँ, प्रकाश देने वाली शक्तियाँ - बिभृथः = धारण करती हैं - वनस्पतीन् = वृक्ष और वनस्पतियाँ - ययोः वाम् = जिन दोनों के भीतर - विश्वा भुवनानि = समस्त लोक - अन्तः = अंदर स्थित - द्यावा-पृथिवी = आकाश और पृथ्वी - भवतम् = बनें - मे = मेरे लिए - स्योने = कल्याणकारी - ते नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें संकट से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

हे द्यावा और पृथिवी! आप गौओं और वनस्पतियों का पोषण करती हैं। आपके भीतर समस्त लोक स्थित हैं। आप मेरे लिए मंगलकारी बनें और हमें संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ उस्रिया = प्रकाश की किरणें, ज्ञान ✔ वनस्पति = जीवन वृद्धि ✔ भुवनानि = चेतना के स्तर ✔ अन्तः = सब कुछ उसी ब्रह्म में स्थित यह मंत्र बताता है कि समस्त जीवन और चेतना प्रकृति के दिव्य आलिंगन में स्थित है। ---

योगिक दृष्टि

✔ गौ = इन्द्रियाँ (प्रकाश ग्रहण करने वाली) ✔ वनस्पति = शरीर की वृद्धि ✔ द्यावा = सहस्रार (ऊर्ध्व चेतना) ✔ पृथिवी = मूलाधार (स्थिरता) जब ऊर्ध्व चेतना और स्थिर आधार संतुलित होते हैं, तब जीवन का पूर्ण विकास होता है। ---

दार्शनिक दृष्टि

✔ प्रकृति = पालनकर्ता ✔ सृष्टि = परस्पर जुड़ा हुआ तंत्र ✔ आकाश + पृथ्वी = संपूर्ण अस्तित्व जीवन अलग-अलग नहीं है — सब कुछ एक ही दिव्य व्यवस्था में स्थित है। ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** पृथ्वी वनस्पतियों और पशुओं को पोषण देती है; पारिस्थितिकी तंत्र सबको जोड़ता है। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** समस्त भुवन एक ही चेतना में स्थित हैं। - **संदेश:** प्रकृति की रक्षा ही आत्मरक्षा है। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ उस्रिया = प्रकाश व पोषण ✔ वनस्पति = जीवन विस्तार ✔ विश्वा भुवनानि = संपूर्ण सृष्टि ✔ स्योने = मंगल ✔ मुञ्चतमंहसः = संकट से मुक्ति ---

English Insight

You who uphold the radiant cows and the plants, within whom all worlds abide— O Heaven and Earth, be gracious to me and free us from distress.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि द्यावा-पृथिवी को जीवन के पोषण और शक्ति के मूल आधार के रूप में संबोधित करते हैं। वे कहते हैं — आप दोनों कीलाल (पोषक रस) और घृत (ऊर्जा/तेज) से तृप्त करती हैं। आप दोनों के बिना कोई भी कुछ कर पाने में समर्थ नहीं। हे द्यावा-पृथिवी! हमारे लिए मंगलकारी बनें और हमें संकट से मुक्त करें। ---

शब्दार्थ

- ये = जो - कीलालेन = मधुर पेय, पोषक रस - तर्पयथः = तृप्त करती हैं - घृतेन = घृत द्वारा, ऊर्जा/तेज से - याभ्याम् ऋते = जिनके बिना - न किंचन शक्नुवन्ति = कोई कुछ भी करने में समर्थ नहीं - द्यावा-पृथिवी = आकाश और पृथ्वी - भवतम् = बनें - मे = मेरे लिए - स्योने = मंगलकारी - ते नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें संकट से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

हे द्यावा और पृथिवी! आप पोषक रस और घृत से सबको तृप्त करती हैं। आप दोनों के बिना कोई भी कुछ नहीं कर सकता। आप मेरे लिए कल्याणकारी बनें और हमें संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ कीलाल = आनंद रस ✔ घृत = ज्ञान का प्रकाश ✔ द्यावा = उच्च चेतना ✔ पृथिवी = जीवन का आधार चेतना और स्थिरता के बिना जीवन की कोई क्रिया संभव नहीं। ---

योगिक दृष्टि

✔ कीलाल = प्राण शक्ति ✔ घृत = ओज/तेज ✔ द्यावा = सहस्रार ✔ पृथिवी = मूलाधार जब प्राण और स्थिरता संतुलित होते हैं, तभी साधक समर्थ बनता है। ---

दार्शनिक दृष्टि

यह मंत्र सिखाता है — ✔ सृष्टि परस्पर निर्भर है ✔ ऊर्जा और आधार दोनों आवश्यक हैं ✔ बिना चेतना और प्रकृति के, कर्म असंभव है ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** पृथ्वी पोषण देती है; वायुमंडल जीवन को ऊर्जा देता है। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** प्राण और चेतना के बिना जीवन निष्प्राण है। - **संदेश:** प्रकृति के साथ सामंजस्य ही वास्तविक शक्ति है। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ कीलाल = जीवन रस ✔ घृत = ऊर्जा/प्रकाश ✔ द्यावा-पृथिवी = अस्तित्व का आधार ✔ स्योने = मंगल ✔ मुञ्चतमंहसः = संकट से मुक्ति ---

English Insight

You who nourish with vital essence and sacred ghee, without whom nothing can function— O Heaven and Earth, be gracious to us and free us from distress.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि आत्मस्वीकृति और शरणागति की उच्च भावना प्रकट करते हैं। वे कहते हैं — जो भी दोष, पाप या दुःख मुझे व्यथित करता है, जो मनुष्य द्वारा किया गया है (दैविक नहीं), हे द्यावा-पृथिवी! मैं आपकी स्तुति करता हूँ, आपकी शरण लेता हूँ — आप हमें उस पाप से मुक्त करें। ---

शब्दार्थ

- यत् = जो - मे इदम् अभिशोचति = जो मुझे संताप देता है - येन येन वा कृतम् = जो-जो भी किया गया है - पौरुषेयान् = मनुष्यकृत - न दैवात् = दैविक नहीं - स्तौमि = मैं स्तुति करता हूँ - द्यावा-पृथिवी = आकाश और पृथ्वी - नाथितः = शरणागत होकर - जोहवीमि = पुकारता हूँ - ते नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें पाप से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

जो भी दुःख या दोष मुझे कष्ट देता है, जो मनुष्य द्वारा किया गया है, हे द्यावा और पृथिवी! मैं आपकी शरण लेकर स्तुति करता हूँ। आप हमें उस पाप से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ पौरुषेय दोष = अहंकार, अज्ञान, कर्मजन्य बंधन ✔ दैवात् न = भाग्य नहीं, स्वयं का कर्म ✔ शरणागति = मुक्ति का मार्ग यह मंत्र सिखाता है — मुक्ति तब मिलती है जब हम अपने कर्म की जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। ---

योगिक दृष्टि

✔ अभिशोचति = अंतर्मन का पश्चाताप ✔ पौरुषेय = व्यक्तिगत संस्कार ✔ द्यावा = उच्च चेतना ✔ पृथिवी = स्थिर विवेक जब साधक पश्चाताप और जागरूकता से जुड़ता है, तभी शुद्धि होती है। ---

दार्शनिक दृष्टि

✔ दुःख = कर्मफल ✔ शरणागति = आत्मशुद्धि ✔ प्रकृति = पुनर्संतुलन का माध्यम जीवन में जो पीड़ा आती है, वह आत्मविकास का अवसर है। ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** हर क्रिया का परिणाम होता है। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** कर्म का बंधन आत्मज्ञान से कटता है। - **संदेश:** स्वीकार + प्रार्थना + जागरूकता = मुक्ति। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ पौरुषेय दोष = स्वयं की भूल ✔ शरणागति = आध्यात्मिक शक्ति ✔ द्यावा-पृथिवी = संतुलन के प्रतीक ✔ मुञ्चतमंहसः = पाप से मुक्ति ---

English Insight

Whatever distress afflicts me, whatever wrong has been done by human action and not by fate— O Heaven and Earth, I praise and invoke you; release us from that sin and suffering.

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