इस मंत्र में ऋषि मरुतों (ऊर्जा, गति और शक्ति के देवता) से आह्वान करते हैं।
वे कहते हैं — मरुत मेरे पक्ष में बोलें,
मुझे वाज (बल, ऐश्वर्य, विजय) प्रदान करें।
वे तीव्र गति से आने वाले अश्वों के समान सहायता हेतु आएँ
और हमें संकट से मुक्त करें।
---
शब्दार्थ
- मरुताम् = मरुतों के
- मन्वे = मैं चिंतन करता हूँ / स्मरण करता हूँ
- अधि मे ब्रुवन्तु = मेरे पक्ष में बोलें
- प्रेमम् = स्नेहपूर्वक
- वाजम् = बल, संपत्ति, विजय
- वाजसाते = विजय प्राप्ति हेतु
- अवन्तु = रक्षा करें
- आशून् इव = तीव्रगामी अश्वों के समान
- सुयमान् = सुशिक्षित, संयमित
- अह्वे = मैं आह्वान करता हूँ
- ऊतये = सहायता के लिए
- ते नः मुञ्चन्तु अंहसः = वे हमें संकट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
हे मरुतों!
मेरे लिए शुभ बोलें,
मुझे बल और विजय प्रदान करें।
तीव्रगामी अश्वों की तरह सहायता के लिए आएँ
और हमें संकट से मुक्त करें।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ मरुत = चेतना की गतिशील शक्तियाँ
✔ वाज = आंतरिक सामर्थ्य
✔ आशु अश्व = प्राण की तीव्र गति
✔ ऊति = दिव्य सहायता
यह मंत्र सिखाता है —
जब भीतर की ऊर्जा जागृत होती है,
तभी जीवन में विजय संभव होती है।
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योगिक दृष्टि
✔ मरुत = प्राण वायु के विभिन्न रूप
✔ वाज = ओज और तेज
✔ आशु अश्व = नियंत्रित प्राणायाम
✔ ऊति = साधना में दिव्य संरक्षण
जब प्राण नियंत्रित होता है,
तभी साधक संकट से मुक्त होता है।
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दार्शनिक दृष्टि
✔ वाणी और विचार हमारे पक्ष में हों
✔ शक्ति और संतुलन से सफलता मिलती है
✔ गति + संयम = विजय
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
- **विज्ञान कहता है:**
ऊर्जा और गति ही प्रगति का आधार हैं।
- **ब्रह्मज्ञान कहता है:**
आंतरिक प्राणशक्ति ही वास्तविक वाज (विजय) है।
- **संदेश:**
जब भीतर की शक्तियाँ समन्वित होती हैं,
तब जीवन की बाधाएँ हटती हैं।
---
समग्र निष्कर्ष
✔ मरुत = शक्ति
✔ वाज = विजय
✔ आशु अश्व = नियंत्रित गति
✔ ऊति = संरक्षण
✔ मुञ्चन्त्वंहसः = संकट से मुक्ति
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English Insight
May the Maruts speak for me,
may they grant strength and victory.
Like swift, well-guided horses,
may they come to my aid
and free us from distress.
भूमिका
इस मंत्र में मरुतों की जीवनदायिनी शक्ति का वर्णन है।
वे उस स्रोत (उत्स) को प्रवाहित करते हैं,
जो पृथ्वी में जीवन का रस भरता है।
वे औषधियों में रस का सिंचन करते हैं
और पृश्नि माता (मेघमाता / आदिशक्ति) को आगे रखते हैं।
वे हमें पाप और संकट से मुक्त करें।
---
शब्दार्थ
- उत्सम् = स्रोत, जलधारा
- क्षितम् = स्थित, पृथ्वी में
- व्यचन्ति = फैलाते हैं
- आसिञ्चन्ति = सींचते हैं
- रसाम् = जीवनरस
- ओषधीषु = औषधियों में
- पुरो दधे = आगे स्थापित करते हैं
- मरुतः = मरुत देव
- पृश्निमातॄन् = पृश्नि माता (मेघ / आदिशक्ति)
- ते नः मुञ्चन्तु अंहसः = वे हमें संकट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
जो मरुत पृथ्वी में स्थित स्रोतों को प्रवाहित करते हैं,
जो औषधियों में जीवनरस का सिंचन करते हैं,
जो पृश्नि माता को आगे रखते हैं—
वे हमें संकट से मुक्त करें।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ उत्स = आत्मा का स्रोत
✔ रस = आनंद और चेतना
✔ ओषधि = शरीर और मन
✔ पृश्नि = आदिशक्ति / प्रकृति
जब दिव्य ऊर्जा भीतर प्रवाहित होती है,
तो जीवन में स्वास्थ्य और संतुलन आता है।
---
योगिक दृष्टि
✔ उत्स = मूलाधार से उठती ऊर्जा
✔ रस = प्राण प्रवाह
✔ ओषधि = नाड़ियों का शुद्धिकरण
✔ मरुत = प्राणवायु
प्राण जब नाड़ियों में प्रवाहित होता है,
तो साधक रोग और क्लेश से मुक्त होता है।
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दार्शनिक दृष्टि
✔ प्रकृति जीवन का स्रोत है
✔ ऊर्जा से ही स्वास्थ्य संभव है
✔ संतुलन से ही मुक्ति
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
- **विज्ञान कहता है:**
जल और पोषण से जीवन संभव है।
- **ब्रह्मज्ञान कहता है:**
चेतना का रस ही जीवन का सार है।
- **संदेश:**
जब भीतर और बाहर संतुलन हो,
तब स्वास्थ्य और शांति मिलती है।
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समग्र निष्कर्ष
✔ मरुत = जीवन ऊर्जा
✔ उत्स = स्रोत
✔ रस = पोषण
✔ ओषधि = स्वास्थ्य
✔ मुञ्चन्त्वंहसः = क्लेश से मुक्ति
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English Insight
The Maruts who release the springs of earth
and pour vital essence into the herbs,
who uphold the Mother Prishni—
may they free us from distress.
भूमिका
इस मंत्र में मरुतों की पोषण, बल और जीवनदायिनी शक्ति का स्तवन है।
वे गायों के दूध, औषधियों के रस और अश्वों की गति को प्रेरित करते हैं।
ऋषि उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे लिए कल्याणकारी और सुखद हों
और हमें संकट से मुक्त करें।
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शब्दार्थ
- पयः = दूध
- धेनूनाम् = गायों का
- रसम् = सार, जीवनरस
- ओषधीनाम् = औषधियों का
- जवम् = वेग
- अर्वताम् = अश्वों का
- कवयः = ज्ञानी, दूरदर्शी
- इन्वथ = प्रेरित करते हैं
- शग्माः = कल्याणकारी
- भवन्तु = हों
- स्योनाः = सुखद, मंगलकारी
- ते नः मुञ्चन्तु अंहसः = वे हमें संकट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
जो मरुत गायों के दूध, औषधियों के रस और अश्वों की गति को प्रेरित करते हैं,
वे हमारे लिए कल्याणकारी और सुखद हों
और हमें संकट से मुक्त करें।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ धेनु = पोषण देने वाली प्रकृति
✔ रस = आनंद और चेतना
✔ अश्व = जीवन की गति
✔ मरुत = प्रेरक दिव्य शक्तियाँ
जब जीवन में पोषण, संतुलन और गति होती है,
तभी समृद्धि और शांति आती है।
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योगिक दृष्टि
✔ पयः = ओज
✔ रस = प्राण
✔ जव = साधना की तीव्रता
✔ कवि = जाग्रत चित्त
प्राण, ओज और तेज के संतुलन से
साधक रोग और क्लेश से मुक्त होता है।
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दार्शनिक दृष्टि
✔ जीवन का सार = पोषण + गति + ज्ञान
✔ प्रकृति की शक्ति = समृद्धि का आधार
✔ कल्याणकारी ऊर्जा ही रक्षा करती है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
- **विज्ञान कहता है:**
पोषण, औषधि और ऊर्जा से जीवन चलता है।
- **ब्रह्मज्ञान कहता है:**
चेतना का संतुलन ही वास्तविक स्वास्थ्य है।
- **संदेश:**
जब ऊर्जा, ज्ञान और पोषण समन्वित होते हैं,
तब जीवन में मंगल ही मंगल होता है।
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समग्र निष्कर्ष
✔ मरुत = प्रेरक शक्ति
✔ धेनु = पोषण
✔ रस = जीवन सार
✔ अश्व = गति
✔ स्योन = सुख और मंगल
✔ मुञ्चन्त्वंहसः = संकट से मुक्ति
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English Insight
The Maruts who inspire the milk of cows,
the essence of herbs,
and the speed of horses—
may they be gracious and kind to us,
and free us from distress.
भूमिका
यह मंत्र मरुतों की उस विश्वव्यापी शक्ति का वर्णन करता है
जो समुद्र से जल को ऊपर उठाती है
और आकाश से पृथ्वी पर वर्षा के रूप में बरसाती है।
वे जल के स्वामी होकर विचरण करते हैं।
ऋषि उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे हमें संकट से मुक्त करें।
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शब्दार्थ
- अपः = जल
- समुद्रात् = समुद्र से
- दिवम् = आकाश
- उद्वहन्ति = ऊपर ले जाते हैं
- दिवस् = आकाश से
- पृथिवीम् = पृथ्वी पर
- अभि सृजन्ति = प्रवाहित करते हैं
- अद्भिः ईशानाः = जल के स्वामी
- मरुतः = मरुत देव
- चरन्ति = विचरण करते हैं
- ते नः मुञ्चन्तु अंहसः = वे हमें संकट से मुक्त करें
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सरल अर्थ
जो मरुत समुद्र से जल को ऊपर उठाते हैं,
और आकाश से पृथ्वी पर वर्षा के रूप में प्रवाहित करते हैं,
जो जल के स्वामी होकर विचरण करते हैं—
वे हमें संकट से मुक्त करें।
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वैज्ञानिक संकेत
✔ समुद्र से जल का उठना = वाष्पीकरण
✔ आकाश में संघनन = बादल बनना
✔ पृथ्वी पर वर्षा = जलचक्र
यह मंत्र प्राचीन वैदिक ऋषियों की
प्रकृति-ज्ञान की सूक्ष्म समझ को दर्शाता है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ समुद्र = चेतना का गहरा स्रोत
✔ आकाश = सूक्ष्म क्षेत्र
✔ वर्षा = कृपा का अवतरण
जब भीतर की चेतना ऊपर उठती है,
तो वह पुनः जीवन को शुद्ध करती है।
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योगिक दृष्टि
✔ समुद्र = मूलाधार शक्ति
✔ उद्वहन = कुंडलिनी का आरोहण
✔ वर्षा = सहस्रार से अमृत का प्रवाह
मरुत = प्राण की गतिशील शक्ति
जो साधक को शुद्ध और जागृत करती है।
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दार्शनिक दृष्टि
✔ प्रकृति का चक्र = जीवन का संतुलन
✔ ऊर्जा का प्रवाह = सृष्टि का आधार
✔ संतुलन भंग = क्लेश
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
- **विज्ञान कहता है:**
जलचक्र से जीवन संभव है।
- **ब्रह्मज्ञान कहता है:**
चेतना का चक्र ही आत्मिक वर्षा है।
- **संदेश:**
जब भीतर और बाहर का संतुलन बना रहे,
तभी मुक्ति संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
✔ मरुत = गतिशील दिव्य ऊर्जा
✔ अपः = जीवन का आधार
✔ समुद्र = मूल स्रोत
✔ वर्षा = कृपा
✔ मुञ्चन्त्वंहसः = संकट से मुक्ति
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English Insight
The Maruts who lift the waters from the ocean to the sky
and release them upon the earth as rain,
who move as lords of the waters—
may they free us from distress.
भूमिका
यह मंत्र मरुतों की पोषणकारी और वर्षा देने वाली शक्ति का वर्णन करता है।
वे कीलाल (रसयुक्त पेय), घृत (पोषण का प्रतीक) और मेद (ऊर्जा/पुष्टि) से
जीवन को तृप्त करते हैं।
वे जल के स्वामी होकर वर्षा करते हैं।
ऋषि उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे हमें पाप और कष्ट से मुक्त करें।
---
शब्दार्थ
- ये = जो
- कीलालेन = रसयुक्त द्रव से
- तर्पयन्ति = तृप्त करते हैं
- घृतेन = घी से (पोषण से)
- वयः = जीव/प्राणी
- मेदसा = मेद/पुष्टि/ऊर्जा से
- संसृजन्ति = उत्पन्न/संयोजित करते हैं
- अद्भिः ईशानाः = जल के स्वामी
- मरुतः = मरुत देव
- वर्षयन्ति = वर्षा करते हैं
- ते नः मुञ्चन्तु अंहसः = वे हमें संकट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
जो मरुत रसयुक्त द्रव से तृप्त करते हैं,
जो घृत से पोषण करते हैं,
जो प्राणियों को मेद और ऊर्जा से पुष्ट करते हैं,
जो जल के स्वामी होकर वर्षा करते हैं—
वे हमें संकट से मुक्त करें।
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प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक संकेत
✔ कीलाल = पौधों का रस / जीवनद्रव्य
✔ घृत = ऊर्जा का सघन स्रोत
✔ मेद = शरीर की ऊर्जा भंडार प्रणाली
✔ वर्षा = जैवचक्र का मूल आधार
यह मंत्र प्रकृति के पोषण-चक्र को दर्शाता है—
जल → वनस्पति → अन्न → ऊर्जा → जीवन।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ कीलाल = आनंद का सूक्ष्म रस
✔ घृत = ज्ञान का तेज
✔ मेद = आध्यात्मिक शक्ति
मरुत = प्राण की गतिशील शक्ति
जो भीतर चेतना को पुष्ट करती है।
---
योगिक दृष्टि
✔ वर्षा = सहस्रार से अमृत प्रवाह
✔ कीलाल = सूक्ष्म प्राण-रस
✔ घृत = ओजस
साधक के भीतर जब प्राण संतुलित होते हैं,
तो जीवन पुष्ट और प्रकाशित होता है।
---
दार्शनिक संकेत
✔ प्रकृति केवल देती नहीं—पोषण भी करती है।
✔ ऊर्जा का प्रवाह ही जीवन है।
✔ संतुलित वर्षा = संतुलित जीवन।
---
समग्र निष्कर्ष
मरुत केवल तूफान के देव नहीं,
वे जीवन-पोषक शक्ति हैं।
वे रस, ऊर्जा और वर्षा के माध्यम से
सृष्टि का संतुलन बनाए रखते हैं।
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English Insight
The Maruts who nourish with vital essence,
who strengthen with ghee-like sustenance,
who enrich beings with energy and rain—
may they free us from distress.
भूमिका
इस मंत्र में ऋषि मरुतों और देवों से प्रार्थना करते हैं कि
यदि यह (कष्ट, दोष, रोग या संकट) मारुति कारण से हो
या दैवी कारण से उत्पन्न हुआ हो,
तो वे वसुओं के रूप में उसके निवारण के अधिकारी हैं—
वे हमें उस दोष से मुक्त करें।
---
शब्दार्थ
- यदि = अगर
- इदं = यह (दोष/कष्ट)
- मरुतः = मरुत देव
- मारुतेन = वायु/प्राण से संबंधित कारण से
- देवा = देवगण
- दैव्येन = दैवी कारण से
- ईदृक् = इस प्रकार का
- यूयम् = आप सब
- ईशिध्वे = अधिकारी हैं / शासन करते हैं
- वसवः = वसु (पोषक देव)
- तस्य निष्कृतेः = उसके निवारण के लिए
- ते नः मुञ्चन्तु अंहसः = वे हमें पाप/कष्ट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
हे मरुतो!
यदि यह कष्ट वायुजन्य है
या यदि यह दैवी कारण से उत्पन्न हुआ है,
तो आप वसु देव उसके निवारण के स्वामी हैं।
अतः हमें इस संकट से मुक्त करें।
---
वैज्ञानिक संकेत
✔ मारुतेन = वायुजन्य रोग (श्वसन, वातावरणीय प्रभाव)
✔ दैव्येन = प्राकृतिक आपदाएँ, पर्यावरणीय परिवर्तन
✔ निष्कृति = उपचार / संतुलन
यह मंत्र दर्शाता है कि ऋषियों को
प्राकृतिक और पर्यावरणीय कारणों की समझ थी।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ मारुतेन = प्राण का असंतुलन
✔ दैव्येन = कर्मजन्य परिणाम
✔ निष्कृति = आत्मशुद्धि
साधक प्रार्थना करता है कि
भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर संतुलन स्थापित हो।
---
योगिक दृष्टि
✔ वायु दोष का संतुलन
✔ प्राणायाम से शुद्धि
✔ दैवी संतुलन = कर्म-शोधन
जब प्राण संतुलित होते हैं
तो रोग और मानसिक तनाव घटते हैं।
---
दार्शनिक संकेत
✔ जीवन में कष्ट के अनेक कारण हो सकते हैं।
✔ समाधान दैवी और प्राकृतिक नियमों के संतुलन में है।
✔ वसु = प्रकाश और स्थिरता की शक्ति।
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समग्र निष्कर्ष
यह मंत्र समग्र स्वास्थ्य की प्रार्थना है—
शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक।
मरुत और देव दोनों शक्तियाँ
संतुलन स्थापित कर जीवन को सुरक्षित बनाती हैं।
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English Insight
O Maruts, if this distress has arisen
from airy forces or divine causes,
you are the rulers of its remedy.
Release us from all affliction.
भूमिका
इस मंत्र में ऋषि मरुतों की तेजस्वी, उग्र और युद्धशील शक्ति का वर्णन करते हुए
उनसे रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
मरुतों का “तिग्ममनीक” स्वरूप उनके प्रखर तेज और दुष्ट-विनाशक शक्ति को दर्शाता है।
---
शब्दार्थ
- तिग्म = तीक्ष्ण, प्रखर
- अनीकम् = मुख, सेना, अग्रभाग
- विदितम् = प्रसिद्ध, ज्ञात
- सहस्वन् = पराक्रमी, शक्तिशाली
- मारुतम् शर्धः = मरुतों का समूह
- पृतनासु = युद्धों में
- उग्रम् = प्रचंड
- स्तौमि = मैं स्तुति करता हूँ
- नाथितः = आश्रय लेकर
- जोहवीमि = पुकारता हूँ
- ते नः मुञ्चन्तु अंहसः = वे हमें पाप/कष्ट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
मैं उन मरुतों की स्तुति करता हूँ
जो तीक्ष्ण तेज वाले, पराक्रमी और युद्ध में उग्र हैं।
मैं उनका आश्रय लेकर उन्हें पुकारता हूँ—
वे हमें संकट से मुक्त करें।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ तिग्ममनीक = विवेक की तीक्ष्णता
✔ पृतनासु उग्रम् = आंतरिक विकारों से संघर्ष
✔ नाथितः = ईश्वर का आश्रय
यह मंत्र आंतरिक दुर्बलताओं के विरुद्ध
दैवी शक्ति का आह्वान है।
---
वैज्ञानिक संकेत
मरुत = वायुमंडलीय शक्तियाँ
✔ तूफान
✔ विद्युत् ऊर्जा
✔ प्राकृतिक संतुलन
तिग्ममनीक = बिजली / ऊर्जा की तीव्रता
---
योगिक व्याख्या
✔ प्राण की उग्र शक्ति
✔ कुण्डलिनी जागरण में तीव्रता
✔ आंतरिक शुद्धि की अग्नि
---
दार्शनिक संकेत
जीवन एक युद्ध है —
अज्ञान, भय और दुर्बलता से।
मरुत उस ऊर्जा का प्रतीक हैं
जो साधक को विजय दिलाती है।
---
समग्र निष्कर्ष
यह मंत्र शक्ति और शरण दोनों का संतुलन है।
साधक स्वीकार करता है कि
दैवी शक्ति के बिना
भीतरी और बाहरी युद्ध नहीं जीते जा सकते।
---
English Insight
I praise the fierce and sharp-fronted Maruts,
mighty in battles.
Taking refuge in them, I invoke their aid—
may they free us from all distress.
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
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