Yajurveda Chapter 31 Purusha Sukta 1-24

Purusha Sukta - मंत्रार्थ और व्याख्या

Purusha Sukta (पुरुष सूक्त)

मंत्र:

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः। सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्त्वा। अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्। १

शब्दार्थ:

  • ॐ – ब्रह्म का प्रतीक।
  • सहस्रशीर्षा – हजार सिर वाला।
  • पुरुषः – सम्पूर्ण सृष्टि का पुरुष।
  • सहस्राक्षः – हजार नेत्र।
  • सहस्रपात् – हजार पैर।
  • स – वह।
  • भूमिं – पृथ्वी।
  • विश्वतो वृत्त्वा – चारों दिशाओं में फैला।
  • अत्यतिष्ठत् – अत्यधिक विशाल।
  • दशाङ्गुलम् – दस अंगुल लंबा।

विस्तृत अर्थ:

पुरुष सूक्त का पहला श्लोक पुरुष के विशाल रूप, हजार सिर, आंख और पैर, और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में उसके व्याप्त होने का वर्णन करता है।

दार्शनिक व्याख्या:

पुरुष = आत्मा = ब्रह्म। हजार सिर, आंख और पैर उसके सर्वव्यापी होने का प्रतीक हैं।

सामाजिक/आध्यात्मिक संदेश:

सर्वव्यापकता, एकत्व की अनुभूति, सृष्टि और धर्म का पालन।

सारांश (हिंदी + English):

हिंदी: पुरुष हजार सिर, आंख और पैर वाला है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।
English: Purusha has a thousand heads, eyes, and feet, pervades the universe, and is the foundation of creation.

मंत्र:

पुरुष एवेत्तम सर्वम्। यद्भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानः। यदन्नेनातिरोहति। २

शब्दार्थ:

  • पुरुष – सम्पूर्ण सृष्टि का पुरुष।
  • एवेत् – यही।
  • सर्वम् – सब कुछ।
  • यद्भूतं – जो भूत है।
  • यच्च भव्यम् – जो भविष्यत है।
  • उत – और।
  • अमृतत्वस्य ईशानः – अमरता का स्रोत।
  • यदन्नेन – जो भोजन से ऊपर है।
  • अति रोहति – उससे उठता है।

विस्तृत अर्थ:

यह श्लोक बताता है कि सम्पूर्ण भूत और भविष्यत पुरुष से उत्पन्न हैं। पुरुष अमरता का स्रोत है और उससे सबका पालन होता है।

दार्शनिक व्याख्या:

पुरुष सभी भूतों और भविष्यत का आधार है। यह शाश्वत चेतना और अमरता का प्रतीक है।

सामाजिक/आध्यात्मिक संदेश:

हमारे कर्म और जीवन पुरुष की दिव्यता से जुड़े हैं। हमें उसके मार्गदर्शन में जीवन जीना चाहिए।

सारांश (हिंदी + English):

हिंदी: पुरुष सम्पूर्ण भूत और भविष्यत का आधार है और अमरता का स्रोत है।
English: Purusha is the source of all beings and future, the foundation of immortality.

मंत्र:

एतावानस्य महिमा। अतो ज्यायांश्च पुरुषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि। त्रिपादस्य आमृतं दिवि। ३

शब्दार्थ:

  • एतावानस्य महिमा – इतना विशाल, इतना महान।
  • अतः ज्यायांश्च पुरुषः – पुरुष इससे भी अधिक महान।
  • पादः – पैर।
  • अस्य – उसका।
  • विश्वा भूतानि – सम्पूर्ण प्राणी और जीव।
  • त्रिपादस्य – तीन पैर वाला।
  • आमृतं दिवि – आकाश में उसका अमृत रूप।

विस्तृत अर्थ:

पुरुष इतना महान है कि उसकी महिमा विशाल है। उसके पैर सम्पूर्ण प्राणी और जीवों को व्याप्त करते हैं। उसके त्रिपाद (तीन पैर) आकाश में अमृत रूप में फैले हुए हैं। यह श्लोक पुरुष की सर्वव्यापकता और दिव्यता को दर्शाता है।

दार्शनिक व्याख्या:

यह श्लोक बताता है कि पुरुष केवल भौतिक रूप में नहीं, बल्कि **संपूर्ण सृष्टि का आधार और अमर चेतना का स्रोत** है।

सामाजिक/आध्यात्मिक संदेश:

हमारे कर्म और जीवन पुरुष की दिव्यता से जुड़े हैं। हमें अपनी दृष्टि और समझ को व्यापक रखना चाहिए।

सारांश (हिंदी + English):

हिंदी: पुरुष इतना विशाल और महान है कि उसकी उपस्थिति सम्पूर्ण सृष्टि में फैली हुई है।
English: Purusha is so great and vast that his presence pervades the entire universe.

मंत्र:

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः। पादोऽस्येहाऽभवात्पुनः। ४

शब्दार्थ:

  • त्रिपादूर्ध्व – तीन पैर ऊपर उठे।
  • उदैत् पुरुषः – पुरुष प्रकट हुआ।
  • पादोऽस्य एहा – उसके पैर यहाँ भूमि पर।
  • अभवात् पुनः – पुनः प्रकट हुआ।

विस्तृत अर्थ:

पुरुष का रूप प्रकट हुआ। उसके पैर यहाँ भूमि पर आए और फिर पुनः ऊपर उठे, यह सृष्टि और पुरुष की विविध गतिविधियों का प्रतीक है।

दार्शनिक व्याख्या:

पुरुष का यह रूप भौतिक और आध्यात्मिक रूप से सृष्टि में प्रकट और संचित होता है।

सामाजिक/आध्यात्मिक संदेश:

हमें यह समझना चाहिए कि **सृजन और जीवन में परिवर्तन लगातार होते रहते हैं**, और सभी गतिविधियाँ पुरुष की दिव्यता से जुड़ी हैं।

सारांश (हिंदी + English):

हिंदी: पुरुष का रूप प्रकट होता है और उसके क्रियाशील पैर सृष्टि में फैले हुए हैं।
English: Purusha manifests, and his active presence pervades creation.

मंत्र:

ततो विश्वङ्व्यक्रामत्। साशनानशने अभि। ५

शब्दार्थ:

  • ततः – उसके बाद।
  • विश्वङ् व्यक्रामत् – संसार में विचरने लगा।
  • साशनानशने अभि – सभी प्राणियों और वस्तुओं में व्याप्त हुआ।

विस्तृत अर्थ:

पुरुष सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विचरने और व्याप्त होने लगा। वह सभी प्राणियों और वस्तुओं में समाहित हो गया।

दार्शनिक व्याख्या:

यह दर्शाता है कि **पुरुष की चेतना और शक्ति सृष्टि में सर्वव्यापी है**, जो हर जीव और तत्व में समाहित है।

सामाजिक/आध्यात्मिक संदेश:

हमें यह समझना चाहिए कि हमारे अंदर भी पुरुष का अंश है। सभी जीवों में दिव्यता की अनुभूति करें।

सारांश (हिंदी + English):

हिंदी: पुरुष सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है और सभी प्राणियों में समाहित है।
English: Purusha pervades the entire creation and is present in all beings.

मंत्र:

यत्पुरुषेण ह॒विषा। देव य॒ज्ञमतन्वत। वसन्तो अस्यासीदाज्यम्। ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः। ६

शब्दार्थ:

  • यत् पुरुषेण हविषा – जिस यज्ञ में पुरुष से हवन किया गया।
  • देवाः यज्ञमतन्वत – देवताओं ने उस यज्ञ को स्वीकार किया।
  • वसन्तः अस्यासीदाज्यम् – वसंत ऋतु में हवन के लिए अन्न उपलब्ध था।
  • ग्रीष्मः इध्मः – गर्मियों में हवन के लिए इध्म (सामग्री)।
  • शरद्धविः – शरद ऋतु में हवन की सामग्री।

विस्तृत अर्थ:

पुरुष से हवन किया गया यज्ञ देवताओं द्वारा स्वीकार किया गया। ऋतुओं के अनुसार हवन सामग्री उपलब्ध कराई गई: वसंत में अन्न, ग्रीष्म में इध्म और शरद में ध्विः। यह सृष्टि में ऋतु चक्र और यज्ञ की व्यवस्था को दर्शाता है।

दार्शनिक व्याख्या:

यह दर्शाता है कि **पुरुष और देवता मिलकर सृष्टि का संचालन करते हैं**, और यज्ञ से प्रकृति का संतुलन बना रहता है।

सामाजिक/आध्यात्मिक संदेश:

हमें जीवन में ऋतुओं और समय के अनुसार अपने कर्तव्यों और कर्मों का पालन करना चाहिए।

सारांश (हिंदी + English):

हिंदी: पुरुष द्वारा किया गया यज्ञ देवताओं को स्वीकार्य हुआ और प्रत्येक ऋतु के अनुसार हवन सामग्री उपलब्ध कराई गई।
English: The sacrifice performed by Purusha was accepted by the gods, and the offerings were provided according to the seasons.

मंत्र:

सप्तास्याः परिसन्धयः। त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवाः यद्यज्ञं तन्वानाः। अबध्नन्पुरुषं पशुम्। ७

शब्दार्थ:

  • सप्तास्याः परिसन्धयः – सात पारियों का विभाजन।
  • त्रिः सप्त समिधः कृताः – ३×७ (२१) सामग्रियाँ तैयार की गईं।
  • देवाः यद्यज्ञं तन्वानाः – देवताओं ने यज्ञ को विस्तारित किया।
  • अबध्नन् पुरुषं पशुम् – पुरुष को पशु रूप में बाँध दिया गया।

विस्तृत अर्थ:

पुरुष को यज्ञ में दिये गए पशु के रूप में बाँधा गया। ३×७ सामग्रियाँ और सात पारियों का आयोजन कर देवताओं ने यज्ञ को सम्पन्न किया। यह श्लोक यज्ञ में समर्पण और व्यवस्था को दर्शाता है।

दार्शनिक व्याख्या:

पुरुष का समर्पण और यज्ञ में उसका समावेश, **संपूर्ण सृष्टि के कर्मों में समर्पण और सहभागिता** को दर्शाता है।

सामाजिक/आध्यात्मिक संदेश:

हमारे कर्म, यज्ञ और कर्तव्यों में अनुशासन आवश्यक है। समय और व्यवस्था के अनुसार कार्य करना चाहिए।

सारांश (हिंदी + English):

हिंदी: यज्ञ में पुरुष का समर्पण और देवताओं द्वारा व्यवस्था सुनिश्चित की गई।
English: In the sacrifice, Purusha was offered, and the gods ensured proper arrangement and distribution.

मंत्र:

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्। पुरुषं जातमग्रतः। तेन देवाः अयजन्त। साध्या ऋषयश्च ये। ८

शब्दार्थ:

  • तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् – उस यज्ञ को बर्हिषि (हवनाग्नि) में प्रज्वलित किया।
  • पुरुषं जातमग्रतः – पुरुष सबसे पहले उत्पन्न हुआ।
  • तेन देवाः अयजन्त – देवताओं ने उसी पुरुष के द्वारा यज्ञ किया।
  • साध्या ऋषयश्च ये – साध्य और ऋषि जिन्होंने यज्ञ में भाग लिया।

विस्तृत अर्थ:

पुरुष को यज्ञ के आरंभ में मुख्य रूप से अर्पित किया गया और देवताओं तथा ऋषियों ने यज्ञ को संपन्न किया। यह श्लोक **सृष्टि और यज्ञ की उत्पत्ति** को दर्शाता है।

दार्शनिक व्याख्या:

यह बताता है कि **संपूर्ण सृष्टि का आरंभ पुरुष और यज्ञ से हुआ**, और देवता एवं ऋषि यज्ञ के माध्यम से सृष्टि के नियमों का पालन करते हैं।

सामाजिक/आध्यात्मिक संदेश:

हमारे कर्मों की नींव समर्पण, अनुशासन और धर्म पर होनी चाहिए। यज्ञ और कर्तव्य जीवन के मूल तत्व हैं।

सारांश (हिंदी + English):

हिंदी: पुरुष को यज्ञ में मुख्य रूप से अर्पित किया गया और देवताओं ने उसे संपन्न किया।
English: Purusha was offered at the start of the sacrifice, and the gods completed the ritual.

शब्दार्थ

  • पशून् – पशु
  • ता – उन सभी को
  • क्रे – बाँधा गया
  • वायव्याः – वायु से संबंधित, आकाशीय प्राणी
  • आरण्यान् – वन में रहने वाले प्राणी
  • ग्राम्याः – गांव और भूमि में रहने वाले प्राणी
  • ये – जो

विस्तृत अर्थ

इस मंत्र में कहा गया कि यज्ञ में सभी प्रकार के जीव – आकाशीय, वन और ग्राम्य – को व्यवस्थित रूप में शामिल किया गया। यह यज्ञ में समग्र सृष्टि के समर्पण और समावेश को दर्शाता है।

दार्शनिक व्याख्या

  • पुरुष सूक्त के अनुसार, सृष्टि का प्रत्येक जीव यज्ञ का हिस्सा है।
  • आकाश, वन और ग्राम्य प्राणी – सभी पुरुष के अंग हैं।
  • यह सृष्टि के संतुलन और समग्र समर्पण का प्रतीक है।

शब्दार्थ

  • तस्मात् – इसलिए
  • यज्ञात् – यज्ञ से
  • सर्वहुतः – सभी बलिदान और आहुति
  • ऋचः – ऋचाएँ (सामग्री और मंत्र)
  • सामानि – साम गीत
  • छन्दांसि – छंद
  • जज्ञिरे – उत्पन्न हुए, गाए गए

विस्तृत अर्थ

यज्ञ में समर्पित बलिदानों से ही ऋचाएँ, साम और छंद उत्पन्न हुए। यह बताता है कि यज्ञ से ही **संगीत, मंत्र और नियम** का विकास होता है।

दार्शनिक व्याख्या

  • सृष्टि का हर तत्व यज्ञ से उत्पन्न हुआ।
  • ऋच, साम और छंद – ये यज्ञ के क्रमबद्ध संचालन का प्रतीक हैं।
  • सभी प्राणी और कर्म यज्ञ के नियमों के अनुसार व्यवस्थित होते हैं।

शब्दार्थ

  • तस्मात् – इसलिए
  • अश्वाः – घोड़े
  • अजायत – उत्पन्न हुए
  • गावः – गायें
  • ह – भी
  • जज्ञिरे – उत्पन्न हुए
  • जाता अजावयः – जन्म और अजाएँ (सभी पशु)

विस्तृत अर्थ

इस मंत्र में घोड़े और गायें यज्ञ से उत्पन्न हुईं। यह यज्ञ में जीवन, ऊर्जा और सृजन के क्रम को दिखाता है।

दार्शनिक व्याख्या

  • यज्ञ से ही सृष्टि के पशु और प्राणी जन्म लेते हैं।
  • अश्व और गाई – ऊर्जा और पोषण का प्रतीक।
  • यह बताता है कि पुरुष (सर्वव्यापी चेतना) सृष्टि के हर तत्व में विद्यमान है।
पुरुष सूक्त मंत्र 12,13,14

शब्दार्थ

  • यत् पुरुषम् – जो पुरुष
  • व्यदधुः – उन्होंने बाँधा
  • कितिधा विकल्पयन् – कितने प्रकार से विभाजित किया
  • मुखं – मुख
  • कौ – हाथ
  • बाहू – बाहू
  • कावूरू – पैर
  • पादावुच्येते – पद कहलाए

विस्तृत अर्थ

इस मंत्र में पुरुष को यज्ञ में विभाजित रूप से बाँधा गया। उसके मुख, हाथ, पैर आदि भागों को अलग-अलग वर्गों और कर्मों के लिए प्रतीक रूप में दर्शाया गया। यह सृष्टि में प्रत्येक वर्ग और कर्म का प्रतीक है।

दार्शनिक व्याख्या

  • पुरुष के अंगों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र उत्पन्न हुए।
  • यह सृष्टि के वर्गीकरण और कर्म-व्यवस्था का प्रतीक है।
  • हजार सिर, नेत्र और पैर वाले पुरुष का यह विभाजन जीवन और समाज में कर्मों का आधार दर्शाता है।

शब्दार्थ

  • ब्राह्मणः – मुख से उत्पन्न हुआ, ज्ञान और धर्म का प्रतीक
  • बाहू – बाहू से राजन्य उत्पन्न, शक्ति और शासन का प्रतीक
  • ऊरू – जांघों से वैश्य उत्पन्न, व्यापार और संपन्नता का प्रतीक
  • पद्भ्यां – पैरों से शूद्र उत्पन्न, सेवा और कर्म का प्रतीक

विस्तृत अर्थ

यह मंत्र पुरुष के अंगों से चार वर्णों का जन्म दर्शाता है – ब्राह्मण (ज्ञान), क्षत्रिय (शक्ति), वैश्य (संपन्नता) और शूद्र (सेवा)। यह समाज और सृष्टि में व्यवस्थित कर्म व्यवस्था को बताता है।

दार्शनिक व्याख्या

  • पुरुष सूक्त समाज के चार वर्णों और उनके कर्तव्यों को दर्शाता है।
  • हर अंग का एक विशेष महत्व और कार्य है।
  • सृष्टि का संतुलन और धर्म इसी वर्गीकरण से बनता है।

शब्दार्थ

  • चन्द्रमा – मन से उत्पन्न, शांति और मनोबल का प्रतीक
  • चक्षुः – आंख से सूरज उत्पन्न, दृष्टि और प्रकाश का प्रतीक
  • मुखात् – मुख से इन्द्र और अग्नि उत्पन्न, इंद्र शक्ति और अग्नि ऊर्जा का प्रतीक
  • प्राणात् – प्राण से वायु उत्पन्न, जीवन शक्ति का प्रतीक

विस्तृत अर्थ

पुरुष के अंगों से सृष्टि की प्रमुख शक्तियों का जन्म हुआ – मन, दृष्टि, ऊर्जा और जीवन शक्ति। यह सृष्टि के मूल तत्वों का प्रतिनिधित्व है।

दार्शनिक व्याख्या

  • मन, दृष्टि, शक्ति और प्राण पुरुष की सर्वव्यापकता को दर्शाते हैं।
  • यह मंत्र प्राकृतिक और दिव्य तत्वों के स्रोत को समझने में मदद करता है।
  • सभी तत्व पुरुष से उत्पन्न हुए हैं, जो सृष्टि का आधार हैं।

शब्दार्थ

  • नाभ्या – नाभि से
  • आसीत् – उत्पन्न हुआ
  • अंतरिक्षम् – आकाश
  • शीर्ष्णः द्यौः – सिर से आकाश
  • पद्ध्यां भूमि – पैर से पृथ्वी
  • दिशः – दिशाएँ
  • श्रवण – कान से
  • लोकाः – दुनिया/सृष्टी

विस्तृत अर्थ

पुरुष के अंगों से भौतिक और आकाशीय तत्वों का निर्माण हुआ। नाभि से अंतरिक्ष, सिर से आकाश, पैर से पृथ्वी, कान से श्रोत्र आदि उत्पन्न हुए। यह सृष्टि के मूल तत्त्वों का प्रतीक है।

दार्शनिक व्याख्या

  • सृष्टि का हर तत्व पुरुष से उत्पन्न हुआ।
  • यह श्लोक सृष्टि की संरचना और उसकी व्यवस्था को दर्शाता है।
  • पुरुष का व्यापक अस्तित्व भौतिक और दिव्य दोनों रूपों में है।

शब्दार्थ

  • वेदाहम् – मैं जानता हूँ
  • एतं पुरुषं महान् – यह महान पुरुष
  • आदित्यवर्णं – सूर्य का वर्ण
  • तमसः पारः – अन्धकार से परे
  • सर्वाणि रूपाणि – सभी रूपों को
  • विचित्य धीः – विचारपूर्वक समझा
  • नामानि कृत्वा – नाम देकर
  • अभिवदन् – व्यक्त किया

विस्तृत अर्थ

यह मंत्र बताता है कि वेदज्ञानी पुरुष को समझते हैं। उन्होंने पुरुष को सूर्य के समान प्रकाशमान और अन्धकार से परे बताया। सभी रूपों और नामों के माध्यम से पुरुष का अभिव्यक्तिकरण किया।

दार्शनिक व्याख्या

  • पुरुष सर्वव्यापक है और उसकी अनुभूति वेदों के माध्यम से संभव है।
  • सभी नाम और रूप उसके विविध रूपों का प्रतीक हैं।
  • यह श्लोक ज्ञानियों की दृष्टि से पुरुष का सर्वज्ञ और सर्वदर्शी होना बताता है।

शब्दार्थ

  • धाता – रचयिता
  • पुरस्ताद् – पहले
  • उमुदाजहार – उद्घोष किया
  • शक्रः – इन्द्र
  • प्रविद्वान् – ज्ञानी
  • प्रदिशः – दिशाएँ
  • चतस्रः – चार
  • तमेवम् – इस प्रकार
  • विद्वान् मृत – ज्ञानी मृत्यु को पार कर जाता है
  • नान्यः पन्था – कोई और मार्ग नहीं
  • अयनाय विद्यते – मुक्ति या लक्ष्य की प्राप्ति के लिए

विस्तृत अर्थ

पुरुष ने चार दिशाओं और तत्वों की रचना की। ज्ञानी पुरुष इस प्रकार पुरुष की सृष्टि और व्यवस्था को समझकर मृत्यु के पार जाकर मोक्ष को प्राप्त होता है। कोई अन्य मार्ग नहीं है।

दार्शनिक व्याख्या

  • यह मंत्र मोक्ष प्राप्ति और पुरुष के अद्वितीय मार्ग का उल्लेख करता है।
  • सृष्टि और उसका ज्ञान पुरुष की समझ से ही संभव है।
  • पुरुष के ज्ञान में ही अंतिम लक्ष्य और मुक्ति है।

शब्दार्थ: देवताओं ने यज्ञ द्वारा यज्ञ की स्थापना की और पहला धर्म (नियम) रखा।

विस्तृत अर्थ: देवताओं ने यज्ञ के माध्यम से सृष्टि के नियम और व्यवस्था बनाई। यह दर्शाता है कि यज्ञ और धर्म के पालन से ब्रह्माण्ड नियंत्रित होता है।

दार्शनिक व्याख्या: सृष्टि का संचालन नियम और कर्तव्य से होता है। प्रत्येक कार्य का प्रारंभ यज्ञ और धर्म से होता है।

शब्दार्थ: पृथ्वी से उत्पन्न रस और तत्वों के माध्यम से विश्वकर्मा ने सृष्टि का निर्माण किया। त्वष्टा ने रूप प्रदान किया।

विस्तृत अर्थ: यह मंत्र सृष्टि के आद्य निर्माण और विश्वकर्मा की रचना शक्ति का वर्णन करता है।

दार्शनिक व्याख्या: पुरुष के माध्यम से सभी तत्वों का रूपांतर हुआ। यह सृष्टि और पुरुष के बीच संबंध को दर्शाता है।

शब्दार्थ: वेद कहते हैं कि यह महान पुरुष सूर्य जैसा तेजस्वी है, अंधकार से परे है। ज्ञानी उसे जानकर अमरता प्राप्त करते हैं।

विस्तृत अर्थ: पुरुष सभी वेदों और ज्ञान का आधार है। कोई दूसरा मार्ग उसके समान नहीं।

दार्शनिक व्याख्या: पुरुष साक्षात् ब्रह्म और मोक्ष का स्रोत है। ज्ञानी उसका साक्षात्कार करके जीवन में परमानंद अनुभव करते हैं।

शब्दार्थ: प्रजापति गर्भ में चलता है। उत्पन्न होने वाला जीव अनेक रूपों में प्रकट होता है। धीर व्यक्ति उसे समझकर योनियों की पहचान करता है।

विस्तृत अर्थ: यह श्लोक जीवन और प्राणी सृष्टि की उत्पत्ति, और प्रजापति के मार्गदर्शन का वर्णन करता है।

दार्शनिक व्याख्या: सृष्टि के आद्य तत्व और पुरुष के ज्ञान के बिना जीव और प्राणी की उत्पत्ति समझना कठिन है।

शब्दार्थ: यह मंत्र सूर्य को समर्पित है। "आतपति" = सूर्य, "पुरोहित" = देवताओं का नेतृत्व करने वाला। पूर्वोक्त देवताओं में से उत्पन्न। हम ब्रह्मा को नमस्कार करते हैं।

विस्तृत अर्थ: सूर्य और देवताओं का सम्मान करना इस मंत्र का उद्देश्य है। यह बताता है कि ब्रह्म और सूर्य से समस्त देवता जुड़े हैं और उनसे प्रेरणा लेते हैं।

दार्शनिक व्याख्या: देवताओं की पूजा और आदर से सृष्टि का नियम स्थिर रहता है। सूर्य और ब्रह्म के माध्यम से चेतना का संचार होता है।

शब्दार्थ: देवता ब्राह्मण को रचना और उत्पत्ति देने वाले हैं। जो ब्राह्मण का ज्ञान जानता है, उसके अधीन देवता रहते हैं।

विस्तृत अर्थ: यह मंत्र ब्राह्मण (सत्यान्वेषी, ज्ञानी) के महत्व और देवताओं के उनके प्रति सम्मान को दर्शाता है।

दार्शनिक व्याख्या: ब्राह्मण का ज्ञान सर्वोच्च है। जो उसका आदर करता है और उसे जानता है, उसके लिए देवता भी नियंत्रित और समर्पित होते हैं।

शब्दार्थ: हृदय और लक्ष्मी दोनों (पत्नी) हमारी पूर्ति में सहायक हैं। दिन और रात में, नक्षत्रों में, अश्विन जोड़े में – सब कुछ ज्ञानी के लिए इच्छित है।

विस्तृत अर्थ: यह मंत्र देवी लक्ष्मी और अन्य शक्तियों की उपस्थिति का वर्णन करता है जो ज्ञानी और साधक को सफलता और जीवन में समृद्धि देती हैं।

दार्शनिक व्याख्या: जीवन में सफलता और ज्ञान के लिए आंतरिक शक्ति और दिव्यता दोनों आवश्यक हैं। यह मंत्र हमें दिखाता है कि देवता, नक्षत्र और शक्ति सभी ज्ञानी के कल्याण में समर्पित हैं।

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