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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

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AtharvaVeda, kand 4 sukta 8

शब्दार्थ

भूतो = जीवित प्राणी भूतेषु = जीवों में, प्राणियों में पय = जीवन, शक्ति, ऊर्जा आ दधाति = प्रदान करता है, देता है स = वह भूतानाम् अधिपति = प्राणियों का अधिपति, स्वामी बभूव = हुआ, अस्तित्व में आया तस्य = उसका मृत्यु = मृत्यु, अंत चरति = चलता है, नियन्त्रित करता है राजसूयं = राजसूय यज्ञ, सम्पूर्ण साम्राज्य का प्रतीक स राजा = वही राजा अनु = उसके अनुसार मन्यताम् = माना जाए, मान्यता दी जाए इदम् = यह ---

सरल हिन्दी अर्थ

सारा जीवन और प्राणी जगत का स्वामी वही है, जो प्राणियों में जीवन और शक्ति देता है। उसके अनुसार मृत्यु चलती है, और यही राजा राजसूय यज्ञ में सर्वोच्च माना जाता है। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र जीवन और मृत्यु के परम सत्ता का वर्णन करता है। “भूतो भूतेषु पय आ दधाति” — जीवित प्राणियों में जीवन और ऊर्जा प्रदान करने वाला। यह केवल शारीरिक जीवन नहीं, बल्कि चेतना, शक्ति और जीवन की गतिशीलता का प्रतीक है। --- “स भूतानामधिपतिर्बभूव” — वह प्राणियों का अधिपति, स्वामी बन गया। सृष्टि में सभी जीव उसी की शक्ति से जीवन पा रहे हैं। यह मंत्र ब्रह्मांड में जीवन की केंद्रीय सत्ता को उद्घाटित करता है। --- “तस्य मृत्युश्चरति” — उसके अनुसार मृत्यु चलती है। सभी प्राणी उसी के नियमन में मरते हैं। यह जीवन और मृत्यु के चक्र का दिव्य नियंत्रण है। --- “राजसूयं स राजा अनु मन्यतामिदम्” — जैसे राजसूय यज्ञ में राजा सर्वोच्च और सर्वस्व माना जाता है, वैसे ही जीवन और मृत्यु के स्वामी को सर्वोच्च माना जाता है। यह भाग वैदिक दर्शन में “सर्वेश्वरत्व” का प्रतीक है। राजसूय यज्ञ एक साम्राज्य की मान्यता का प्रतीक है; यहाँ उसी शक्ति को ब्रह्मांड में सर्वोच्चता से जोड़ा गया है। ---

आध्यात्मिक दृष्टि

मंत्र यह समझाता है कि— ✔ जीवन और मृत्यु मानव नियंत्रण में नहीं हैं। ✔ जो शक्ति जीवन देती है और मृत्यु नियन्त्रित करती है, वही परम सत्ता है। ✔ इसी कारण सभी प्राणी उसी के अधीन हैं। ---

योगिक और आध्यात्मिक अर्थ

योग में जीवन ऊर्जा (प्राण) को सर्वोच्च माना गया है। जो इसे नियंत्रित करता है, वही सृष्टि का वास्तविक अधिपति है। मृत्यु और जीवन का यह संतुलन संसार में स्थिरता और न्याय का प्रतीक है। ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

मनुष्य अक्सर जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण की आकांक्षा करता है। वास्तव में, यह प्राकृतिक शक्ति का हिस्सा है। इसे स्वीकार करना मानसिक संतुलन लाता है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के जीवन में यह संदेश महत्वपूर्ण है— ✔ जीवन का सम्मान करें ✔ मृत्यु और परिवर्तन को स्वीकारें ✔ सर्वोच्च शक्ति के अनुसार जीवन को संचालित करें यह दृष्टिकोण हमें विनम्रता, जागरूकता और स्थिरता प्रदान करता है। ---

सारांश

मंत्र यह सिखाता है कि— 1. जीवन और शक्ति का स्रोत एक सर्वोच्च सत्ता है। 2. मृत्यु उसी की व्यवस्था के अनुसार होती है। 3. यही शक्ति, राजसूय यज्ञ में राजा की तरह, सर्वोच्च मानी जाती है। ---

English Insight

He who gives life and vitality to all beings, he is the lord of all creatures. Death moves according to his will, and he alone is the supreme ruler, like a king in the Rajasuya sacrifice. This verse emphasizes the supreme sovereignty of the source of life and the natural order of existence.

शब्दार्थ

अभि = सामने, नज़दीक प्रेहि = फेंको, भेजो, नियंत्रित करो माप = सीमित रूप से, संतुलित रूप से वेन् = शत्रु, विरोधी उग्र = कठोर, क्रूर, तीव्र चेत्ता = चेतना, बुद्धि सपत्नहा = शत्रु को नष्ट करने वाला आ = पास, निकट तिष्ठ = स्थिर रहो, खड़ा रहो मित्रवर्धन = मित्रों को बढ़ाने वाला, समर्थन देने वाला तुभ्यं = तुम्हारे लिए देवा = देवता अधि ब्रुवन् = कहते हैं, आदेश देते हैं ---

सरल हिन्दी अर्थ

हे देवता, सभी तीव्र और चालाक शत्रुओं को नियंत्रित करो और उन्हें संतुलित रूप से दूर करो। तुम स्थिर रहो, हमारे मित्रों और समर्थकों को बढ़ाओ। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र सुरक्षा, सामरिक शक्ति और मित्रता की वृद्धि के लिए कहा गया है। “अभि प्रेहि माप वेन उग्रश्चेत्ता सपत्नहा” — हे देवता, हमारे सामने आने वाले शत्रु जो शक्तिशाली, क्रूर या चालाक हैं, उन पर नियंत्रण स्थापित करो। यह केवल शारीरिक सुरक्षा नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक सुरक्षा का भी निर्देश है। --- “आ तिष्ठ मित्रवर्धन तुभ्यं” — हमारे मित्र और सहयोगी तुम्हारे संरक्षण में बढ़ें। देवता के आदेश और आशीर्वाद से, मित्रों और समर्थकों की शक्ति बढ़ती है। यह वैदिक समाज में सामुदायिक सुरक्षा और सहयोग का महत्व दर्शाता है। --- “देवा अधि ब्रुवन्” — देवता आदेश दे रहे हैं। यह केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि दिव्य निर्देश और कार्यात्मक शक्ति की पुष्टि है। ---

आध्यात्मिक दृष्टि

मंत्र यह सिखाता है कि— ✔ नकारात्मक और हानिकारक शक्तियों को नियंत्रित करना चाहिए। ✔ मित्रों और सहयोगियों का समर्थन और वृद्धि आवश्यक है। ✔ शक्तिशाली संरक्षण और सकारात्मक ऊर्जा का संतुलन बनाए रखना चाहिए। ---

योगिक और मानसिक दृष्टि

शत्रु केवल बाहरी नहीं, आंतरिक भय, द्वेष और नकारात्मकता भी हो सकते हैं। मंत्र के माध्यम से— ✔ मन की चेतना को जागरूक करो ✔ नकारात्मकता को नियंत्रित करो ✔ मित्रवत और सहयोगी ऊर्जा को बढ़ाओ ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

सुरक्षा और सहयोग मानसिक स्थिरता लाते हैं। शत्रु या नकारात्मक परिस्थितियों के सामने, आंतरिक संतुलन और समर्थन प्राप्त करना आवश्यक है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के जीवन में शत्रु— ✔ प्रतिस्पर्धा ✔ नकारात्मक विचार ✔ सामाजिक दबाव इनसे निपटने के लिए— ✔ अपनी ऊर्जा और संसाधनों का संतुलित उपयोग ✔ मित्र और सहयोगियों का समर्थन ✔ सकारात्मक मानसिकता मंत्र हमें यह शिक्षा देता है। ---

सारांश

✔ शत्रु और नकारात्मक शक्तियों को नियंत्रित करो। ✔ मित्रों और समर्थकों को बढ़ाओ। ✔ देवताओं (सकारात्मक शक्ति) के आदेश और संरक्षण पर भरोसा रखो। यह मंत्र संतुलन, सुरक्षा और सामरिक जागरूकता का प्रतीक है। ---

English Insight

O Deities, restrain and control fierce and clever enemies near us. Remain steadfast, and strengthen our friends and allies. This verse emphasizes protection, the importance of allies, and the balance of defensive and supportive forces.

शब्दार्थ

आतिष्ठन्तं = खड़ा, प्रतिष्ठित परि = चारों ओर, समग्र रूप में विश्वे = विश्व में, सृष्टि में अभूषं = अलंकरण, सम्मान, शक्ति छ्रियं = ऐश्वर्य, वैभव, सम्पदा वसानश्चरति = वास करता है, चलता है स्वरोचिः = स्वर, तेज, प्रकाश महत्तत् = महान, विशाल वृष्णो = वीर, शक्तिशाली, वृषभ रूप असुरस्य = असुर का, नकारात्मक शक्ति का नामा = नाम विश्वरूपो = जो सर्वरूप है, ब्रह्मांड का स्वरूप अमृतानि = अमृत, दिव्य, शाश्वत तस्थौ = स्थित हुआ, प्रतिष्ठित ---

सरल हिन्दी अर्थ

संपूर्ण सृष्टि में प्रतिष्ठित, शक्ति और वैभव से परिपूर्ण, तेजस्वी स्वरूप वाला। वह महान वृषभ (वीर) है, असुरों का नाम और रूप, जो सर्वरूप है और अमृतों में प्रतिष्ठित है। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र सृष्टि के महान और सर्वव्यापी स्वरूप का वर्णन करता है। “आतिष्ठन्तं परि विश्वे अभूषं छ्रियं वसानश्चरति स्वरोचिः” — संपूर्ण सृष्टि में वह प्रतिष्ठित है। उसका स्वरूप शक्ति, वैभव और तेज से परिपूर्ण है। यह केवल भौतिक शक्ति नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और दिव्य शक्ति का भी प्रतीक है। --- “महत्तद्वृष्णो असुरस्य नामा” — यह महान वृषभ (वीर) है, जिसे असुरों के रूप में पहचान प्राप्त है। असुर यहाँ केवल नकारात्मक शक्तियों का प्रतीक हैं। इसलिए मंत्र बताता है कि वह शक्ति, जो नकारात्मक तत्वों को नियंत्रित करती है, महान और दिव्य है। --- “विश्वरूपो अमृतानि तस्थौ” — सर्वरूप (विश्वरूप) के रूप में वह अमर और दिव्य तत्वों में स्थित है। अर्थात्, यह शक्ति केवल सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त और अमर है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

मंत्र यह सिखाता है कि— ✔ ब्रह्मांड में हर शक्ति का अपना स्थान और उद्देश्य है। ✔ नकारात्मक शक्तियाँ भी व्यवस्था का हिस्सा हैं। ✔ उन्हें नियंत्रित और संतुलित रूप से समझना चाहिए। यह दृष्टिकोण हमें जीवन में स्थिरता, जागरूकता और संतुलन सिखाता है। ---

योगिक और आध्यात्मिक दृष्टि

योग और वेदांत में ब्रह्मांड की शक्ति का समग्र अनुभव महत्वपूर्ण है। यह मंत्र दर्शाता है कि सभी शक्तियाँ (सकारात्मक और नकारात्मक) सर्वरूप में दिव्य और अमर हैं। ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

असुर या नकारात्मक तत्व केवल भय उत्पन्न नहीं करते, बल्कि जागरूक और नियंत्रित दृष्टि से उन्हें समझना चाहिए। ✔ उनके अस्तित्व को स्वीकार करना ✔ उनका संतुलित उपयोग करना ✔ अपने जीवन में सकारात्मक प्रभाव लाना यह मंत्र इसी शिक्षा को देता है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के जीवन में— ✔ नकारात्मक परिस्थितियाँ ✔ कठिन चुनौतियाँ ✔ विरोधी शक्तियाँ सभी का उद्देश्य हमें सशक्त और जागरूक बनाना है। इस मंत्र से सीख— इन शक्तियों को समझकर संतुलित दृष्टि से सामना करना चाहिए। ---

सारांश

1. ब्रह्मांड में सर्वव्यापी शक्ति का अनुभव। 2. नकारात्मक तत्व भी दिव्य और स्थिर हैं। 3. अमर और सर्वरूप शक्ति जीवन और सृष्टि को नियंत्रित करती है। यह मंत्र जागरूकता, संतुलन और दिव्य शक्ति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। ---

English Insight

He who stands established across the universe, adorned with splendor and radiance, is the great Vṛṣṇa, known as the Asura, whose universal form is seated in the immortal realms. The verse emphasizes the omnipresence of divine power, its control over both positive and negative forces, and its eternal, cosmic nature.

शब्दार्थ

व्याघ्रः = व्याघ्र, शक्ति, वीर, शक्तिशाली अधि = ऊपर, प्रभुत्व के साथ वैयाघ्रे = व्याघ्र रूप में, वीर रूप में वि क्रमस्व = व्यवस्थित रूप से चल, क्रियाशील हो दिशः = दिशाएँ, स्थान महीः = पृथ्वी, क्षेत्र विशस्त्वा = फैल जाओ, व्यापो सर्वा = सभी वाञ्छन्तु = इच्छित हों, कामना करें आपः = जल, जीवनशक्ति दिव्याः = दिव्य, पवित्र पयस्वतीः = जीवनदायिनी, अमृतवत् ---

सरल हिन्दी अर्थ

हे व्याघ्र रूपी शक्ति, सभी दिशाओं और पृथ्वी पर अपने प्रभाव को व्यवस्थित रूप से फैलाओ। सभी दिव्य जल और जीवनदायिनी शक्तियाँ अपनी इच्छानुसार प्रवाहित हों। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र प्राकृतिक और दिव्य शक्तियों के नियंत्रित प्रवाह का वर्णन करता है। “व्याघ्रो अधि वैयाघ्रे वि क्रमस्व दिशो महीः” — यह व्याघ्र (वीर या शक्ति) सभी दिशाओं और पृथ्वी पर व्यवस्थित रूप से चले। सभी क्षेत्र और दिशाएँ उसी शक्ति के अनुसार सक्रिय हों। यह केवल शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि प्राकृतिक और आध्यात्मिक शक्ति का भी प्रतीक है। --- “विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्त्वापो दिव्याः पयस्वतीः” — सभी दिव्य जल, जो जीवनदायिनी और अमृतवत हैं, अपनी इच्छानुसार फैलें। यह मंत्र जीवन और ऊर्जा के प्रवाह का नियंत्रण दर्शाता है। यह प्राकृतिक तत्वों—जल, ऊर्जा और शक्ति—के संतुलन की पुष्टि करता है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

मंत्र यह सिखाता है कि— ✔ जीवनदायिनी शक्तियाँ और प्राकृतिक ऊर्जा का संतुलन आवश्यक है। ✔ सभी दिशाओं में शक्ति का नियंत्रण और प्रभाव आवश्यक है। ✔ दिव्य और अमर तत्वों का स्वतंत्र प्रवाह सृष्टि के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण है। ---

योगिक और मानसिक दृष्टि

योग और प्राणायाम में प्राकृतिक और जीवनशक्ति (प्राण) का संतुलित प्रवाह महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मंत्र इसी दृष्टि को दर्शाता है— ✔ शक्ति का नियंत्रित और संतुलित उपयोग ✔ जीवनदायिनी ऊर्जा का सही दिशा में प्रवाह ✔ मानसिक और आध्यात्मिक स्थिरता ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

मानव जीवन में— ✔ शक्ति, ऊर्जा और संसाधनों का संतुलित प्रयोग आवश्यक है। ✔ अधूरी या अनियंत्रित शक्ति हानिकारक हो सकती है। ✔ नियंत्रित और व्यवस्थित ऊर्जा मानसिक स्थिरता लाती है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के समय में यह मंत्र— ✔ प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन ✔ ऊर्जा का जिम्मेदार प्रयोग ✔ समाज में सकारात्मक शक्तियों का फैलाव की शिक्षा देता है। मंत्र हमें याद दिलाता है कि शक्ति और ऊर्जा का नियंत्रित प्रवाह ही कल्याण और स्थिरता लाता है। ---

सारांश

1. सभी दिशाओं और पृथ्वी में शक्ति का व्यवस्थित प्रवाह। 2. जीवनदायिनी और दिव्य जल का स्वतंत्र और नियंत्रित फैलाव। 3. संतुलित ऊर्जा और शक्ति जीवन और सृष्टि के लिए आवश्यक। यह मंत्र प्रकृति और जीवन शक्ति के संतुलन का प्रतीक है। ---

English Insight

O tiger-like power, move systematically across the directions and the Earth. Let all divine waters and life-giving forces flow freely and as desired. The verse emphasizes the controlled flow of natural and divine energies, ensuring balance and vitality in the universe.

शब्दार्थ

या = जो आपः = जल, जीवनदायिनी शक्ति दिव्याः = दिव्य, पवित्र पयसा = जीवनदायिनी, अमृतवत् मदन्ति = बढ़ती हैं, फैलती हैं अन्तरिक्ष = आकाश, आकाशीय क्षेत्र उत = या वा = या, अथवा पृथिव्याम् = पृथ्वी पर तासां = उनकी त्वा = तुम, देवता सर्वासाम् = सभी की आपाम् = जल, जीवनशक्ति अभि षिञ्चामि = हम छिड़कते हैं, प्रेषित करते हैं वर्चसा = शक्ति, वैभव, प्रभाव ---

सरल हिन्दी अर्थ

जो दिव्य जल आकाश में या पृथ्वी पर फैलती है, हे देवता, हम उसकी शक्ति से सभी जीवों को लाभ पहुँचाने के लिए इसे प्रेषित करते हैं। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र जीवनदायिनी शक्तियों और जल के दिव्य प्रवाह का उद्घोष करता है। “या आपो दिव्याः पयसा मदन्त्यन्तरिक्ष उत वा पृथिव्याम्” — जो जल, अमृतवत् और दिव्य, आकाश और पृथ्वी में फैलता है। यह केवल भौतिक जल नहीं, बल्कि जीवन और ऊर्जा का प्रतीक है। वह सभी जीवों को जीवन और शक्ति प्रदान करता है। --- “तासां त्वा सर्वासामपामभि षिञ्चामि वर्चसा” — हम उन दिव्य जलों की शक्ति को सभी पर फैलाने के लिए देवता से प्रार्थना करते हैं। “वर्चसा” से यह स्पष्ट है कि यह जल केवल भौतिक नहीं, बल्कि शक्ति, वैभव और आध्यात्मिक ऊर्जा भी है। ---

आध्यात्मिक दृष्टि

मंत्र यह सिखाता है कि— ✔ जीवनदायिनी शक्ति और ऊर्जा को सभी में फैलाना चाहिए। ✔ आकाश और पृथ्वी में समान रूप से जीवन और शक्ति व्याप्त है। ✔ दिव्य ऊर्जा का वितरण और प्रवाह सृष्टि के कल्याण के लिए आवश्यक है। यह ध्यान और प्रार्थना में ऊर्जा और आशीर्वाद का प्रतीक है। ---

योगिक और मानसिक दृष्टि

योग में प्राण और ऊर्जा का संतुलित प्रवाह आवश्यक है। यह मंत्र उसी सिद्धांत को उद्घाटित करता है— ✔ दिव्य और जीवनदायिनी शक्ति का संचरण ✔ सभी दिशाओं और प्राणियों में समान रूप से ऊर्जा का विस्तार ✔ मानसिक और आध्यात्मिक स्थिरता ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

इस मंत्र का मानसिक लाभ— ✔ सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव ✔ दूसरों के लिए लाभकारी दृष्टिकोण ✔ जीवन में संतुलन और स्थिरता यह दृष्टिकोण आंतरिक और बाहरी दोनों स्तरों पर कल्याणकारी है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के जीवन में— ✔ प्राकृतिक संसाधनों और जल का सम्मान ✔ जीवनदायिनी ऊर्जा का संतुलित वितरण ✔ सकारात्मक और सहयोगी दृष्टिकोण मंत्र हमें यह सिखाता है कि सभी जीवों और प्राकृतिक तत्वों में समान रूप से शक्ति और ऊर्जा वितरित करें। ---

सारांश

1. दिव्य जल और जीवनदायिनी शक्ति का प्रकट होना। 2. उसका समान रूप से सभी में वितरण। 3. यह शक्ति भौतिक और आध्यात्मिक दोनों रूपों में है। मंत्र जीवन, ऊर्जा और शक्ति के संतुलन का प्रतीक है। ---

English Insight

The divine waters, flowing in the sky or on Earth, O Deity, let their power and vitality be sprinkled upon all. This verse emphasizes the distribution of life-giving energy and the omnipresence of divine, vital forces in the universe.

शब्दार्थ

अभि = ऊपर, साथ में त्वा = तुम, देवता वर्चसासिचन्न् = शक्ति, वैभव और प्रभाव से परिपूर्ण आपो = जल, जीवनदायिनी शक्ति दिव्याः = दिव्य, पवित्र पयस्वतीः = जीवनदायिनी, अमृतवत् यथा = जिस प्रकार सो = वह, मित्र मित्रवर्धन = मित्रों को बढ़ाने वाला, सहयोग और समर्थन देने वाला तथा = वैसे ही, उसी प्रकार त्वा = तुम सविता = सूर्य, जीवनदाता, प्रेरक करत् = करता है, प्रदान करता है ---

सरल हिन्दी अर्थ

हे देवता, तुम्हारे दिव्य जल और जीवनदायिनी शक्तियाँ शक्ति और वैभव से परिपूर्ण हों। जैसे सूर्य मित्रों और जीवों का कल्याण करता है, वैसे ही तुम्हारा प्रभाव भी जीवन और सहयोग को बढ़ावा दे। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र जीवनदायिनी ऊर्जा, दिव्य जल और उनकी शक्तियों का सम्मान करता है। “अभि त्वा वर्चसासिचन्न् आपो दिव्याः पयस्वतीः” — हे देवता, तुम्हारा जल और जीवनशक्ति पूरी तरह से शक्ति और वैभव से भरपूर हो। यह केवल भौतिक तत्व नहीं, बल्कि दिव्य ऊर्जा और अमृत के समान है। यह मनुष्य, जीव-जंतु और सृष्टि के कल्याण के लिए कार्य करती है। --- “यथासो मित्रवर्धनस्तथा त्वा सविता करत्” — जैसे सूर्य अपनी ऊर्जा और प्रकाश से मित्र और जीवन को बढ़ाता है, वैसे ही देवताओं की शक्ति और जल सभी में मित्रवत, सहयोगपूर्ण और जीवनदायिनी रूप में प्रवाहित हो। यह भाग यह सिखाता है कि जीवन की ऊर्जा केवल अस्तित्व के लिए नहीं, बल्कि इसे फैलाने और सभी जीवों के कल्याण के लिए उपयोग करना चाहिए। ---

आध्यात्मिक अर्थ

मंत्र यह दर्शाता है कि— ✔ दिव्य और जीवनदायिनी ऊर्जा का पूर्ण अनुभव करना चाहिए। ✔ शक्ति और वैभव का उद्देश्य केवल आत्म-संपन्नता नहीं, बल्कि दूसरों और सृष्टि के कल्याण में होना चाहिए। ✔ सूर्य और दिव्य शक्तियों के समान, हमें भी जीवन और मित्रता को बढ़ावा देना चाहिए। ---

योगिक और मानसिक दृष्टि

योग और प्राणायाम में, जीवनशक्ति (प्राण) का संतुलित और व्यापक प्रवाह आवश्यक है। यह मंत्र उसी सिद्धांत को उद्घाटित करता है— ✔ ऊर्जा का व्यवस्थित और सकारात्मक प्रवाह ✔ सभी प्राणियों और प्रकृति में जीवनदायिनी शक्तियों का फैलाव ✔ मानसिक और आध्यात्मिक स्थिरता ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

मंत्र का मानसिक लाभ— ✔ सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास ✔ दूसरों के कल्याण के लिए सहानुभूति और सहयोग ✔ जीवन में स्थिरता और संतुलन यह सिखाता है कि शक्ति और ऊर्जा का प्रयोग केवल स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि मित्रवत और सहायक कार्यों में होना चाहिए। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के जीवन में यह मंत्र हमें— ✔ प्राकृतिक संसाधनों और जल का सम्मान ✔ जीवनशक्ति और ऊर्जा का सही दिशा में प्रयोग ✔ मित्रों, समाज और सहयोगियों के कल्याण में सक्रिय होना की शिक्षा देता है। ---

सारांश

1. देवताओं के जल और जीवनदायिनी शक्तियाँ वैभव और ऊर्जा से परिपूर्ण हों। 2. उनका प्रभाव सभी जीवों और मित्रों के कल्याण के लिए हो। 3. सूर्य और मित्रवर्धन की तरह, शक्ति का उपयोग सहायक और जीवनदायिनी होना चाहिए। यह मंत्र जीवन, शक्ति और सहयोग का प्रतीक है। ---

English Insight

O Deity, may your divine waters and life-giving forces be full of strength and radiance. As the Sun increases vitality and well-being of all, may your power also enhance life and harmony among beings. The verse emphasizes the amplification of life, positive influence, and the spreading of divine, supportive energy throughout the universe.

शब्दार्थ

एना = इस प्रकार, इस शक्ति से व्याघ्रं = व्याघ्र, शक्ति, वीर, साहसी परिषस्वजानाः = सभ्य लोग, प्रजाएँ, अनुशासित लोग सिंहं हिन्वन्ति = सिंह को मारते हैं, नियंत्रित करते हैं महते = महान, बड़े, शक्तिशाली सौभगाय = भाग्य, कल्याण, सौभाग्य समुद्रं = समुद्र न सुभुवः = स्थिर नहीं है, या प्रभावित नहीं होता स्थिवांसं = हाथी, विशाल प्राणी मर्मृज्यन्ते = चोट पहुँचते हैं, क्षति पहुँचते हैं द्वीपिनम् = द्वीप, क्षेत्र अप्स्वन्तः = जल में, पानी में ---

सरल हिन्दी अर्थ

इस प्रकार नियंत्रित और अनुशासित शक्ति के द्वारा, सभ्य लोग महान सिंह को नियंत्रित करते हैं और कल्याण सुनिश्चित करते हैं। जैसे समुद्र स्थिर रहता है और द्वीप तथा हाथियों को प्रभावित नहीं करता, वैसे ही यह शक्ति अपने प्रभाव में संतुलित और नियंत्रित रहती है। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र शक्ति और अनुशासन के सामंजस्य का प्रतीक है। “एना व्याघ्रं परिषस्वजानाः सिंहं हिन्वन्ति महते सौभगाय” — अनुशासित और विवेकशील प्रजाएँ या लोग, व्याघ्र (साहसी और वीर) को नियंत्रित करते हैं। सिंह का प्रतीक यहाँ बड़े और शक्तिशाली कार्यों या शक्ति का है। यह दर्शाता है कि केवल शक्ति ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अनुशासन और विवेक के साथ उसका उपयोग करना आवश्यक है। महत्तम सौभाग्य और कल्याण उसी अनुशासन में निहित हैं। --- “समुद्रं न सुभुवस्तस्थिवांसं मर्मृज्यन्ते द्वीपिनमप्स्वन्तः” — यहाँ समुद्र और द्वीप का उदाहरण दिया गया है। समुद्र विशाल और अप्रभावित रहता है, वह हाथियों और द्वीपों को क्षति नहीं पहुँचाता। यह संकेत करता है कि वास्तविक शक्ति संतुलित और नियंत्रित होनी चाहिए। जो शक्ति संतुलित नहीं होती, वह विनाशक हो सकती है, परंतु जो शक्ति विवेक और अनुशासन से संचालित होती है, वह सभी के कल्याण के लिए स्थिर और अनुकूली रहती है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

मंत्र यह सिखाता है कि— ✔ शक्ति और साहस का विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। ✔ अनुशासन और सामंजस्य के बिना शक्ति हानिकारक हो सकती है। ✔ संतुलित शक्ति ही स्थिरता और कल्याण लाती है। ---

योगिक और मानसिक दृष्टि

यह मंत्र योग और मानसिक अनुशासन में भी उपयुक्त है। ✔ मानसिक शक्ति और साहस का नियंत्रित उपयोग ✔ बाहरी और आंतरिक ऊर्जा का संतुलित प्रवाह ✔ सशक्त लेकिन शांत, विवेकपूर्ण व्यक्तित्व का विकास ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

✔ शक्ति और सामर्थ्य का सही उपयोग सामाजिक और व्यक्तिगत स्थिरता देता है। ✔ बिना अनुशासन के शक्ति विनाशक होती है। ✔ विवेकपूर्ण शक्ति कल्याण और संतुलन की कुंजी है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के जीवन में यह मंत्र हमें सिखाता है कि— ✔ नेतृत्व और शक्ति का विवेकपूर्ण उपयोग करें। ✔ अनुशासन और संतुलन के साथ कार्य करें। ✔ शक्ति केवल प्रभाव के लिए नहीं, कल्याण के लिए हो। यह मंत्र हमें यह याद दिलाता है कि शक्ति को नियंत्रित और विवेकपूर्ण बनाना ही जीवन और समाज में स्थिरता लाता है। ---

सारांश

1. शक्ति और साहस का संतुलित और विवेकपूर्ण उपयोग। 2. अनुशासन और नियंत्रण से शक्ति कल्याणकारी बनती है। 3. स्थिरता और संतुलन वास्तविक शक्ति का संकेत हैं। ---

English Insight

By disciplined and controlled strength, the mighty tiger is subdued and even the lion is managed for the greater good. Just as the ocean remains stable, not harming islands or elephants, true power flows with balance, control, and benevolence. The verse teaches that strength without discipline is destructive, while controlled strength fosters stability and prosperity.

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