न्याय दर्शन सूत्र प्रथम अध्याय प्रथम भाग


सूत्र 1 – पदार्थोद्देश
सूत्र:
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम् तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः ।।

सरल व्याख्या:
इन सोलह पदार्थों के यथार्थ ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सूत्र 2 – दुःख और अपवर्ग
सूत्र:
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानाम् उत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः ।।

व्याख्या:
मिथ्याज्ञान से दुःख उत्पन्न होता है, उसका पूर्ण नाश ही मोक्ष है।
सूत्र 3 – प्रमाण
सूत्र:
प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ।।

व्याख्या:
ज्ञान के चार प्रमाण हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द।
सूत्र 4 – प्रत्यक्ष
सूत्र:
इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ।।

व्याख्या:
इन्द्रियों और विषय के संपर्क से उत्पन्न निश्चित ज्ञान प्रत्यक्ष है।
सूत्र 5 – अनुमान
सूत्र:
अथ तत्पूर्वकं त्रिविधम् अनुमानं पूर्ववत् शेषवत् सामान्यतोदृष्टं च ।।

व्याख्या:
अनुमान तीन प्रकार का होता है।
सूत्र 6 – उपमान
सूत्र:
प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधनम् उपमानम् ।।

व्याख्या:
समानता से होने वाला ज्ञान उपमान कहलाता है।
सूत्र 7 – शब्द
सूत्र:
आप्तोपदेशः शब्दः ।।

व्याख्या:
विश्वसनीय व्यक्ति का उपदेश शब्द प्रमाण है।
सूत्र 8 – शब्द भेद
सूत्र:
स द्विविधो दृष्टादृष्टार्थत्वात् ।।

व्याख्या:
शब्द प्रमाण दो प्रकार का होता है – लौकिक और वैदिक।
सूत्र 9 – प्रमेय
सूत्र:
आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् ।।

व्याख्या:
आत्मा से लेकर मोक्ष तक सभी जानने योग्य विषय प्रमेय हैं।
सूत्र 10 – आत्मा
सूत्र:
इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानानि आत्मनः लिङ्गम् इति ।।

व्याख्या:
इच्छा, द्वेष, ज्ञान आदि आत्मा के लक्षण हैं।
सूत्र 11 – शरीर
सूत्र:
चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ।।

व्याख्या:
इन्द्रियों और क्रियाओं का आधार शरीर है।
सूत्र 12 – इन्द्रियाँ
सूत्र:
घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणि इन्द्रियाणि भूतेभ्यः ।।

व्याख्या:
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच भूतों से बनी हैं।
सूत्र 13 – भूत
सूत्र:
पृथिवी आपः तेजः वायुः आकाशं इति भूतानि ।।

व्याख्या:
पाँच महाभूत बताए गए हैं।
सूत्र 14 – गुण
सूत्र:
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणाः ।।

व्याख्या:
गन्ध आदि भूतों के गुण हैं।
सूत्र 15 – बुद्धि
सूत्र:
बुद्धिः उपलब्धिः ज्ञानं इति अनर्थान्तरम् ।।

व्याख्या:
बुद्धि और ज्ञान एक ही हैं।
सूत्र 16 – मन
सूत्र:
युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिः मनसः लिङ्गम् ।।

व्याख्या:
एक समय में एक ही ज्ञान होना मन का लक्षण है।
सूत्र 17 – प्रवृत्ति
सूत्र:
प्रवृत्तिः वाग्बुद्धिशरीरारम्भः ।।

व्याख्या:
वाणी, बुद्धि और शरीर की क्रिया प्रवृत्ति है।
सूत्र 18 – दोष
सूत्र:
प्रवर्त्तनालक्षणाः दोषाः ।।

व्याख्या:
जो कर्म के लिए प्रेरित करें वे दोष हैं।
सूत्र 19 – प्रेत्यभाव
सूत्र:
पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः ।।

व्याख्या:
मृत्यु के बाद पुनर्जन्म।
सूत्र 20 – फल
सूत्र:
प्रवृत्तिदोषजनितः अर्थः फलम् ।।

व्याख्या:
कर्म से उत्पन्न परिणाम फल है।
सूत्र 21 – दुःख
सूत्र:
बाधनालक्षणं दुःखम् ।।

व्याख्या:
पीड़ा देने वाला अनुभव दुःख है।
सूत्र 22 – अपवर्ग
सूत्र:
तदत्यन्तविमोक्षः अपवर्गः ।।

व्याख्या:
दुःख से पूर्ण मुक्ति ही मोक्ष है।
सूत्र 23 – संशय
सूत्र:
समानानेकधर्मोपपत्तेः ... विमर्शः संशयः ।।

व्याख्या:
निश्चित ज्ञान का अभाव संशय है।
सूत्र 24 – प्रयोजन
सूत्र:
यं अर्थं अधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम् ।।

व्याख्या:
जिस उद्देश्य से कार्य किया जाए वही प्रयोजन है।
सूत्र 25 – दृष्टान्त
सूत्र:
लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिनर्थे बुद्धिसाम्यं सः दृष्टान्तः ।।

व्याख्या:
सर्वमान्य उदाहरण को दृष्टान्त कहते हैं।
सूत्र 26 – सिद्धान्त
सूत्र:
तन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः ।।

सरल व्याख्या:
किसी शास्त्र में जिस विषय को निश्चित रूप से स्वीकार कर लिया गया हो, वह सिद्धान्त कहलाता है।
सूत्र 27 – सिद्धान्त के भेद
सूत्र:
सः चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थित्यर्थान्तरभावात् ।।

व्याख्या:
सिद्धान्त चार प्रकार का होता है – सर्वतन्त्र, प्रतितन्त्र, अधिकरण और अभ्युपगम सिद्धान्त।
सूत्र 28 – सर्वतन्त्र सिद्धान्त
सूत्र:
सर्वतन्त्राविरुद्धः तन्त्रे अधिकृतः अर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः ।।

व्याख्या:
जो सिद्धान्त सभी शास्त्रों में मान्य हो, वह सर्वतन्त्र सिद्धान्त कहलाता है।
सूत्र 29 – प्रतितन्त्र सिद्धान्त
सूत्र:
समानतन्त्रसिद्धः परतन्त्रासिद्धः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः ।।

व्याख्या:
जो सिद्धान्त अपने शास्त्र में मान्य हो पर अन्य शास्त्रों में न हो, वह प्रतितन्त्र सिद्धान्त है।
सूत्र 30 – अधिकरण सिद्धान्त
सूत्र:
यत्सिद्धौ अन्यप्रकरणसिद्धिः सः अधिकरणसिद्धान्तः ।।

व्याख्या:
जिस सिद्धान्त के सिद्ध होने पर अन्य विषय स्वतः सिद्ध हो जाएँ, वह अधिकरण सिद्धान्त है।
सूत्र 31 – अभ्युपगम सिद्धान्त
सूत्र:
अपरीक्षिताभ्युपगमात्तद्विशेषपरीक्षणं अभ्युपगमसिद्धान्तः ।।

व्याख्या:
जिसे अस्थायी रूप से मानकर तर्क-वितर्क किया जाए, वह अभ्युपगम सिद्धान्त है।
सूत्र 32 – अवयव
सूत्र:
प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनानि अवयवाः ।।

व्याख्या:
प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन – ये पाँच अवयव हैं।
सूत्र 33 – प्रतिज्ञा
सूत्र:
साध्यनिर्देशः प्रतिज्ञा ।।

व्याख्या:
जिस बात को सिद्ध करना हो, उसका कथन प्रतिज्ञा कहलाता है।
सूत्र 34 – हेतु (साधर्म्य)
सूत्र:
उदाहरणसाधर्म्यात्साध्यसाधनं हेतुः ।।

व्याख्या:
समान गुणों के आधार पर साध्य को सिद्ध करने वाला कारण हेतु है।
सूत्र 35 – हेतु (वैधर्म्य)
सूत्र:
तथा वैधर्म्यात् ।।

व्याख्या:
विपरीत गुणों के आधार पर भी हेतु सिद्ध किया जा सकता है।
सूत्र 36 – उदाहरण
सूत्र:
साध्यसाधर्म्यात्तद्धर्मभावी दृष्टान्तः उदाहरणम् ।।

व्याख्या:
जिस उदाहरण में साध्य के समान धर्म हों, वह उदाहरण कहलाता है।
सूत्र 37 – विपरीत उदाहरण
सूत्र:
तद्विपर्ययात्वा विपरीतम् ।।

व्याख्या:
जहाँ साध्य का अभाव हो, वह विपरीत उदाहरण कहलाता है।
सूत्र 38 – उपनय
सूत्र:
उदाहरणापेक्षः तथा इति उपसंहारः न तथा इति वा साध्यस्य उपनयः ।।

व्याख्या:
उदाहरण को विषय पर लागू करना उपनय कहलाता है।
सूत्र 39 – निगमन
सूत्र:
हेत्वपदेशात्प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम् ।।

व्याख्या:
प्रतिज्ञा का अंतिम निष्कर्ष निगमन कहलाता है।
सूत्र 40 – तर्क
सूत्र:
अविज्ञाततत्वे अर्थे कारणोपपत्तितः तत्त्वज्ञानार्थं उहः तर्कः ।।

व्याख्या:
सत्य तक पहुँचने के लिए किया गया विचार तर्क कहलाता है।
सूत्र 41 – निर्णय
सूत्र:
विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यां अर्थावधारणं निर्णयः ।।

व्याख्या:
पक्ष और विपक्ष पर विचार कर निश्चित निष्कर्ष निकालना निर्णय है।
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