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दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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विद्वान कौन है? | यजुर्वेद 40.16 में चेतना, विद्या और परम सत्य की व्याख्या

विद्वान की वैदिक परिभाषा – यजुर्वेद 40.16 में चेतना और अग्नि का प्रतीक Vedic sage symbolizing true Vidwan beyond body and intellect


विद्वान कौन है?

वैदिक दृष्टि में विद्वत्ता, चेतना और परमात्मा के समकक्ष मानव

(यजुर्वेद 40.16 के आलोक में)


1. भूमिका : “विद्वान” शब्द की आधुनिक दरिद्रता

आज के युग में “विद्वान” शब्द अत्यंत हल्का हो चुका है।
जिसके पास डिग्री है — वह विद्वान।
जिसने किताबें पढ़ लीं — वह विद्वान।
जिसे भाषण देना आता है — वह विद्वान।

परंतु वेद इस परिभाषा को अस्वीकार करते हैं।

वेदों के लिए विद्वान कोई सूचनाओं का भंडार नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था है जहाँ मनुष्य शरीर नहीं रहता, स्वामी बन जाता है

यजुर्वेद का यह मंत्र उसी उच्चतम विद्वत्ता का उद्घाटन करता है —

“ओ३म् अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युवोध्यस्मज्जुहुराणामेनो
भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम॥”
— यजुर्वेद 40.16

यह कोई साधारण प्रार्थना नहीं है।
यह मानव से परमात्मा के समकक्ष उठने का वैदिक घोष है।


2. यह मंत्र मानव कल्पना नहीं है — यह अपौरुषेय है

सबसे पहले एक मौलिक तथ्य समझना आवश्यक है —

यह मंत्र किसी मानव मस्तिष्क की उपज नहीं है।

✔ यह कालजयी है
✔ यह अपौरुषेय है
✔ यह परमेश्वर द्वारा सृजित है

मानव मस्तिष्क तर्क कर सकता है,
परंतु यह मंत्र तर्क के परे चेतना के स्तर पर कार्य करता है

यही कारण है कि इसमें प्रयुक्त अलंकार, प्रतीक और अर्थ
सामान्य बुद्धि की पकड़ से बाहर हैं।


3. “अग्नि” क्यों कहा गया विद्वान को?

मंत्र का पहला शब्द ही चौंकाता है —

“अग्ने”

सामान्य व्यक्ति सोचता है —
क्या विद्वान को अग्नि कह दिया गया?

यहाँ अग्नि कोई लौ नहीं है।
यहाँ अग्नि एक तत्त्वात्मक संकेत है।

3.1 अग्नि का वैदिक अर्थ

अग्नि वह है —

  • जो सभी भौतिक पदार्थों को भस्म कर देती है
  • जो अज्ञान को नष्ट कर देती है
  • जो रूप को समाप्त कर सार तक पहुँचाती है

एक ही पदार्थ ऐसा है जो अग्नि से नष्ट नहीं होता —

पारा (Mercury)

वैदिक दृष्टि में पारा चेतना का प्रतीक है।

अर्थात —

जो भस्म नहीं होता — वही चेतन है।


4. विद्वान : शरीर नहीं, शरीर का स्वामी

यहीं से विद्वान की असली परिभाषा जन्म लेती है —

विद्वान वह है जो शरीर नहीं है,
बल्कि शरीर का स्वामी है।

सामान्य मनुष्य कहता है —

  • मैं दुखी हूँ
  • मैं बीमार हूँ
  • मैं डर रहा हूँ

विद्वान कहता है —

  • शरीर दुखी है
  • मन अस्थिर है
  • मैं साक्षी हूँ

यह अंतर सूक्ष्म नहीं,
यह संपूर्ण अस्तित्व का अंतर है।


5. विद्वान अग्नि से श्रेष्ठ क्यों कहा गया?

मंत्र में विद्वान को अग्नि कहा गया,
परंतु साथ ही संकेत है कि वह अग्नि से भी श्रेष्ठ है।

क्यों?

  • अग्नि पदार्थ को जलाती है
  • विद्वान अहंकार, अज्ञान और अंधकार को जलाता है

अग्नि बाहर कार्य करती है
विद्वान भीतर कार्य करता है


6. अतिन्द्रिय विद्या : विद्वान की वास्तविक शक्ति

विद्वान की बुद्धि —

  • इंद्रियों से परे होती है
  • विषयों से परे होती है
  • निर्विषय चेतना को देख सकती है

वह केवल वही नहीं जानता जो दिखता है,
वह जानता है जो अब तक अज्ञात है

विद्वान का कार्य ज्ञात को दोहराना नहीं,
अज्ञात तक मार्ग बनाना है।


7. विद्वान का कर्तव्य : नये मार्ग का अन्वेषण

मंत्र कहता है —

“नय सुपथा”
हमें श्रेष्ठ मार्ग से ले चलो

विद्वान वह नहीं जो पुराने रास्तों पर भीड़ बढ़ा दे।
विद्वान वह है जो —

  • अंधकार में नया पथ खोजे
  • उसे सरल बनाए
  • सामान्य जन के लिए सुलभ करे

8. लौकिक और परमार्थिक ऐश्वर्य

यह विद्या केवल मोक्ष की बात नहीं करती।

वैदिक विद्वान —

  • लौकिक संपदा भी देता है
  • परमार्थिक ऐश्वर्य भी देता है

परंतु —

सामान्य नहीं, असाधारण।

यह धन आश्चर्यमय होता है
यह उपलब्धि साधारण नहीं होती


9. वायु का रूपक : विद्वान क्यों सर्वप्रिय होता है

जैसे —

  • सभी जीवों के लिए वायु अनिवार्य है
  • कोई वायु को देख नहीं सकता
  • परंतु उसके बिना कोई जी नहीं सकता

उसी प्रकार —

विद्वान दिखाई नहीं देता,
परंतु उसके बिना समाज जीवित नहीं रह सकता।


10. विद्वान का दान : विद्या, सत्ता नहीं

विद्वान का सबसे बड़ा दान —

  • पद नहीं
  • सत्ता नहीं
  • अधिकार नहीं

बल्कि —

विद्या

और यह विद्या ऐसी होती है कि —

  • वह मनुष्य को देवताओं के समकक्ष खड़ा कर देती है
  • उसमें एकत्व की स्थापना कर देती है
  • वैदिक विद्वान की परिभाषा
  • यजुर्वेद 40.16 अर्थ
  • विद्या और चेतना
  • विद्वान और परमात्मा
  • वैदिक दर्शन
  • अग्नि का वैदिक अर्थ
  • विद्वत्ता क्या है
  • ब्रह्मज्ञान और विद्या

11. विद्वान के संपर्क में आने वाला क्या बनता है?

यह मंत्र का सबसे क्रांतिकारी बिंदु है —

जो विद्वान के संपर्क में आता है,
वह विद्वान के तुल्य बन जाता है।

यह गुरु-शिष्य परंपरा का रहस्य है।

विद्वान शिष्य को —

  • अनुयायी नहीं बनाता
  • भक्त नहीं बनाता

वह उसे अपने समान बना देता है।

 विद्वान की वैदिक परिभाषा क्या है

यजुर्वेद में विद्वान का अर्थ

true scholar in Vedas

difference between intellectual and vidwan

consciousness vs body in vedas

अग्नि का दार्शनिक अर्थ


12. आधुनिक युग में विद्वान क्यों लुप्त है?

क्योंकि —

  • आज ज्ञान बिकाऊ है
  • आज विद्या प्रदर्शन है
  • आज गहराई का मूल्य नहीं

आज लोग —

  • पढ़ते नहीं
  • ठहरते नहीं
  • जलते नहीं (अग्नि नहीं बनते)

13. निष्कर्ष : विद्वान होना पद नहीं, अवस्था है

विद्वान —

  • डिग्री नहीं
  • उपाधि नहीं
  • पहचान नहीं

विद्वान —

चेतना की वह अग्नि है
जो स्वयं को जलाकर
दूसरों को प्रकाश देती है।

यही इस एक पंक्ति के मंत्र का संभावित अर्थ है।
इसके आगे और भी बहुत कुछ है।

पर इतना समझ लेना ही पर्याप्त है कि —

विद्वान परमात्मा से कम नहीं,
और सामान्य मनुष्य से कहीं अधिक है।



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