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दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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भारत की आत्मा, ऋषि परंपरा और वैदिक चेतना

                  


विद्वान कौन है?

भारत की आत्मा, ऋषि परंपरा और वैदिक चेतना


भूमिका: प्रश्न जो युगों से अनुत्तरित है

आज के आधुनिक युग में जब शिक्षा को डिग्री, ज्ञान को सूचना और बुद्धि को केवल तार्किक गणना तक सीमित कर दिया गया है, तब एक मूल प्रश्न बार-बार हमारे सामने खड़ा होता है — विद्वान कौन है?

क्या वह व्यक्ति विद्वान है जिसने अनेक विश्वविद्यालयों से उपाधियाँ प्राप्त की हैं? या वह जिसने असंख्य पुस्तकें पढ़ ली हैं? अथवा वह जो समाज में प्रसिद्ध वक्ता या विचारक कहलाता है?

वैदिक भारत का उत्तर इन सबसे भिन्न है। वहाँ विद्वान वह नहीं था जो केवल जानता था, बल्कि वह था जो स्वयं को जान गया हो


1. विद्वान की वैदिक परिभाषा

वेदों में विद्वान शब्द का प्रयोग केवल बौद्धिक क्षमता के लिए नहीं हुआ है। संस्कृत में विद्वान शब्द की उत्पत्ति “विद्” धातु से हुई है, जिसका अर्थ है — जानना, लेकिन यह जानना बाह्य नहीं, आत्म-ज्ञान है।

"नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन" — कठोपनिषद

अर्थात आत्मा न तो प्रवचनों से, न बुद्धि से, न अधिक सुनने से प्राप्त होती है।

अतः वैदिक विद्वान वह है जिसने:

  • शरीर को साधन माना
  • मन को शुद्ध किया
  • बुद्धि को अनुशासित किया
  • और अंततः आत्मा को जाना

2. आधुनिक शिक्षा बनाम वैदिक विद्या

आधुनिक शिक्षा प्रणाली सूचना पर आधारित है। वह हमें बताती है क्या है, लेकिन यह नहीं सिखाती कि हम कौन हैं

वैदिक शिक्षा इसके विपरीत थी। गुरुकुल में पहला प्रश्न होता था:

“तुम कौन हो?”

नाम, जाति, परिवार नहीं — बल्कि चेतना की पहचान।

आज का शिक्षित व्यक्ति अक्सर:

  • अधिक जानता है
  • कम समझता है
  • और स्वयं से कट चुका होता है

जबकि वैदिक विद्वान:

  • कम बोलता था
  • गहराई से देखता था
  • और मौन में अधिक जानता था

3. भारत: एक देश नहीं, एक चेतना

भारत को केवल भौगोलिक राष्ट्र मानना एक ऐतिहासिक भूल है। वैदिक दृष्टि में भारत एक जीवित चेतना है।

ऋषियों ने भारत को:

  • पुण्यभूमि
  • तपोभूमि
  • कर्मभूमि

कहा है।

यहाँ नदियाँ केवल जलधारा नहीं थीं, वे चेतना की धाराएँ थीं। पर्वत केवल पत्थर नहीं थे, वे ऊर्जा-स्तंभ थे।

इस भूमि पर विद्वान बनने का अर्थ था — भूमि, आकाश और आत्मा के बीच सामंजस्य स्थापित करना


4. ऋषि विश्वामित्र: विद्वान से ब्रह्मर्षि तक

ऋषि विश्वामित्र की कथा विद्वान की यात्रा को स्पष्ट करती है। वे जन्म से राजा थे — शक्ति, सेना और सत्ता के स्वामी। लेकिन एक क्षण आया जब उन्होंने वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में देखा कि आत्मबल भौतिक बल से श्रेष्ठ है

उन्होंने राजपाट छोड़ा, तप किया, असफल हुए, क्रोधित हुए, गिरे — लेकिन रुके नहीं।

विश्वामित्र विद्वान इसलिए नहीं थे कि उन्होंने मंत्र रचे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने अपने अहंकार को पराजित किया

विद्वान वही है जो स्वयं से हारकर सत्य से जीतता है।


5. राजा हरिश्चंद्र: सत्य का विद्वान

राजा हरिश्चंद्र को अक्सर केवल सत्यवादी राजा कहा जाता है, पर वास्तव में वे कर्मयोग के विद्वान थे।

उन्होंने:

  • राज्य छोड़ा
  • पत्नी को खोया
  • पुत्र को मृत देखा
  • स्वयं को दास बनाया

फिर भी सत्य नहीं छोड़ा।

वैदिक दृष्टि में विद्वान वह नहीं जो ज्ञान पर भाषण दे, बल्कि वह जो ज्ञान को जी सके

हरिश्चंद्र का विद्वान होना उनके शब्दों में नहीं, उनके त्याग में था।


6. अगस्त्य ऋषि: विज्ञान और चेतना का संगम

अगस्त्य ऋषि को केवल पौराणिक पात्र समझना भारी भूल है। वे:

  • भूगोलवेत्ता थे
  • खगोलविद थे
  • आयुर्वेदाचार्य थे
  • और महान योगी थे

दक्षिण भारत की सभ्यता, नदियों का प्रवाह, समुद्री विज्ञान — सब उनके ज्ञान से जुड़े हैं।

वैदिक विद्वान का अर्थ था — विज्ञान और अध्यात्म का विभाजन नहीं, एकता


7. विद्वान और मौन

ऋषि कम बोलते थे। मौन उनकी भाषा थी।

आज का विद्वान बनने की होड़ में व्यक्ति लगातार बोलता है — मंच, सोशल मीडिया, लेख।

पर वैदिक विद्वान जानता था:

जो जानता है, वह मौन हो जाता है।

मौन अज्ञान नहीं, परिपक्व ज्ञान का लक्षण है।


8. क्यों आज विद्वान दुर्लभ हैं?

क्योंकि:

  • साधना कठिन है
  • अनुशासन अप्रिय है
  • और आत्मनिरीक्षण असुविधाजनक

आज हम दूसरों को सुधारना चाहते हैं, स्वयं को नहीं।

विद्वान बनने के लिए पहला कदम है — अपने अज्ञान को स्वीकार करना


9. आधुनिक युग में विद्वान कैसे बनें?

विद्वान बनने के लिए:

  • प्रतिदिन मौन का अभ्यास
  • शास्त्रों का अध्ययन, पर अंधानुकरण नहीं
  • प्रकृति से संवाद
  • और सबसे महत्वपूर्ण — सत्य से समझौता नहीं

उपसंहार: विद्वान एक पद नहीं, एक अवस्था है

विद्वान होना उपलब्धि नहीं, अवस्था है।

जब व्यक्ति जान लेता है कि:

  • वह शरीर नहीं है
  • वह केवल विचार नहीं है
  • वह चेतना है

तब वह विद्वान होता है।

भारत ने ऐसे ही विद्वानों को जन्म दिया था — और भविष्य में भी देगा।

क्योंकि भारत मिट्टी नहीं, चेतना है।

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