आज के आधुनिक युग में जब शिक्षा को डिग्री, ज्ञान को सूचना और बुद्धि को केवल तार्किक गणना तक सीमित कर दिया गया है, तब एक मूल प्रश्न बार-बार हमारे सामने खड़ा होता है — विद्वान कौन है?
क्या वह व्यक्ति विद्वान है जिसने अनेक विश्वविद्यालयों से उपाधियाँ प्राप्त की हैं? या वह जिसने असंख्य पुस्तकें पढ़ ली हैं? अथवा वह जो समाज में प्रसिद्ध वक्ता या विचारक कहलाता है?
वैदिक भारत का उत्तर इन सबसे भिन्न है। वहाँ विद्वान वह नहीं था जो केवल जानता था, बल्कि वह था जो स्वयं को जान गया हो।
वेदों में विद्वान शब्द का प्रयोग केवल बौद्धिक क्षमता के लिए नहीं हुआ है। संस्कृत में विद्वान शब्द की उत्पत्ति “विद्” धातु से हुई है, जिसका अर्थ है — जानना, लेकिन यह जानना बाह्य नहीं, आत्म-ज्ञान है।
"नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन" — कठोपनिषद
अर्थात आत्मा न तो प्रवचनों से, न बुद्धि से, न अधिक सुनने से प्राप्त होती है।
अतः वैदिक विद्वान वह है जिसने:
आधुनिक शिक्षा प्रणाली सूचना पर आधारित है। वह हमें बताती है क्या है, लेकिन यह नहीं सिखाती कि हम कौन हैं।
वैदिक शिक्षा इसके विपरीत थी। गुरुकुल में पहला प्रश्न होता था:
“तुम कौन हो?”
नाम, जाति, परिवार नहीं — बल्कि चेतना की पहचान।
आज का शिक्षित व्यक्ति अक्सर:
जबकि वैदिक विद्वान:
भारत को केवल भौगोलिक राष्ट्र मानना एक ऐतिहासिक भूल है। वैदिक दृष्टि में भारत एक जीवित चेतना है।
ऋषियों ने भारत को:
कहा है।
यहाँ नदियाँ केवल जलधारा नहीं थीं, वे चेतना की धाराएँ थीं। पर्वत केवल पत्थर नहीं थे, वे ऊर्जा-स्तंभ थे।
इस भूमि पर विद्वान बनने का अर्थ था — भूमि, आकाश और आत्मा के बीच सामंजस्य स्थापित करना।
ऋषि विश्वामित्र की कथा विद्वान की यात्रा को स्पष्ट करती है। वे जन्म से राजा थे — शक्ति, सेना और सत्ता के स्वामी। लेकिन एक क्षण आया जब उन्होंने वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में देखा कि आत्मबल भौतिक बल से श्रेष्ठ है।
उन्होंने राजपाट छोड़ा, तप किया, असफल हुए, क्रोधित हुए, गिरे — लेकिन रुके नहीं।
विश्वामित्र विद्वान इसलिए नहीं थे कि उन्होंने मंत्र रचे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने अपने अहंकार को पराजित किया।
विद्वान वही है जो स्वयं से हारकर सत्य से जीतता है।
राजा हरिश्चंद्र को अक्सर केवल सत्यवादी राजा कहा जाता है, पर वास्तव में वे कर्मयोग के विद्वान थे।
उन्होंने:
फिर भी सत्य नहीं छोड़ा।
वैदिक दृष्टि में विद्वान वह नहीं जो ज्ञान पर भाषण दे, बल्कि वह जो ज्ञान को जी सके।
हरिश्चंद्र का विद्वान होना उनके शब्दों में नहीं, उनके त्याग में था।
अगस्त्य ऋषि को केवल पौराणिक पात्र समझना भारी भूल है। वे:
दक्षिण भारत की सभ्यता, नदियों का प्रवाह, समुद्री विज्ञान — सब उनके ज्ञान से जुड़े हैं।
वैदिक विद्वान का अर्थ था — विज्ञान और अध्यात्म का विभाजन नहीं, एकता।
ऋषि कम बोलते थे। मौन उनकी भाषा थी।
आज का विद्वान बनने की होड़ में व्यक्ति लगातार बोलता है — मंच, सोशल मीडिया, लेख।
पर वैदिक विद्वान जानता था:
जो जानता है, वह मौन हो जाता है।
मौन अज्ञान नहीं, परिपक्व ज्ञान का लक्षण है।
क्योंकि:
आज हम दूसरों को सुधारना चाहते हैं, स्वयं को नहीं।
विद्वान बनने के लिए पहला कदम है — अपने अज्ञान को स्वीकार करना।
विद्वान बनने के लिए:
विद्वान होना उपलब्धि नहीं, अवस्था है।
जब व्यक्ति जान लेता है कि:
तब वह विद्वान होता है।
भारत ने ऐसे ही विद्वानों को जन्म दिया था — और भविष्य में भी देगा।
क्योंकि भारत मिट्टी नहीं, चेतना है।
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