विज्ञान शतक श्लोक 1-15: अर्थ, भावार्थ और वैज्ञानिक विश्लेषण | Vigyan Shatak Shlokas 1-10 with Hindi & English Meaning

Vigyan Shatak Shlokas 1-10 ​Bhartrihari Vigyan Shatak Hindi Meaning ​Ancient Indian Philosophy Shlokas ​विज्ञान शतक हिंदी व्याख्या ​वैराग्य शतक और विज्ञान शतक

 

🌸 श्लोक १: श्री गणेश वंदना

विगलदमलदानश्रेणिसौरभ्यलोभो-
        पगतमधुपमालाव्याकुलाकाशदेशः ।
अवतु जगदशेषं शश्वदुग्रात्मदर्य्यो?
        विपुलपरिघदन्तोद्दण्डशुण्डो गणेशः ॥ १॥
🔸 शब्दार्थ (Word-by-Word Analysis):
विगलद-अमल-दान-श्रेणि: झरते हुए निर्मल मद की धारा | सौरभ्य-लोभ-उपगत: जिसकी सुगंध के लोभ में आए हुए | मधुप-माला: भौरों की पंक्तियों से | व्याकुलाकाशदेशः: व्याप्त आकाश मंडल | अवतु जगद-अशेषं: संपूर्ण जगत की रक्षा करें | विपुल-शुण्डो: लंबी सूंड वाले।
🔸 हिंदी भावार्थ:
विशाल सूंड और वज्र के समान दांतों वाले भगवान गणेश, जिनके मस्तक से बहने वाले मद की सुगंध से आकर्षित होकर भौरों ने आकाश को घेर लिया है, वे संपूर्ण जगत की रक्षा करें।
🔸 English Interpretation:
May Lord Ganesha, with His massive trunk and tusks, protect the entire universe. His divine fragrance attracts swarms of bees that fill the sky with their buzzing.

🌸 श्लोक २: ब्रह्म वंदना

यत्सत्तया शुचि विभाति यदात्मभासा
        प्रद्योतितं जगदशेषमपास्तदोषम् ।
तद्ब्रह्म निष्कलमसङ्गमपारसौख्यं
        प्रत्यग्भजे परममङ्गलमद्वितीयम् ॥ २॥
🔸 शब्दार्थ (Word-by-Word Analysis):
यत्सत्तया: जिसकी सत्ता (Existence) से | शुचि विभाति: पवित्र रूप से चमकता है | यदात्मभासा: जो अपने स्वयं के प्रकाश से | जगद-अशेषम्: संपूर्ण जगत को | अपास्त-दोषम्: दोषों से रहित | निष्कलम्: अखंड | अद्वितीयम्: अद्वितीय (Non-dual)।
🔸 हिंदी भावार्थ:
जिसकी सत्ता से यह संसार प्रकाशित है, जो दोषरहित, अद्वितीय, और परमानंद स्वरूप है, मैं उस अंतरात्मा रूपी ब्रह्म की वंदना करता हूँ।
🔸 English Interpretation:
I worship that supreme, non-dual Brahman, whose existence illuminates the entire universe and who is the source of infinite bliss.

🌸 श्लोक ३: संसार की अनित्यता

माता मृता जनयितापि जगाम शीघ्रं
        लोकान्तरं तव कलत्रसुतादयोऽपि ।
भ्रातस्तथापि न जहासि मृषाभिमानं
        दुःखात्मके वपुषि मूत्रकुदर्पकूपे ॥ ३॥
🔸 शब्दार्थ (Word-by-Word Analysis):
माता मृता: माता की मृत्यु हुई | जनयिता-अपि: पिता भी | लोकान्तरं: परलोक (मृत्यु) | कलत्र-सुतादय: पत्नी और पुत्र आदि | मृषा-अभिमानं: झूठा अहंकार | वपुषि: शरीर में | मूत्रकुदर्पकूपे: मलमूत्र से भरे कुएं के समान।
🔸 हिंदी भावार्थ:
हे भाई! माता-पिता मृत्यु को प्राप्त हुए, पत्नी-संतान भी चले जाएंगे; फिर भी तुम इस मल-मूत्र से भरे हुए अपवित्र और दुखों के घर रूपी शरीर पर झूठा अहंकार क्यों नहीं छोड़ते?
🔸 English Interpretation:
O Brother! Parents have passed away, and so will your family. Yet, you cling to false pride in this physical body, which is transient and merely a vessel of impurities.

🌸 श्लोक ४: मोक्ष का मार्ग

ब्रह्मामृतं भज सदा सहजप्रकाशं
        सर्वान्तरं निरवधि प्रथितप्रभावम् ।
यद्यस्ति ते जिगमिषा सहसा भवाब्धेः
        पारे परे परमशर्मणि निष्कलङ्के ॥ ४॥
🔸 शब्दार्थ (Word-by-Word Analysis):
ब्रह्मामृतं: ब्रह्म रूपी अमृत | सहजप्रकाशं: स्वयं प्रकाशित | सर्वान्तरं: सबके भीतर स्थित | भवाब्धेः: संसार रूपी सागर | जिगमिषा: जाने की इच्छा | परमशर्मणि: परम कल्याण/सुख में | निष्कलङ्के: निष्कलंक (पवित्र)।
🔸 हिंदी भावार्थ:
यदि तुम इस संसार रूपी सागर के उस पार परम पवित्र और शाश्वत सुख को प्राप्त करना चाहते हो, तो हमेशा उस स्वयं-प्रकाशित ब्रह्म का ध्यान करो जो सबके हृदय में अमृत के समान स्थित है।
🔸 English Interpretation:
If you desire to cross the ocean of worldly existence and reach the shore of eternal bliss, always worship the self-effulgent Brahman who dwells within all beings.

🌸 श्लोक ५: सुख का भ्रम

आरभ्य गर्भवसतिं मरणावसानं
        यद्यस्ति जीवितुमदृष्टमनेककालम् ।
जन्तोस्तथापि न सुखं सुखविभ्रमोऽयं
        यद्बालया रतिरनेकविभूतिभाजः ॥ ५॥
🔸 शब्दार्थ (Word-by-Word Analysis):
गर्भवसतिं: गर्भ में रहने से | मरणावसानं: मृत्यु के अंत तक | अनेककालम्: लंबे समय तक | जन्तो: प्राणी को | सुखविभ्रमोऽयं: यह सुख का मात्र भ्रम है | विभूतिभाजः: ऐश्वर्य को भोगने वाला।
🔸 हिंदी भावार्थ:
गर्भ से लेकर मृत्यु तक, चाहे मनुष्य कितने ही लंबे समय तक ऐश्वर्य के साथ जीवित रहे, उसे वास्तविक सुख कभी नहीं मिलता। जिसे वह सुख कहता है, वह केवल मन का एक भ्रम मात्र है।
🔸 English Interpretation:
From the time in the womb until death, even if one lives a long life with great wealth, true happiness is never found. What is perceived as pleasure is merely a delusion of the senses.

🌸 श्लोक ६: स्त्री की अनित्यता

सा रोगिणी यदि भवेदथवा विवर्णा
        बालाप्रियाशशिमुखी रसिकस्य पुंसः ।
शल्यायते हृदि तथा मरणं कृशाङ्ग्या-
        यत्तस्य सा विगतनिद्रसरोरुहाक्षी ॥ ६॥
🔸 शब्दार्थ:
रोगिणी: बीमार | विवर्णा: कान्तिहीन (फीकी) | बालाप्रिया: प्रिय युवती | शशिमुखी: चन्द्रमा के समान मुख वाली | शल्यायते: काँटे की तरह चुभना | कृशाङ्ग्या: पतले अंगों वाली | सरोरुहाक्षी: कमल के समान नेत्रों वाली।
🔸 हिंदी भावार्थ:
वही चन्द्रमुखी प्रियतमा, जो किसी रसिक पुरुष को प्राणों से प्यारी होती है, यदि रोगी या कान्तिहीन हो जाए, तो हृदय में शूल की तरह चुभने लगती है। यहाँ तक कि उसकी मृत्यु भी उस पुरुष के लिए असहनीय कष्ट का कारण बन जाती है। अतः यह सुख नश्वर और दुख का मूल है।
🔸 English Interpretation:
The same beloved who was once the source of joy becomes a cause of deep pain if she falls ill or loses her charm. Even her death pierces the heart like a thorn, proving that worldly attachment leads only to sorrow.

🌸 श्लोक ७: विवेकपूर्ण विचार

त्वत्साक्षिकं सकलमेतदवोचमित्थं
        भ्रातर्विचार्य भवता करणीयमिष्टम् ।
येनेदृशं न भविता भवतोऽपि कष्टं
        शोकाकुलस्य भवसागरमग्नमूर्तेः ॥ ७॥
🔸 शब्दार्थ:
त्वत्साक्षिकं: तुम्हें साक्षी मानकर | अवोचम्: कहा है | भ्रातर्विचार्य: हे भाई! विचार करके | करणीयमिष्टम्: जो उचित हो वह करो | भवसागरमग्न: संसार रूपी समुद्र में डूबा हुआ।
🔸 हिंदी भावार्थ:
हे भाई! मैंने तुम्हें साक्षी मानकर यह सब (सत्य) कह दिया है। अब तुम स्वयं विचार करो कि तुम्हारे लिए क्या श्रेष्ठ है, ताकि तुम्हें भविष्य में भवसागर में डूबकर शोकाकुल होने का कष्ट न उठाना पड़े।
🔸 English Interpretation:
O Brother! I have presented these truths before you. Now, reflect deeply and do what is best for your soul, so that you may avoid the immense suffering of being lost in the ocean of worldly grief.

🌸 श्लोक ८: राजसुख की निस्सारता

निष्कण्टकेऽपि न सुखं वसुधाधिपत्ये
        कस्यापि राजतिलकस्य यदेष देवः ।
विश्वेश्वरो भुजगराजविभूतिभूषो
        हित्वा तपस्यति चिरं सकला विभूतीः ॥ ८॥
🔸 शब्दार्थ:
निष्कण्टके: बाधा रहित | वसुधाधिपत्ये: पृथ्वी के साम्राज्य में | राजतिलकस्य: राजाओं का | विश्वेश्वरो: महादेव (शिव) | हित्वा: छोड़कर | तपस्यति: तपस्या करते हैं।
🔸 हिंदी भावार्थ:
बाधा रहित पृथ्वी के साम्राज्य में भी वास्तविक सुख नहीं है। देखो, स्वयं महादेव (विश्वेश्वर), जो समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी हैं, वे भी सब विभूतियों को त्यागकर श्मशान और तपस्या को चुनते हैं। जब ईश्वर स्वयं वैराग्य में सुख देखते हैं, तो राजसुख में शांति कैसे संभव है?
🔸 English Interpretation:
True happiness does not exist even in an unopposed earthly empire. Consider Lord Shiva, the master of the universe, who renounces all luxuries to dwell in penance, showing that peace lies in renunciation, not possession.

🌸 श्लोक ९: सृष्टि का चक्र

भूमण्डलं लयमुपैति भवत्यबाधं
        लब्धात्मकं पुनरपि प्रलयं प्रयाति ।
आवर्तते सकलमेतदनन्तवारं
        ब्रह्मादिभिः सममहो न सुखं जनानाम् ॥ ९॥
🔸 शब्दार्थ:
लयमुपैति: नष्ट हो जाता है | अबाधं: बिना रुके | लब्धात्मकं: पुनर्जन्म या पुनः निर्माण | प्रलयं: विनाश | आवर्तते: दोहराया जाता है | अनन्तवारं: अनगिनत बार।
🔸 हिंदी भावार्थ:
यह पृथ्वी और संपूर्ण ब्रह्मांड बार-बार नष्ट होता है और फिर से बनता है। प्रलय और सृजन का यह चक्र अनंत काल से चल रहा है। ब्रह्मा आदि देवताओं के काल चक्र में भी साधारण मनुष्यों के लिए स्थायी सुख कहीं नहीं है।
🔸 English Interpretation:
The entire universe undergoes cycles of creation and destruction endlessly. In this eternal loop of birth and dissolution, there is no permanent happiness for beings caught in the passage of time.

🌸 श्लोक १०: संसार जलधि

यदा देवादीनापि भवति जन्मादि नियतं
        महाहर्म्यस्थाने ललितललनालोलमनसाम् ।
तदा कामार्तानां सुगतिरिह संसारजलधौ
        निमग्नानामुच्चै रतिविषयशोकादिमकरे ॥१०॥
🔸 शब्दार्थ:
देवादीनापि: देवताओं का भी | महत-हर्म्य: विशाल महलों में | ललित-ललना: सुंदर स्त्रियाँ | कामार्तानां: कामुकता से पीड़ित | मकरे: मगरमच्छों वाले।
🔸 हिंदी भावार्थ:
जब महलों में रहने वाले और सुंदरियों में मग्न रहने वाले देवताओं का भी पतन और पुनर्जन्म निश्चित है, तो फिर इस संसार रूपी समुद्र में डूबे हुए कामुक मनुष्यों की क्या गति होगी? यहाँ तो विषय-वासना और शोक रूपी भयंकर मगरमच्छ हर ओर विद्यमान हैं।
🔸 English Interpretation:
When even celestial beings in grand palaces are subject to the laws of birth and fall, what hope is there for humans enslaved by lust? In this worldly ocean, one is constantly threatened by the crocodiles of attachment and grief.

🌸 श्लोक ११: आकस्मिक काल (मृत्यु)

स्वयं भोक्ता दाता वसु सुबहु सम्पाद्य भविता
        कुटुम्बानां पोष्टा गुणनिधिरशेषेप्सितनरः ।
इति प्रत्याशस्य प्रबलदुरितानीतविधुरं
        शिरस्यस्याकस्मात्पतति निधनं येन भवति ॥ ११॥
🔸 शब्दार्थ:
भोक्ता: भोगने वाला | दाता: दान देने वाला | वसु: धन | कुटुम्बानां पोष्टा: परिवार का पोषक | प्रत्याशस्य: ऐसी आशा करने वाले के | आकस्मात्: अचानक।
🔸 हिंदी भावार्थ:
मनुष्य सोचता है कि मैं बहुत धन कमाऊँगा, स्वयं भोगूँगा, दान दूँगा और परिवार का पालन करूँगा। वह भविष्य की अनगिनत आशाएँ संजोए बैठा होता है, तभी अचानक उसके सिर पर काल (मृत्यु) गिर पड़ता है और सब कुछ समाप्त हो जाता है।
🔸 English Interpretation:
While a man is busy planning to accumulate wealth, support his family, and fulfill his desires, unexpected death strikes and ends all his worldly plans instantly.

🌸 श्लोक १२: ज्ञानी का स्वरूप

विपश्चिद्देहादौ क्वचिदपि ममत्वं न कुरुते
        परब्रह्मध्याता गगननगराकारसदृशे ।
निरस्ताहङ्कारः श्रुतिजनितविश्वासमुषितो
        निरातङ्कोऽव्यग्रः प्रकृतिमधुरालापचतुरः ॥ १२॥
🔸 शब्दार्थ:
विपश्चिद्: विद्वान | ममत्वं: अपनापन | गगननगर: आकाश में दिखने वाला मायावी नगर | निरस्ताहङ्कारः: अहंकार रहित | निरातङ्को: निर्भय।
🔸 हिंदी भावार्थ:
सच्चा ज्ञानी इस शरीर में कभी ममता नहीं रखता, क्योंकि वह संसार को माया के समान समझता है। वह अहंकार से मुक्त, वेदों में निष्ठावान, निर्भय, शांत और सदैव परब्रह्म के ध्यान में मग्न रहता है।
🔸 English Interpretation:
A wise person, free from ego and fear, stays detached from the physical body and remains focused on the Supreme Reality, viewing the world as a mere illusion.

🌸 श्लोक १३: चंचल मन को बोध

अरे चेतश्चित्रं भ्रमसि यदपास्य प्रियतमं
        मुकुन्दं पार्श्वस्थं पितरमपि मान्यं सुमनसाम् ।
बहिः शब्दाद्यर्थे प्रकृतिचपले क्लेशबहुले
        न ते संसारेऽस्मिन्भवति सुखदाद्यापि विरतिः ॥ १३॥
🔸 शब्दार्थ:
मुकुन्दं: भगवान विष्णु | पार्श्वस्थं: पास में स्थित | प्रकृतिचपले: चंचल स्वभाव के | क्लेशबहुले: कष्टों से भरे | विरतिः: अरुचि/वैराग्य।
🔸 हिंदी भावार्थ:
हे मन! तू अपने पास ही स्थित भगवान मुकुन्द को छोड़कर बाहर के इन चंचल और दुखदायी विषयों में क्यों भटक रहा है? आश्चर्य है कि इतने कष्ट सहने के बाद भी इस संसार से तेरा मोह कम नहीं होता।
🔸 English Interpretation:
O Mind! Why do you wander among painful worldly objects, ignoring the Divine who is right within you? It is strange that even after many sufferings, you aren't detached from this world.

🌸 श्लोक १४: हरि ध्यान ही शरण

न जानीषे मूर्ख क्वचिदपि हितं लोकमहितं
        भ्रमद्भोगाकाङ्क्षाकलुषिततया मोहबहुले ।
जगत्यत्रारण्ये प्रतिपदमनेकापदि सदा
        हरिध्याने व्यग्रं भव सकलतापैककदने ॥ १४॥
🔸 शब्दार्थ:
कलुषिततया: मलिन होने से | अरण्ये: जंगल (संसार) | प्रतिपद: हर कदम पर | तापैककदने: दुखों का नाश करने वाले।
🔸 हिंदी भावार्थ:
हे मूर्ख जीव! भोगों की लालसा में तू अपना भला-बुरा भूल गया है। यह संसार एक भयानक जंगल है जहाँ हर कदम पर विपत्ति है। इन दुखों से बचने का एकमात्र उपाय भगवान हरि का ध्यान करना है।
🔸 English Interpretation:
Ignorant soul! Clouded by desires, you fail to see your own good. This world is a dangerous forest; only meditation on Hari can destroy all your miseries.

🌸 श्लोक १५: माया का भ्रम

वियद्भूतं भूतं यदवनलभं चाखिलमिदं
        महामायासङ्गाद्भुजग इव रज्वां भ्रमकरम् ।
तदत्यन्ताह्लादं विजरममरं चिन्तय मनः
        परब्रह्माव्यग्रं हरिहरसुराद्यैरवगतम् ॥ १५॥
🔸 शब्दार्थ:
वियद्भूतं: आकाश आदि पंचभूत | भुजग इव रज्वां: रस्सी में सांप की तरह | विजरममरं: बुढ़ापे और मृत्यु से रहित।
🔸 हिंदी भावार्थ:
जैसे रस्सी में सांप का भ्रम होता है, वैसे ही माया के कारण यह संसार सत्य लगता है। हे मन! इस भ्रम को छोड़कर उस परब्रह्म का चिंतन कर जो परमानंद स्वरूप, अजर और अमर है।
🔸 English Interpretation:
Just as a rope is mistaken for a snake, this world is an illusion of Maya. O Mind! Meditate on the eternal Brahman who is beyond birth and death.

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. विज्ञान शतक के रचयिता कौन हैं?
विज्ञान शतक के रचयिता महान कवि और दार्शनिक भर्तृहरि माने जाते हैं।

2. इस ग्रंथ का मुख्य विषय क्या है?
इसका मुख्य विषय संसार की नश्वरता को समझना और आत्म-ज्ञान (ब्रह्म) की प्राप्ति है।

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