न भूतपूर्वं – श्लोक व्याख्या
तथापि तॄष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ॥
- न भूतपूर्वं – Never existed before / पहले कभी नहीं था
- न कदापि वार्ता – No news / कभी कोई बात नहीं
- हेम्नः कुरंगः – Golden-colored monkey / स्वर्णवर्णी बंदर
- न कदापि दृष्टः – Never seen / कभी देखा नहीं गया
- तथापि – Nevertheless / फिर भी
- तॄष्णा – Desire / तृष्णा, लालसा
- रघुनन्दनः – Son of Raghu (Lord Rama) / रघुकुल के नन्दन
- विनाशकाले – At the time of destruction / विनाश के समय
- विपरीतबुद्धिः – Perverse or wrong understanding / विपरीत बुद्धि
ऐसा कभी नहीं हुआ कि **स्वर्णवर्णी बंदर** के बारे में कोई पहले से जानकारी हो। फिर भी, **रघुनन्दन (भगवान राम) के विनाशकाले**, कुछ लोग **अपनी विपरीत बुद्धि और लालसा से विचलित होते हैं**, यानी जो पहले नहीं जानते थे, वे भी गलत सोच और लालसा के कारण प्रभावित होते हैं।
It has never been that a **golden-colored monkey** was known before. Yet, at the **time of destruction involving Lord Rama (Raghunandan)**, some individuals, driven by **perverse understanding and desire**, are affected, showing that even what was previously unknown can be misinterpreted or misused due to desire.
श्लोक हमें सिखाता है कि **इच्छा और लालसा** कभी-कभी हमें **सत्य और वास्तविकता** से दूर कर देती है। जो पहले अज्ञानी थे, वही विपरीत बुद्धि के कारण **असत्य और भ्रम में फंस सकते हैं**। सच्चा विवेक हमें **विनाश और विपरीत परिस्थितियों में भी सतर्क रहने** के लिए प्रेरित करता है।
परान्नं – श्लोक व्याख्या
दुर्लभानि परान्नानि प्रानाः जन्मनि जन्मनि ॥
- परान्नं प्राप्य – Obtaining others’ food / दूसरों का भोजन प्राप्त करके
- दुर्बुद्धे – Foolish or ignorant person / मूर्ख या दुर्बुद्धि व्यक्ति
- मा प्राणेषु दयां कुरु – Do not show mercy in vital life / प्राणों में दया मत दिखाओ
- दुर्लभानि परान्नानि – Rare and valuable foods / दुर्लभ भोजन
- प्रानाः जन्मनि जन्मनि – Life is obtained birth after birth / प्राण जन्मों में मिलते हैं
जो भोजन हमें दूसरों से दुर्बुद्धि या मूर्खता से प्राप्त होता है, उसमें **अपने जीवन में या दूसरों के प्राणों में दया** नहीं करनी चाहिए। क्योंकि **वास्तविक रूप से दुर्लभ और मूल्यवान भोजन**, जैसे प्राण, जन्मों के क्रम में प्राप्त होते हैं। इसलिए हमें **स्मार्ट और विवेकपूर्ण व्यवहार** रखना चाहिए।
When one obtains **food meant for others** due to ignorance or folly, one should not be careless with **life or vital essence**. Truly **rare and valuable sustenance**, like life, is obtained across births. Hence, careful and wise conduct is essential.
यह श्लोक हमें सिखाता है कि **जीवन और साधन** दोनों ही मूल्यवान हैं। जो चीज़ दुर्लभ है, उसकी लापरवाही या मूर्खता से प्राप्ति, हमें **सतर्क, विवेकशील और अनुशासित रहने** की शिक्षा देती है।
न दुर्जनः – श्लोक व्याख्या
भूयोऽपि सिक्तः पयसा घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति ॥
- न दुर्जनः – Not a wicked person / दुर्जन नहीं
- सज्जनतामुपैति – Approaches goodness / सज्जनता की ओर जाता है
- बहुप्रकारैः अपि सेव्यमानः – Even when served in many ways / कई प्रकार से सेवा होने पर भी
- भूयोऽपि सिक्तः पयसा घृतेन – Again and again nourished with milk and ghee / बार-बार दूध और घी से सिंचित
- निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति – A lemon tree does not become sweet / नींबू का पेड़ मीठा नहीं होता
जो दुर्जन होता है, वह **सज्जनता और भलाई की ओर नहीं बढ़ता**, भले ही उसे **अनेक प्रकार से सेवा और पोषण** किया जाए। जैसे **नींबू का पेड़ कभी मीठा नहीं होता**, वैसे ही दुर्जन का स्वभाव बदलना कठिन है।
A wicked person **does not approach goodness**, even if he is **served and nourished in many ways**. Just as a **lemon tree never becomes sweet**, similarly, the nature of the wicked is hard to change.
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि **स्वभाव को बदलना कठिन है**। किसी का कर्म और आचरण, भले ही कितनी भी सेवा और पोषण प्राप्त करे, अगर उसका मूल स्वभाव दूषित है, तो वह सज्जन नहीं बन सकता।
केयूरा न विभूषयन्ति – श्लोक व्याख्या
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः ।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते
क्षीयन्ते खलू भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् ॥
- केयूरा – Armlets / बाजूबंद
- न विभूषयन्ति पुरुषं – Do not adorn a man / पुरुष को सजाते नहीं
- हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः – Necklaces nor shining moon-like ornaments / हार और चाँद जैसे चमकते आभूषण
- न स्नानं, न विलेपनं, न कुसुमं – No bathing, no anointing, no flowers / न स्नान, न लेपन, न फूल
- मूर्धजाः – Hair ornaments / सिर के आभूषण
- वाणि – Speech / वाणी
- एका समलंकरोति पुरुषं – Alone adorns the person / अकेली सजाती है व्यक्ति को
- संस्कृता धार्यते – Refined / संस्कारित
- क्षीयन्ते भूषणानि – Ornaments decay / आभूषण नष्ट हो जाते हैं
- वाग्भूषणं – Speech as ornament / वाणी का आभूषण
जो पुरुष **केयूर, हार, चमकते आभूषण** पहनता है, या **स्नान, लेपन, फूल से सजता है**, वह वास्तव में मूल्यवान नहीं होता। सच्चा सज्जन वह है जिसकी **वाणी सुंदर और संस्कारित** है। भौतिक आभूषण समय के साथ क्षीण हो जाते हैं, लेकिन **अच्छी वाणी हमेशा मूल्यवान रहती है**।
A man is not truly adorned by **armlets, necklaces, or shining ornaments**, nor by **bathing, anointing, or flowers**. A person is truly adorned when his **speech is refined and virtuous**. Material ornaments decay over time, but **the ornament of good speech remains valuable forever**.
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि **सच्ची शोभा और मूल्य वाणी और संस्कार में हैं**, भौतिक आभूषण या बाहरी सजावट अस्थायी हैं। मनुष्य का **आदर्श आचरण और शुद्ध वाणी** उसके असली आभूषण हैं।
किं वाससेत्यत्र विचारणीयं – श्लोक व्याख्या
पीताम्बरं वीक्ष्य ददौ स्वकनां दिगम्बरं वीक्ष्य विषं समुद्रः ॥
- वासः – Clothing / वस्त्र
- प्रधानं खलु योग्यतायै – Truly important for suitability / वास्तव में उपयुक्तता के लिए महत्वपूर्ण
- पीताम्बरं – Yellow garment / पीला वस्त्र
- स्वकनां – Own people / अपने लोग
- दिगम्बरं – Sky-clad, naked / आकाशवस्त्र, निर्वस्त्र
- विषं समुद्रः – Poisons like the ocean / विषमय समुद्र
- वीक्ष्य – Observing / देखते हुए
- ददौ – Gave / दिया
यह श्लोक बताता है कि **वस्त्र केवल बाहरी आवरण है**, लेकिन **उचित और योग्य पहनावा** ही मनुष्य की सच्ची शोभा बढ़ाता है। जैसे पीताम्बर (सुसज्जित वस्त्र) किसी के लिए उपयुक्त हो सकता है, वैसे ही दूसरों की स्थिति और सम्मान का ध्यान रखते हुए वस्त्र धारण करना चाहिए। दिगम्बर होकर समुद्र जैसा विष भी देखने योग्य है—अर्थात् परिस्थितियों के अनुसार निर्णय करना महत्वपूर्ण है।
The verse indicates that **clothing is merely an external covering**, but the **appropriate and suitable attire** truly enhances a person’s dignity. Just as yellow garments may be suitable for some, one should choose attire considering others’ circumstances and respect. Being sky-clad, even the poisonous ocean is to be observed—meaning, decisions should be made appropriately according to the situation.
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि **बाहरी वस्त्र और दिखावा अस्थायी हैं**, पर **योग्यता और उपयुक्तता के अनुसार आचरण और चयन** स्थायी मूल्य प्रदान करते हैं। सच्ची शोभा और सम्मान व्यक्ति के **कर्म, विवेक और निर्णय** में निहित है।
गुणैरुत्तुंगतां – श्लोक व्याख्या
प्रासादशिखरस्थोऽपि काको न गरुडायते ॥
- गुणैः – By qualities / गुणों द्वारा
- उत्तुंगतां याति – Reaches the heights / उच्चता प्राप्त करता है
- न उत्तुंगेन आसनेन – Not by a high seat / ऊँचे आसन से नहीं
- प्रासादशिखरस्थः – On the top of a palace / महल की चोटी पर स्थित
- काकः – Crow / कौआ
- गरुडायते – Is not eaten by Garuda / गरुड़ द्वारा नहीं खाया जाता
किसी व्यक्ति की **सच्ची ऊँचाई और मान्यता उसके गुणों और कर्मों से आती है**, न कि उसके ऊँचे पद, आसन या भौतिक स्थिति से। जैसे **महल की चोटी पर बैठा कौआ भी गरुड़ द्वारा नहीं खाया जाता**, वैसे ही **सच्चे गुण और योग्यता ही किसी को सम्मान दिलाते हैं**।
A person’s **true elevation and respect come from his qualities and deeds**, not from high positions, seats, or material status. Just as a **crow sitting atop a palace is not eaten by Garuda**, similarly, **true virtue and capability earn respect**.
यह श्लोक हमें सिखाता है कि **सच्चा मूल्य और प्रतिष्ठा बाहरी स्थिति से नहीं**, बल्कि **गुण, योग्यता और कर्मों से आती है**। ऊँचे पद पर बैठा व्यक्ति केवल दिखावे में महान हो सकता है, लेकिन वास्तविक सम्मान उसके गुणों और सच्चे प्रयासों में निहित होता है।
नाभिषेको न संस्कारः – श्लोक व्याख्या
विक्रमार्जितसत्त्वस्य स्वयमेव म्र्गेन्द्रता ॥
- नाभिषेको – No coronation / अभिषेक नहीं
- न संस्कारः – No ritual / संस्कार नहीं
- सिंहस्य – Of a lion / सिंह का
- क्रियते वने – Performed in the forest / वन में किया जाता है
- विक्रमार्जितसत्त्वस्य – Of one whose power is earned through courage / साहस और शक्ति से अर्जित गुणों वाला
- स्वयमेव म्र्गेन्द्रता – Becomes the king of beasts by itself / स्वयमेव वन का राजा बन जाता है
वन में सिंह का **कोई अभिषेक या संस्कार नहीं होता**। जो **साहस और शक्ति से अपना सामर्थ्य अर्जित करता है**, वही स्वयमेव **वन का राजा बन जाता है**। इस श्लोक का संदेश है कि **सच्ची महत्ता बाहरी सम्मान से नहीं, बल्कि कर्म और योग्यता से आती है**।
In the forest, there is **no coronation or ritual for the lion**. One who **earns power and strength through courage** naturally becomes **the king of beasts**. This teaches that **true greatness comes from merit and action, not external honors**.
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि **सच्ची प्रतिष्ठा और नेतृत्व** केवल **योग्यता, साहस और कर्म** से आती है। बाहरी समारोह या दिखावे से कोई व्यक्ति महान नहीं बनता।
अशनं मे वसनं मे – श्लोक व्याख्या
इति मे मे कुर्वाणं कालवृको हन्ति पुरुषाजम् ॥
- अशनं मे – My food / मेरा भोजन
- वसनं मे – My clothing / मेरा वस्त्र
- जाया मे – My wealth / मेरी संपत्ति
- बन्धुवर्गो मे – My relatives / मेरे संबंधी
- इति मे मे कुर्वाणं – All that I consider mine / जो कुछ मैं अपना मानता हूँ
- कालवृको हन्ति पुरुषाजम् – Is destroyed by the time-wolf (death) / काल का भेड़िया (मृत्यु) मनुष्य को नष्ट कर देता है
जो हम **भोजन, वस्त्र, धन, और परिवार को अपना मानते हैं**, वह सब **कालवृक अर्थात मृत्यु द्वारा समाप्त हो जाता है**। इस श्लोक का संदेश है कि **संसारिक वस्तुएँ अस्थायी हैं और स्थायी नहीं**।
All that we consider **our food, clothing, wealth, and relatives** is eventually destroyed by the **time-wolf (death)**. This verse teaches that **material possessions are temporary and impermanent**.
यह श्लोक हमें **संसार की अस्थिरता और मरण की अनिवार्यता** याद दिलाता है। इसे समझकर व्यक्ति को **संसारिक मोह से परे, सत्संग और आध्यात्मिक जीवन** की ओर ध्यान देना चाहिए।
अल्पकार्यकराः – श्लोक व्याख्या
शरत्कालिनमेघास्ते नूनं गर्जन्ति केवलम् ॥
- अल्पकार्यकराः – Those who perform little / कम कर्म करने वाले
- सन्ति ये नरा बहुभाषिणः – People who talk a lot / बहु-भाषी लोग
- शरत्कालिनमेघाः – Autumn clouds / शरद के बादल
- ते नूनं गर्जन्ति केवलम् – They roar only / केवल गरजते हैं
जो लोग **बहुत बातें करते हैं लेकिन बहुत कम कार्य करते हैं**, वे केवल **शरद के बादलों की तरह गर्जते हैं**, अर्थात दिखावे और शब्दों के लिए ही सक्रिय रहते हैं, वास्तविक परिणाम नहीं लाते।
Those who **speak a lot but accomplish little** are like **autumn clouds that roar loudly**, meaning they are active in words and display, but do not produce real results.
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि **कथनी और करनी में अंतर** होना चाहिए। सिर्फ बातें करने से कोई महत्व या सफलता नहीं मिलती। सच्चा प्रभाव **कर्म और प्रयासों से** आता है।
गते शोको न कर्तव्यः – श्लोक व्याख्या
वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः ॥
- गते – That which has passed / जो बीत चुका
- शोकः – Grief / शोक
- न कर्तव्यः – Should not be done / नहीं करना चाहिए
- भविष्यं – Future / भविष्य
- नैव चिन्तयेत् – Should not worry about / चिंता नहीं करनी चाहिए
- वर्तमानेन कालेन – In the present time / वर्तमान समय में
- वर्तयन्ति – Live or act / जीवन जीते हैं
- विचक्षणाः – Wise people / बुद्धिमान लोग
जो **बीत चुका है उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए**, और **भविष्य की अत्यधिक चिंता भी नहीं करनी चाहिए**। बुद्धिमान व्यक्ति **वर्तमान समय के अनुसार जीवन जीते हैं** और उसी में अपने कर्तव्य और कर्म करते हैं।
One should **not grieve over what has already passed**, nor should one **worry excessively about the future**. Wise people **live and act according to the present moment**, focusing on what can be done now.
यह श्लोक हमें **वर्तमान में जीने का महत्व** सिखाता है। अतीत का शोक और भविष्य की चिंता मन को अशांत करते हैं। सच्ची बुद्धिमत्ता यही है कि मनुष्य **वर्तमान क्षण को समझकर उचित कर्म करे**।
मद्यपान के दोष – श्लोक व्याख्या
पापं कृत्वा दुर्गतिं यान्ति मूधास्तस्मान्मद्यं नैव पेयं न पेयम् ॥
- चित्ते भ्रान्तिः – Confusion in mind / मन में भ्रम
- जायते – Arises / उत्पन्न होता है
- मद्यपानात् – From drinking alcohol / मद्यपान से
- भ्रान्ते चित्ते – When mind becomes confused / जब मन भ्रमित हो जाता है
- पापचर्याम् उपैति – One moves towards sinful actions / पाप कर्मों की ओर जाता है
- पापं कृत्वा – After doing sinful acts / पाप करके
- दुर्गतिं यान्ति – Fall into misery / दुर्गति को प्राप्त होते हैं
- मूढाः – Foolish people / मूर्ख लोग
- तस्मात् – Therefore / इसलिए
- मद्यं नैव पेयम् – Alcohol should never be consumed / मद्यपान नहीं करना चाहिए
मद्यपान से **मन में भ्रम उत्पन्न होता है**। जब मन भ्रमित हो जाता है, तब व्यक्ति **पाप कर्मों की ओर प्रवृत्त हो जाता है**। ऐसे पाप कर्म करने के बाद मूर्ख लोग **दुर्गति को प्राप्त होते हैं**। इसलिए यह शिक्षा दी गई है कि **मद्यपान कभी नहीं करना चाहिए**।
Drinking alcohol **creates confusion in the mind**. When the mind becomes confused, a person **tends to engage in sinful actions**. After committing such deeds, foolish people **fall into misery and suffering**. Therefore, the teaching is that **alcohol should never be consumed**.
यह श्लोक **संयम और शुद्ध जीवन** का महत्व बताता है। मद्यपान मनुष्य की **बुद्धि, विवेक और नैतिकता को कमजोर करता है**, जिससे वह गलत कर्मों में पड़ सकता है। अतः **सत्कर्म और आत्मसंयम** ही जीवन की श्रेष्ठ दिशा है।
प्रत्यक्ष कविकाव्यं – श्लोक व्याख्या
गृहवैद्यस्य विद्या च कस्मैचिद्यदि रोचते ॥
- प्रत्यक्ष – Directly seen / प्रत्यक्ष
- कवि-काव्यं – Poetry composed by a poet / कवि का काव्य
- रूपं – Beauty / रूप
- कुल-योषितः – A noble woman / कुलीन स्त्री
- गृह-वैद्यस्य – Of a household physician / घर के वैद्य की
- विद्या – Knowledge / विद्या
- कस्मैचित् – To someone / किसी को
- यदि रोचते – If it pleases / यदि अच्छा लगे
कवि का काव्य, कुलीन स्त्री का रूप और घर के वैद्य की विद्या — ये तीनों ऐसी वस्तुएँ हैं जो **सबको समान रूप से अच्छी नहीं लगतीं**, बल्कि **किसी-किसी व्यक्ति को ही प्रिय लगती हैं**। अर्थात् **रुचि और पसंद व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार भिन्न होती है**।
A poet’s poetry, the beauty of a noble woman, and the knowledge of a household physician — these may **appeal only to certain people**. In other words, **taste and appreciation differ from person to person**.
यह श्लोक बताता है कि **हर व्यक्ति की रुचि अलग होती है**। जो चीज किसी को अत्यंत प्रिय और सुंदर लगती है, वह दूसरे को उतनी आकर्षक नहीं लग सकती। इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि **सौंदर्य और मूल्य का अनुभव व्यक्ति की दृष्टि और समझ पर निर्भर करता है**।
मद्य का उचित-अनुचित प्रयोग – श्लोक व्याख्या
अयुक्तियुक्तं रोगाय युक्तियुक्तं यथा स्मृतम् ॥
- किन्तु – However / किन्तु
- मद्यं – Alcohol / मद्य
- स्वभावेन – By its nature / स्वभाव से
- यथा औषधं – Like a medicine / औषधि के समान
- तथा स्मृतम् – Considered as such / ऐसा माना गया है
- अयुक्ति-युक्तं – Used improperly / अनुचित रूप से उपयोग
- रोगाय – Leads to disease / रोग का कारण
- युक्ति-युक्तं – Used properly / उचित विधि से उपयोग
- यथा स्मृतम् – Considered beneficial / हितकारी माना गया है
मद्य को उसके स्वभाव के कारण **औषधि के समान भी माना गया है**। यदि इसका **अनुचित या अति प्रयोग किया जाए**, तो यह **रोग और हानि का कारण बनता है**। किन्तु यदि इसका **उचित मात्रा और उचित विधि से उपयोग किया जाए**, तो इसे **औषधि के समान लाभकारी भी माना गया है**।
Alcohol, by its nature, is sometimes **considered like a medicine**. If it is **used improperly or excessively**, it can **cause disease and harm**. However, when used **properly and in the right manner**, it is **regarded as beneficial like a medicine**.
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि **किसी भी वस्तु का मूल्य उसके उपयोग पर निर्भर करता है**। अत्यधिक या अनुचित उपयोग हानिकारक होता है, जबकि **संयम और विवेक के साथ किया गया उपयोग लाभदायक हो सकता है**। अतः जीवन में **संतुलन और विवेक** का पालन करना आवश्यक है।
चातक और मेघ – श्लोक व्याख्या
चिर पिपासित चातक पोतके ।
प्रचलिते मरुति क्षणं अन्यथा
क्व च भवान् क्व पयः क्व च चातकः ॥
- वितर – Give / प्रदान करो
- वारिद – Cloud (giver of water) / मेघ
- वारि – Water / जल
- आतुरे – Distressed / व्याकुल
- चिर पिपासित – Long thirsty / लंबे समय से प्यासा
- चातक – Chataka bird / चातक पक्षी
- पोतक – Young one / शिशु
- प्रचलिते मरुति – When wind starts blowing / जब हवा चलती है
- क्षणम् अन्यथा – In a moment it may change / एक क्षण में स्थिति बदल सकती है
- क्व च भवान् – Where will you be / आप कहाँ होंगे
- क्व पयः – Where will be the water / जल कहाँ होगा
- क्व च चातकः – Where will be the Chataka / चातक कहाँ होगा
हे मेघ! इस **बहुत समय से प्यासे और व्याकुल चातक के बच्चे को जल दे दो**। यदि थोड़ी देर में **हवा चलने लगे और मेघ आगे बढ़ जाए**, तो फिर **न जाने तुम कहाँ रहोगे, जल कहाँ होगा और यह चातक कहाँ होगा**। अर्थात् अवसर मिलने पर **सहायता तुरंत कर देनी चाहिए**।
O cloud, **give water to the thirsty young Chataka bird** that has been longing for rain for a long time. If the wind begins to blow and the cloud moves away, then **who knows where you will be, where the water will be, and where the Chataka will be**. Therefore, **help should be given immediately when the opportunity arises**.
यह श्लोक हमें **समय पर सहायता करने का महत्व** सिखाता है। यदि हम अवसर होने पर भी सहायता नहीं करते, तो समय बीत जाने पर **सहायता का अवसर समाप्त हो सकता है**। अतः **परोपकार और करुणा में विलंब नहीं करना चाहिए**।
वनाग्नि और दीपक – श्लोक व्याख्या
स एव दीप नाषाय कृशे कस्य अस्ति सौहृदम् ॥
- वनानि – Forests / वन
- दहतः – Burning / जलाते हुए
- वह्नेः – Of fire / अग्नि का
- सखा – Friend / मित्र
- भवति – Becomes / बन जाता है
- मारुतः – Wind / वायु
- स एव – That same / वही
- दीप नाशाय – For destroying a lamp / दीपक को बुझाने के लिए
- कृशे – Weak / दुर्बल
- कस्य अस्ति सौहृदम् – Who has friendship / किसका सच्चा मित्र होता है
जब **अग्नि वन को जलाती है**, तब **वायु उसका मित्र बनकर उसे और अधिक भड़काती है**। किन्तु वही वायु **छोटे और कमजोर दीपक को बुझा देती है**। अर्थात् संसार में प्रायः **शक्तिशाली का साथ दिया जाता है**, और **दुर्बल को सच्चा सहारा बहुत कम मिलता है**।
When a **forest fire burns**, the **wind becomes its friend and helps it spread further**. But the same wind **extinguishes a small and weak lamp**. This means that in the world, **people often support the strong**, while **the weak rarely find true friendship or support**.
यह श्लोक मानव समाज की एक वास्तविकता को दर्शाता है कि **शक्ति और सामर्थ्य वाले व्यक्तियों को अधिक समर्थन मिलता है**, जबकि **दुर्बल व्यक्ति अक्सर उपेक्षित रह जाते हैं**। इसलिए सच्चे सज्जन वही हैं जो **दुर्बलों की सहायता करते हैं और न्याय का साथ देते हैं**।
काल की लीला – श्लोक व्याख्या
यत्राप्येकस्तदनु बहवस्तत्र नैकोऽपि चान्ते ।
इत्थं नयौ रजनिदिवसौ लोलयन् द्वाविवाक्षौ ।
कालः कल्यो भुवनफलके क्रीडति प्राणिसारैः ॥
- यत्र अनेकः – Where many people / जहाँ अनेक लोग
- क्वचिदपि गृहे – In some house / किसी घर में
- तत्र तिष्टति अथ एकः – Later only one remains / वहाँ अंत में केवल एक रह जाता है
- यत्र अपि एकः – Where there was only one / जहाँ पहले एक था
- तदनु बहवः – Later many gather / बाद में बहुत लोग हो जाते हैं
- तत्र नैकः अपि अन्ते – Eventually none remain / अंत में कोई भी नहीं रहता
- रजनिदिवसौ – Night and day / रात्रि और दिन
- द्वाविव अक्षौ – Like two dice / दो पासों के समान
- कालः – Time / काल
- भुवन फलके – On the board of the world / संसार रूपी पट पर
- क्रीडति – Plays / खेलता है
- प्राणिसारैः – With living beings / प्राणियों के साथ
कभी किसी घर में **बहुत लोग रहते हैं**, फिर समय के साथ वहाँ **केवल एक ही रह जाता है**। कभी जहाँ **एक ही व्यक्ति होता है**, वहाँ बाद में **बहुत लोग इकट्ठा हो जाते हैं**, और अंत में वहाँ **कोई भी नहीं बचता**। इस प्रकार **दिन और रात रूपी दो पासों को घुमाते हुए काल**, इस **संसार रूपी खेलपट पर प्राणियों के साथ खेल करता रहता है**।
Sometimes in a house **many people live together**, but later **only one remains**. Sometimes where **only one person lived**, later **many gather there**, and eventually **none remain at all**. Thus, **Time rolls the dice of day and night**, playing with living beings on the **board of the world**.
यह श्लोक हमें **काल की अनिश्चितता और संसार की अस्थिरता** का बोध कराता है। जीवन में **संबंध, परिवार और परिस्थितियाँ समय के साथ बदलती रहती हैं**। इसलिए मनुष्य को **मोह में फँसने के बजाय विवेक और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए**।
काल और मोह – श्लोक व्याख्या
व्यापरैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते ।
दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते ।
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिराम् उन्मत्तभूतं जगत् ॥
- आदित्यस्य गतागतैः – By the rising and setting of the sun / सूर्य के आने-जाने से
- अहरहः – Day by day / प्रतिदिन
- सङ्क्षीयते जीवितं – Life diminishes / जीवन कम होता जाता है
- व्यापरैः बहुकार्यभारगुरुभिः – With heavy loads of many activities / अनेक कार्यों के बोझ से
- कालः न विज्ञायते – Time is not noticed / समय का पता नहीं चलता
- जन्म जरा विपत्ति मरणं – Birth, old age, suffering and death / जन्म, बुढ़ापा, विपत्ति और मृत्यु
- त्रासः न उत्पद्यते – Fear does not arise / भय उत्पन्न नहीं होता
- मोहमयीं प्रमादमदिराम् – Wine of delusion and negligence / मोह और प्रमाद की मदिरा
- उन्मत्तभूतं जगत् – The world has become intoxicated / संसार मतवाला हो गया है
सूर्य के **उदय और अस्त होने के साथ प्रतिदिन जीवन घटता जाता है**, परंतु मनुष्य **अनेक कार्यों के भारी बोझ में इतना व्यस्त रहता है कि उसे समय का पता ही नहीं चलता**। जन्म, बुढ़ापा, दुःख और मृत्यु को देखकर भी **मनुष्य के भीतर भय या जागरूकता उत्पन्न नहीं होती**, क्योंकि यह संसार **मोह और प्रमाद की मदिरा पीकर मतवाला हो गया है**।
With the **daily rising and setting of the sun, life gradually diminishes**. However, people remain so **occupied with numerous responsibilities and activities** that they fail to notice the passing of time. Even after seeing **birth, old age, suffering, and death**, no fear or awareness arises. This is because the world has become **intoxicated with the wine of delusion and negligence**.
यह श्लोक जीवन की **अनित्यता और समय के महत्व** को दर्शाता है। मनुष्य संसारिक कार्यों में इतना उलझ जाता है कि उसे **जीवन के वास्तविक उद्देश्य का स्मरण नहीं रहता**। इसलिए आवश्यक है कि हम **मोह और प्रमाद से जागें और जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करें**।
राधा-गोविन्द प्रेमभाव – श्लोक व्याख्या
राधायाः नयन द्वन्द्वे राधा नाम विपर्ययः ॥
- यदि वा – If indeed / यदि सच में
- याति – Goes / जाता है
- गोविन्दः – Lord Krishna / गोविन्द (कृष्ण)
- मथुरातः – From Mathura / मथुरा से
- पुनः – Again / पुनः
- सखि – O friend / हे सखी
- राधायाः – Of Radha / राधा की
- नयन द्वन्द्वे – In the pair of eyes / दोनों नेत्रों में
- राधा नाम – The name “Radha” / राधा नाम
- विपर्ययः – Reversed / उल्टा
हे सखी! यदि गोविन्द **मथुरा से वापस आ जाएँ**, तो राधा की आँखों में जो **राधा नाम का उल्टा रूप (धारा)** बह रहा है, अर्थात् **आँसुओं की धारा**, वह समाप्त हो जाएगी। यह श्लोक राधा के **विरह और प्रेम की गहराई** को व्यक्त करता है।
O friend, if Govinda **returns from Mathura**, then in Radha’s eyes the **reverse of her name “Radha” (which forms “Dhara”, meaning a stream)**— the **stream of tears**—will cease to flow. The verse beautifully expresses the **depth of Radha’s love and separation from Krishna**.
यह श्लोक **भक्ति और प्रेम के विरह भाव** को दर्शाता है। राधा की आँखों से बहती **आँसुओं की धारा** उनके गहरे प्रेम का प्रतीक है। यह संदेश देता है कि **सच्चा प्रेम और भक्ति व्यक्ति के हृदय को पूर्णतः समर्पित बना देती है**।
धैर्य और लक्ष्य – श्लोक व्याख्या
सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चिदार्थाद्विरमन्ति धीराः ॥
- रत्नैः महार्हैः – With precious gems / बहुमूल्य रत्नों से
- तुतुषुः – Were satisfied / संतुष्ट हुए
- न देवा – The gods did not / देवता नहीं
- न भेजिरे – Did not fear / भयभीत नहीं हुए
- भीम विषेण – By terrible poison / भयंकर विष से
- सुधां विना – Without nectar / अमृत के बिना
- न प्रययुः विरामं – Did not stop / विराम नहीं लिया
- न निश्चिद् अर्थात् – From their determined goal / अपने निश्चित लक्ष्य से
- विरमन्ति – Turn away / हटते हैं
- धीराः – Brave and determined people / धीर पुरुष
समुद्र मंथन के समय देवता **बहुमूल्य रत्नों से संतुष्ट नहीं हुए**, और **भयंकर विष निकलने पर भी भयभीत नहीं हुए**। वे **अमृत प्राप्त किए बिना नहीं रुके**। इसी प्रकार **धीर और दृढ़ निश्चयी व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना रुकते नहीं हैं**।
During the churning of the ocean, the gods **were not satisfied with precious gems**, nor were they **frightened by the terrible poison that emerged**. They **did not stop until they obtained the nectar of immortality**. Similarly, **determined and courageous people do not abandon their goal until it is achieved**.
यह श्लोक **धैर्य, दृढ़ संकल्प और लक्ष्य के प्रति समर्पण** का संदेश देता है। सच्चे धीर पुरुष **कठिनाइयों और प्रलोभनों से विचलित नहीं होते**, बल्कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक **निरंतर प्रयास करते रहते हैं**।
संक्रान्ति मंगलकामना – श्लोक व्याख्या
तिलगुडलद्दुकवत् सम्बन्धे अस्तु सुवृत्तत्त्वम् ।
अस्तु विचारे शुभसंक्रमणं मंगलाय यशसे ।
कल्याणी संक्रान्तिरस्तु वः सदाहमाशंसे ॥
- तिलवत् स्निग्धं – Smooth like sesame / तिल के समान स्निग्ध
- मनोऽस्तु – May the mind be / मन ऐसा हो
- वाण्यां गुडवन्माधुर्यं – Sweetness in speech like jaggery / वाणी में गुड़ जैसी मिठास
- तिलगुडलद्दुकवत् – Like sesame-jaggery sweet (laddu) / तिल-गुड़ के लड्डू जैसा
- सम्बन्धे – In relationships / संबंधों में
- सुवृत्तत्त्वम् – Good nature and harmony / उत्तम व्यवहार
- विचारे – In thoughts / विचारों में
- शुभसंक्रमणं – Auspicious transformation / शुभ परिवर्तन
- मंगलाय यशसे – For prosperity and fame / मंगल और यश के लिए
- कल्याणी संक्रान्तिः – Auspicious Sankranti / मंगलमयी संक्रांति
- अस्तु वः – May it be for you / आप सबके लिए हो
- अहम् आशंसे – I wish / मैं कामना करता हूँ
आपका **मन तिल के समान कोमल और स्निग्ध हो**, आपकी **वाणी गुड़ की तरह मधुर हो**, और आपके **संबंध तिल-गुड़ के लड्डू की तरह मधुर और सुदृढ़ हों**। आपके विचारों में **शुभ परिवर्तन आए और जीवन में मंगल तथा यश की वृद्धि हो**। मैं आप सभी के लिए **कल्याणकारी संक्रांति की शुभकामना करता हूँ**।
May your **mind be soft and gentle like sesame**, may your **speech be sweet like jaggery**, and may your **relationships be harmonious like sesame-jaggery sweets**. May your thoughts undergo **auspicious transformation bringing prosperity and fame**. I sincerely wish you all a **blessed and auspicious Sankranti**.
यह श्लोक **सौहार्द, मधुरता और शुभ परिवर्तन** का संदेश देता है। तिल और गुड़ भारतीय संस्कृति में **मित्रता, प्रेम और सौहार्द का प्रतीक** हैं। इस श्लोक के माध्यम से जीवन में **मधुर वाणी, स्नेहपूर्ण संबंध और सकारात्मक विचार** रखने की प्रेरणा मिलती है।
सुभाषित की महिमा – श्लोक व्याख्या
सुभाषितरसं दृष्ट्वा सुधा भीता दिवं गता ॥
- द्राक्षा – Grapes / अंगूर
- म्लानमुखी जाता – Became dull-faced / मुरझा गई
- शर्करा – Sugar / शक्कर
- अश्मतां गता – Became like stone / पत्थर समान हो गई
- सुभाषित रसम् – The essence of wise sayings / सुभाषित का रस
- दृष्ट्वा – Seeing / देखकर
- सुधा – Nectar / अमृत
- भीता – Afraid / भयभीत
- दिवं गता – Went to heaven / स्वर्ग चली गई
सुभाषितों की मधुरता और रस को देखकर **अंगूर लज्जित होकर मुरझा गए**, **शक्कर भी पत्थर के समान कठोर हो गई**, और **अमृत भी भयभीत होकर स्वर्ग को चला गया**। अर्थात् **सुभाषितों का रस इतना मधुर और श्रेष्ठ है कि अन्य सभी मिठास उसके सामने फीकी पड़ जाती है**।
Seeing the sweetness of **wise sayings (Subhashitas)**, the **grapes became pale**, **sugar turned to stone**, and even **nectar, out of fear, returned to heaven**. This means the **sweetness and beauty of wise words surpass all other forms of sweetness**.
यह श्लोक **सुभाषितों की महानता और प्रभाव** को दर्शाता है। सत्य, ज्ञान और सद्वचन की मिठास **भौतिक वस्तुओं की मिठास से कहीं अधिक श्रेष्ठ होती है**। इसलिए जीवन में **सद्वचन, ज्ञान और नीति का महत्व सर्वोपरि है**।
गुणवान् पुरुष की महिमा – श्लोक व्याख्या
मणिः शीर्षे गले बाहौ यत्र कुत्र अपि शोभते ॥
- सर्वत्र देशे – In every place / हर स्थान पर
- गुणवान् – Virtuous person / गुणों वाला व्यक्ति
- शोभते – Shines / शोभा देता है
- प्रथितः नरः – Renowned person / प्रसिद्ध मनुष्य
- मणिः – Jewel / रत्न
- शीर्षे – On the head / सिर पर
- गले – On the neck / गले में
- बाहौ – On the arm / बांह पर
- यत्र कुत्र अपि – Anywhere / कहीं भी
- शोभते – Looks beautiful / शोभा देता है
जिस मनुष्य में **सद्गुण होते हैं**, वह **हर स्थान पर सम्मान और शोभा प्राप्त करता है**। जैसे **रत्न सिर, गले या बांह में कहीं भी धारण किया जाए, वह हर जगह सुंदर ही लगता है**। उसी प्रकार **गुणवान व्यक्ति हर स्थान पर आदर और प्रतिष्ठा पाता है**।
A **virtuous and noble person shines everywhere** and gains respect in all places. Just as a **jewel looks beautiful whether placed on the head, neck, or arm**, similarly a **person with good qualities is admired everywhere**.
यह श्लोक बताता है कि **सच्चा सम्मान पद, स्थान या बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि गुणों से मिलता है**। जिस व्यक्ति में **सदाचार, ज्ञान और विनम्रता** होती है, वह हर स्थान पर आदर पाता है। अतः जीवन में **गुणों का विकास ही वास्तविक प्रतिष्ठा का आधार है**।
ईश्वर पूजा का सच्चा अर्थ – श्लोक व्याख्या
सन्तोषं जनयेत्प्राज्ञः तदेवेश्वरपूजनम् ॥
- येन केन प्रकारेण – By any possible means / किसी भी प्रकार से
- यस्य कस्यापि – Of any person / किसी भी व्यक्ति का
- देहिनः – Living being / देहधारी प्राणी
- सन्तोषं – Happiness, satisfaction / संतोष
- जनयेत् – Should create / उत्पन्न करे
- प्राज्ञः – Wise person / बुद्धिमान व्यक्ति
- तत् एव – That itself / वही
- ईश्वर पूजनम् – Worship of God / ईश्वर की पूजा
बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह **किसी भी प्रकार से किसी भी प्राणी के मन में संतोष और प्रसन्नता उत्पन्न करे**। क्योंकि **दूसरों को सुख देना और संतोष प्रदान करना ही वास्तव में ईश्वर की सच्ची पूजा है**।
A wise person should try **by any possible means to bring happiness and satisfaction to any living being**. Creating joy in others is itself considered **true worship of God**.
यह श्लोक सिखाता है कि **ईश्वर पूजा केवल मंदिर, मंत्र या कर्मकांड तक सीमित नहीं है**। वास्तविक पूजा वह है जिसमें **हम दूसरों के जीवन में सुख, शांति और संतोष लाते हैं**। अर्थात् **मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है**।
सत्संग की महिमा – श्लोक व्याख्या
पुष्पमालाप्रसङ्गेन सूत्रं शिरसि धार्यते ॥
- गुणवत् जन – Virtuous people / गुणी व्यक्ति
- संसर्गात् – By association / संगति से
- याति – Attains / प्राप्त करता है
- नीचः अपि – Even a lowly person / नीच व्यक्ति भी
- गौरवम् – Respect, honor / सम्मान
- पुष्पमाला – Garland of flowers / पुष्पों की माला
- प्रसङ्गेन – By association / संगति के कारण
- सूत्रम् – Thread / धागा
- शिरसि – On the head / सिर पर
- धार्यते – Is worn / धारण किया जाता है
गुणवान व्यक्तियों की संगति से **नीच व्यक्ति भी सम्मान प्राप्त कर लेता है**। जैसे **फूलों की माला में जुड़ने के कारण साधारण धागा भी सिर पर धारण किया जाता है**।
Through association with **virtuous people**, even a **lowly person gains respect**. Just as a **simple thread is placed on the head when it becomes part of a garland of flowers**.
यह श्लोक **सत्संग की महानता** को दर्शाता है। मनुष्य की संगति उसके **चरित्र, सम्मान और जीवन की दिशा** को प्रभावित करती है। अतः जीवन में **सज्जनों और गुणवान व्यक्तियों की संगति** ही उन्नति और सम्मान का मार्ग है।
सत्संग का प्रभाव – श्लोक व्याख्या
पुष्पमालाप्रसङ्गेन सूत्रं शिरसि धार्यते ॥
- गुणवत् जन – Virtuous people / गुणवान व्यक्ति
- संसर्गात् – By association / संगति से
- याति – Attains / प्राप्त करता है
- नीचः अपि – Even a lowly person / नीच व्यक्ति भी
- गौरवम् – Respect / सम्मान
- पुष्पमाला – Garland of flowers / फूलों की माला
- प्रसङ्गेन – By connection / संबंध के कारण
- सूत्रम् – Thread / धागा
- शिरसि – On the head / सिर पर
- धार्यते – Is worn / धारण किया जाता है
गुणवान लोगों की संगति से **नीच व्यक्ति भी सम्मान प्राप्त कर लेता है**। जिस प्रकार **फूलों की माला में जुड़े होने के कारण साधारण धागा भी सिर पर धारण किया जाता है**, उसी प्रकार सज्जनों के साथ रहने से व्यक्ति का सम्मान बढ़ जाता है।
Through association with **virtuous people**, even a **lowly person gains honor and respect**. Just as a **simple thread becomes worthy of being placed on the head when it forms part of a garland of flowers**.
यह श्लोक **सत्संग की महिमा** को बताता है। मनुष्य की संगति उसके **चरित्र और प्रतिष्ठा** को प्रभावित करती है। इसलिए जीवन में **सज्जनों और गुणवान लोगों की संगति** करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विद्या से बुद्धि का विकास – श्लोक व्याख्या
तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनी दलम् इव विस्तारिता बुद्धिः ॥
- यः – One who / जो व्यक्ति
- पठति – Reads / पढ़ता है
- लिखति – Writes / लिखता है
- पश्यति – Observes / देखता है
- परिपृच्छति – Asks questions / प्रश्न करता है
- पण्डितान् – Learned people / विद्वानों को
- उपाश्रयति – Takes refuge in / आश्रय लेता है
- तस्य – His / उसकी
- दिवाकर किरणैः – By the rays of the sun / सूर्य की किरणों से
- नलिनी दलम् – Lotus petals / कमल की पंखुड़ियाँ
- इव – Like / जैसे
- विस्तारिता बुद्धिः – Expanded intellect / बुद्धि का विस्तार
जो व्यक्ति **पढ़ता है, लिखता है, ध्यानपूर्वक देखता है, प्रश्न करता है और विद्वानों की संगति करता है**, उसकी बुद्धि **सूर्य की किरणों से खिलने वाले कमल की पंखुड़ियों की तरह विकसित होती जाती है**।
One who **reads, writes, observes, asks questions, and seeks the guidance of learned people**, his intellect **expands like the petals of a lotus blooming under the rays of the sun**.
यह श्लोक बताता है कि **ज्ञान प्राप्त करने के कई मार्ग हैं**—पढ़ना, लिखना, देखना, प्रश्न करना और विद्वानों की संगति करना। इन सभी साधनों के माध्यम से **मनुष्य की बुद्धि निरंतर विकसित होती रहती है**, जैसे सूर्य की किरणों से **कमल का फूल धीरे-धीरे खिलता है**।

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