Sanskrit SubhAshita
न त्वहं कामये राज्यं – श्लोक व्याख्या
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनाम् आर्तिनाशनम् ॥
- न – Not / नहीं
- अहं – I / मैं
- कामये – Desire / इच्छा करता हूँ
- राज्यं – Kingdom / राज्य
- स्वर्गं – Heaven / स्वर्ग
- पुनर्भवम् – Rebirth / पुनर्जन्म
- दुःखतप्तानाम् – Those suffering / दुःख से पीड़ित
- प्राणिनाम् – Living beings / प्राणी
- आर्तिनाशनम् – To relieve from suffering / कष्ट निवारण
मैं न तो राज्य चाहता हूँ, न स्वर्ग और न ही पुनर्जन्म की इच्छा रखता हूँ। मेरी केवल यह इच्छा है कि दुख और कष्ट से पीड़ित प्राणियों का कल्याण और मुक्ति हो।
I do not desire kingdom, heaven, or rebirth. My only wish is to alleviate the suffering of living beings who are afflicted with pain.
यह श्लोक अहंकार और सांसारिक इच्छाओं से ऊपर उठकर **परमार्थ और करुणा** के मार्ग पर चलने की शिक्षा देता है। मनुष्य का उच्चतम लक्ष्य केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि दूसरों के दुःख का निवारण और सेवा करना होना चाहिए।
अजायुद्धमृषिश्राद्धं – श्लोक व्याख्या
दम्पत्योः कलहश्चैव परिणामे न किञ्चन ॥
- अजायुद्धम् – Without fighting / बिना संघर्ष
- ऋषि-श्राद्धम् – Offering to sages / ऋषियों को श्राद्ध
- प्रभाते – In the morning / प्रातः
- मेघ-डम्बरम् – Cloud show / मेघों का गर्जन या दृश्य
- दम्पत्यः – Husband and wife / दंपत्ति
- कलहः – Quarrel / कलह
- परिणामे – Result / परिणाम
- न किञ्चन – Nothing / कुछ भी नहीं
सुबह ऋषियों को श्राद्ध देने और मेघों के गर्जन को देखकर भी, अगर दंपत्ति के बीच कलह हो, तो उसका कोई वास्तविक परिणाम नहीं होता।
Even by offering rituals to sages in the morning and witnessing the display of clouds, if there is quarrel between husband and wife, it bears no real effect.
यह श्लोक यह सिखाता है कि बाहरी अनुष्ठान, पूजा या प्राकृतिक अद्भुत घटनाएँ तब तक मूल्यहीन हैं जब तक हमारे व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में **सद्भाव और शांति** नहीं है। अंतर्निहित शांति के बिना कोई भी कर्म सार्थक नहीं होता।
क्षणशः कणशश्चैव – श्लोक व्याख्या
क्षण त्यागे कुतो विद्या कणत्यागे कुतो धनम् ॥
- क्षणशः – Moment by moment / क्षण-क्षण में
- कणशश्च – Particle by particle / कण- कण में
- विद्या – Knowledge / विद्या
- अर्थं – Wealth / धन, सम्पत्ति
- साधयेत् – Should be pursued / साधना करनी चाहिए
- त्यागे – By giving up / त्याग में
- कुतः – How / कैसे
- धनम् – Wealth / संपत्ति
विद्या और धन को प्राप्त करने के लिए समय और अवसर का क्षण-क्षण और कण-कण उपयोग करना चाहिए। यदि समय और अवसर का त्याग किया जाए, तो विद्या और धन कभी नहीं प्राप्त होंगे।
Knowledge and wealth should be pursued moment by moment, particle by particle. If moments and opportunities are neglected, knowledge and wealth can never be attained.
यह श्लोक हमें सिखाता है कि समय और अवसर का महत्त्व अत्यधिक है। छोटी-छोटी क्रियाओं और लगातार प्रयासों के बिना विद्या और संपत्ति कभी स्थायी रूप से प्राप्त नहीं होती। हर क्षण और प्रत्येक अवसर का सदुपयोग करना जीवन की सफलता का मूलमंत्र है।
अपि स्वर्णमयी लङ्का – श्लोक व्याख्या
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥
- अपि – Even / भी
- स्वर्णमयी लङ्का – Golden Lanka / सोने जैसी लंका
- न मे… रोचते – Does not appeal to me / मुझे प्रिय नहीं है
- जननी – Mother / जननी, माता
- जन्मभूमिश्च – Birthplace / जन्मभूमि
- स्वर्गात् अपि – Even more than heaven / स्वर्ग से भी अधिक
- गरीयसी – Eminent / श्रेष्ठ, उच्चतम
स्वर्णमयी लंका जैसी समृद्धि वाली जगह भी मुझे प्रिय नहीं है। जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी अधिक प्रिय और महान है।
Even a golden city like Lanka does not appeal to me. The mother and one’s birthplace are superior and more dear than heaven itself.
यह श्लोक हमें मातृभूमि और माता के महत्व का बोध कराता है। धन, वैभव या भौतिक समृद्धि जीवन में हमेशा सर्वोपरि नहीं होते। सच्चा प्रेम और सम्मान अपने जन्मस्थान और माता के लिए होना चाहिए।
परोपकाराय – श्लोक व्याख्या
परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकारार्थमिदं शरीरम् ॥
- परोपकाराय – For the welfare of others / दूसरों के हित के लिए
- फलन्ति वृक्षाः – Trees bear fruit / वृक्ष फल देते हैं
- वहन्ति नद्यः – Rivers flow / नदियाँ बहती हैं
- दुहन्ति गावः – Cows give milk / गायें दूध देती हैं
- अयं शरीरः – This body / यह शरीर
- परोपकारार्थम् – For the service of others / दूसरों के कल्याण हेतु
जैसे वृक्ष अपने फल दूसरों के लिए देते हैं, नदियाँ अपने जल दूसरों के लिए बहाती हैं, गायें दूध दूसरों के लिए देती हैं, वैसे ही यह हमारा शरीर भी दूसरों की भलाई के लिए है।
Just as trees bear fruits for the benefit of others, rivers flow for others, and cows give milk for the benefit of others, similarly, this body exists for serving the welfare of others.
यह श्लोक हमें परोपकार का महत्व समझाता है। मनुष्य का शरीर और जीवन केवल अपने लिए नहीं है; यह दूसरों की सेवा और समाज कल्याण में लगाया जाना चाहिए। निस्वार्थ सेवा ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है।
अमन्त्रम् अक्षरं – श्लोक व्याख्या
अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः ॥
- अमन्त्रम् – Without mantra / मंत्ररहित
- अक्षरं – Imperishable / अक्षर
- मूलम् – Root / मूल
- औषदम् – Medicine / औषधि
- अयोग्यः पुरुषः – Unfit person / अयोग्य व्यक्ति
- योजकः – One who unites or applies / योजक
- दुर्लभः – Rare / दुर्लभ
इस संसार में न कोई ऐसा मंत्र है जो सभी कठिनाइयों का समाधान कर सके, न कोई अक्षर है जो अजर-अमर हो, न कोई औषधि है जो सभी रोगों का इलाज करे। और अयोग्य व्यक्ति को किसी भी महान कार्य में सफल करना अत्यंत दुर्लभ है।
In this world, there is no mantra that can solve all difficulties, no imperishable letter, no medicine that cures all ailments, and it is extremely rare for an unfit person to succeed in any great work.
यह श्लोक हमें सिखाता है कि सफलता, ज्ञान और साधना केवल योग्य व्यक्ति और प्रयास के लिए संभव है। कोई भी शक्ति, औषधि या मंत्र स्वयं कार्य नहीं कर सकता; योग्य और तैयार मनुष्य ही उसका सही उपयोग कर सकता है। साधना में अयोग्य व्यक्ति और आलसी का स्थान नहीं है।
एकचक्रो रथो – श्लोक व्याख्या
आक्रामत्येव तेजस्वी तथ्याप्यर्को नभस्तलम् ॥
- एकचक्रः रथः – Single-wheeled chariot / एक चक्र वाला रथ
- यन्ता – Moving / चलने वाला
- विकलः – Unsteady / अस्थिर
- विषमे हयाः – Horses in a dangerous/uneven situation / विषम परिस्थितियों में घोड़े
- आक्राम्यते – Rushes forward / आक्रमण करता है
- तेजस्वी – Powerful / तेजस्वी
- तथ्यापि – Nevertheless / तथापि
- अर्कः – Sun / सूर्य
- नभस्तलम् – Sky / आकाश
एकचक्र वाला रथ, जिसमें घोड़े अस्थिर और विषम स्थिति में हैं, तेजस्वी होकर आगे बढ़ता है, और सूर्य (अर्क) भी आकाश में उसकी गति और उत्साह को देखता है। यह श्लोक शक्ति, साहस और गतिशीलता का प्रतीक है।
A single-wheeled chariot, whose horses are unsteady in a difficult situation, rushes forward with vigor. The sun too observes its speed and brilliance in the sky. This verse symbolizes power, courage, and momentum.
यह श्लोक हमें बताता है कि कठिन परिस्थितियों में भी यदि शक्ति, साहस और धैर्य के साथ आगे बढ़ा जाए, तो कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। जीवन के विपरीत मार्ग में स्थिरता और गति का समन्वय सफलता की कुंजी है।
मधुसिक्तो निम्बखण्डः – श्लोक व्याख्या
गंगास्नातोऽपि दुर्जनः स्वभावं नैव मुन्चति ॥
- मधुसिक्तः – Soaked in honey / मधु में भीगा हुआ
- निम्बखण्डः – Piece of lemon / नींबू का टुकड़ा
- दुग्धपुष्टः – Fed on milk / दूध पिलाकर पोषित
- भुजंगः – Snake / सर्प
- गंगास्नातः – Bathed in Ganga / गंगा में स्नान किया हुआ
- दुर्जनः – Wicked person / दुष्ट व्यक्ति
- स्वभावं न मुन्चति – Does not abandon his nature / अपना स्वभाव नहीं छोड़ता
जैसे मधु में भिगा हुआ नींबू या दूध से पोषित सर्प अपनी प्रवृत्ति नहीं बदलता, वैसे ही कोई दुष्ट व्यक्ति, भले ही गंगा में स्नान कर ले, अपने स्वभाव और दुष्ट कर्मों को नहीं छोड़ता।
Just as a lemon soaked in honey or a milk-fed snake does not change its inherent nature, a wicked person, even after bathing in the Ganga, does not abandon his evil tendencies.
यह श्लोक हमें सिखाता है कि बाहरी कर्म या पूजा से किसी का स्वभाव नहीं बदलता। सच्चा परिवर्तन केवल आंतरिक साधना, ज्ञान और साधक का प्रयास से ही संभव है।
एकेनापि सुवृक्षेण – श्लोक व्याख्या
वासितं तद् वनं सर्वं सुप्त्रेण कुलं यथा ॥
- एकेन – By one / एक द्वारा
- सुवृक्षेण – Beautiful tree / सुन्दर वृक्ष
- पुष्पितेन – Blooming / पुष्पित
- सुगन्धिना – Fragrant / सुगंधित
- वासितं – Perfumed / महकित
- वनं सर्वं – Entire forest / सम्पूर्ण वन
- सुप्त्रेण कुलं यथा – Like an entire family by one virtuous person / जैसे एक पुण्य व्यक्ति द्वारा सम्पूर्ण परिवार का गुण बढ़ता है
जैसे एक सुन्दर और पुष्पित सुगंधित वृक्ष पूरे वन को महका देता है, वैसे ही एक गुणी और पुण्य व्यक्ति पूरे परिवार या समाज को लाभ और प्रसिद्धि प्रदान करता है।
Just as a single beautiful, blooming, and fragrant tree can perfume an entire forest, similarly, one virtuous person can bring prosperity, honor, and positive influence to his entire family or community.
यह श्लोक हमें सिखाता है कि एक व्यक्ति का पुण्य और गुण पूरे समाज या परिवार पर गहरा प्रभाव डालता है। एक व्यक्ति का सही कर्म और चरित्र अन्य लोगों के जीवन को भी उज्जवल बना सकता है।
ऋणशेषोऽग्निशेषश्च – श्लोक व्याख्या
पुनः पुनः प्रवर्धन्ते तस्माच्छेषं न रक्षयेत् ॥
- ऋणशेषः – Remaining debt / शेष बकाया ऋण
- अग्निशेषः – Remaining fire / जलती आग का शेष
- शत्रुशेषः – Remaining enemy / शेष शत्रु
- पुनः पुनः प्रवर्धन्ते – Grow again and again / बार-बार बढ़ते हैं
- तस्मात् शेषं न रक्षयेत् – Therefore, do not preserve the remainder / इसलिए शेष को सुरक्षित नहीं रखना चाहिए
जैसे शेष ऋण, शेष आग और शेष शत्रु समय-समय पर बढ़ते रहते हैं, वैसे ही जीवन में बचा हुआ अयोग्य कर्म, पिछली गलतियाँ और दुर्भावनाएँ बार-बार प्रकट हो सकती हैं। इसलिए ऐसे शेष को संजोकर नहीं रखना चाहिए।
Just as remaining debt, fire, or an enemy can grow again and again, similarly, unresolved past actions, mistakes, or hostility can resurface repeatedly. Hence, one should not preserve or harbor such remnants.
यह श्लोक हमें चेतावनी देता है कि जीवन में अवशिष्ट नकारात्मक चीज़ें बार-बार हमें प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए पुराने ऋण, दुश्मनी और नकारात्मक भावनाओं को दिल में संजोकर नहीं रखना चाहिए। उन्हें समय पर समाप्त करना और मुक्त रहना ही जीवन की शांति है।
उदये सविता रक्तो – श्लोक व्याख्या
सम्पत्तौ च विपत्तौ च साधुनामेकरूपता ॥
- उदये – At sunrise / उदय होने पर
- सविता – Sun / सूर्य
- रक्तः – Red / लाल
- अस्तमे – At sunset / अस्त होने पर
- सम्पत्तौ – In prosperity / समृद्धि में
- विपत्तौ – In adversity / विपत्ति में
- साधूनाम् – Of virtuous people / साधुजन
- एकरूपता – Sameness / समानता, स्थिरता
सूर्य के उदय और अस्त होने पर जो लालिमा दिखाई देती है, वैसे ही साधुजन की एकरूपता, उनकी स्थिरता और समानता, समृद्धि और विपत्ति दोनों में समान रूप से दिखाई देती है। साधुजन हमेशा अपने स्वभाव में स्थिर रहते हैं।
Just as the sun appears red at sunrise and sunset, similarly, the virtue and steadiness of the righteous are consistent both in times of prosperity and adversity. The wise and virtuous maintain their equanimity always.
यह श्लोक हमें बताता है कि साधु और ज्ञानी व्यक्ति का चरित्र परिस्थितियों के अनुसार बदलता नहीं। साधुजन अपनी स्थिरता और सद्गुणों में समृद्धि या संकट में समान रहते हैं। यह स्थिरता ही वास्तविक योग और धैर्य का परिचायक है।
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः – श्लोक व्याख्या
दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ?
- उद्योगिनं – Diligent person / उद्योगी व्यक्ति
- पुरुषसिंहम् – Like a lion among men / पुरुषों में शेर समान
- उपैति लक्ष्मीः – Attains wealth / लक्ष्मी प्राप्त करता है
- दैवेन – By fate / भाग्य से
- दैवं निहत्य – Conquering destiny / भाग्य को जीतकर
- पौरुषम – Courage, effort / पुरुषार्थ, पराक्रम
- आत्मशक्त्या – By one’s own power / अपनी शक्ति से
- सिध्यति – Succeeds / सिद्ध होता है
- कापुरुषा – Cowardly persons / कायर लोग
- कोऽत्र दोषः – Who is at fault here? / दोष किसका है?
उद्योगी और पराक्रमी पुरुष ही धन और सफलता को प्राप्त करता है। कायर लोग कहते हैं कि यह सब केवल भाग्य से होता है। परंतु जो व्यक्ति अपनी शक्ति, परिश्रम और पुरुषार्थ से प्रयास करता है, और फिर भी सफल नहीं होता, तो उसमें कोई दोष नहीं है। सफलता का मूल कारण कर्म और परिश्रम है, न कि केवल भाग्य।
Only a diligent and courageous person attains wealth and success. Cowards claim that everything happens only due to fate. But one who exerts his own power and effort, and still does not succeed, is not at fault. Success primarily depends on one’s effort and diligence, not mere destiny.
यह श्लोक हमें सिखाता है कि **सफलता का आधार भाग्य नहीं बल्कि कर्म और पुरुषार्थ है**। कायर और आलसी लोग भाग्य को दोष देते हैं, जबकि वास्तविक शक्ति अपने प्रयास में है। सही दृष्टिकोण यह है कि व्यक्ति अपने प्रयास में संलग्न रहे और परिणाम की चिंता न करे।
उपसर्गेण धात्वर्थो – श्लोक व्याख्या
प्रहाराहारसंहारविहारपरिहारवत् ॥
- उपसर्गेण – By prefix / उपसर्ग द्वारा
- धात्वर्थः – The meaning of the root / धातु का अर्थ
- बलात् – By force / बल द्वारा
- अन्यत्र नीयते – Is not transferred elsewhere / अन्यत्र नहीं ले जाया जाता
- प्रहारः – Strike, attack / प्रहार
- आहरः – Food / आहार
- संहारः – Destruction / संहार
- विहारः – Recreation / विहार
- परिहारवत् – As exemption / परिहार के समान
धातु का वास्तविक अर्थ केवल उपसर्ग से स्पष्ट होता है, बल प्रयोग करके इसे कहीं और नहीं ले जाया जा सकता। जैसे प्रहार, आहार, संहार और विहार अपने स्थान पर होते हैं, वैसे ही धातु का अर्थ भी केवल उसके उपसर्ग द्वारा ही समझा जाता है। अन्यथा यह किसी भी प्रकार से बदल नहीं सकता।
The true meaning of a verbal root (dhatu) is realized only through its prefix (upsarga). It cannot be forcibly applied elsewhere. Just as strikes, food, destruction, and recreation occur in their proper contexts, the meaning of a root is understood only in conjunction with its prefix. It cannot be altered arbitrarily.
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि **सही संदर्भ और मार्गदर्शन के बिना ज्ञान अधूरा है**। उपसर्ग धातु के अर्थ को परिभाषित करता है, बिना उपसर्ग के उसका वास्तविक प्रभाव नहीं समझा जा सकता। सत्य ज्ञान और कर्म में भी संदर्भ का महत्व उतना ही आवश्यक है जितना भाषा में।
एते सत्पुरुषाः परार्थघटकाः – श्लोक व्याख्या
सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये ।
तेऽमी मानवराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये ।
ये तु घ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे ॥
- एते – These / ये
- सत्पुरुषाः – Virtuous people / सत्पुरुष
- परार्थघटकाः – Dedicated to the welfare of others / परहित हेतु लोग
- स्वार्थान् परित्यज – Giving up personal gain / स्वार्थ त्यागते हैं
- सामान्याः – Ordinary people / सामान्य लोग
- परार्थमुद्यमभृतः – Performing efforts for others’ welfare / परहित के लिए प्रयासरत
- स्वार्थाविरोधेन – Without conflicting personal interest / स्वार्थ विरोध रहित
- मानवराक्षसाः – Humans behaving like demons / जो मनुष्य राक्षस की तरह हैं
- परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति – Destroy others’ welfare for personal gain / दूसरों के भले के लिए हानि करते हैं, स्वार्थ के लिए
- निरर्थकं परहितं – Useless welfare / व्यर्थ का परहित
जो लोग परहित के लिए काम करते हैं और अपने स्वार्थ को त्याग देते हैं, वे सत्पुरुष कहलाते हैं। सामान्य लोग जो दूसरों के भले के लिए प्रयास करते हैं, लेकिन अपने स्वार्थ से नहीं टकराते, वे भी अच्छे हैं। जो लोग दूसरों के हित को अपने स्वार्थ के लिए नष्ट करते हैं, वे मानवराक्षस समान हैं। और जो लोग व्यर्थ का परहित नष्ट करते हैं, उनके उद्देश्य को हम नहीं समझ सकते।
Those who abandon their personal gain and work solely for the welfare of others are virtuous people. Ordinary people who perform efforts for the welfare of others without conflicting personal interest are also commendable. Those who destroy others’ welfare for personal gain behave like human-demons. And those who destroy useless welfare, we cannot comprehend their motives.
यह श्लोक हमें बताता है कि **सच्चा परहित वही है जो स्वार्थ से रहित हो**। व्यर्थ या स्वार्थ के लिए किए गए परहित का मूल्य नहीं है। सत्पुरुष वही हैं जो दूसरों के भले के लिए निःस्वार्थ भाव से कार्य करते हैं। इसी दृष्टि से नैतिकता और धर्म का असली मूल्य समझा जा सकता है।
अनुदिनमनुतापेन – श्लोक व्याख्या
परमकरुण मोहं छिन्धि मायासमेतम् ।
इदमतिचपलं मे मानसं दुर्निवारं ।
भव्ति च बहु खेदस्त्वां विना धाव शीघ्रम् ॥
- अनुदिनम् – Every day / प्रतिदिन
- अनुतापेन – With grief or repentance / पछतावे के साथ
- राम तप्तः – Burned or tormented, O Rama / हे राम, तपते हुए
- परमकरुण – Supreme compassion / अत्यंत दयालु
- मोहं छिन्धि – Remove delusion / मोह को दूर कर
- मायासमेतम् – With illusion / माया सहित
- इदम् अति चपलं – This mind is very restless / यह मन अत्यंत चंचल है
- दुर्निवारं – Difficult to control / कठिन नियंत्रण योग्य
- बहु खेदः – Much grief / बहुत शोक
- त्वां विना – Without you / तुम्हारे बिना
- धाव शीघ्रम् – Quickly runs / शीघ्र भागता है
हे राम! मैं प्रतिदिन पछतावे और दुःख में तपता हूँ। हे परमकरुणामय! मेरी माया सहित मोह को दूर करो। मेरा मन अत्यंत चंचल और असंयमित है, इसे नियंत्रित करना कठिन है। तुम्हारे बिना मेरा मन शीघ्र ही शोक में दौड़ जाता है।
O Rama! I burn every day with grief and repentance. O Most Compassionate One! Remove the delusion filled with maya (illusion) from me. This mind of mine is extremely restless and hard to control. Without You, it quickly runs into sorrow.
यह श्लोक आत्मा की **अशांत मानसिक स्थिति और मोहमाया** को दर्शाता है। हमारा मन बिना ईश्वर के मार्गदर्शन के शोक और मोह में बह जाता है। सच्चा समाधान और शांति केवल **ईश्वर के स्मरण और भक्ति** में ही संभव है। यह हमें ध्यान और भक्ति के महत्व की ओर इंगित करता है।
न भूतपूर्वं न कदापि – श्लोक व्याख्या
तथापि तॄष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ॥
- न भूतपूर्वं – Never existed before / पूर्व में कभी नहीं हुआ
- न कदापि – At no time / कभी नहीं
- वार्ता – Event / घटना
- हेम्नः कुरंगः – Golden monkey / स्वर्ण रंग का बंदर (आकृति रूपक)
- न दृष्टः – Never seen / कभी देखा नहीं गया
- तथापि – Nevertheless / फिर भी
- तृष्णा – Desire / लालसा, तृष्णा
- रघुनन्दनस्य – Of Raghunandan (Lord Rama) / रघुनंदन के
- विनाशकाले – At the time of destruction / विनाश के समय
- विपरीतबुद्धिः – Wrong-mindedness / विपरीत बुद्धि, असंतुलित सोच
इस प्रकार की कोई घटना पहले कभी नहीं हुई और न ही इसे कभी देखा गया। स्वर्णवर्ण का यह रूपक (हेम्न कुरंग) भी न देखा गया। फिर भी, रघुनंदन (राम) के विनाशकाले, तृष्णा और लालसा से मनुष्य का मन विपरीत और असंतुलित हो जाता है।
Such an event has never occurred before, nor has it ever been seen. Even the golden monkey (Hemna Kurang) has never been seen. Yet, at the time of Raghunandan’s (Lord Rama’s) destruction, desire and craving cause the mind to become misguided and unstable.
यह श्लोक **इच्छा, लालसा और मोह** के प्रकोप को दर्शाता है। भले ही कोई घटना पहले न हुई हो या असंभव प्रतीत हो, मनुष्य की **तृष्णा और असंतुलित बुद्धि** विपत्ति के समय उसे भ्रम और गलत मार्ग पर ले जा सकती है। यह हमें **संतुलन, विवेक और ईश्वर की शरण** में रहने का महत्व बताता है।
सौवर्णानि सरोजानि – श्लोक व्याख्या
तत्र सौरभ निर्माणे चतुरः चतुराननः ॥
- सौवर्णानि – Golden / सुवर्ण
- सरोजानि – Lotus flowers / कमल के फूल
- निर्मातुं – To create / बनाने के लिए
- सन्ति – Are / होते हैं
- शिल्पिनः – Artisans / कलाकार, शिल्पी
- तत्र – There / वहाँ
- सौरभ – Fragrance / सुगंध
- निर्माणे – In making / निर्माण में
- चतुरः – Clever / चतुर, कुशल
- चतुराननः – Four-faced / चार मुख वाला (विवेकपूर्ण रूपक)
कलाकार (शिल्पी) सुवर्ण कमल के फूल बनाने में निपुण हैं। वह कमल अपने सुगंध निर्माण में चार मुख वाले कुशल और चतुर शिल्पी के समान है। इसमें **सौंदर्य, कुशलता और दक्षता** का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
Artisans are skilled in creating golden lotus flowers. In crafting their fragrance, they resemble a clever, four-faced master. This depicts a perfect harmony of beauty, skill, and dexterity.
यह श्लोक सृजनात्मक शक्ति और निपुणता को दर्शाता है। कुशल शिल्पी का कार्य न केवल भौतिक सौंदर्य बल्कि **आध्यात्मिक संतुलन और विवेक** का भी प्रतीक है। जैसे शिल्पी अपने कारीगरी में पूर्ण है, वैसे ही व्यक्ति को अपने कर्म और ज्ञान में निपुण होना चाहिए।
स्वायत्तमेकान्तहितं – श्लोक व्याख्या
विशेषतः सर्वविदां समाजे विन्हूषणं मौनमपण्डितानाम् ॥
- स्वायत्त – Independent / स्वतंत्र
- एकान्तहितं – For selfless good / एकान्त हित के लिए
- विधात्रा – Creator / सृष्टिकर्ता
- विनिर्मितं – Created / निर्मित
- छादनम् – Protection / आच्छादन, सुरक्षा
- अज्ञतायाः – Ignorance / अज्ञान
- विशेषतः – Especially / विशेष रूप से
- सर्वविदां – Of all scholars / सभी विद्वानों का
- समाजे – In society / समाज में
- विन्हूषणम् – Ornament / आभूषण, गहना
- मौनम् – Silence / मौन
- अपण्डितानाम् – Of the learned / ज्ञानी लोगों का
सृष्टिकर्ता ने **स्वायत्त और एकान्तहितकारी** रूप से अज्ञानता के आवरण को निर्मित किया। विशेषकर समाज में सभी विद्वानों और ज्ञानी लोगों के लिए उनका **मौन और संयम** ही सबसे बड़ा आभूषण है।
The Creator has, in an independent and selfless manner, created a covering over ignorance. Especially in society, the **silence and restraint** of learned and wise individuals is considered their greatest ornament.
यह श्लोक बताता है कि वास्तविक ज्ञान और बुद्धि का सबसे बड़ा आभूषण **मौन, संयम और स्व-नियंत्रण** है। जितने भी ज्ञानी और विद्वान हैं, उनके लिए बाहरी आभूषण की तुलना में **मौन और विवेक** अधिक मूल्यवान हैं। स्वयं का नियंत्रण और अहंकार का परित्याग ही सच्चा गुण है।
विनिर्मिले – श्लोक व्याख्या
मूर्खास जे मौनचि फार साजे सभेस त्यान्च्या बहु जाणते जे ॥
- विनिर्मिले – Removed / हटाया गया
- ज़ाकण – Cover / आवरण, झाकण
- अज्ञतेचे – Of ignorance / अज्ञान का
- स्वाधीन – Independent / स्वतंत्र
- पद्मभवे – In the world / जगत में
- फुकाचे – Created / निर्मित
- मूर्खास – For fools / मूर्खों के लिए
- मौनचि – Of silence / मौन का
- फार साजे – Great ornament / बड़ा आभूषण
- सभेस – In society / समाज में
- त्यान्च्या बहु जाणते जे – Those who know / जो जानते हैं
सृष्टिकर्ता ने **अज्ञान के आवरण** को हटाया और स्वतंत्र रूप से इसे जगत में प्रकट किया। मूर्खों के लिए मौन एक **महान आभूषण** है, और जो लोग वास्तव में जानते हैं, उनके लिए यही सबसे मूल्यवान है।
The Creator removed the cover of ignorance and established independence in the world. For fools, silence is the **greatest ornament**, and for those who truly know, it is the most valuable attribute.
यह श्लोक हमें बताता है कि **मौन और विवेक** ही ज्ञानी और विद्वानों का सबसे बड़ा आभूषण है। जो लोग अपनी अज्ञानता को छोड़कर ज्ञान और आत्मबोध में रहते हैं, उनके लिए मौन का अभ्यास सर्वोपरि है। मौन से मन शांत होता है और आंतरिक शक्ति विकसित होती है।
गुरुशुश्रूशया – श्लोक व्याख्या
अथ वा विद्यया विद्या चतुर्थो न उपलभ्यते ॥
- गुरुशुश्रूशया – By serving the Guru / गुरु की सेवा द्वारा
- विद्या – Knowledge / ज्ञान
- पुष्कलेन – Abundantly / पर्याप्त मात्रा में
- धनेन – With wealth / धन के साथ
- अथ – Otherwise / अन्यथा
- विद्यया – By knowledge / ज्ञान द्वारा
- चतुर्थो न उपलभ्यते – The fourth (highest) cannot be attained / चौथा (सर्वोच्च) प्राप्त नहीं होता
किसी भी व्यक्ति को **सर्वोच्च ज्ञान या विद्या** केवल तीन माध्यमों से प्राप्त होती है – 1) गुरु की सेवा, 2) पर्याप्त धन, 3) विद्या स्वयं। इन तीनों के बिना चौथा (सर्वोच्च) ज्ञान प्राप्त नहीं होता।
Supreme knowledge can be attained through **three means** – 1) Serving the Guru, 2) Having abundant wealth, 3) Knowledge itself. Without these, the fourth (highest) knowledge cannot be achieved.
यह श्लोक हमें यह समझाता है कि **ज्ञान का सर्वोच्च रूप** केवल तभी उपलब्ध होता है जब हम गुरु का सम्मान करें, संसाधनों का सही उपयोग करें और विद्या में निपुण हों। ज्ञान केवल अध्ययन या पढ़ाई से ही नहीं आता, बल्कि गुरु की सेवा और साधन की प्राप्ति भी आवश्यक है।
चलत्येकेन पादेन – श्लोक व्याख्या
न समीक्ष्यापरं स्थानं पूर्वमायातनं त्यजेत् ॥
- चलत्येकेन पादेन – Moves with one foot / एक पाद से चलता है
- तिष्ठत्येकेन – Stands on one foot / एक पाद पर खड़ा रहता है
- पण्डितः – Wise person / ज्ञानी, पंडित
- न समीक्ष्य – Without observing / देखे बिना
- परं स्थानं – Another place / दूसरी जगह
- पूर्वमायातनं – Previous dwelling / पूर्व का आवास, पहले का स्थान
- त्यजेत् – Should abandon / त्यागना चाहिए
एक पाय पर खड़ा होकर और एक पाय से चलते हुए भी एक ज्ञानी व्यक्ति **पूर्व के स्थान या अतीत की चीज़ों में फँसा नहीं रहता**। वह बिना देखे या परखें, पुराने भ्रम और पुराने आवास को छोड़ देता है और वर्तमान में रहता है।
Even while moving with one foot and standing on the other, a wise person **does not cling to past places or dwellings**. Without inspection or hesitation, he abandons previous attachments and remains rooted in the present.
यह श्लोक हमें सिखाता है कि **सच्चा ज्ञान** हमें अतीत में नहीं बाँधता। एक ज्ञानी व्यक्ति वर्तमान में स्थिर रहते हुए, पुराने भ्रम, संबंध और जगहों का मोह त्याग देता है। यह स्थिरता और परिपक्वता जीवन में आगे बढ़ने का मार्ग है।
कल्पद्रुमः – श्लोक व्याख्या
चिन्तामणिश्चिन्तितमेव दत्ते सतां तु संगः सकलम् प्रसूते ॥
- कल्पद्रुमः – Wish-fulfilling tree / कल्पवृक्ष
- कल्पितमेव सूत् – Produced as imagined / कल्पित रूप में उत्पन्न
- कामधुक् – Cow that gives milk as desired / कामधेनु
- कामितमेव दोग्धि – Gives milk according to desire / इच्छानुसार दूध देती है
- चिन्तामणि – Wish-fulfilling gem / चमत्कारी मणि
- चिन्तितमेव दत्ते – Gives whatever is wished / इच्छानुसार देता है
- सतां संगः सकलम् – Association of the virtuous / सत्पुरुषों का समूह
- प्रसूते – Gives birth / प्रसूत करता है / उत्पन्न करता है
कल्पद्रुम और कामधेनु केवल कल्पित और इच्छानुसार फल देने वाले होते हैं। ठीक इसी तरह, **सत्पुरुषों के साथ का संग** भी उन सभी के लिए लाभकारी होता है जो सत्कर्म और धर्म में प्रवृत्त हैं। सत्पुरुषों का संग जीवन में समस्त शुभ कार्यों और गुणों की प्राप्ति कराता है।
Just as a **Kalpadruma** (wish-fulfilling tree) and a **Kamadhenu** (desire-fulfilling cow) provide whatever is desired, similarly, **association with virtuous people** brings all benefits to those who are engaged in righteous actions. Being in the company of the virtuous leads to growth in all goodness and merits.
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि **सत्पुरुषों का संग** जीवन में सबसे बड़ा वरदान है। जैसे कल्पद्रुम और कामधेनु इच्छानुसार फल देती हैं, वैसे ही सत्पुरुषों के संग से मनुष्य सभी प्रकार के पुण्य और लाभ प्राप्त करता है। अतः अपने जीवन में योग्य संग का महत्व अत्यंत है।
सत्यं ब्रूयात् – श्लोक व्याख्या
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः ॥
- सत्यं ब्रूयात् – Speak the truth / सत्य बोलो
- प्रियं ब्रूयात् – Speak what is pleasing / प्रिय बोलो
- न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् – Do not speak truth that is unpleasant / ऐसा सत्य न बोलो जो अप्रिय हो
- प्रियं च नानृतं ब्रूयात् – Do not speak pleasant untruth / ऐसा प्रिय नहीं सत्य न बोलो
- एष धर्मः सनातनः – This is eternal dharma / यही सनातन धर्म है
हमें हमेशा **सत्य बोलना चाहिए**, और वही बोलना चाहिए जो **प्रिय और हितकर** हो। कभी भी ऐसा सत्य न बोलें जो दूसरों को दुख पहुँचाए, और कभी भी ऐसा प्रिय न बोलें जो झूठ हो। यही सनातन धर्म का मार्ग है।
One should always **speak the truth** and speak only that which is **pleasant**. Never speak a truth that is unpleasant, and never speak a pleasant lie. This is the **eternal dharma**.
यह श्लोक हमें जीवन में **सत्य और नैतिकता** के पालन का मूल मंत्र देता है। सत्य बोलना ही धर्म है, परंतु ऐसा सत्य बोलना चाहिए जो उचित और प्रिय हो। झूठ और अप्रिय सत्य से मानव संबंध और समाज में अशांति उत्पन्न होती है।
सम्पूर्णकुम्भो – श्लोक व्याख्या
अर्धो घटो घोषमुपैति नूनं ।
विद्वान् कुलीनो न करोति गर्वं
मूधास्तु जल्पन्ति गुणैर्विहीनाः ॥
- सम्पूर्णकुम्भो – A full pot / पूर्ण घट
- न करोति शब्दं – Does not make sound / आवाज नहीं करता
- अर्धो घटः – Half-filled pot / आधा घट
- घोषमुपैति नूनं – Certainly makes noise / निश्चित रूप से आवाज करता है
- विद्वान् कुलीनः – A wise and noble person / ज्ञानी और कुलीन व्यक्ति
- न करोति गर्वं – Does not show pride / गर्व नहीं करता
- मूढाः – Foolish / मूर्ख
- जल्पन्ति गुणैर्विहीनाः – Talk without virtues / गुणहीन बातें करते हैं
जैसे **पूर्ण घट शांत रहता है** और **आधा घट आवाज करता है**, वैसे ही **ज्ञानी और कुलीन व्यक्ति विनम्र रहता है** और अपने गुणों का घमंड नहीं करता। मूर्ख और अविद्या वाले लोग, जो गुणहीन हैं, वे अक्सर **बिना कारण बातें और दिखावा करते हैं**।
Just as a **full pot makes no sound**, and a **half-filled pot makes noise**, similarly, a **wise and noble person remains humble** and does not boast of his virtues. Foolish and ignorant people, lacking qualities, often **speak unnecessarily**.
यह श्लोक हमें सिखाता है कि **सच्चा ज्ञान और गुण विनम्रता में प्रकट होता है**, और घमंड और दिखावा केवल उन लोगों में होता है जो अपने गुणों से अनभिज्ञ हैं। वास्तविक मूल्य बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि **अंतरात्मा की शांति और संतुलन** में है।
आदित्यचन्द्रावनलानिलौ – श्लोक व्याख्या
द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च ।
अहश्च रात्रिश्च उभे च
धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥
- आदित्यः – Sun / सूर्य
- चन्द्रः – Moon / चंद्र
- अवनलः – Fire / अग्नि
- निलः – Sky / आकाश
- द्यौः – Heaven / नभ
- भूमिः – Earth / पृथ्वी
- आपः – Water / जल
- हृदयं – Heart / हृदय
- यमः – Lord of Death / यमदेव
- अहः – Day / दिन
- रात्रिः – Night / रात
- धर्मः – Righteousness / धर्म
- नरस्य वृत्तम् – Human conduct / मनुष्य का आचरण
सूर्य, चंद्रमा, अग्नि, आकाश, आकाश और पृथ्वी, जल, हृदय, यमदेव, दिन और रात – ये सभी मानव के **धर्म और आचरण** को जानते हैं। संसार में हर तत्व अपने तरीके से यह समझता है कि मनुष्य कैसे कर्म करता है और उसका जीवन कैसा है।
The Sun, Moon, Fire, Sky, Heaven, Earth, Water, Heart, Yama, Day, and Night — all of these are aware of a person's **dharma (righteous conduct)**. Every element in the universe, in its own way, observes the actions of humans and understands their moral conduct.
नारिकेलसमाकारा – श्लोक व्याख्या
अन्ये बदरिकाकारा बहिरेव मनोहराः ॥
- नारिकेलसमाकारा – Like a coconut / नारियल के समान आकार
- दृश्यन्तेऽपि – Appear / दिखाई देते हैं
- सज्जनाः – Virtuous people / सज्जन लोग
- अन्ये – Others / अन्य लोग
- बदरिकाकारा – Like a jujube fruit / बेर के समान आकार
- बहिरेव – Only externally / केवल बाहरी रूप से
- मनोहराः – Appealing / मनोहर दिखते हैं
कुछ लोग **सज्जन और गुणी होते हैं**, जैसे नारियल के समान – अंदर और बाहर दोनों रूप से मजबूत और उत्तम। परन्तु अन्य लोग केवल **बाहरी रूप से आकर्षक और सुंदर दिखते हैं**, जैसे बेर – भीतर उनसे गुणों की कमी होती है।
Some people are **truly virtuous and noble**, like coconuts – strong and good both inside and out. Others are **only superficially attractive**, like jujube fruits – beautiful outside but lacking inner qualities.
यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि **सच्चा मूल्य अंदर छुपा होता है**, केवल बाहरी सुंदरता पर ध्यान न दें। सज्जन व्यक्ति का गुण उसके चरित्र और आचरण में प्रकट होता है, जबकि बाहरी आकर्षण कभी वास्तविक मूल्य नहीं दर्शाता।

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