विवेकचूडामणि - मोक्ष और बन्धन श्लोक 136 to 140

Vivekachudamani: The Crest Jewel of Discrimination


विवेकचूडामणि - मोक्ष और बन्धन

विवेकचूडामणि: बन्धन और अज्ञान (136-140)

नियमितमनसामुं त्वं स्वमात्मानमात्म-न्ययमहमिति साक्षाद्विद्धि बुद्धिप्रसादात् ।
जनिमरणतरङ्गापारसंसारसिन्धुं प्रतर भव कृतार्थो ब्रह्मरूपेण संस्थः ॥ १३६॥

हिन्दी: मन को वश में करके, एकाग्र बुद्धि के द्वारा अपने भीतर इस आत्मा को "यही मैं हूँ" इस रूप में साक्षात् जानो। जन्म-मरण की लहरों वाले इस अपार संसार सागर को पार करो और ब्रह्मरूप में स्थित होकर कृतार्थ हो जाओ।

English: By controlling the mind and through a purified intellect, realize this Self within as "This I am". Cross this vast ocean of worldliness with its waves of birth and death, and be fulfilled by abiding in the form of Brahman.

अत्रानात्मन्यहमिति मतिर्बन्ध एषोऽस्य पुंसः प्राप्तोऽज्ञानाज्जननमरणक्लेशसम्पातहेतुः ।
येनेवायं वपुरिदमसत्सत्यमित्यात्मबुद्ध्या पुष्यत्युक्षत्यवति विषयैस्तन्तुभिः कोशकृद्वत् ॥ १३७॥

हिन्दी: इस अनात्मा (शरीर आदि) में "मैं" का भाव रखना ही मनुष्य का बंधन है, जो अज्ञान से पैदा होता है और जन्म-मरण के कष्टों का कारण बनता है। इसी के कारण मनुष्य इस असत्य शरीर को सत्य मानकर विषयों से वैसे ही पालता-पोस्त है जैसे रेशम का कीड़ा (कोशकृत्) अपने ही तंतुओं से स्वयं को कैद कर लेता है।

English: Identifying the Self with the non-Self is the man's bondage, born of ignorance, causing birth and death. Due to this, one nourishes this unreal body considering it real, just as a silkworm traps itself in its own cocoon.

अतस्मिंस्तद्बुद्धिः प्रभवति विमूढस्य तमसा विवेकाभावाद्वै स्फुरति भुजगे रज्जुधिषणा ।
ततोऽनर्थव्रातो निपतति समादातुरधिकः ततो योऽसद्ग्राहः स हि भवति बन्धः श‍ृणु सखे ॥ १३८॥

हिन्दी: अज्ञानी मनुष्य को तमस (अन्धकार) के कारण जो वस्तु जैसी नहीं है, उसमें वैसी बुद्धि हो जाती है। जैसे विवेक के अभाव में रस्सी में साँप का भ्रम होता है। इससे अनर्थों का समूह पैदा होता है। हे सखे! सुनो, इस असत्य वस्तु को सत्य पकड़ना ही वास्तव में बंधन है।

English: In a deluded person, the idea of something being what it is not arises from darkness (Tamas). Just as a rope is mistaken for a snake due to lack of discrimination, this false perception leads to a heap of miseries. Friend, know that this attachment to the unreal is bondage.

अखण्डनित्याद्वयबोधशक्त्या स्फुरन्तमात्मानमनन्तवैभवम् ।
समावृणोत्यावृतिशक्तिरेषा तमोमयी राहुरिवार्कबिम्बम् ॥ १३९॥

हिन्दी: यह तमोमयी 'आवरण शक्ति' उस अखंड, नित्य, अद्वैत और अनंत वैभव वाले आत्मा को वैसे ही ढक लेती है, जैसे राहु सूर्य के बिम्ब को ढक लेता है।

English: This veiling power (Avariti-shakti) of darkness covers the indivisible, eternal, and non-dual Self of infinite glory, just as Rahu conceals the disc of the sun during an eclipse.

तिरोभूते स्वात्मन्यमलतरतेजोवति पुमान् अनात्मानं मोहादहमिति शरीरं कलयति ।
ततः कामक्रोधप्रभृतिभिरमुं बन्धनगुणैः परं विक्षेपाख्या रजस उरुशक्तिर्व्यथयति ॥ १४०॥

हिन्दी: जब अत्यंत निर्मल प्रकाशस्वरूप आत्मा ढक जाता है, तब मनुष्य मोहवश इस अनात्मा (शरीर) को 'मैं' मानने लगता है। तब रजस की 'विक्षेप शक्ति' उसे काम, क्रोध आदि बंधनों के गुणों से बहुत दुखी करती है।

English: When the extremely pure and radiant Self is hidden, man delusively identifies himself with the body. Then the powerful 'distractive power' (Vikshepa-shakti) of Rajas afflicts him with the bonds of desire, anger, and so forth.

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