पीनोत्तुङ्गपयोधरेति सुमुखाम्भोजेति सुभ्रूरिति ॥
दृष्ट्वा माद्यति मोदतेऽभिरमते प्रस्तौति विद्वानपि
प्रत्यक्षाशुचिभस्त्रिकां स्त्रियमहो मोहस्य दुश्चेष्टितम् ! ॥ ८३॥
विद्वान पुरुष भी स्त्री को 'प्रिया', 'कमल जैसे नेत्रों वाली', 'सुंदर मुख' और 'मनोहर भौंहों वाली' कहकर प्रशंसा करता है और उसे देखकर हर्षित और मुग्ध होता है। जबकि वह स्त्री साक्षात् अपवित्र वस्तुओं (हाड़-मांस-मल) की एक थैली (भस्त्रिका) मात्र है। अहो! यह मोह की कैसी विचित्र और बुरी लीला है कि सत्य जानते हुए भी मन भ्रमित रहता है।
English Explanation:Even a learned man praises a woman as 'beloved' or 'lotus-eyed' and feels delighted by her beauty. In reality, the body is just a bag of impure substances. Alas! This is the deceptive power of worldly attachment that masks reality with illusion.
स्पृष्टा भवति मोहाय ! सा नाम दयिता कथम् ? ॥ ८४॥
जिसका स्मरण करने मात्र से संताप (तपिश) बढ़ता है, जिसे देखने से उन्माद (पागलपन) बढ़ता है और जिसे स्पर्श करने से मोह (मूर्छा) व्याप्त हो जाता है—ऐसी स्त्री को 'दयिता' (सुख देने वाली प्रिया) कैसे कहा जा सकता है? वह तो वास्तव में कष्ट का ही कारण है।
English Explanation:A woman causes distress when remembered, madness when seen, and delusion when touched. How then can she be called 'Dayita' (the beloved giver of joy)? She is but a source of turmoil.
चक्षुःपथादतीता तु विषादप्यतिरिच्यते ॥ ८५॥
स्त्री केवल तभी तक अमृत के समान सुखदायी प्रतीत होती है जब तक वह आँखों के सामने रहती है। जैसे ही वह आँखों की ओझल (दृष्टि से दूर) होती है, उसका विरह विष से भी अधिक पीड़ादायक और घातक हो जाता है।
English Explanation:She appears nectar-like only as long as she is within the sight of the eyes. Once she passes out of sight, the resulting longing becomes more painful and dangerous than poison itself.
सैवामृतरुता रक्ता विरक्ता विषवल्लरी ॥ ८६॥
संसार में स्त्री के अतिरिक्त न तो कोई अमृत है और न ही कोई विष। जब वह प्रेम (रक्त) करती है, तब वह अमृतमयी सुख देती है, और जब वह विरक्त (रूठना या दूर होना) होती है, तब वह विष की बेल (विषवल्लरी) के समान प्राणघातक बन जाती है।
English Explanation:There is no nectar and no poison other than a woman. When in love, she is the embodiment of nectar; when indifferent or detached, she becomes a poisonous vine.
दोषाणां संविधानं कपटशतमयं क्षेत्रमप्रत्ययानाम् ॥
स्वर्गद्वारस्य विघ्नौ नरकपुरमुखं सर्वमायाकरण्डं
स्त्रीयन्त्रं केन सृष्टं विषममृतमयं प्राणिलोकस्य पाशः ॥ ८७॥
स्त्री संशयों का भँवर है, अशिष्टता का घर है, दुस्साहस का नगर है, दोषों का खजाना है और छल-कपट व अविश्वास का क्षेत्र है। वह स्वर्ग के द्वार की बाधा और नरक का द्वार है। अमृत से लिपटे हुए विष के समान इस 'स्त्री-यंत्र' को किसने बनाया, जो समस्त प्राणियों के लिए एक फंदा (पाश) है?
English Explanation:A woman is described here as a whirlpool of doubts, a city of audacity, and a field of deceit. She is a hindrance to heaven and the mouth of hell. Who created this 'female machine'—a trap of nectar-covered poison for all living beings?
द्वन्द्वं लोचनतां गतं न कनकैरप्यङ्गयष्टिः कृता ॥
किं त्वेवं कविभिः प्रतारितमनास्तत्त्वं विजानन्नपि
त्वङ्मांसास्थिमयं वपुर्मृगदृशां मन्दो जनः सेवते ॥ ८८॥
सत्य तो यह है कि न तो चंद्रमा मुख बना है, न नीले कमल आँखें बने हैं और न ही सोने से शरीर बना है। किंतु कवियों की काल्पनिक उपमाओं से ठगा हुआ मनुष्य, यह जानते हुए भी कि स्त्री का शरीर केवल चमड़ी, मांस और हड्डियों से बना है, मोहवश उसकी सेवा (आसक्ति) करता रहता है।
English Explanation:Truly, the moon is not the face, nor are lotuses the eyes, nor is the body made of gold. Yet, deceived by the flowery language of poets, even those who know that the body is just skin, flesh, and bones, continue to be infatuated with it.
रागो नलिन्या हि निसर्गसिद्धस्तत्र भ्रमत्येव वृथा षडङ्घ्रिः ॥ ८९॥
सुंदर स्त्रियों के हाव-भाव और विलास स्वाभाविक (सहज) होते हैं, किंतु मूर्ख पुरुष उन्हें अपने प्रति प्रेम समझकर हृदय में बसा लेता है। जैसे कमलिनी की लालिमा प्राकृतिक होती है, किंतु भँवरा व्यर्थ ही उस पर मुग्ध होकर चारों ओर मंडराता रहता है।
English Explanation:The playful gestures of beautiful women are natural to them, but a fool mistakes them for personal affection and becomes captivated. Just as the redness of a lotus is natural, but the bee hovers around it in vain infatuation.
