Vigyan Satakam Brtrihari Slokas Part 2 Hindi english Explanation विज्ञान शतक (श्लोक 31–60) | वैराग्य, माया और ब्रह्मज्ञान का रहस्य | Vedic Wisdom Explained

विज्ञान शतक श्लोक 31–60 Vijnana Shataka Hindi Explanation Brahmgyan Sanskrit Shlokas Vairagya Shlok in Hindi Vedantic Wisdom Explained Maya and Brahman Philosophy Sanskrit Spiritual Shlokas with Meaning विज्ञान शतक के श्लोकों का अर्थ हिन्दी में Sanskrit shlokas with Hindi and English meaning ब्रह्मज्ञान और वैराग्य पर संस्कृत श्लोक Spiritual Sanskrit verses explained Vedanta philosophy explained in simple Hindi Science of consciousness Vedic knowledge

रे रे चित्त मदान्ध मोहबधिरा मिथ्याभिमानोद्धता
व्यर्थेयं भवतां धनावनरतिः संसारकारागृहे ।
बद्धानां निगडेन गात्रममतासंज्ञेन यत्कर्हिचि-
द्देवब्राह्मणभिक्षुकादिषु धनं स्वप्नेऽपि न व्येति वः ॥ ३१॥

हिन्दी व्याख्या:
हे चित्त! तू अहंकार से अंधा, मोह से बहिरा और मिथ्या अभिमान से ग्रस्त है। इस संसार रूपी कारागार में धन की रक्षा में तेरा यह निरंतर प्रयास व्यर्थ है। तू “ममता” रूपी बेड़ी से बंधा हुआ है, जो तुझे मुक्त नहीं होने देती। इस कारण तू कभी भी देवता, ब्राह्मण, भिक्षुक या जरूरतमंदों को धन देने का विचार भी नहीं करता— यहाँ तक कि स्वप्न में भी नहीं। यह श्लोक लोभ और ममता के बंधन को दर्शाता है।

English Explanation:
O mind! You are blinded by pride, deafened by delusion, and inflated with false ego. Your constant attachment to guarding wealth in this prison of worldly existence is futile. You are bound by the chains of possessiveness, which keep you trapped. Thus, you never even think of giving wealth to gods, Brahmins, or the needy— not even in your dreams. This verse exposes the bondage of greed and attachment.

यावत्ते यमकिङ्कराः करतलक्रूरासिपाशादयो
वुर्दान्ताः सृणिराजदीर्घसुनखा दंष्ट्राकरालाननाः ।
नाकर्षन्ति नरान्धनादिरहितान्यत्तावदिष्टेच्छया
युष्माभिः क्रियतां धनस्य कृपणास्त्यागः सुपर्वादिषु ॥ ३२॥

हिन्दी व्याख्या:
जब तक यमराज के दूत, अपने हाथों में भयानक तलवार और पाश लेकर, लंबे नाखून और डरावने दाँतों के साथ तुम्हें पकड़ने नहीं आ जाते— तब तक तुम्हें अपने धन का त्याग स्वयं करना चाहिए। हे कृपण (कंजूस) मनुष्य! अपनी इच्छा से, शुभ अवसरों पर दान करो। क्योंकि जब मृत्यु सामने आ जाएगी, तब तुम्हारे पास कुछ भी करने का अवसर नहीं रहेगा। यह श्लोक समय रहते दान और त्याग की प्रेरणा देता है।

English Explanation:
Before the terrifying messengers of Yama arrive—holding weapons and nooses, with sharp claws and dreadful faces—to drag you away, you should willingly give up your wealth. O miserly person! Donate your wealth during auspicious occasions while you still can. Once death approaches, you will have no chance to act. This verse urges timely charity and detachment.

देहाद्यात्ममतानुसारि भवतां यद्यस्ति मुग्धं मतं
वेदव्यासविनिन्दितं कथमहो पित्राद्यपत्ये तदा ।
दाहादिः क्रियते विशुद्धफलको युष्माभिरुद्वेजितैः
शोकेनार्थपरायणैरपसदैर्दृष्टार्थमात्रार्थिभिः ॥ ३३॥

हिन्दी व्याख्या:
यदि तुम यह मानते हो कि शरीर ही आत्मा है—तो यह अज्ञानपूर्ण विचार है, जिसे वेदव्यास जैसे महान ऋषियों ने भी निंदित किया है। यदि शरीर ही आत्मा होता, तो मृत्यु के बाद उसी शरीर को अग्नि में क्यों जलाया जाता? यह दर्शाता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा उससे भिन्न है। जो लोग केवल धन और भौतिक वस्तुओं के पीछे भागते हैं, वे इस सत्य को नहीं समझ पाते। यह श्लोक देहाभिमान के भ्रम को तोड़ता है।

English Explanation:
If you believe that the body itself is the soul, then your understanding is deluded and has been rejected by sages like Vedavyasa. If the body were truly the self, why would it be burned after death? This clearly shows that the body is temporary and different from the soul. Those who are attached only to material gains fail to realize this truth. This verse removes the illusion of body-identification.

अद्यश्वो वा मरणमशिवप्राणिनां कालपाशै-
राकृष्टानां जगति भवतो नान्यथात्वं कदाचित् ।
यद्यप्येवं न खलु कुरुते हा तथाप्यर्थलोभं
हित्वा प्राणी हितमवहितो देवलोकानुकूलम् ॥ ३४॥

हिन्दी व्याख्या:
इस संसार में प्राणियों का आज या कल मृत्यु को प्राप्त होना निश्चित है। काल के पाश से बंधे हुए जीव को कोई भी इससे बचा नहीं सकता। यह सत्य जानने के बाद भी मनुष्य धन के लोभ को नहीं छोड़ता—यह अत्यंत आश्चर्य की बात है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह लोभ को त्यागकर, अपने कल्याण के लिए शुभ और धर्ममय कर्म करे, जो उसे उच्च लोकों की ओर ले जाए।

English Explanation:
In this world, death is inevitable—whether today or tomorrow—for all beings bound by the noose of time. No one can escape this truth. Yet, even knowing this, humans do not abandon their greed for wealth. Therefore, a wise person should give up attachment to wealth and perform righteous actions that lead to higher realms and true well-being.

दृष्टप्रायं विकलमखिलं कालसर्पेण विश्वं
क्रूरेणेदं शिव शिव मुने ब्रूहि रक्षाप्रकारम् ।
अस्यास्तेकः श‍ृणु मुररिपोर्ध्यानपीयूषपानं
त्यक्त्वा नान्यत्किमपि भुवने दृश्यते शास्त्रदृष्ट्या ॥ ३५॥

हिन्दी व्याख्या:
यह समस्त संसार काल रूपी सर्प के द्वारा पीड़ित और अस्थिर दिखाई देता है। हे मुनि! यह अत्यंत भयावह स्थिति है—इससे बचने का उपाय क्या है? उत्तर मिलता है कि इसका एकमात्र उपाय है—भगवान (मुररिपु) के ध्यान रूपी अमृत का पान। शास्त्रों के अनुसार इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि केवल ईश्वर ध्यान ही इस दुःखमय संसार से मुक्ति का मार्ग है।

English Explanation:
This entire world appears weakened and afflicted by the cruel serpent of time. O sage, what is the means of protection from this भय? The answer is clear: the only remedy is to drink the nectar of meditation on the Lord (Murari). According to the scriptures, there is no other way. This verse emphasizes that divine meditation alone leads to liberation.

ध्यानव्यग्रं भवतु तव हृत्तिष्ठतो यत्र तत्र
श्रीमद्विष्णोस्त्रिभुवनपतेर्नित्यमानन्दमूर्तेः ।
लक्ष्मीचेतःकुमुदविपुलानन्दपीयूषधाम्नो
मेघच्छायाप्रतिभटतनोः क्लेशसिन्धुं तितीर्षोः ॥ ३६॥

हिन्दी व्याख्या:
तुम्हारा हृदय सदा भगवान विष्णु के ध्यान में लीन रहे—चाहे तुम कहीं भी हो। वे त्रिभुवन के स्वामी हैं, नित्य आनंद स्वरूप हैं। उनका स्वरूप ऐसा है जो लक्ष्मी के हृदय रूपी कमल को आनंद से भर देता है। वे मेघ के समान शीतल और शांत हैं। यदि तुम इस दुःखरूपी संसार सागर को पार करना चाहते हो, तो तुम्हें उनके ध्यान में निरंतर स्थित रहना चाहिए।

English Explanation:
Let your heart always remain absorbed in the meditation of Lord Vishnu, wherever you are. He is the Lord of the three worlds and the embodiment of eternal bliss. His presence brings joy like nectar to the lotus-heart of Lakshmi. Cool and soothing like a rain cloud, He is the refuge. If you wish to cross the ocean of suffering, you must remain constantly immersed in His meditation.

कामव्याघ्रे कुमतिफणिनि स्वान्तदुर्वारनीडे
मायासिंहीविहरणमहीलोभभल्लूकभीमे ।
जन्मारण्ये न भवति रतिः सज्जनानां कदाचि-
त्तत्त्वज्ञानां विषयतुषिताकण्टकाकीर्णपार्श्वे ॥ ३७॥

हिन्दी व्याख्या:
यह संसार एक भयानक वन के समान है, जहाँ काम (वासना) व्याघ्र के रूप में, कुमति (दुष्ट बुद्धि) सर्प के रूप में, और माया सिंह के रूप में विचरण करती है। लोभ भालू के समान डरावना है, और मनुष्य का हृदय इस सबका निवास स्थान बन जाता है। ऐसे जन्म-मरण रूपी वन में सज्जन और तत्वज्ञानी व्यक्ति कभी भी आसक्ति नहीं रखते। क्योंकि यह संसार विषयों के छोटे-छोटे सुखों से भरा हुआ है, परंतु चारों ओर दुःख और कांटों से घिरा हुआ है।

English Explanation:
This world is like a terrifying forest where desire is a tiger, wrong thinking is a serpent, and illusion roams like a lion. Greed is like a fierce bear, and the mind becomes their dwelling place. In such a forest of birth and death, wise and noble people never develop attachment. For though it offers small pleasures, it is surrounded by suffering and thorns.

यामासाद्य त्रिलोकीजनमहितशिवावल्लभारामभूमिं
ब्रह्मादीनां सुराणां सुखवसतिभुवो मण्डलं मण्डयन्तीम् ।
नो गर्भे व्यालुठन्ति क्वचिदपि मनुजा मातुरुत्क्रान्तिभाज-
स्तां काशीं नो भजन्ते किमिति सुमतयो दुःखभारं वहन्ते ॥ ३८॥

हिन्दी व्याख्या:
काशी वह पवित्र भूमि है जो भगवान शिव की प्रिय है और तीनों लोकों के प्राणियों द्वारा पूजित है। यह देवताओं (ब्रह्मा आदि) के लिए भी सुखद निवास स्थान है। जो मनुष्य काशी को प्राप्त कर लेते हैं, वे पुनः गर्भ में नहीं गिरते—अर्थात जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। फिर भी, बुद्धिमान लोग काशी का आश्रय क्यों नहीं लेते और दुःख का भार क्यों उठाते हैं? यह श्लोक काशी के आध्यात्मिक महत्व को दर्शाता है।

English Explanation:
Kashi is the sacred land beloved of Lord Shiva, revered by beings of all three worlds. It is adorned as a joyful abode even for gods like Brahma. Those who attain Kashi are freed from the cycle of birth and do not return to the womb. Then why do wise people not seek refuge in Kashi and continue to bear the burden of suffering? This verse highlights the spiritual glory of Kashi.

किं कुर्मः किं भजामः किमिह समुद्रितं साधनं किं वयस्याः
संसारोन्मूलनाय प्रतिदिवसमिहानर्थशङ्कावतारः ।
भ्रातर्ज्ञातं निदानं भवभयदलने सङ्गतं सज्जनां
तां काशीमाश्रयामो निरुपमयशसः स्वःस्रवन्त्या वयस्याम् ॥ ३९॥

हिन्दी व्याख्या:
हम क्या करें? किसका भजन करें? इस संसार से मुक्त होने का उपाय क्या है? मनुष्य प्रतिदिन अनर्थ और भय में उलझा रहता है। हे भाई! अब इसका उपाय समझ में आ गया है— सज्जनों की संगति और काशी का आश्रय ही इस संसार के भय को दूर करने का मार्ग है। अतः हमें उस काशी का आश्रय लेना चाहिए, जो मुक्ति का द्वार है और अपार यश से युक्त है।

English Explanation:
What should we do? Whom should we worship? What is the means to uproot worldly existence? Every day, humans are caught in fear and uncertainty. O brother! The solution is now known— association with the wise and taking refuge in Kashi destroys the fear of worldly life. Therefore, we should seek refuge in Kashi, the gateway to liberation and eternal glory.

भुक्तिः क्वापि न मुक्तिरस्त्यभिमता क्वाण्यस्ति मुक्तिर्न सा
काश्यामस्ति विशेष एव सुतरां श्लाघ्यं यदेतद्रूपम् ।
सर्वैरुत्तममध्यमाधमजनैरासाद्यतेऽनुग्रहा-
द्देवस्य त्रिपुरद्विषः सुरधुनीस्नानावदातव्ययैः ॥ ४०॥

हिन्दी व्याख्या:
कहीं भोग (भुक्ति) है, पर मुक्ति नहीं; कहीं मुक्ति की बात है, पर वह वास्तविक नहीं। परंतु काशी में दोनों का विशेष और अद्वितीय संगम है, जो अत्यंत प्रशंसनीय है। यह स्थान सभी प्रकार के लोगों—उत्तम, मध्यम और अधम—के लिए सुलभ है। भगवान शिव (त्रिपुरद्वेषी) की कृपा से और गंगा स्नान के पवित्र प्रभाव से यहाँ जीवन पवित्र और सफल हो जाता है।

English Explanation:
In some places there is enjoyment but no liberation; elsewhere liberation is spoken of but not truly attained. However, in Kashi both are uniquely present in a praiseworthy form. People of all levels—high, medium, and low—can attain it. By the grace of Lord Shiva and the purifying power of the Ganga, life here becomes sanctified and fulfilled.

विद्यन्ते द्वारकाद्या जगति कति न ता देवताराजधान्यो
यद्यप्यन्यास्तथापि स्खलदमलजलावर्तगङ्गातरङ्गा ।
काश्येवारामकूजत्पिकशुकचटकाक्रान्तदिक्कामिनीनां
क्रीडाकासारशाला जयति मुनिजनानन्दकन्दैकभूमिः ॥ ४१॥

हिन्दी व्याख्या:
इस संसार में द्वारका आदि अनेक दिव्य नगर और देवताओं की राजधानियाँ हैं। किन्तु काशी की महिमा उनसे भिन्न और विशेष है, क्योंकि यहाँ गंगा की निर्मल तरंगें निरंतर प्रवाहित होती हैं। यह स्थान पक्षियों के मधुर कलरव से गूंजता है और सौंदर्य से परिपूर्ण है। यह मुनियों के आनंद का केंद्र और आध्यात्मिक क्रीड़ा का स्थल है। अतः काशी ही वास्तव में अद्वितीय और श्रेष्ठ है।

English Explanation:
There are many divine cities like Dwaraka in the world, yet Kashi stands unique due to the pure and flowing waves of the Ganga. Filled with the sweet sounds of birds and natural beauty, it is a place of joy and spiritual play for sages. Thus, Kashi alone shines as a supreme and incomparable sacred land.

काशीयं समलङ्कृता निरुपमस्वर्गापगाव्योमगा-
स्थूलोत्तारतरङ्गबिन्दुविलसन्मुक्ताफलश्रेणिभिः ।
चञ्चच्चञ्चलचञ्चरीकनिकरारागाम्बरा राजते
कासारस्थविनिद्रपद्मनयना विश्वेश्वरप्रेयसी ॥ ४२॥

हिन्दी व्याख्या:
काशी दिव्य रूप से अलंकृत है, जहाँ गंगा के तरंगों के जल-बिंदु मोतियों की तरह चमकते हैं। यह स्वर्ग समान शोभा से युक्त है। चारों ओर भौंरों का गुंजन और सुंदर प्राकृतिक वातावरण इसे और भी आकर्षक बनाता है। यह काशी भगवान विश्वेश्वर (शिव) की प्रिय नगरी है, जिसकी तुलना किसी अन्य स्थान से नहीं की जा सकती।

English Explanation:
Kashi is beautifully adorned, with the droplets of Ganga’s waves shining like pearls. It resembles a heavenly realm of unmatched beauty. The humming of bees and the vibrant surroundings enhance its charm. This sacred city is beloved of Lord Vishweshwara (Shiva), and its splendor is beyond comparison.

वह्निप्राकारबुद्धिं जनयति वलभीवासिनां नागराणां
गन्धारण्यप्रसूतस्फुटकुसुमचयः किंशुकानां शुकानाम् ।
चञ्च्वाकारो वसन्ते परमपदपदं राजधानी पुरारेः
सा काश्यारामरम्या जयति मुनिजनानन्दकन्दैकभूमिः ॥ ४३॥

हिन्दी व्याख्या:
वसंत ऋतु में काशी का सौंदर्य अत्यंत मनोहर हो जाता है। किंशुक (पलाश) के लाल पुष्प अग्नि के समान चमकते हैं, जो नगरवासियों के मन में अद्भुत भाव उत्पन्न करते हैं। चारों ओर सुगंधित वन और पक्षियों की चहल-पहल वातावरण को जीवंत बनाती है। यह काशी भगवान शिव की राजधानी है और मुनियों के आनंद का केंद्र है।

English Explanation:
In spring, Kashi becomes extraordinarily beautiful. The red blossoms of the palash tree shine like fire, inspiring deep feelings in the hearts of its residents. Fragrant forests and lively birds create a vibrant atmosphere. This is the divine city of Lord Shiva and the source of joy for sages.

भजत विबुधसिन्धुं साधवो लोकबन्धुं
हरहसिततरङ्गं शङ्कराशीर्षसङ्गम् ।
दलितभवभुजङ्गं ख्यातमायाविभङ्गं
निखिलभुवनवन्द्यं सर्वतीर्थानवद्यम् ॥ ४४॥

हिन्दी व्याख्या:
हे साधुओ! उस गंगा का भजन करो जो देवताओं के लिए भी अमृत समान है और समस्त लोकों की मित्र है। उसकी तरंगें भगवान शिव के मस्तक को स्पर्श करती हैं और आनंद प्रदान करती हैं। वह संसार रूपी सर्प का नाश करती है और माया के भ्रम को तोड़ती है। संपूर्ण जगत द्वारा पूजनीय यह गंगा सभी तीर्थों में श्रेष्ठ और पवित्र है।

English Explanation:
O noble ones, worship the Ganga, the divine river cherished even by the gods. Its waves joyfully touch the head of Lord Shiva. It destroys the serpent of worldly existence and breaks the illusion of maya. Revered by all worlds, it is the purest and highest among all sacred places.

यदमृतममृतानां भङ्गरङ्गप्रसङ्ग-
प्रकटितरसवत्तावैभवं पीतमुच्चैः ।
दलयति कलिदन्तांस्तां सुपर्वस्रवन्तीं
किमिति न भजतार्ता ब्रह्मलोकावतीर्णाम् ॥ ४५॥

हिन्दी व्याख्या:
गंगा का जल अमृत के समान है, जिसका पान देवता भी करते हैं। यह अपने दिव्य प्रभाव से कलियुग के पापों और कष्टों को नष्ट कर देती है। यह स्वर्ग से अवतरित होकर पृथ्वी पर प्रवाहित होती है। फिर भी, दुःखी लोग इसका सेवन और स्मरण क्यों नहीं करते? यह श्लोक गंगा की महिमा और उसके महत्व को दर्शाता है।

English Explanation:
The waters of the Ganga are like nectar, enjoyed even by the gods. They destroy the evils and sufferings of the Kali age. Descending from the heavens, the Ganga flows on earth for the benefit of all. Yet, why do suffering beings not seek refuge in it? This verse glorifies the divine power of the Ganga.

स्वाधीने निकटस्थितेऽपि विमलज्ञानामृते मानसे
विख्याते मुनिसेवितेऽपि कुधियो न स्नान्ति तीर्थे द्विजाः ।
यत्तत्कष्टमहो विवेकरहितास्तीर्थार्थिनो दुःखिता
यत्र क्वाप्यटवीमटन्ति जलधौ मज्जन्ति दुःखाकरे ॥ ४६॥

हिन्दी व्याख्या:
मन में ही निर्मल ज्ञान रूपी अमृत उपलब्ध है और वह निकट ही स्थित है, जिसे मुनि भी साधना के द्वारा प्राप्त करते हैं। फिर भी अज्ञानी लोग इस आंतरिक तीर्थ में स्नान नहीं करते। विवेकहीन लोग बाहरी तीर्थों में भटकते रहते हैं और दुःख पाते हैं। यह श्लोक सिखाता है कि सच्चा तीर्थ भीतर ही है।

English Explanation:
The pure nectar of knowledge resides within the mind itself, and is sought by sages through deep practice. Yet ignorant people do not immerse themselves in this inner sacred place. Lacking wisdom, they wander externally and suffer. This verse teaches that the true pilgrimage lies within.

नाभ्यस्तो धातुवादो न च युवतीवशीकारकः कोप्युपायो
नो वा पौराणिकत्वं न च सरसकविता नापि नीतिर्न गीतिः ।
तस्मादर्थार्थिनां या न भवति भवतश्चातुरी क्वापि विद्वन्
ज्ञात्वेत्थं चक्रपाणेरनुसर चरणाम्भोजयुग्मं विभूत्यै ॥ ४७॥

हिन्दी व्याख्या:
न तो रसायन विद्या (धातुवाद), न स्त्रियों को वश में करने के उपाय, न पुराणों का ज्ञान, न काव्य, न नीति और न ही संगीत— इनमें से कोई भी वस्तु सच्चे अर्थ में जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं है। हे विद्वान! यह जानकर भगवान विष्णु (चक्रपाणि) के चरणों का अनुसरण करो। वही वास्तविक संपत्ति और मुक्ति का मार्ग है।

English Explanation:
Neither alchemy, nor methods of attraction, nor scriptural knowledge, poetry, ethics, or music can truly fulfill the ultimate purpose of life. O wise one, realizing this, follow the lotus feet of Lord Vishnu (Chakrapani). That alone leads to true wealth and liberation.

अर्थेभ्योऽनर्थजातं भवति तनुभृतां यौवनादिष्ववश्यं
पित्राद्यैरर्जितेभ्योऽनुपकृतिमतिभिः स्वात्मनैवार्जितेभ्यः ।
यस्माद्दुःखाकरेभ्यस्तमनुसर सदा भद्र लक्ष्मीविलासं
गोपालं गोपकान्ताकुचकलशतटीकुङ्कुमासङ्गरङ्गम् ॥ ४८॥

हिन्दी व्याख्या:
धन से प्रायः अनर्थ ही उत्पन्न होते हैं, विशेषकर यौवन आदि अवस्थाओं में। चाहे वह धन माता-पिता द्वारा अर्जित हो या स्वयं द्वारा— यदि उसका सदुपयोग न हो, तो वह दुःख का कारण बनता है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह उन भौतिक वस्तुओं से हटकर भगवान गोपाल (कृष्ण) का स्मरण करे, जो लक्ष्मी के साथ आनंदमय लीला करते हैं।

English Explanation:
Wealth often gives rise to misfortune, especially during youth. Whether earned by oneself or inherited, if not used wisely, it becomes a source of suffering. Therefore, one should turn away from such attachments and meditate upon Lord Gopala (Krishna), who embodies divine joy and prosperity.

भ्रातः शान्तं प्रशान्तं क्वचिदपि निपतन्मित्र रे भूधराग्रे
ग्रीष्मे ध्यानाय विष्णोः स्पृहयसि सुतरां निर्विशङ्के गुहायाम् ।
अन्वेष्यान्तादृगत्र क्षितिवलयतले स्थानमुन्मूल याव-
त्संसारानर्थवृक्षं प्रथिततममहामोहमूलं विशालम् ॥ ४९॥

हिन्दी व्याख्या:
हे मित्र! तुम पर्वत की चोटी या किसी गुफा में जाकर शांति से भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहते हो। यह अच्छी बात है, परंतु जब तक तुम इस संसार रूपी वृक्ष को जड़ से नहीं उखाड़ते— जिसका मूल मोह है—तब तक केवल स्थान बदलने से मुक्ति नहीं मिलेगी। सच्चा वैराग्य भीतर से उत्पन्न होना चाहिए।

English Explanation:
O friend, you may wish to meditate peacefully on a mountain or in a cave. While this is noble, liberation cannot be attained merely by changing location. Unless the tree of worldly attachment, rooted in delusion, is uprooted, true peace will not arise. Real detachment must come from within.

केदारस्थानमेकं रुचिरतरमुमानाट्यलीलावनीकं
प्रालेयाद्रिप्रदेशे प्रथितमतितरामस्ति गङ्गानिवेशे ।
ख्यातं नारायणस्य त्रिजगति बदरीनाम सिद्धाश्रमस्य
तत्रैवानादिमूर्तेर्मुनिजनमनसामन्यदानन्दमूर्तेः ॥ ५०॥

हिन्दी व्याख्या:
हिमालय क्षेत्र में केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे पवित्र स्थान स्थित हैं, जो अत्यंत रमणीय और दिव्य हैं। ये स्थान भगवान शिव और विष्णु से संबंधित हैं और मुनियों के लिए आनंद के केंद्र हैं। यहाँ का वातावरण साधना और आत्मचिंतन के लिए अत्यंत अनुकूल है।

English Explanation:
In the Himalayan region lie sacred places like Kedarnath and Badrinath, renowned for their beauty and spiritual significance. Associated with Lord Shiva and Vishnu, these places are sources of joy for sages. They provide an ideal environment for meditation and self-realization.

सन्तन्ये त्रिदशापगादिपतनादेव प्रयागादयः
प्रालेयाचलसम्भवा बहुफलाः सिद्धाश्रमाः सिद्धयः ।
यत्राघौघसहा भवन्ति सुधियां ध्यानेश्वरणां चिरं
मुक्ताशेषभियां विनिद्रमनसां कन्दाम्बुपर्णाशिनाम् ॥ ५१॥

हिन्दी व्याख्या:
प्रयाग आदि तीर्थ, जो देवताओं की नदियों से उत्पन्न हुए हैं, बहुत पुण्य और फलदायक हैं। यहाँ साधक अपने पापों को नष्ट कर सकते हैं और ध्यान में लीन रह सकते हैं। जो लोग संयमित जीवन जीते हैं और साधना में लगे रहते हैं, वे इन स्थानों में शांति और मुक्ति का अनुभव करते हैं।

English Explanation:
Sacred places like Prayag, born of divine rivers, are highly fruitful and purifying. Here, seekers can destroy their sins and remain absorbed in meditation. Those who live a disciplined life and pursue spiritual practices find peace and liberation in such holy places.

किं स्थानस्य निरीक्षणेन मुरजिद्ध्यानाय भूमण्डले
भ्रातश्चेद्विरतिर्भवेद्दृढतरा यस्य स्रगादौ सदा ।
तस्यैषा यदि नास्ति हन्त सुतरां व्यर्थं तदान्वेषणं
स्थानस्यानधिकारिणः सुरधुनीतीराद्रिकुञ्जादिषु ॥ ५२॥

हिन्दी व्याख्या:
हे भाई! यदि तुम्हारे भीतर दृढ़ वैराग्य है, तो भगवान के ध्यान के लिए किसी विशेष स्थान की आवश्यकता नहीं है। परंतु यदि वैराग्य नहीं है, तो तीर्थों या पर्वतों की खोज करना व्यर्थ है। सच्चा साधन स्थान नहीं, बल्कि मन की स्थिति है।

English Explanation:
O brother, if you possess true detachment, you do not need any special place for meditation on the Lord. But without detachment, searching for sacred places is futile. The real path lies not in location, but in the state of the mind.

स्वान्तव्योम्नि निरस्तकल्मषघने सद्बुद्धितारावली-
सन्दीप्ते समुदेति चेन्निरुपमानन्दप्रभामण्डलः ।
ब्रह्मज्ञानसुधाकरः कवलिताविद्यान्धकारस्तदा
क्व व्योम क्व सदागतिः क्व हुतभुक् क्वाम्भाः क्व सर्वंसहा ॥ ५३॥

हिन्दी व्याख्या:
जब मन रूपी आकाश से पाप और अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं, और सद्बुद्धि रूपी ताराएँ प्रकाशित हो जाती हैं, तब ब्रह्मज्ञान रूपी चंद्रमा उदित होता है, जो अनुपम आनंद प्रदान करता है। उस समय अज्ञान रूपी अंधकार समाप्त हो जाता है, और सभी भेद—आकाश, अग्नि, जल आदि—अर्थहीन हो जाते हैं।

English Explanation:
When the inner sky of the mind becomes free of impurities and illuminated by the stars of wisdom, the moon of Brahma-knowledge rises, radiating incomparable bliss. At that moment, the darkness of ignorance vanishes, and distinctions like space, fire, and water lose their meaning.

विश्वेश्वरे भवति विश्वजनीनजन्म-
विश्वम्भरे भगवति प्रथितप्रभावे ।
यो दत्तचित्तविषयः सुकृती कृतार्थो
यत्र क्वचित्प्रतिदिनं निवसन् गृहादौ ॥ ५४॥

हिन्दी व्याख्या:
जो व्यक्ति अपने चित्त को भगवान विश्वेश्वर में स्थिर कर देता है, जो समस्त जगत के उत्पत्ति और पालनकर्ता हैं— वह वास्तव में कृतार्थ और पुण्यवान होता है। वह चाहे कहीं भी रहे—घर में या बाहर— उसका जीवन सफल हो जाता है।

English Explanation:
One who fixes their mind upon Lord Vishweshwara, the creator and sustainer of the universe, becomes truly fulfilled and blessed. No matter where they live—at home or elsewhere— their life attains its purpose.

चिद्रत्नमत्र पतितं वपुरन्धकूपे
पुंसो भ्रमादनुपमं सहनीयतेजः ।
उद्धृत्य यो जगति तद्भविता कृतार्थो
मन्ये स एव समुपासितविश्वनाथः ॥ ५५॥

हिन्दी व्याख्या:
मनुष्य का शरीर एक अंधे कुएँ के समान है, जिसमें चेतना रूपी रत्न गिरा हुआ है। अज्ञान के कारण वह इस अनमोल तत्व को पहचान नहीं पाता। जो व्यक्ति इस आत्मरत्न को पहचान कर उसे प्राप्त कर लेता है, वही वास्तव में कृतार्थ होता है—और वही सच्चे अर्थ में भगवान की उपासना करता है।

English Explanation:
The human body is like a dark well in which the jewel of consciousness has fallen. Due to ignorance, one fails to recognize this priceless treasure. Whoever retrieves and realizes this inner jewel becomes fulfilled and truly worships the Divine.

यद्येता मदनेषवो मृगदृशश्चेतःकुरङ्गारयो
धीराणामपि नो भवेयुरबलाः संसारमायापुरे ।
को नामामृतसागरे न रमते धीरस्तदा निर्मले
पूर्णानन्दमहोर्मिरम्यनिकरे रागादिनक्रोज्झिते ॥ ५६॥

हिन्दी व्याख्या:
यदि कामदेव के बाण और स्त्रियों के आकर्षण धीर पुरुषों को भी विचलित न करें, तो वे संसार रूपी माया के नगर में फँसें ही नहीं। ऐसी स्थिति में कौन बुद्धिमान व्यक्ति अमृत रूपी आनंद सागर में नहीं डूबेगा? जहाँ राग-द्वेष जैसे मगरमच्छ नहीं होते और केवल शुद्ध आनंद होता है।

English Explanation:
If the arrows of desire and attractions of beauty do not disturb even the wise, they will not be trapped in the illusion of worldly existence. Then who would not delight in the ocean of nectar-like bliss, free from the crocodiles of attachment and aversion?

बालेयं बालभावं त्यजति न सुदति यत्कटाक्षैर्विशालै-
रस्मान्विभ्रामयन्ती लसदधरदलाक्षिप्तचूतप्रवाला ।
नेतुं वाञ्छत्यकामान् स्वसदनमधुना क्रीडितुं दत्तचित्तान्
पुष्यन्नीलोत्पलोत्पलाभे मुरजिति कमलावल्लभे गोपलीले ॥ ५७॥

हिन्दी व्याख्या:
युवती अपने बाल्यभाव को त्यागकर अपने सौंदर्य और कटाक्षों से पुरुषों को मोहित करती है। उसकी मधुर मुस्कान और आकर्षण मन को विचलित कर देता है। वह कामनाओं में फंसे लोगों को अपने वश में करना चाहती है। यह श्लोक दर्शाता है कि बाहरी आकर्षण मनुष्य को भटकाने का कारण बन सकता है।

English Explanation:
A young woman, leaving behind childhood innocence, enchants others with her beauty and glances. Her charm captivates the mind and draws people into desire. This verse illustrates how external attraction can lead one astray.

शिव शिव महाभ्रान्तिस्थानं सतां विदुषामपि
प्रकृतिचपला धात्रा सृष्टाः स्त्रियो हरिणीदृशः ।
विजहति धनं प्राणैः साकं यतस्तदवाप्तये
जगति मनुजा रागाकृष्टास्तदेकपरायणाः ॥ ५८॥

हिन्दी व्याख्या:
हाय! यह स्त्रियों का आकर्षण इतना शक्तिशाली है कि यह विद्वानों और सज्जनों को भी भ्रमित कर देता है। प्रकृति ने उन्हें अत्यंत चंचल और आकर्षक बनाया है। मनुष्य उनके आकर्षण में पड़कर धन और यहाँ तक कि अपने प्राण भी त्याग देता है। यह श्लोक मोह और आसक्ति के खतरनाक प्रभाव को दर्शाता है।

English Explanation:
Alas! The charm of women is so powerful that it can delude even the wise and noble. Nature has made them captivating and restless. People, drawn by attachment, may sacrifice wealth and even their lives for it. This verse highlights the intense power of attachment and delusion.

हरति वपुषः कान्तिं पुंसः करोति बलक्षितिं
जनयति भृशं भ्रान्तिं नारी सुखाय निषेविता ।
विरतिविरसा भुक्ता यस्मात्ततो न विवेकिभि-
र्विषयविरसैः सेव्या मायासमाश्रितविग्रहा ॥ ५९॥

हिन्दी व्याख्या:
स्त्री (या विषय भोग) का अधिक सेवन पुरुष की देह की कांति को नष्ट कर देता है, उसकी शक्ति को कम कर देता है और मन में गहरी भ्रांति उत्पन्न करता है। जब इन भोगों से विरक्ति हो जाती है, तब वे नीरस और निरर्थक प्रतीत होते हैं। इसलिए विवेकी व्यक्ति इन विषयों में आसक्ति नहीं रखता, क्योंकि वे माया के अधीन और अंततः दुःखदायी हैं।

English Explanation:
Excessive indulgence in sensual pleasures diminishes a person's vitality and strength, and creates deep confusion in the mind. When detachment arises, these pleasures appear tasteless and meaningless. Therefore, a wise person avoids attachment to such illusions, as they are rooted in maya and ultimately lead to suffering.

कमलवदना पीनोत्तुङ्गं घटाकृति बिभ्रती
स्तनयुगमियं तन्वी श्यामा विशालदृगञ्चला ।
विशददशना मध्यक्षामा वृथेति जनाः श्रमं
विदधति मुधारागादुच्चैरनीदृशवर्णने ॥ ६०॥

हिन्दी व्याख्या:
लोग स्त्री के रूप का अत्यधिक वर्णन करते हैं—कमल के समान मुख, उन्नत वक्षस्थल, सुडौल शरीर, सुंदर नेत्र, मधुर मुस्कान आदि। परंतु यह सब केवल मोह और आकर्षण के कारण होता है। वास्तव में यह सब व्यर्थ का परिश्रम है, क्योंकि यह बाहरी रूप अस्थायी और नश्वर है। विवेकी व्यक्ति इस प्रकार के मोह में नहीं फँसता।

English Explanation:
People often describe physical beauty in exaggerated ways— a lotus-like face, graceful form, charming eyes, and sweet smile. However, such descriptions arise from attachment and illusion. In reality, this is a futile effort, as physical beauty is temporary and perishable. A wise person does not get trapped in such delusion.

🔱 विज्ञान शतक – भाग 2 (समापन)

इस भाग में हमने श्लोक 31 से 60 तक के गहन वैदिक ज्ञान, वैराग्य, माया, भोग और ब्रह्मज्ञान के रहस्यों का अध्ययन किया। इन श्लोकों में जीवन के वास्तविक स्वरूप, संसार के भ्रम, और आत्मज्ञान की आवश्यकता को अत्यंत स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

यह सम्पूर्ण भाग हमें यह सिखाता है कि —

  • 🔹 धन और विषय भोग अंततः दुःख का कारण बनते हैं
  • 🔹 बाहरी सौंदर्य और आकर्षण क्षणभंगुर हैं
  • 🔹 सच्चा तीर्थ और शांति भीतर है
  • 🔹 ब्रह्मज्ञान ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है
  • 🔹 भगवान का स्मरण ही संसार से मुक्ति का मार्ग है

जो साधक इन शिक्षाओं को अपने जीवन में धारण करता है, वह धीरे-धीरे संसार के बंधनों से मुक्त होकर आत्मानुभूति की ओर अग्रसर होता है।


🚀 आगे क्या?

👉 अब पढ़ें अगला भाग — विज्ञान शतक (श्लोक 61–100)
👉 और गहराई से जानें — आत्मज्ञान, वैराग्य और ब्रह्म रहस्य

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विज्ञान शतक भाग 1 (श्लोक 1–30)

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