जनयति सुतं कञ्चिन्नारी सती कुलभूषणं
निरुपमगुणैः पुण्यात्मानं जगत्परिपालकम् ।
कथमपि न साऽनिन्द्या वन्द्या भवेन्महतां यतः ।
सुरसरिदिव ख्याता लोके पवित्रितभूतला ॥ ६१॥
हिन्दी व्याख्या:
एक सती स्त्री कभी-कभी ऐसे पुत्र को जन्म देती है जो कुल का भूषण होता है,
जो महान गुणों से युक्त होकर संसार का पालन करने वाला बनता है।
ऐसी स्त्री कभी निन्दनीय नहीं होती, बल्कि वह महान लोगों के द्वारा वंदनीय होती है।
वह गंगा नदी की तरह इस पृथ्वी को पवित्र करने वाली होती है।
English Explanation:
A virtuous woman sometimes gives birth to a son who becomes the pride of the family,
endowed with noble qualities and capable of protecting the world.
Such a woman is never to be criticized but is revered by the wise.
Like the sacred Ganga, she sanctifies the earth.
धन्या एते पुमांसो यदयमहमिति त्यक्तचेतोविकल्पा
निश्शङ्कं संचरन्तो विदधति मलिनं कर्म कामप्रयुक्ताः ।
जानन्तोऽप्यर्थहीनं जगदिदमखिलं भ्रान्तवद्द्वैतजालं
रागद्वेषादिमन्तो वयमयमिति हा न त्यजन्तेऽभिमानम् ॥ ६२॥
हिन्दी व्याख्या:
कुछ लोग “मैं” और “मेरा” के भ्रम को त्यागे बिना ही निडर होकर कर्म करते रहते हैं,
और कामनाओं के कारण अशुद्ध कर्मों में लगे रहते हैं।
वे जानते हुए भी कि यह संसार निरर्थक और भ्रममय है,
फिर भी राग-द्वेष और अहंकार को नहीं छोड़ते—यही उनका दुर्भाग्य है।
English Explanation:
Some people continue to act boldly without abandoning the illusion of “I” and “mine,”
engaging in impure actions driven by desire.
Even though they know that this world is meaningless and illusory,
they still fail to give up attachment, aversion, and ego—this is their misfortune.
प्रज्ञावन्तोऽपि केचिच्चिरमुपनिषदाद्यर्थकारा यतन्तो
व्याकुर्वन्तोऽपि केचिद्दलितपरमता यद्यपि ज्ञाततत्त्वाः ।
तीर्थे तीर्थं तथापि भ्रमणरसिकतां नो जहत्यध्वखेदा
यत्तत्कष्टं विधत्ते मम मनसि सदा पश्यतस्तत्र कृत्यम् ॥ ६३॥
हिन्दी व्याख्या:
कुछ ज्ञानी लोग उपनिषदों के अर्थ को समझने और समझाने का प्रयास करते हैं,
और सत्य को जान लेने के बाद भी तीर्थों में भटकते रहते हैं।
वे यात्रा के कष्टों को सहते हुए भी इस भटकाव को नहीं छोड़ते।
यह स्थिति आश्चर्यजनक और दुःखद है कि ज्ञान के बाद भी स्थिरता नहीं आती।
English Explanation:
Some learned individuals strive to understand and explain the meanings of the Upanishads,
yet even after realizing the truth, they continue wandering from one pilgrimage to another.
They endure hardships of travel but do not abandon this restlessness.
It is surprising and troubling that even knowledge does not bring stability.
तीर्थावस्थानजन्यं न भवति सुकृतं दुष्कृतोन्मूलनं वा
यस्मादाभ्यां विहीनः श्रुतिसमधिगतः प्रत्यगात्मा जनानाम् ।
सर्वेषामद्वितीयो निरतिशयसुखं यद्यपि स्वप्रकाशा-
स्तीर्थे विद्यास्तथापि स्पृहयति तपसे यत्तदाश्चर्यहेतुः ॥ ६४॥
हिन्दी व्याख्या:
केवल तीर्थ स्थानों पर रहने से न तो पुण्य बढ़ता है और न ही पाप समाप्त होते हैं।
सच्चा आत्मा तो भीतर ही है, जिसे शास्त्रों के द्वारा जाना जाता है।
वह अद्वितीय, स्वयं प्रकाशित और परम सुख स्वरूप है।
फिर भी लोग बाहरी तीर्थों में भटकते हैं—यह वास्तव में आश्चर्य की बात है।
English Explanation:
Merely staying at holy places does not increase merit nor remove sins.
The true Self lies within and is realized through scriptural wisdom.
It is non-dual, self-luminous, and the source of supreme bliss.
Yet people continue to seek externally—this is truly astonishing.
उदासीनो देवो मदनमथनः सज्जनकुले
कलिक्रीडासक्तः कृतपरिजनः प्राकृतजनः ।
इयं म्लेच्छाक्रान्ता त्रिदशतटिनी चोभयतटे
कथं भ्रान्तस्थाता कथय सुकृती कुत्र विभयः ॥ ६५॥
हिन्दी व्याख्या:
भगवान शिव जैसे देवता भी मानो उदासीन हो गए हैं,
सज्जन लोग कम हो गए हैं और सामान्य लोग कलियुग के खेल में फँसे हुए हैं।
पवित्र गंगा के दोनों तट भी अशुद्धता से प्रभावित हो गए हैं।
ऐसी स्थिति में सज्जन व्यक्ति कहाँ जाए और किससे निर्भयता प्राप्त करे—यह बड़ा प्रश्न है।
English Explanation:
Even Lord Shiva appears indifferent,
the noble are rare, and ordinary people are absorbed in the distractions of Kali Yuga.
Even the sacred banks of the Ganga seem affected by impurity.
In such times, where can a virtuous person go to find fearlessness? This is the question.
निस्सारावसुधाधुना समजनि प्रौढप्रतापनल-
ज्वालाज्वालसमाकुला द्विपघटासङ्घट्टविक्षोभिता ।
म्लेच्छानां रथवाजिपत्तिनिवहैरुन्मीलिता कीदृशी-
यं विद्या भवितेति हन्त न सखे जानीमहे मोहिताः ॥ ६६॥
हिन्दी व्याख्या:
यह पृथ्वी अब निस्सार और अशांत हो गई है।
युद्ध और हिंसा की अग्नि से यह जल रही है,
हाथियों और सेनाओं के संघर्ष से विचलित हो रही है।
विदेशी आक्रमणों और अशांति के बीच यह प्रश्न उठता है—
अब इस संसार में सच्चा ज्ञान कैसा होगा? हम स्वयं भी भ्रमित हैं।
English Explanation:
The world has become hollow and disturbed,
burning in the flames of conflict and turmoil.
It is shaken by clashes of armies and chaos.
Amid foreign invasions and unrest, one wonders—
what will true knowledge look like now? Even we are confused.
वेदो निर्वेदमागादिह नमनभिया ब्राह्मणानां वियोगा-
द्वैयासिक्यो गिरोऽपि क्वचिदपि विरलाः सम्मतं सन्ति देशे ।
इत्थं धर्मे विलीने यवनकुलपतौ शासति क्षोणिबिम्बं
नित्यं गङ्गावगाहाद्भवति गतिरितः संसृतेरर्थसिद्धौ ॥ ६७॥
हिन्दी व्याख्या:
वेदों का अध्ययन कम हो गया है, ब्राह्मणों का पतन हो रहा है,
और व्यासजी की वाणी भी दुर्लभ हो गई है।
जब धर्म इस प्रकार लुप्त होता जा रहा है,
तब इस संसार से पार पाने का एक उपाय है—
गंगा में स्नान और उसकी शरण।
English Explanation:
The study of the Vedas has declined, Brahmins are losing their path,
and the teachings of Vyasa have become rare.
As dharma fades away,
there remains one path to liberation—
taking refuge in the sacred Ganga.
गङ्गा गङ्गेति यस्याः श्रुतमपि पठितं केनचिन्नाममात्रं
दुरस्थस्यापि पुंसो दलयति दुरितं प्रौढमित्याहुरेके ।
स गङ्गा कस्य सेव्या न भवति भुवने सज्जनस्यातिभव्या
ब्रह्माण्डं प्लावयन्ती त्रिपुरहरजटामण्डलं मण्डयन्तीम् ॥ ६८॥
हिन्दी व्याख्या:
केवल “गंगा” नाम का उच्चारण या श्रवण भी,
दूर स्थित व्यक्ति के पापों का नाश कर देता है—ऐसा कहा गया है।
ऐसी महान गंगा कौन नहीं अपनाना चाहेगा?
वह भगवान शिव की जटाओं में विराजमान होकर पूरे ब्रह्मांड को पवित्र करती है।
English Explanation:
Even hearing or chanting the name “Ganga”
is said to destroy sins, even from afar.
Who would not seek such a sacred river?
Flowing from the locks of Lord Shiva,
she purifies the entire universe.
यत्तीरे वसतां सतामपि जलैर्मूलैः फलैर्जीवतां
मुक्ताहंममभावशुद्धमनसामाचारविद्यावताम् ।
कैवल्यं करबिल्वतुल्यममलं सम्पद्यते हेलया
स गङ्गा ह्यतुलामलोर्मिमपटला सद्भिः कुतो नेक्ष्यते ॥ ६९॥
हिन्दी व्याख्या:
जो संतजन गंगा के तट पर निवास करते हैं,
सरल जीवन (जल, मूल, फल) से संतुष्ट रहते हैं,
और “मैं” और “मेरा” के भाव से मुक्त होकर शुद्ध मन रखते हैं—
उन्हें सहज ही कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त हो जाता है।
ऐसी पवित्र और अनुपम गंगा को सज्जन क्यों न अपनाएँ?
English Explanation:
Those noble souls who live on the banks of the Ganga,
sustaining themselves simply on water, roots, and fruits,
and free from ego and possessiveness,
attain liberation effortlessly.
Why would the wise not seek such a sacred river?
तीर्थानामवलोकने सुमनसामुत्कण्ठते मानसं
तावद्भूवलये सतां पुररिपुध्यानामृतास्वादिनाम् ।
पावत्ते न विलोकयन्ति सरितां रोचिष्णुमुक्तावलीम्
श्रीमन्नाकतरङ्गिणीं हरजटाजूटाटवीविभ्रमाम् ॥ ७०॥
हिन्दी व्याख्या:
साधारण लोग तीर्थों को देखने के लिए उत्सुक रहते हैं,
परंतु सच्चे साधक, जो भगवान शिव के ध्यान में लीन रहते हैं,
उन्हें बाहरी आकर्षणों की आवश्यकता नहीं होती।
वे गंगा की बाहरी चमक-दमक को नहीं, बल्कि उसके आध्यात्मिक स्वरूप को देखते हैं।
English Explanation:
Ordinary people feel eager to visit sacred places,
but true seekers, absorbed in the meditation of Lord Shiva,
do not depend on external attractions.
They do not merely see the outer beauty of rivers like the Ganga,
but perceive their inner spiritual essence.
संसारो विविधाधिबाधबधिरः सारायते मानसे
निःसारोऽपि वपुष्मतां कलिवृकग्रासीकृतानां चिरम् ।
दृष्टायां घनसारपाथसि महापुण्येन यस्यां सतां
सा सेव्या न कुतो भवेत्सुरधुनीस्वर्गापवर्गोदया ॥ ७१॥
हिन्दी व्याख्या:
यह संसार अनेक प्रकार के दुःखों से भरा हुआ है,
फिर भी लोग इसे महत्वपूर्ण मानते रहते हैं।
कलियुग में यह संसार भेड़िये के समान मनुष्य को निगलता रहता है।
ऐसी स्थिति में गंगा, जो स्वर्ग और मोक्ष देने वाली है,
उसे क्यों न अपनाया जाए?
English Explanation:
This world is filled with countless sufferings,
yet people continue to treat it as meaningful.
In Kali Yuga, it devours beings like a wolf.
In such a condition, why should one not seek the Ganga,
which grants both heavenly joy and liberation?
यस्याः सङ्गतिरुन्नतिं वितनुते वाराममीषां जनै-
रुद्गीता कविभिर्महेश्वरमनोभीष्टा महीमण्डले ।
सा सन्तः शरदिन्दुसोदरपयः पूराभिरामा नद-
त्कोकश्रेणिमनोजपुण्यपुलिना भागीरथी सेव्यताम् ॥ ७२॥
हिन्दी व्याख्या:
भागीरथी गंगा का संग मनुष्य को ऊँचाई और पवित्रता प्रदान करता है।
कवियों ने उसकी महिमा का गान किया है और वह भगवान शिव को भी प्रिय है।
उसका जल शरद पूर्णिमा के चंद्रमा के समान निर्मल और शीतल है।
ऐसी पुण्यदायिनी गंगा का सेवन सज्जनों द्वारा अवश्य किया जाना चाहिए।
English Explanation:
Association with the Ganga elevates a person spiritually.
Poets have sung her glory, and she is dear to Lord Shiva.
Her waters are as pure and soothing as the autumn moon.
Such a sacred river should always be embraced by the wise.
क्वचिद्धंसश्रेणी सुखयति रिरंसुः श्रुतिसुखं
नदन्ती चेतो नो विपुलपुलिने मन्थरगतिः ।
तदेतस्या योऽर्थी सुरतरुलता नाकतटिनी
सदा सद्भिः सेव्या सकलपुरुषार्थाय कृतिभिः ॥ ७३॥
हिन्दी व्याख्या:
गंगा के तट पर हंसों की मधुर ध्वनि मन को आनंदित करती है।
उसकी धीमी बहती धारा हृदय को शांति प्रदान करती है।
जो व्यक्ति जीवन के चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को पाना चाहता है,
उसे इस दिव्य नदी की शरण अवश्य लेनी चाहिए।
English Explanation:
On the banks of the Ganga, the gentle sounds of swans bring joy to the ears.
Her slow, graceful flow calms the heart.
One who seeks the four goals of life—dharma, artha, kama, and moksha—
should take refuge in this divine river.
कलौ गङ्गा काश्यां त्रिपुरहरपुर्यां भगवती
प्रशस्तादेवानामपि भवति सेव्यानुदिवसम् ।
इति व्यासो ब्रूते मुनिजनधुरीणो हरिकथा-
सुधापानस्वस्थो गलितभवबन्धोऽतुलमतिः ॥ ७४॥
हिन्दी व्याख्या:
कलियुग में काशी और गंगा विशेष रूप से पूजनीय हैं।
महर्षि व्यास कहते हैं कि देवताओं के लिए भी यह स्थान सेवनीय है।
जो हरिकथा और भक्ति में लीन होकर संसार के बंधनों से मुक्त हो चुके हैं,
वे इस सत्य को भली-भांति जानते हैं।
English Explanation:
In Kali Yuga, Kashi and the Ganga hold special significance.
Sage Vyasa declares that even the gods revere these places.
Those absorbed in divine devotion and free from worldly bondage
understand this truth deeply.
यावज्जागर्ति चित्ते दुरितकलुषिते प्राणिनो वित्तपुत्र-
क्षेत्राद्यर्थेषु चिन्ता तदतिपरतया भ्राम्यमानस्य नित्यम् ।
तावन्नार्थस्य सिद्धिर्भवति कथमपि प्राथितस्यार्तिभाजा
कैवल्याख्यस्य लोके रमणसुखभुवो मुक्तदोषानुषक्तेः ॥ ७५॥
हिन्दी व्याख्या:
जब तक मनुष्य का चित्त पाप और मोह से भरा रहता है
और वह धन, पुत्र, भूमि आदि में ही लगा रहता है,
तब तक उसे वास्तविक शांति या मोक्ष प्राप्त नहीं होता।
ऐसी अवस्था में वह केवल संसार में भटकता रहता है।
English Explanation:
As long as the mind is clouded by sin and attachment
and remains occupied with wealth, family, and possessions,
true fulfillment or liberation cannot be attained.
One continues to wander endlessly in worldly distractions.
सन्त्यर्था मम सञ्चिता बहुधाः पित्रादिभिः साम्प्रतं
वाणिज्यैः कृषिभिः कलाभिरपि तान्विस्तारयिष्यामि वः ।
हे पुत्रा इति भावन्ननुदिनं संसारपाशावलीं
छेत्तायं तु कथं मनोरथमयीं जीवो निरालम्बनः ॥ ७६॥
हिन्दी व्याख्या:
मनुष्य सोचता है कि उसने बहुत धन एकत्र किया है
और वह उसे और बढ़ाएगा।
वह अपने बच्चों के लिए योजनाएँ बनाता रहता है,
परंतु यह सब संसार के बंधनों को और मजबूत करता है।
इन बंधनों से मुक्त होना अत्यंत कठिन हो जाता है।
English Explanation:
A person believes he has accumulated wealth
and plans to expand it further.
He keeps making plans for his children,
but this only strengthens the bonds of worldly attachment.
Breaking free from these chains becomes extremely difficult.
जानन्नेव करोति कर्म बहुलं दुःखात्मकं प्रेरितः
केनाप्यप्रतिवाच्यशक्तिमहिना देवेन मुक्तात्मना ।
सर्वज्ञेन हृदिस्थितेन तनुमत्संसाररङ्गाङ्गणे
माद्यद्बुद्धिनटीविनोदनिपुणो नृत्यन्नङ्गप्रियः ॥ ७७॥
हिन्दी व्याख्या:
मनुष्य जानता है कि उसके कर्म दुःखदायी हैं,
फिर भी वह किसी अदृश्य शक्ति के प्रभाव में आकर उन्हें करता रहता है।
ईश्वर, जो हृदय में स्थित है, इस संसार रूपी रंगमंच पर
बुद्धि को नटी (नर्तकी) की तरह नचाते हुए अपनी लीला करता है।
English Explanation:
Even knowing that actions lead to suffering,
a person continues to perform them under the influence of an unseen force.
The Divine, residing in the heart,
plays in the theater of the world,
making the intellect dance like an actress in a cosmic drama.
को देवो भुवनोदयावनकरो विश्वेश्वरो विद्यते
यस्याज्ञावशवर्तिनो जलधियो नाप्लावयन्ति क्षितिम् ।
इत्याम्नातमपीश्वरं सुरशिरोरत्नं जगत्साक्षिणं
सर्वज्ञं धनयौवनोद्घतमना नो मन्यते बालिशः ॥ ७८॥
हिन्दी व्याख्या:
यह ईश्वर ही है जो सृष्टि की रचना और पालन करता है,
जिसकी आज्ञा से समुद्र अपनी सीमा में रहते हैं।
वह सर्वज्ञ, देवताओं का भी श्रेष्ठ और जगत का साक्षी है।
फिर भी धन और यौवन के अहंकार में डूबा हुआ मूर्ख मनुष्य उसे नहीं मानता।
English Explanation:
It is God who creates and sustains the universe,
by whose command even the oceans remain within bounds.
He is all-knowing, the witness of the world, and supreme among the gods.
Yet a foolish person, blinded by wealth and youth, refuses to acknowledge Him.
कस्येमौ पितरौ मनोभववता तापेन संयोजिता-
वन्योन्यं तनयादिकं जनयतो भूम्यादिभूतात्मभिः ।
इत्थं दुःस्थमतिर्मनोभवरतिर्यो मन्यते नास्तिकः
शान्तिस्तस्य कथं भवेद्घनवतो दुष्कर्मधर्मश्रमात् ॥ ७९॥
हिन्दी व्याख्या:
जो व्यक्ति यह नहीं समझता कि माता-पिता का मिलन भी ईश्वर की व्यवस्था है,
और संसार की उत्पत्ति दिव्य शक्ति से होती है,
वह अज्ञान में डूबा हुआ नास्तिक है।
ऐसे व्यक्ति को कभी शांति नहीं मिल सकती,
क्योंकि वह कर्मों के बंधन में उलझा रहता है।
English Explanation:
One who fails to understand that even the union of parents
and the creation of life is governed by divine will
remains ignorant and atheistic.
Such a person can never attain peace,
as he remains bound by the cycle of actions and consequences.
हिक्काकास भगन्दरोदरमहामेदज्वरैराकुलः
श्लेष्माद्यैरपि निद्रया विरहितो मन्दानलोल्पाशनः ।
तारुण्येऽपि विलोक्यते बहुविधो जीवो दरिद्रेश्वरो
हा कष्टं कथमीदृशं भगवतः संसारदुःसागरे ॥ ८०॥
हिन्दी व्याख्या:
मनुष्य शरीर अनेक रोगों से ग्रस्त रहता है—हिचकी, खाँसी, ज्वर आदि।
उसे नींद भी नहीं आती और भोजन भी ठीक से नहीं पचता।
युवा अवस्था में भी वह दुखी और दरिद्र दिखाई देता है।
यह संसार वास्तव में दुःखों का महासागर है।
English Explanation:
The human body suffers from many ailments—hiccups, cough, fever, and more.
Sleep is disturbed, digestion is weak.
Even in youth, one appears miserable and poor.
Truly, this world is an ocean of suffering.
माद्यत्तार्किकतान्त्रिकद्विपघटासङ्घट्टपञ्चानन-
स्तद्वदृप्तकदन्तवैद्यककलाकल्पोऽपि निष्किञ्चनः ।
यत्र क्वापि विनाशया कृशतनुर्भूपालसेवापरो
जीवन्नेव मृतायते किमपरं संसारदुःसागरे ॥ ८१॥
हिन्दी व्याख्या:
तर्कशास्त्र, तंत्र या चिकित्सा में निपुण व्यक्ति भी
यदि केवल अहंकार और जीविका में उलझा है,
तो उसका जीवन व्यर्थ है।
राजाओं की सेवा करते-करते वह शरीर से कमजोर हो जाता है
और जीवित रहते हुए भी मृत समान हो जाता है।
English Explanation:
Even a master of logic, tantra, or medicine,
if driven by ego and survival alone,
leads a meaningless life.
Serving kings, he weakens himself
and lives like a dead person while still alive.
आढ्यः कश्चिदपण्डितोऽपि विदुषां सेव्यः सदा धार्मिको
विश्वेषामुपजारको मृगदृशामानन्दकन्दाकरः ।
कर्पूरद्युतिकीर्तिभूषितहरिद्भूमण्डले गीयते
शश्वद्द्वन्दिजनैर्महीतनुभृतः पुण्यैर्न कस्योदयः ॥ ८२॥
हिन्दी व्याख्या:
कभी-कभी एक धनी व्यक्ति, भले ही विद्वान न हो,
फिर भी समाज में सम्मानित होता है।
वह सबका प्रिय बन जाता है और उसकी कीर्ति फैलती है।
यह सब उसके पूर्व जन्म के पुण्य का परिणाम है।
English Explanation:
Sometimes a wealthy person, though not learned,
is still respected by the wise.
He becomes beloved and widely praised.
This is the result of merits accumulated in past lives.
कर्तव्यं न करोति बन्धुभिरपि स्नेहात्मभिर्वोदितः
कामित्वादभिमन्यते हितमतं धीरोप्यभीष्टं नरः ।
निष्कामस्य न विक्रिया तनुभृतो लोके क्वचिद्दृश्यते
यत्तस्मादयमेव मूलमखिलानर्थस्य निर्धारितम् ॥ ८३॥
हिन्दी व्याख्या:
मनुष्य को जब अपने कर्तव्य के लिए समझाया जाता है,
तो भी वह कामना के कारण उसे नहीं करता।
वह अपनी इच्छाओं को ही सर्वोपरि मानता है।
निष्काम व्यक्ति में कोई विकार नहीं होता।
इसलिए कामना ही सभी दुःखों और समस्याओं का मूल कारण है।
English Explanation:
Even when advised by loved ones,
a person driven by desire neglects his duties.
He considers his desires supreme.
A desireless person remains unaffected.
Thus, desire is the root cause of all suffering.
निष्कामा मुनयः परावरदृशो निर्धूतपाप्मोदया
निःसङ्गा निरहङ्कृता निरुपमानन्दं परं लेभिरे ।
यद्गत्वा न लुठन्ति मातृजठरे दुःखाकरे मानवा
दुर्गन्धे पुनरेत्यकाममकरे संसारपाथोनिधौ ॥ ८४॥
हिन्दी व्याख्या:
निष्काम, निरहंकारी और निःसंग मुनि, जो समस्त सत्य को देख चुके हैं,
अपने पापों से मुक्त होकर परम आनंद को प्राप्त करते हैं।
उस अवस्था को प्राप्त होकर वे पुनः जन्म-मरण के चक्र में नहीं आते।
वे इस दुःखरूपी संसार सागर में फिर नहीं गिरते।
English Explanation:
Desireless sages, free from ego and attachment,
having realized the ultimate truth, attain supreme bliss.
Having reached that state, they are not reborn
into the cycle of suffering and worldly existence again.
कामस्यापि निदानमाहुरपरे मायां महाशासना
निश्चित्कां सकलप्रपञ्चरचनाचातुर्यलीलावतीम् ।
यत्सङ्गाद्भगवानपि प्रभवति प्रत्यङ्महामोहहा
श्रीरङ्गो भुवनोदयावनलयव्यापारचक्रेक्रियाः ॥ ८५॥
हिन्दी व्याख्या:
कुछ विद्वान कहते हैं कि काम (इच्छा) का मूल कारण माया है।
यह माया सम्पूर्ण संसार की रचना करने में अत्यंत कुशल है।
इसी के प्रभाव से जीव मोह में फँस जाता है,
जबकि ईश्वर इस माया से परे होकर सृष्टि का संचालन करता है।
English Explanation:
Some scholars state that desire originates from Maya.
Maya skillfully creates the entire universe.
Under its influence, beings fall into delusion,
while the Divine remains beyond it, governing creation.
तुल्यार्थेन त्वमैक्यं त्रिभुवनजनकस्तत्पदार्थःप्रपद्य
प्रत्यक्षं मोहजन्म त्यजति भगवति त्वंपदार्थोऽपि जीवः ।
श्रुत्याचार्यप्रसादान्निरुपमविलसद्ब्रह्मविद्यैस्तदैक्यं
प्राप्यानन्दप्रतिष्ठो भवति विगलितानाद्यविद्योपरीहः ॥ ८६॥
हिन्दी व्याख्या:
जीव और ब्रह्म का ऐक्य ही वास्तविक सत्य है।
जब जीव अपने मोह को त्यागकर इस सत्य को पहचानता है,
तो वह ब्रह्म के साथ एक हो जाता है।
शास्त्र और गुरु की कृपा से प्राप्त इस ज्ञान से
वह अनादि अज्ञान से मुक्त होकर परम आनंद को प्राप्त करता है।
English Explanation:
The unity of the individual soul and Brahman is the ultimate truth.
When one realizes this by abandoning delusion,
one becomes one with the Divine.
Through the grace of scriptures and teachers,
one attains supreme bliss beyond ignorance.
संन्यासो विहितस्य केशवपदद्वन्द्वे व्यधायि श्रुता
वेदान्ता निरवद्यनिष्कलपरानन्दाः सुनिष्ठाश्चिरम् ।
संसारे वधबन्धदुःखबहुले मायाविलासेऽव्ययं
ब्रह्मास्मीति विहाय नान्यदधुना कर्तव्यमास्ते क्वचित् ॥ ८७॥
हिन्दी व्याख्या:
वेद और वेदान्त बताते हैं कि संन्यास का वास्तविक उद्देश्य
भगवान के चरणों में स्थिर होकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना है।
जब साधक “अहं ब्रह्मास्मि” का अनुभव कर लेता है,
तो उसके लिए इस संसार में करने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहता।
English Explanation:
The Vedas and Vedanta declare that true renunciation
means surrendering to the Divine and realizing Brahman.
Once one realizes “I am Brahman,”
nothing else remains to be achieved in this world.
हित्वा विश्वाद्यवस्थाः प्रकृतिविलसिता जाग्रदाद्यैर्विशेषैः
सार्धं चैतन्यधातौ प्रकृतिमपि समं कार्यजातैरशेषैः ।
ज्ञानानन्दं तुरीयं विगलितगुणकं देशकालाद्यतीतं
स्वात्मानं वीतनिद्रः सततमधिकृतश्चिन्तयेदद्वितीयम् ॥ ८८॥
हिन्दी व्याख्या:
जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं को पार करके,
प्रकृति और उसके सभी कार्यों से ऊपर उठकर,
साधक तुरीय अवस्था को प्राप्त करता है।
यह अवस्था ज्ञान और आनंद से पूर्ण,
देश-काल से परे और अद्वितीय होती है।
English Explanation:
Transcending the states of waking, dream, and deep sleep,
and going beyond nature and its manifestations,
one attains the fourth state—Turiya.
It is pure knowledge and bliss,
beyond time and space, and absolutely non-dual.
अग्रेपश्चादधस्तादुपरि च परितो दिक्षु धान्यास्वनादिः
कूटस्था संविदेका सकलतनुभृतामन्तरात्मानियन्त्री ।
यस्यानन्दस्वभावा स्फुरति शुभधियः प्रत्यहं निष्प्रपञ्चा
जीवन्मुक्तः स लोके जयति गतमहामोहविश्वप्रपञ्चः ॥ ९०॥
हिन्दी व्याख्या:
जो साधक यह अनुभव कर लेता है कि एक ही चेतना सभी दिशाओं में,
सभी प्राणियों के भीतर विद्यमान है और सबका संचालन करती है,
और जो प्रतिदिन उस निष्प्रपंच, आनंदस्वरूप आत्मा का अनुभव करता है—
वह जीवन्मुक्त कहलाता है, जिसने संसार के महान मोह को जीत लिया है।
English Explanation:
One who realizes that a single consciousness pervades all directions
and exists within all beings as the inner controller,
and experiences that pure, blissful, non-dual reality daily,
is a liberated soul—free from the illusion of the world.
क्वाहं ब्रह्मेति विद्या निरतिशयसुखं दर्शयन्ती विशुद्धं
कूटस्थं स्वप्रकाशं प्रकृति सुचरिता खण्डयन्ती च मायाम् ।
क्वाविद्याहं ममेति स्थगितपरसुखा चित्तभित्तौ लिखन्ती
सर्वानर्थाननर्थान् विषयगिरिभुवा वासनागैरिकेण ॥ ९१॥
हिन्दी व्याख्या:
“अहं ब्रह्मास्मि” की विद्या शुद्ध, स्वयं प्रकाशित और परम सुख देने वाली है,
जो माया का नाश कर देती है।
इसके विपरीत “मैं” और “मेरा” की अविद्या मन पर वासनाओं के रंग से
सभी दुःखों और अनर्थों को अंकित करती है।
English Explanation:
The knowledge “I am Brahman” reveals pure, self-luminous, supreme bliss
and destroys illusion.
In contrast, ignorance rooted in “I” and “mine”
paints the mind with desires, leading to all suffering and misfortune.
अहं ब्रह्मास्मीति स्फुरदमलबोधो यदि भवे-
त्पुमान्पुण्योद्रेकादुपचितपरानर्थविरतिः ।
तदानीं क्वाविद्या भृशमसहमानौपनिषदं
विचारं संसारः क्व च विविधदुःखैकवसतिः ॥ ९२॥
हिन्दी व्याख्या:
जब “मैं ब्रह्म हूँ” का शुद्ध ज्ञान प्रकट होता है,
तो मनुष्य सभी अनर्थों से दूर हो जाता है।
उस समय अविद्या नष्ट हो जाती है,
और संसार के दुःखों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
English Explanation:
When the pure realization “I am Brahman” arises,
one becomes free from all miseries.
Ignorance disappears,
and the world of suffering loses its hold completely.
कश्चित्क्रन्दति कालकर्कशकराकृष्टं विनष्टं हठा-
दुत्कृष्टं तनयं विलोक्य पुरतः पुत्रेति हा हा क्वचित् ।
कश्चिन्नर्तकनर्तकीपरिवृतो नृत्यत्यहो कुत्रचि-
च्चित्रं संसृतिपद्धतिः प्रथयति प्रीतिञ्च कष्टञ्च नः ॥ ९३॥
हिन्दी व्याख्या:
कहीं कोई व्यक्ति अपने प्रिय पुत्र की मृत्यु पर रो रहा है,
तो कहीं कोई व्यक्ति नृत्य और आनंद में लीन है।
यह संसार अत्यंत विचित्र है—
यह एक ही समय में सुख और दुःख दोनों को प्रस्तुत करता है।
English Explanation:
In one place, a person cries over the loss of his beloved son,
while elsewhere, someone is immersed in joy and dance.
Such is the strange nature of the world—
it presents both happiness and sorrow simultaneously.
नान्नं जीर्यति किञ्चिदौषधबलं नालं स्वकार्योदये
शक्तिश्चंक्रमणे न हन्त जरया जीर्णीकृतायां तनौ ।
अस्माकं त्वधुना न लोचनबलं पुत्रेति चिन्ताकुलो
ग्लायत्यर्थपरायणोऽतिकृपणो मिथ्याभिमानो गृही ॥ ९४॥
हिन्दी व्याख्या:
वृद्धावस्था में शरीर इतना दुर्बल हो जाता है कि न भोजन पचता है,
न औषधि काम करती है, न चलने-फिरने की शक्ति रहती है।
फिर भी मनुष्य “पुत्र, धन, परिवार” की चिंता में डूबा रहता है।
यह मिथ्या अहंकार और मोह उसे अंत तक कष्ट देता है।
English Explanation:
In old age, the body weakens—food is not digested,
medicine loses effect, and movement becomes difficult.
Yet the mind remains attached to children, wealth, and family.
Such false ego and attachment continue to cause suffering till the end.
अन्नाशाय सदा रटन्ति पृथुकाःक्षुत्क्षामकण्ठास्त्रियो
वासोभी रहिता बहिर्व्यवहृतौ निर्यान्ति नो लज्जया ।
गेहादङ्गणमार्जनेऽपि गृहिणो यस्येति दुर्जीवितं
यद्यप्यस्ति तथापि तस्य विरतिर्नोदेति चित्रं गृहे ॥ ९५॥
हिन्दी व्याख्या:
जहाँ परिवार भूख से व्याकुल है, वस्त्र तक नहीं हैं,
और जीवन अत्यंत कठिन हो गया है—
फिर भी उस व्यक्ति के भीतर वैराग्य उत्पन्न नहीं होता।
यह संसार के मोह की अत्यंत आश्चर्यजनक स्थिति है।
English Explanation:
Even when a family suffers from hunger and lacks basic clothing,
and life becomes extremely miserable,
the person still does not develop detachment.
Such is the strange power of worldly attachment.
सद्द्वंशो गुणवानहं सुचरितः श्लाघ्यां करोत्यात्मनो
नीचानां विदधाति च प्रतिदिनं सेवां जनानां द्विजः ।
योषित्तस्य जिघृक्षया स च कुतो नो लज्जते सज्जना-
ल्लोभान्धस्य नरस्य नो खलु सतां दृष्टं हि लज्जाभयम् ॥ ९६॥
हिन्दी व्याख्या:
मनुष्य स्वयं को उच्च कुल का, गुणवान और श्रेष्ठ बताता है,
परंतु लोभ और वासना के कारण वह नीच कर्म भी करता है।
ऐसा व्यक्ति सज्जनों के सामने भी लज्जा अनुभव नहीं करता।
लोभ अंधा बना देता है और विवेक को नष्ट कर देता है।
English Explanation:
A person may claim noble lineage and virtues,
yet due to greed and desire, engages in ignoble acts.
Such a person feels no shame even before the wise.
Greed blinds and destroys all sense of morality.
कामादित्रिकमेव मूलमखिलक्लेशस्य मायोद्भवं
मर्त्यानामिति देवमौलिविलसद्भाजिष्णुचूडामणिः ।
श्रीकृष्णो भगवानवोचदखिलप्राणिप्रियो मत्प्रभु-
र्यस्मात्तत्त्रिकमुद्यतेन मनसा हेयं पुमर्थार्थिना ॥ ९७॥
हिन्दी व्याख्या:
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि काम, क्रोध और लोभ—ये तीनों
संसार के सभी दुःखों के मूल कारण हैं।
इसलिए जो मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य को पाना चाहता है,
उसे इन तीनों का त्याग करना चाहिए।
English Explanation:
Lord Krishna teaches that desire, anger, and greed
are the root causes of all suffering in life.
Therefore, one who seeks the highest goal
must consciously abandon these three.
यत्प्रीत्यर्थमनेकधामनि मया कष्टेन वस्तु प्रियं
स्वस्याशाकवलीकृतेन विकलीभावं दधानेन मे ।
तत्सर्वं विलयं निनाय भगवान् यो लीलया निर्जरो
मां हित्वा जरयाकुलीकृततनुं कालाय तस्मै नमः ॥ ९८॥
हिन्दी व्याख्या:
जिस वस्तु को मैंने कठिन परिश्रम से अर्जित किया और प्रिय माना,
उसे भी काल ने खेल-खेल में नष्ट कर दिया।
अंत में शरीर भी जरा (बुढ़ापे) से ग्रस्त होकर छूट जाता है।
ऐसे सर्वनाशकारी काल को नमस्कार है।
English Explanation:
All that I gained with effort and attachment
is destroyed effortlessly by Time.
Even the body decays with age and is left behind.
Salutations to Time—the ultimate dissolver of all.
आयुर्वेदविदां रसाशनवतां पथ्याशिनां यत्नतो
वैद्यानामपि रोगजन्म वपुषो ह्यन्तर्यतो दृश्यते ।
दुश्चक्षोत्कवलीकृतत्रिभुवनो लीलाविहारस्थितः
सर्वोपायविनाशनैकचतुरः कालाय तस्मै नमः ॥ ९९॥
हिन्दी व्याख्या:
आयुर्वेद जानने वाले, संयमित आहार लेने वाले और चिकित्सक भी
रोगों से बच नहीं पाते।
काल तीनों लोकों को ग्रसने वाला है और सभी उपायों को निष्फल कर देता है।
ऐसे काल को नमस्कार है।
English Explanation:
Even those skilled in Ayurveda and disciplined in diet
cannot escape disease.
Time devours all worlds and nullifies every remedy.
Salutations to Time, the master of all destruction.
ते धन्या भुवने सुशिक्षितपरब्रह्मात्मविद्याजना
लोकानामनुरञ्जका हरिकथापीयूषपानप्रियाः ।
येषां नाकतरङ्गिणीतटशिलाबद्धासनानां सतां
प्राणा यन्ति लयं सुखेन मनसा श्रीरङ्गचिन्ताभृताम् ॥ १००॥
हिन्दी व्याख्या:
वे ही धन्य हैं जो ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर चुके हैं,
जो हरिकथा में आनंद लेते हैं और दूसरों को भी आनंदित करते हैं।
जो गंगा तट पर बैठकर भगवान का चिंतन करते हुए
शांतिपूर्वक प्राण त्याग करते हैं।
English Explanation:
Blessed are those who realize Brahman,
delight in divine discourse, and inspire others.
Sitting peacefully by the Ganges, absorbed in God,
they depart this world in blissful awareness.
हे पुत्राः व्रजताभयं यत इतो गेहं जनन्या समं
रागद्वेषमदादयो भवतु वः पन्थाः शिवोऽमायया ।
काशीं साम्प्रतमागतोऽहमहह क्लेशेन हातुं वपुः
सर्वानर्थगृहं सुपर्वतटिनीवीचिश्रियामण्डिताम् ॥ १०१॥
हिन्दी व्याख्या:
हे पुत्रों! तुम निडर होकर अपने घर जाओ।
राग, द्वेष और अहंकार का त्याग करो।
मैं काशी आया हूँ इस शरीर का त्याग करने,
जो सभी दुःखों का घर है।
English Explanation:
O sons! Go fearlessly to your homes.
Abandon attachment, hatred, and ego.
I have come to Kashi to renounce this body,
which is the abode of all suffering.
यत्साक्षादभिधातुमक्षमतया शब्दाद्यनालिङ्गितं
कूटस्थं प्रतिपादयन्ति विलयद्वारा प्रपञ्चस्रजः ।
मोक्षाय श्रुतयो निरस्तविधयो ध्यानस्य चोच्छित्तये
तत्राद्वैतवने सदा विचरताच्चेतः कुरङ्गः सताम् ॥ १०२॥
हिन्दी व्याख्या:
जिस परम सत्य को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता,
उसे केवल अनुभव के माध्यम से जाना जाता है।
वेद भी अंततः उसी अद्वैत सत्य की ओर संकेत करते हैं।
सज्जनों का मन उसी अद्वैत में विचरण करता है।
English Explanation:
The ultimate truth cannot be expressed in words.
It is realized through direct experience.
The scriptures ultimately point toward non-duality,
where the minds of the wise dwell in peace.
बुधानां वैराग्यं सुघटयतु वैराग्यशतकं
गृहस्थानामेकं हरिपदसरोजप्रणयिनाम् ।
जनानामानन्दं वितरतु नितान्तं सुविशद-
त्रयं शेषव्याख्यागलिततमसां शुद्धमनसाम् ॥ १०३॥
हिन्दी व्याख्या:
यह ग्रंथ विद्वानों में वैराग्य उत्पन्न करे,
गृहस्थों में भगवान के प्रति प्रेम जगाए,
और सभी लोगों के मन में आनंद उत्पन्न करे।
English Explanation:
May this text create detachment in the wise,
devotion in householders,
and spread joy among all people.
🔱 यह केवल श्लोकों का संग्रह नहीं — यह आत्मा की यात्रा है 🔱
🕉️ हिन्दी सार:
यह ग्रंथ मनुष्य को पहले झकझोरता है —
कि संसार, शरीर, धन, संबंध — सब क्षणभंगुर हैं।
जो हम “सुख” समझते हैं, वह केवल मन का भ्रम है।
फिर यह हमें भीतर ले जाता है —
जहाँ एक शुद्ध चेतना, स्वयं प्रकाशित, सदा विद्यमान है।
वही ब्रह्म है — वही वास्तविक सत्य है।
“मैं” और “मेरा” — यही बंधन हैं।
यही अविद्या है जो हमें जन्म-मरण के चक्र में बाँधे रखती है।
जब यह ज्ञान जागता है — “अहं ब्रह्मास्मि”
तब उसी क्षण मुक्ति होती है।
कहीं जाना नहीं पड़ता — केवल पहचानना होता है।
काल सब कुछ नष्ट कर देता है —
इसलिए जो नश्वर है, उसमें आसक्ति व्यर्थ है।
अंततः केवल अद्वैत सत्य शेष रहता है —
जहाँ न द्वैत है, न भय, न दुःख।
👉 संसार = स्वप्न
👉 शरीर = नश्वर
👉 मन = भ्रम
👉 ज्ञान = जागरण
👉 ब्रह्म = एकमात्र सत्य
🔱 “तुम वही हो, जिसे तुम खोज रहे हो।” 🔱
🌍 English Summary:
This text is not just a collection of verses—
it is the journey of the soul from illusion to truth.
It first shakes the seeker, revealing that
the world, body, wealth, and relationships are temporary.
What we call happiness is merely a projection of the mind.
Then it turns us inward,
towards the self-luminous consciousness within—
that is Brahman, the only reality.
“I” and “mine” are the roots of bondage.
Ignorance keeps us trapped in the cycle of birth and death.
When the realization “I am Brahman” arises,
liberation happens instantly.
Nothing needs to be attained—only recognized.
Time destroys everything—
therefore attachment to the temporary is futile.
Ultimately, only non-dual truth remains—
beyond fear, beyond sorrow.
👉 World = illusion
👉 Body = temporary
👉 Mind = creator of illusion
👉 Knowledge = awakening
👉 Brahman = ultimate reality
🔱 “You are what you are seeking.” 🔱
