विवेकचूडामणि - साक्षी भाव sloka 291 to 295

Vivekachudamani: The Crest Jewel of Discrimination


विवेकचूडामणि - साक्षी भाव

विवेकचूडामणि: साक्षी और अहंकार

श्लोक २९१ - २९५ | मिथ्या वेश का त्याग

यत्रैष जगदाभासो दर्पणान्तः पुरं यथा ।
तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ २९१॥

हिन्दी: जैसे दर्पण के भीतर नगर का आभास (प्रतिबिंब) होता है, वैसे ही जिसमें यह संपूर्ण जगत भास रहा है—"वह ब्रह्म मैं हूँ", ऐसा जानकर तुम कृतकृत्य (सफल) हो जाओगे।

English: Just as a city is reflected in a mirror, so is this universe reflected in That (Brahman). Knowing "I am That Brahman," you will reach the fulfillment of life.

यत्सत्यभूतं निजरूपमाद्यं चिदद्वयानन्दमरूपमक्रियम् ।
तदेत्य मिथ्यावपुरुत्सृजेत शैलूषवद्वेषमुपात्तमात्मनः ॥ २९२॥

हिन्दी: जो सत्य, अनादि, अद्वितीय चैतन्य और आनंदस्वरूप है, जो रूप और क्रिया से रहित है—उस स्वरूप को प्राप्त करके, इस मिथ्या शरीर रूपी वेश को वैसे ही त्याग दो जैसे कोई अभिनेता (शैलूष) नाटक समाप्त होने पर अपना वेष उतार देता है।

English: Attaining that which is real, primal, non-dual Bliss, formless and actionless—one should discard this false body, like an actor putting off the costume he had assumed for a role.

सर्वात्मना दृश्यमिदं मृषैव नैवाहमर्थः क्षणिकत्वदर्शनात् ।
जानाम्यहं सर्वमिति प्रतीतिः कुतोऽहमादेः क्षणिकस्य सिध्येत् ॥ २९३॥

हिन्दी: यह दृश्य जगत पूरी तरह मिथ्या है। "अहं" (अहंकार) भी आत्मा नहीं है क्योंकि वह क्षणिक (बदलने वाला) है। "मैं सब जानता हूँ"—यह प्रतीति उस क्षणिक अहंकार को कैसे हो सकती है? (अर्थात् जानने वाला नित्य होना चाहिए)।

English: This objective world is altogether unreal; even the ego is not the Self because it is seen to be momentary. How can the perception "I know all" belong to the ego, which is itself transitory?

अहम्पदार्थस्त्वहमादिसाक्षी नित्यं सुषुप्तावपि भावदर्शनात् ।
ब्रूते ह्यजो नित्य इति श्रुतिः स्वयं तत्प्रत्यगात्मा सदसद्विलक्षणः ॥ २९४॥

हिन्दी: वास्तविक "अहं" (आत्मा) तो वह है जो अहंकार आदि का साक्षी है। गहरी नींद (सुषुप्ति) में भी उसका अस्तित्व बना रहता है। श्रुति भी उसे 'अजन्मा और नित्य' कहती है। वह अंतरात्मा व्यक्त और अव्यक्त से परे है।

English: But the real 'I' is the witness of the ego and other things. It exists even in deep sleep. The Shruti itself says, "It is birthless and eternal." That is the inner Self, distinct from the cause and effect.

विकारिणां सर्वविकारवेत्ता नित्याविकारो भवितुं समर्हति ।
मनोरथस्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटं पुनः पुनः दृष्टमसत्त्वमेतयोः ॥ २९५॥

हिन्दी: विकारी (बदलने वाली) वस्तुओं के सभी विकारों को जानने वाला स्वयं 'नित्य और निर्विकार' होना चाहिए। मन के संकल्पों, स्वप्न और सुषुप्ति में इन दृश्य प्रपंचों की असत्यता बार-बार स्पष्ट देखी जाती है।

English: The knower of all changes in changing things must itself be eternal and changeless. The unreality of the mind's imaginations, dreams, and deep sleep is clearly and repeatedly observed.

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