विवेकचूडामणि: तूष्णीं भव (शांत हो जाओ)
श्लोक २८६ - २९० | देह-अध्यास का पूर्ण त्याग
क्वचिन्नावसरं दत्त्वा चिन्तयात्मानमात्मनि ॥ २८६॥
हिन्दी: निद्रा (आलस्य), लोकवार्ता (गपशप), शब्दादि विषयों और विस्मृति (प्रमाद) को जरा सा भी अवसर न देते हुए, निरंतर अपनी आत्मा में ही आत्मा का चिंतन करो।
English: Giving no room to sleep, worldly talk, sense-objects, or forgetfulness, constantly meditate on the Self in your own heart.
त्यक्त्वा चाण्डालवद्दूरं ब्रह्मीभूय कृती भव ॥ २८७॥
हिन्दी: माता-पिता के अंशों से उत्पन्न, मल-मांस से भरे इस शरीर को चाण्डाल (या अपवित्र वस्तु) की तरह दूर से ही त्याग कर, ब्रह्मस्वरूप होकर कृतार्थ हो जाओ।
English: Shunning this body which is born of parents and composed of flesh and impurities, as one avoids an outcast, become Brahman and attain the goal of life.
विलाप्याखण्डभावेन तूष्णीं भव सदा मुने ॥ २८८॥
हिन्दी: जैसे घड़े के आकाश (घटाकाश) को महाकाश में विलीन कर दिया जाता है, वैसे ही अपनी आत्मा को परमात्मा में विलीन करके, हे मुनि! अखंड भाव से सदा के लिए शांत (मौन) हो जाओ।
English: Merging the limited self into the Supreme Self, like the space in a jar into the infinite space, remain forever silent as the Indivisible Whole, O Sage.
ब्रह्माण्डमपि पिण्डाण्डं त्यज्यतां मलभाण्डवत् ॥ २८९॥
हिन्दी: स्वयं प्रकाशमान अधिष्ठान (ब्रह्म) होकर, इस पिण्डाण्ड (शरीर) और ब्रह्माण्ड (जगत) को मल के पात्र (गंदगी के बर्तन) की तरह सदा के लिए त्याग दो।
English: Becoming yourself the self-luminous Substratum, abandon both the microcosm (body) and the macrocosm (universe) like a vessel of filth.
निवेश्य लिङ्गमुत्सृज्य केवलो भव सर्वदा ॥ २९०॥
हिन्दी: देह में जमी हुई "मैं" की बुद्धि को उस सदानंद चिदात्मा में विलीन कर दो, और लिंग शरीर (सूक्ष्म देह) की आसक्ति को छोड़कर सदा के लिए केवल (मुक्त) हो जाओ।
English: Transferring the "I-consciousness" rooted in the body to the Self which is Existence-Knowledge-Bliss, and discarding the subtle body, be forever alone and free.