विवेकचूडामणि: आत्म-बोध एवं प्राणमय कोश श्लोक 161 -165

Vivekachudamani: The Crest Jewel of Discrimination


विवेकचूडामणि - देहासक्ति त्याग

विवेकचूडामणि: आत्म-बोध एवं प्राणमय कोश

अत्रात्मबुद्धिं त्यज मूढबुद्धे त्वङ्मांसमेदोऽस्थिपुरीषराशौ ।
सर्वात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे कुरुष्व शान्तिं परमां भजस्व ॥ १६१॥
हिन्दी: हे मूढबुद्धि! त्वचा, मांस, चर्बी, हड्डी और मल के इस ढेर (शरीर) में 'मैं' की बुद्धि का त्याग कर। इसके स्थान पर उस निर्विकल्प ब्रह्म में, जो सबका आत्मा है, अपना मन लगा और परम शांति का अनुभव कर।
English: O fool, cease to identify yourself with this bundle of skin, flesh, fat, bones, and filth. Instead, identify yourself with the absolute Brahman, the Self of all, and attain supreme peace.
देहेन्द्रियादावसति भ्रमोदितां विद्वानहन्तां न जहाति यावत् ।
तावन्न तस्यास्ति विमुक्तिवार्ताप्यस्त्वेष वेदान्तनयान्तदर्शी ॥ १६२॥
हिन्दी: जब तक विद्वान पुरुष देह और इंद्रियों आदि असत्य वस्तुओं में भ्रम से पैदा हुई 'अहं-बुद्धि' (मैं-पन) को नहीं छोड़ता, तब तक उसके लिए मुक्ति की चर्चा भी व्यर्थ है—चाहे वह समस्त वेदान्त शास्त्रों का ज्ञाता ही क्यों न हो।
English: As long as a learned man does not give up his mistaken identification with the body and organs, there is no hope of his liberation, even though he may be a master of Vedanta and its philosophy.
छायाशरीरे प्रतिबिम्बगात्रे यत्स्वप्नदेहे हृदि कल्पिताङ्गे ।
यथात्मबुद्धिस्तव नास्ति काचिज्जीवच्छरीरे च तथैव माऽस्तु ॥ १६३॥
हिन्दी: जैसे तुम्हारी अपनी परछाईं में, दर्पण के प्रतिबिंब में, स्वप्न के शरीर में या मन की कल्पना के शरीर में 'मैं' बुद्धि नहीं होती, वैसी ही बुद्धि इस जीवित शरीर में भी कभी न रहे।
English: Just as you do not identify yourself with your shadow, or your reflection, or the body in a dream, or the body in your imagination, so should you not identify yourself with this living body.
देहात्मधीरेव नृणामसद्धियां जन्मादिदुःखप्रभवस्य बीजम् ।
यतस्ततस्त्वं जहि तां प्रयत्नात् त्यक्ते तु चित्ते न पुनर्भवाशा ॥ १६४॥
हिन्दी: देह को आत्मा मानना ही अज्ञानियों के लिए जन्म-मरण आदि दुखों का बीज है। इसलिए तुम प्रयत्नपूर्वक इसका त्याग करो। जब चित्त से यह धारणा निकल जाती है, तब पुनर्जन्म की कोई संभावना नहीं रहती।
English: The identification with the body is the seed of the misery of birth and death for people of clouded intellect. Therefore, exert yourself to destroy it. When this idea is removed from the mind, there is no more fear of rebirth.
कर्मेन्द्रियैः पञ्चभिरञ्चितोऽयं प्राणो भवेत्प्राणमयस्तु कोशः ॥
येनात्मवानन्नमयोऽनुपूर्णः प्रवर्ततेऽसौ सकलक्रियासु ॥ १६५॥
हिन्दी: पाँचों कर्मेन्द्रियों के साथ मिलकर यह 'प्राण' ही 'प्राणमय कोश' कहलाता है। इसी से युक्त होकर अन्नमय कोश (शरीर) शक्ति प्राप्त करता है और समस्त क्रियाओं में प्रवृत्त होता है।
English: The Prana, along with the five organs of action, constitutes the Pranamaya-kosha (the vital sheath). Imbued with this, the food-sheath (the body) is filled with life and performs all its activities.

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