विवेकचूडामणि: वासना-त्याग विधि श्लोक २६६ - २७०

Vivekachudamani: The Crest Jewel of Discrimination


विवेकचूडामणि - वासना क्षय एवं अध्यास निरास

विवेकचूडामणि: वासना-त्याग विधि

श्लोक २६६ - २७०

बुद्धौ गुहायां सदसद्विलक्षणं ब्रह्मास्ति सत्यं परमद्वितीयम् ।
तदात्मना योऽत्र वसेद्गुहायां पुनर्न तस्याङ्गगुहाप्रवेशः ॥ २६६॥

हिन्दी: बुद्धि रूपी गुहा में वह 'सत्' और 'असत्' से परे, अद्वितीय और परम सत्य ब्रह्म स्थित है। जो पुरुष उस ब्रह्म के साथ एक होकर अपनी अंतरात्मा (गुहा) में निवास करता है, उसे फिर कभी 'देह रूपी गुहा' (पुनर्जन्म) में प्रवेश नहीं करना पड़ता।

English: In the cave of the intellect resides the non-dual Brahman, distinct from the manifest and unmanifest. He who dwells in this cave, identifying himself with Brahman, never again has to enter the cave of the body (re-birth).

ज्ञाते वस्तुन्यपि बलवती वासनाऽनादिरेषा कर्ता भोक्ताप्यहमिति दृढा याऽस्य संसारहेतुः ।
प्रत्यग्दृष्ट्याऽऽत्मनि निवसता सापनेया प्रयत्नान्मुक्तिं प्राहुस्तदिह मुनयो वासनातानवं यत् ॥ २६७॥

हिन्दी: आत्म-तत्व को जान लेने पर भी, "मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ"—ऐसी अनादि और बलवती वासना बनी रहती है, जो संसार का कारण है। अंतर्मुखी दृष्टि से आत्मा में स्थित होकर इस वासना को बड़े प्रयत्न से मिटाना चाहिए। मुनिजन 'वासनाओं के क्षीण होने' (वासना-तानव) को ही मुक्ति कहते हैं।

English: Even after the Truth is known, the strong, beginningless impression (Vasana) that "I am the doer and enjoyer" persists; this is the cause of rebirth. It must be carefully removed by living in a state of self-realization. Sages call the thinning out of Vasanas 'liberation'.

अहं ममेति यो भावो देहाक्षादावनात्मनि । अध्यासोऽयं निरस्तव्यो विदुषा स्वात्मनिष्ठया ॥ २६८॥
ज्ञात्वा स्वं प्रत्यगात्मानं बुद्धितद्वृत्तिसाक्षिणम् । सोऽहमित्येव सद्वृत्त्याऽनात्मन्यात्ममतिं जहि ॥ २६९॥

हिन्दी: इस देह और इन्द्रियों जैसे अनात्मा में "मैं और मेरा" का जो भाव है, वही 'अध्यास' (गलत पहचान) है। विद्वान को आत्म-निष्ठा द्वारा इसे दूर करना चाहिए। बुद्धि और उसकी वृत्तियों के साक्षी अपने अंतरात्मा को जानकर, "वह ब्रह्म मैं हूँ" इस वृत्ति के द्वारा अनात्मा में आत्म-बुद्धि का त्याग कर दो।

English: The idea of "I and mine" in the non-self, such as the body and organs, is superimposition (Adhyasa). A wise man must overcome it by identification with the Self. Knowing yourself as the witness of the intellect, destroy the false notion of Self in the non-self.

लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम् ।
शास्त्रानुवर्तनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २७०॥

हिन्दी: लोक-मर्यादा (दुनिया क्या कहेगी), देह-सुख (शारीरिक आसक्ति) और शास्त्रों के केवल बाहरी कर्मकाण्ड के पीछे भागना छोड़कर, अपने ऊपर लादे गए 'अध्यास' (झूठी पहचान) को दूर करो।

English: Giving up your obsession with social conformity, your obsession with the body, and your obsession with mere scriptural rituals—remove the superimposition that has fallen upon the Self.

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