रविवार, 30 सितंबर 2018

हम सब जानते हैं कि हम सब मरने वालें हैं फिर हम किसी को मारते क्यों हैं?

हम सब जानते हैं कि हम सब मरने वालें हैं फिर हम किसी को मारते क्यों हैं?


       हम सब जानते हैं कि हम सब मरने वालें हैं, फिर हम किसी को मारतें क्यो हैं? क्या हम इंतजार नहीं कर सकते  हैं किसी को मारने से पहले उसके मरने का, यह भी हो सकता है कि कुछ ऐसे लोग हो जिनको मारना आवश्यक हो जाता है, अपने अस्तित्व को बचाने के लिए। लेकिन जब हम देखते हैं कि जिनका कोई दोष नहीं हैं जो निर्दोष हैं उनको भी हम सब अपनी अज्ञानता के कारण और अपनी वासना के तृप्ती के लिए तड़पा-तड़पा कर मारते है। 

   यह क्या हैं, यह संसार जिसमें हम सब रहते है इसमें सबसे बड़ें हत्यारें हमारें माता-पिता ही होते है। जो स्वयं भयंकरतम मानसिक और शारिरीक कष्ट में अपना जीवन व्यतित करते हैं और उसके बाद भी अपनी संतती को आगे बढ़ाते हैं। और उनको संसार के भयंकरतम कष्ट को सहने के लिए मजबुर करते है। वास्तव में क्या उनकी जरुरत है, जिनको केवल कष्ट को भोगने के लिए ही उतपन्न किया जाता है। 

    हमारें समाज में कितने प्रकार के कष्ट हैं मानसिक, शारीरिक, और आत्मिक लेकिन कितने लोग हैं जो यह जानते हैं और इससे मुक्त होने का प्रयाश करते है। ज्यादातर लोग ऐसा समझते हैं कि केवल भौतिक उन्नती ही इस संसार में सबसे अधिक समपन्नता का कारण हैं। जिसके लिए लग-भग सभी प्रयाश करते हैं जिसमें बहुत कम ही लोग इस में सफलता को हासिल करने में समर्थ होते है। और उन्ही को हम सब अपना आइकान बना कर उनका पिछ करते हैं। और एक केन प्रकारेण स्वयं को भौतिक रुप से समपन्न करने के लिए हर प्रकार का संड़यन्त्र करते है। यह सड़यन्त्र क्या आज तक किसी एक को भी उसकी मृत्यु से एक भी पल के लिए बचा पाया है। संसार असंभवता और संभवता के मध्य में अटका हुआ कांटा है। बहुत लोग कहते हैं कि संसार में संघर्ष के द्वारा कुछ भी संभव है तो क्या हर आदमी संघर्ष नहीं करता है, ऐसा नहीं हर आदमी अपने स्थान पर परिश्रम और संघर्ष अपनी प्रकृति से करता है। चाहे वह पागल या फिर दिवान या मतवाला हो, क्योंकि इस संसार में हर व्यक्ति समानता के अधिकार को प्राप्त करने में कभी सफल नहीं होते हैं। हर आदमी यह क्यों समझता हैं कि सम्पन्नता का मलतब केवल आर्थिक उन्नती ही प्रमुख कारण है, जबकि मैं समझता हुं कि इस संसार में जो सबसे घटिया वस्तु है। वह है आर्थिक समपन्नता क्योंकि मैंने अनुभव किया हैं जिनके पास भी धन हैं। वह सब अक्सर रुग्ण और अज्ञानता के शिकार होते है। 

  सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि ज्ञान में अज्ञान में क्या अंतर है जहां तक हमारें महापुरुष हैं वह कहते है जो कुछ हमारी आँखों के सामने दिख रहा है संसार के समग्र सामग्री के साथ हमारी शरीर भी अज्ञान के श्रेणी में आते है। ज्ञान का मतलब हैं हमारी आत्मा से हैं जो हमें हमारी इस मृत्यु से मुक्त करने का समार्थ रखता है, जबकि हम संसार में यह निरंतर देखते हैं कि यहां कोई भी मृत्यु से मुक्त नहीं है। सभी मृत्यु के चंगुल में फंसे है कोई भी इस मृत्यु से मुक्त नहीं होता है। तो क्या जो हमारें महा पुरुष कहते हैं वह गलत हैं जो कहते हैं कि यह संसार दुख पूर्ण अज्ञानता के प्रमुख श्रोत है। इस संसार से के दुःख और मृत्यु से मुक्त होने के लिए ज्ञान का अर्जन करान होगा। तो क्या हम सब ज्ञान का अर्जन करने के लिए पुरुषार्थ करते है जैसा कि देखने में आता है कि हर कोई सर्वप्रथम धनार्जन करने का प्रयास करता है। और उसमें आवश्यक नहीं हैं कि ज्ञान का उपयोग करना बहुत जरुरी हो, क्योंकि जिनके पास बहुत अधिक धन हैं जरुरी नहीं हैं कि वह सब अपने पुरुषार्थ से प्राप्त या ज्ञान के मार्ग से प्राप्त किया  है।

    ज्यादा तर लोग तो अपने पुरखों से प्राप्त करते है। और उसी को आगे बढ़ाते हैं बहुत कम ही ऐसे लोग दिुखने में इस संसार में आते हैं। जो अपने पुरुषार्थ से संसार में उन्नती को प्राप्त किया हो, और किसी प्रकार का सड़यंत्र का उपयोग नहीं किया हो। अक्सर तो ऐसा होता है कि जितने लोग अपने दम पर समपन्नता को हासिल करने का दम भरते हैं। वह भी किसी ना किसी प्रकार के सड़यंत्र के सहारें ही इस उपलब्धी को प्राप्त किया है।   

    मैं जानता हु कि इस संसार में मेरी बात को कोई भी माने वाला नहीं हैं, क्योंकि हर आदमी को यहां अपने जीने के लिए धन को प्राप्त करना परमआवश्यक हैं। बिना धन के जीवको पार्जन करना मुस्किल ही नहीं असंभव है, दूसरी बात हर आदमी को असिमीत धन की जरुरत है। लेकिन यह सबको समान रूप से नहीं मिल सकता है जैसा कि हम सब अपने संसार में समाज में देख सकते है। कोई एक देश बहुत ज्यादा अमिर है, जैसे अमेरिका, रुश, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, चिन, जर्मनी, चाइना, आस्ट्रेलिया, भारत इत्यादि, और कुछ बहुत गरीब देश भी है जैसे पाकिस्तान, अफगानिस्तार, इरान, इराक, नेपाल, श्री लंका, बंगलादेश इत्यादि, तो क्या इनके पास जीने के हक नहीं है इनको यहां पृथ्वी पर से समाप्त कर देना चाहिए।

    तो आप कहेंगे ऐसा हम नहीं कर सकते है, जैसा कि हम सब भारतिय जानते हैं कि पाकिस्तान का और चाइना का जो दुर्व्यवहार हमारें भारत देश के साथ किया जा रहा हैं जिसके कारण हमेसा इनमें और हममें हमेशा तना-तना चलता रहता है। तो क्या इनके पास धन आजाने से यह सब हमारें साथ अच्छा व्यवहार करेंगे। हम ऐसी कामना कर सकते हैं, जैसा कि मैं आप के जबाब को जानता हुं कि यह सब हमारें साथ दुर्व्यवहार को और अधिक घृड़ित कर देगे। जिसके लिए ही हमें तैयारी करनी पड़ती उनके रक्षा करने के लिए अपने शक्ती का विकास और खतरनाक अश्त्रों का निर्वाण करना पड़ रहा है। भले ही हमारें भारते में या पाकिस्तान में बहुत लोग ऐसे है जिनको दो समय का भोजन भी नसिब नहीं होता है। और हम दोनो देश परमाणु बम बना रहें है।

      एक दूसरे के सर्वनाश करने के लिए, क्योंकि इसके पिछे जो तर्क दिया जाता हैं इसके द्वार हम अपनी रक्षा करते है। तो क्या सच में हम अपनी रक्षा करने में समर्थ हो चुके हैं ृ, उदाहरण के लिए चिन जो जमिन हमसे छिन लिया पुरा का पुरा तीब्बत उससे वापस लेने में समर्थ हो सके हैं, या फिर पाकिस्तान ने जो हमारी कश्मिर के आधे भाग पर कब्जा कर लिया है। उसको प्राप्त करने में सफल हो सके हैं तो जबाा मिलेगा कि नहीं। और यह भी कह सकते हैं कि हम सब इसके लिए प्रयाश कर रहें हैं। उसको तो प्राप्त करना बहुत दूर यहां तो समस्या अपने को आज तो तत्काल में हैं।

 उसे किसी प्रकार से सुरुक्षित रखा जाये। जिसके लिए ही हमारी भारत सरकार संघर्ष कर रही है। इस प्रकार से हम यह आसानी से समझ सकते है कि यहां संसार मे  जिसे हम कमजोर या गरिब समझते हैं। उसको भी परास्थ करना असंभव सा लगता है, लेकिन दूसरी तरफ हम देखते हैं कि भारत समेत पाकिस्तान और दूसरे कितने देश को अंग्रोजों ने अपने छत्र छाया में कर लिया था।

    जिसका अभिमान वह आज भी करते है। और यह भी कहते हैं कि भारत अभी आजाद उनके शासन से नहीं हैं। आज भीउसके चमचे हमारें भारत पर अपना अधिकार बना कर रखा है। अर्थात हम सब स्वतंत्र नहीं आज भी हम सब परतंत्र है अर्थात गुलाम है जब हम गुलाम ही है तो हम स्वतंत्र और समर्थ कैसे हुए, अर्थात आज भी हमारी सरकारें भयभित और गुलाम हैं। वह स्वतंत्र नहीं है इसका मतलब यह कि केवल धन या संपदा के संग्रह या उसके उपभोग मात्र से हम में ज्ञान का विकास नहीं होता है। और ना ही उससे हम मृत्यु से ही मुक्त होते है तो फिर हम मुक्त कैसे होते है? और कैसे हम या हमारा राष्ट्र इस गुलामी से सेस्वतंत्र हो सकता है और कैसे हम अपने शत्रुओं को परास्थ कर सकते है? जैसा कि हम सब जानते हैं कि हम सब मरने वालें हैं और हमें किसी को मारने की जरुरत नहीं है जरुरत हैं। लोगो को मरने के लिए अकेला छोड़ दे और इंतजार करें की वह अपनी स्वेच्छा सें मर सके। 

    जिसके लिए हमें किसी हथियार की या परमाणु बम की जरुरत नहीं पड़ेगी, जरुरत है तो केवल ज्ञान की हैं। और वह ज्ञान हमें हैं हमें मरने की तैयारी करनी करनी होगी और जिसके साथ निर्भयता को धारण करना होगा, और हमें आपने शत्रु को मारने की जरुरत नहीं हैं नाही अपने मित्र को ही मित्र समझना है। क्योंकि मित्र भी छद्मबेष में शत्रु ही है हमें स्वावलंबी बनना होगा। हमें अपना निर्वाण करना होगा हममें जो अमरता हैं उसको प्राप्त करना है। और उसको समय की कसौटि के साथ परिक्षीत करना होगा। हमें तपस्वी बनना होगा। जैसा कि मंत्र कहता है "ऋतं च संत्य च चा भी तपसो ध्याजायत"

   आज हमारें समाज में जो रुग्ड़ता हैं या विकार हैं उसका कारण है अत्यधिक बिलाशता हमें अपने बिलासता का त्याग करना होगा। जिस प्रकार से अंग्रेज अपने संपन्नता के लिए अपने भोग विलास से संपन्न देश को छोड़ कर भारत में आये और धिरे धिरे भारत पर अपना कब्जा बना लिया। उनके अंदर जो सबसे बड़ी वस्तु पाइ जाती है वह अपनr नस्लता के प्रति सब कुछ दाव पर लगा देना। और आखिरी दम तक लड़ते रहना। जब तक कि सफलता उनके कदमों को नहीं चुम लेती है। तो सबसे पहले हमें उनसे ही लड़ना होगा आज हमारी जो सबसे बड़ी शत्रु हैं, वह अंग्रेज और अंग्रेजियत हैं इससे जब तक हम मुक्त नहीं होगें। 

   तब तक हम एक दुसरें को मारते रहेंगे, यद्यपि आज जो भी दूनिया में सद्गुण और उत्साह या विजेता का गुण हैं। वह सब हमारें द्वारा ही उन्हें प्राप्त हुआ और हम सब अपने स्वयं के ज्ञान से दूर होगये हैं। और हमारी सरकारें उनसे ज्ञान को खरिद कर भारतिय बना रही यह उसी प्रकार से हैं जैसे कि जो प्राणी मछली में रहने के लिये निर्मित किया गया हैं। उसको जंगल औऱ पहाड़ियों पर रहने के लिए विवश कर रहें हैं। चाइना इतना बड़ा देश हैं लेकिन उसके उपर कभी किसी राष्ट्र नें कब्जा नहीं किया हैं। उसके पिछे कारण हैं अपनी नस्लता के प्रति श्रद्धा और यह श्रद्धा जब तक हमारी स्वयं पर नहीं होगी तब तक हम सवतंत्र नहीं होगे। और नाही किसी के द्वारा मृत्यु से ही दूर हो सकते है।

    हमें मरना होगा स्वयं के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए, हमें हमारें पागलपन को विकसीत करना होगा। इन दुनिया के पागलों पर विजय प्राप्त करने के लिए और हमारे शत्रुओं को परास्थ करने के लिए सर्वप्रथम यही अज्ञान हैं। की हम स्वयं को हाड़ मान्स का पिजंड़ समझते हैं। जबकी सत्य और ज्ञान यह हैं कि हम शरीर नहीं है हमारे अंदर एक दिव्य शक्ती है जिसको विकसीत करना होगा। जिसके कारण एक समय ऐसा था जब हम विश्व के गुरु कहलाते थे और आगे भी संभव होगा जब हम स्वयं के अस्तित्व से संबंध स्थापित करने में समर्थ होते हैं।
मनोज पाण्डेय  
ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान 
वैदिक विश्वविद्यालय 
             ब्रह्मपूरा                                          

सोमवार, 24 सितंबर 2018

यजुर्वेद प्रथम अध्याय मंत्रा

 

ओ३म्  इ॒षे त्वो॒र्जे  त्वा॑ वा॒यव॑ स्थ दे॒वो वः॑ सवि॒ता प्रार्प॑यतु॒ श्रेष्ठ॑तमाय॒ कर्मण॒ऽआप्या॑यध्वमघ्नया॒ऽइन्द्रा॑य भा॒गम्प्र॒जाव॑तीरनमी॒वाऽय॒क्ष्मा मा व॑स्तेनऽईशत॒ माघꣳश सो ध्रु॒वाऽअ॒स्मिन॒ गोप॑तौ स्यात ब॒ह्वीर्यज॑मानस्य प॒शून्पा॒हि।। १।।

2.                       ओ३म् वसोः॑ प॒वित्र॑मसि॒ द्यौर॑सि पृथि॒व्य॒सि मात॒रिश्व॑नो घ॒र्मो॒ऽसि । वि॒श्वधा॑ऽअसि । प॒र॒मेण॒ धाम्ना॒ दृꣳहस्व॒ मा ह्वा॒र्मा ते॑ य॒ज्ञप॑तिर्ह्वार्षीत्।। २।।

3.                       ओ३म् वसोः॑ प॒वित्र॑मसि श॒तधा॑रं॒ वसोः॑ प॒वित्र॑मसि स॒हस्त्रधारम् । दे॒वस्त्वा॑ सवि॒ता पु॑नातु॒ वसोः॑ प॒वित्रे॑ण श॒तधा॑रेण सु॒प्वा काम॑धुक्षः ।। ३।।

4.                       ओ३म् सा वि॒श्वायुः॒ सा वि॒श्वकर्मा॒ सा वि॒श्वधा॑याः । इन्द्र॑स्य त्वा भा॒ग सोमे॒नात॑नच्मि॒ विष्णो॑ ह॒व्यꣳरक्ष ।। ४।।

5.                       ओ३म् अग्ने॑ व्रतपते व्र॒तं च॑रिष्यामि॒ तच्छ॑केयं॒ तन्मे॑ राध्यताम् । इ॒दम॒हमनृ॑ता स॒त्यमुपै॑मि ।। ५ ।।

6.                       ओ३म् कस्त्वा॑ युनक्ति॒ स त्वा॑ युनक्ति॒ कस्मै॑ त्वा युनक्ति॒ तस्मै॑ त्वा युनक्ति। कर्म॑णे वां॒ वेषा॑य वाम् ।। ६।।

7.                       ओ३म् प्रत्यु॑ष्ट॒ꣳरक्षः॒ प्रत्यु॑ष्टा॒ऽअरा॑तयो॒ निष्ट॑प्त॒ꣳ रक्षो॒ निष्ट॑प्ता॒ऽअरा॑तयः ।। उ॒र्वन्तरि॑क्ष॒मन्वे॑मि ।। ७।।

8.                       ओ३म् धूर॑सि॒ धूर्व॒ धूर्व॑न्त॒ धूर्व॒ तं योऽस्मान धूर्वति॒ तं धूर्व॒ यं व॒यं धूर्वा॑मः। देवाना॑मसि॒ वह्नितम॒ꣳ सस्त्नि॑तमं॒ पप्रि॑तमं॒ जुष्ट॑तमं देव॒हूत॑मम् ।। ८।।

9.                       ओ३म् अह्रु॑तमसि हवि॒र्धानं॒ दृꣳहस्व॒ मा ह्वा॒र्मा ते॑ यज्ञप॑तिर्ह्वार्षीत् । विष्णु॑स्त्वा क्रमतामु॒रु वाता॒याप॑हत॒ꣳरक्षो॒ यच्छ॑न्तां॒ पञ्च॑ ।। ९।।

10.                 ओ३म् दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्रस॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम् । अ॒ग्नये॒ जुष्टं॑ गृह्राम्य॒ग्नीषोमा॑भ्यां जुष्टं॑ गृह्णामि ।। १०।।

11.                   ओ३म् भू॒ताय॑ त्वा॒ नारा॑तये॒ स्व॒रभि॒विख्येषं॒ दृꣳहन्तां॒ दुर्य्याः पृथि॒व्यामु॒र्वन्तरि॑क्षमन्वे॑मि पृथि॒व्यास्त्वा॒ नाभौ॑ सादया॒म्यदित्याऽउ॒पस्थेऽग्ने ह॒व्यꣳ र॒क्ष ।। ११ ।।

12.                 ओ३म् प॒वित्रे॑ स्थो वैष्ण॒व्यौ॒ सवि॒तुर्वः॑ प्रस॒व उत्पुना॒म्यच्छि॑द्रेण प॒वित्रे॑ण॒ सूर्य्यस्य र॒श्मिभिः॑ ।। देवी॑रापोऽअग्रेगुवोऽअग्रेपु॒वोग्र॑ऽइ॒मम॒द्य य॒ज्ञं न॑यताग्रे॑ यज्ञप॑तिꣳ सु॒धातुं॑ य॒ज्ञप॑तिन्देव॒युवम् ।। १२ ।।

13.                 ओ३म् यु॒ष्माऽइन्द्रो॑ऽवृणीत वृत्र॒तूर्ये॑ यू॒यमिन्द्र॑मवृणीध्व वृत्र॒तूर्ये॒ प्रोक्षि॑ता स्थ । अ॒ग्नये त्वा॒ जुष्टं॒ म्प्रोक्षा॑म्य॒ग्नीषोमा॑भ्यां त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑मि । दैव्या॑य कर्म॑णे शुन्धध्वन्देवय॒ज्यायै॒ यद्वोऽशु॑द्धा पराज॒ध्नुरि॒दं व॒स्तच्छु॑न्धामि ।। १३।।

14.                ओ३म् शर्मा॒स्यव॑धूत॒ꣳ रक्षोऽव॑धूता॒ऽअरा॑त॒योऽदित्या॒स्त्वग॑सि॒ प्रति॒ त्वादि॑तिर्वेत्तु । अद्रि॑रसि वानस्प॒त्यो ग्रावा॑सि पृ॒थुबु॑ध्नः॒ प्रति॒ त्वादि॑त्या॒स्त्वग्वे॑त्तु ।। १४।।

15.                 ओ३म् अ॒ग्नेस्त॒नूर॑सि वा॒चो वि॒सर्ज॑नं देववी॑तये त्वा गृह्णामि बृहद्ग्रा॑वासि वानस्प॒त्यः सऽइदं देवेभ्यो॑ ह॒विः श॑मीष्व सु॒शमि॑ शमीष्व । हवि॑ष्कृ॒देहि॑ हवि॑ष्कृ॒देहि॑ ।। १५।।

16.                 ओ३म् कु॒क्कु॒टोऽसि॒ मधु॑जिह्व॒ऽइष॒मूर्ज॒माव॑द॒ त्वया॑ व॒याꣳ सं॑घा॒तꣳ सं॑घा॒तं जैष्म व॒र्षवृ॑द्धमसि॒ प्रति॑ त्वा व॒र्षवृ॑द्ध वेत्तु॒ परा॑पूत॒ꣳ रक्षः॒ परा॑पूता॒अरा॑त॒योप॑हत॒ꣳ रक्षों वा॒युर्वो॒ विवि॑नक्तु दे॒वो वः॑ सवि॒ता हिर॑ण्यपाणिः॒ प्रति॑ गृभ्णा॒त्वच्छि॑द्रेण पा॒णिना॑ ।। १६।।

17.                 ओ३म् धृष्टिर॒स्यपाग्नेऽअ॒ग्निमा॒मादं॑ जहि॒ निष्क्र॒व्याद॑ꣳ से॒धा दे॑व॒यजं वह। ध्रु॒वम॑सि पृथि॒वीं दृ॑ꣳह ब्रह्म॒वनि॑ त्वा क्षत्र॒वनि॑ सजात॒वन्युप॑दधामि॒ भ्रातृ॑व्यस्य व॒धाय॑।। १७।।

18.                 ओ३म् अग्ने॒ ब्रह्म॑ गृभ्णीष्व ध॒रुण॑मस्य॒न्तरि॑क्षं दृꣳह ब्रह्म॒वनि॑ त्वा क्षत्र॒वनि॑ सजात॒वन्युप॑दधामि॒ भ्रातृ॑व्यस्य व॒धाय॑। ध॒र्त्रमसि॒ दिवं॑ दृꣳह ब्रह्म॒वनि॑ त्वा क्षत्र॒वनि॑ सजात॒वन्युप॑दधामि॒ भ्रातृ॑व्यस्य व॒धाय॑ । विश्वा॑भ्य॒स्त्वाशा॑भ्यऽउप॑दधामि॒ चित॑ स्थोर्ध्व॒चितो॒ भृगू॑णा॒मङ्गि॑रसां॒ तप॑सा तप्यध्वम् ।। १८।।

19.                 ओ३म् शर्मा॒स्यव॑धू॒तꣳ रक्षोऽव॑धूता॒ऽअरा॑त॒योदि॑त्या॒स्त्वगसि॒ प्रति॒ त्वादि॑तिर्वेत्तु। धि॒षणा॑सि पर्व॒ती प्रति॒ त्वादि॑त्या॒स्त्वग्वे॑त्तु दि॒वः स्क॑म्भ॒नीर॑सि धि॒षणा॑सि पार्वते॒यी प्रति॑ त्वा पर्व॒ती वे॑त्तु।। १९।।

20.              ओ३म् धा॒न्य॒मसि धिनु॒हि दे॒वान्प्रा॒णाय॒ त्वोदा॒नाय॑ त्वा व्या॒नाय॑ त्वा। दी॒र्घामनु॒ प्रसि॑ति॒मायु॑षे धान्दे॒वो वः॑ सवि॒ता हिर॑ण्यपाणिः॒ । प्रति॑गृभ्णा॒त्वच्छि॑द्रेण पा॒॒णिना॒ चक्षु॑षे त्वा म॒हीनां॒ पयो॑ऽसि ।। २०।।

21.                 ओ३म् दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेश्विनो॑र्बा॒हुभ्या॒म्पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्।। सं व॑पा॒मि समाप॒ऽओष॑धीभिः॒ समोष॑धयो रसे॑न। सꣳ रे॒वती॒र्जग॑तीभिः पृच्यन्ता॒ᳬ सम्मधु॑मती॒र्मधु॑मतीभिः पृच्यन्ताम्।। २१।।

22.              ओ३म् जन॑यत्यै त्वा॒ संयो॑मी॒दम॒ग्नेरि॒दम॒ग्नीषोम॑योरि॒षे त्वा॑ घ॒र्मो॒सि वि॒श्वायु॑रु॒रुप्र॑थाऽउ॒रु प्र॑थस्वो॒रु। ते॑ यज्ञप॑तिः प्रथताम॒ग्निष्टे त्वचं॒ मा हिंꣳसीद्दे॒वस्त्वा॑ सवि॒ता श्र॑पयतु॒ वर्षि॒ष्ठेधि॒ नाके॑ ।। २२।।

23.              ओ३म् मा भे॒र्मा सँवि॑क्था॒ऽअत॑मेरुर्य॒ज्ञोऽत॑मेरु॒र्यज॑मानस्य प्र॒जा भू॑यात्त्रि॒ताय॑ त्वा द्वि॒ताय॑ त्वेक॒ताय॑ त्वा ।। २३।।

24.              ओ३म् दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्रे॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्याम्पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। आद॑देऽध्वर॒कृतं॑न्दे॒वेभ्य॒ऽइन्द्र॑स्य बा॒हुर॑सि दक्षि॑णः स॒हस्त्र॑भृष्टिः श॒तते॑जा वा॒युर॑सि ति॒ग्मते॑जा द्विष॒तो व॒धः ।। २४।।

25.              ओ३म् पृथि॑वि देवयज॒न्योष॑ध्यास्ते॒ मूल॒म्मा हिंꣳसिषं व्रजङ्ग॑च्छ गोष्ठानंवर्ष॑तु ते॒ द्यौर्बधा॒न दे॑व सवितः पर॒मस्या॑म्पृथि॒व्याꣳ श॒तेन॒ पाशै॒र्योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यञ्च॑ व॒यन्द्वि॒ष्मस्तमतो॒ मा मौ॑क् ।। २५।।

26.              ओ३म् अपा॒ररुं॑ पृथि॒व्यै देव॒यज॑नाद्वध्यासँव्र॒जङ्ग॑च्छ गो॒ष्ठानं॒वर्ष॑तु ते॒ द्यौर्ब॑धा॒न दे॑व सवितः पर॒मस्या॑म्पृथिव्याᳬ श॒तेन॒ पाशै॒र्योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒य द्विष्मस्तमतो॒ मा मौ॑क् । अर॑रो॒ दिव॒म्मा प॑प्तो द्र॒प्सस्ते॒ द्याम्मा स्क॑न्व्रजङ्ग॑च्छ गो॒ष्ठानंवर्ष॑तु ते॒ द्यौर्ब॑धा॒न दे॑व सवितः पर॒मस्या॑म्पृथि॒व्याᳬ श॒तेन॒ पाशै॒र्योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यञ्च॑ व॒यं द्वि॒ष्मस्तमतो॒ मा मौ॑क् ।। २६।।

27.              ओ३म् गा॒य॒त्रेण त्वा॒ छन्द॑सा परि॑गृह्णामि॒ त्रैष्टु॑भेन त्वा॒ छन्द॑साॱ परि॑गृह्णामि॒ जग॑तेन त्वा॒ छन्द॑सा॒ परि॑गृह्णामि॒ । सु॒क्ष्मा चा॑सि शि॒वा चासि स्यो॒ना चासि॑ सुषदा॑ चा॒स्यू॑र्ज॑स्वती॒ चासि॒ पय॑स्वती च ।। २७।।

28.              ओ३म् पु॒रा क्रू॒रस्य॑ वि॒सृपो॑ विरप्शिन्नुदा॒दाय॑ पृथि॒वीञ्जी॒वदा॑नुम्। यामै॑र॑यँश्च॒न्द्रम॑सि स्व॒धाभि॒स्तामु॒ धीरा॑सोऽअनु॒दिश्य॑ यजन्ते। प्रोक्षणी॒रा॒सा॑दय द्विष॒तो व॒धो॒ऽसि ।। २८ ।।

29.              ओ३म्   प्रत्युष्ट॒ꣳ र॒क्षः प्रत्यु॑ष्टा॒ऽअरातयो॒ निष्ट॑प्प्त॒ꣳ रक्षो॒ निष्ट॑प्ता॒ऽअरा॑तयः। अनि॑शितोऽसि सपत्न॒क्षिद्वा॒जिनं॑ त्वा वाजे॒ध्यायै॒ सम्मा॑र्ज्मि। प्रत्यु॑ष्ट॒ꣳ रक्षः॒ प्रत्यु॑ष्टा॒ऽअरा॑तयो॒ निष्ट॑प्त॒ꣳ रक्षो॒ निष्ट॑प्ता॒ऽअरा॑तयः। अनि॑शितासि॒ सपत्न॒क्षिद्वा॒जिनी॑न्त्वा वाजे॒ध्यायै॒ सम्मार्ज्मि ।। २९।।

30.              ओ३म् अदि॑त्यै॒ रास्ना॑सि॒ विष्णो॑र्वे॒ष्पो॒स्यू॒॑र्जे त्वाऽद॑ब्धेन त्वा॒ चक्षु॒षाव॑पश्यामि। अ॒ग्नेर्जि॒ह्वासि॑ सु॒हूर्दे॒वेभ्यो॒ धाम्ने॑ धाम्ने मे भव॒ यजु॑षे यजुषे ।। ३०।।

31.                 ओ३म् स॒वि॒तुस्त्वा॑ प्रस॒वऽउत्पु॑ना॒म्यच्छि॑द्रेण प॒वित्रेण सूर्यस्य र॒श्मिभिः॑। स॒वि॒तुर्वः॑ प्र॒स॒वऽउत्प॑ना॒म्यच्छि॑द्रेण पवि॒त्रे॑ण सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑ । तेजो॑सि शु॒क्रम॑स्य॒मृत॑मसि॒ धाम॒ नामा॑सि प्रि॒यन्दे॒वाना॒मना॑धृष्टं देव॒यज॑नमसि ।। ३१।।
इति प्रथमोऽध्यायः


रविवार, 23 सितंबर 2018

मृत्यु भयभित कर रही हैं, क्योंकि जीवन में आनंद दिख रहा है।

 


मृत्यु और जीवन—ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भारतीय दर्शन और शास्त्रों में इन दोनों के बीच के संबंध को अत्यंत गहनता से समझाया गया है। यहाँ मृत्यु के भय से मुक्ति और जीवन के वास्तविक आनंद पर एक शास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत है:

मृत्यु का भय: एक अज्ञानता 

शास्त्रों के अनुसार, मृत्यु का भय (जिसे योग सूत्र में 'अभिनिवेश' कहा गया है) मनुष्य के पांच प्रमुख क्लेशों में से एक है। यह भय इसलिए होता है क्योंकि हम स्वयं को इस नश्वर शरीर के साथ जोड़ लेते हैं।

 * श्रीमद्भगवद्गीता का दृष्टिकोण: भगवान कृष्ण कहते हैं कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर प्राप्त करती है।
   
 * अतार्किकता: मृत्यु केवल शरीर का अंत है, आत्मा का नहीं। जब हम इस सत्य को आत्मसात कर लेते हैं कि हम 'अविनाशी' हैं, तो मृत्यु का भय स्वतः समाप्त होने लगता है।

जीवन का आनंद: वर्तमान में अस्तित्व

जीवन का आनंद भौतिक वस्तुओं के संग्रह में नहीं, बल्कि 'स्व' के बोध में है। उपनिषदों के अनुसार, हमारा मूल स्वरूप सच्चिदानंद (सत्य, चित्त और आनंद) है।

आनंद की प्राप्ति के मार्ग:

 * स्थितप्रज्ञता: सुख और दुःख में समान रहना ही जीवन का वास्तविक आनंद है। जब हम बाहरी परिस्थितियों पर अपनी खुशी निर्भर करना बंद कर देते हैं, तब आनंद का झरना भीतर से फूटता है।

 * निष्काम कर्म: फल की चिंता किए बिना कर्म करना जीवन को तनावमुक्त बनाता है। भय हमेशा भविष्य का होता है, जबकि आनंद केवल 'वर्तमान क्षण' में उपलब्ध है।
 * मुमुक्षुत्व (मुक्ति की इच्छा): यह समझना कि यह संसार एक रंगमंच है, हमें जीवन को एक खेल (लीला) की तरह जीने की शक्ति देता है।

भय से आनंद की ओर संक्रमण

मृत्यु का भय तब तक बना रहता है जब तक 'मोह' (Attachment) रहता है। जिस क्षण व्यक्ति यह समझ जाता है कि जो जन्म लेता है उसका अंत निश्चित है, वह मृत्यु को एक 'विश्राम' के रूप में देखने लगता है।


    मृत्यु का भय जीवन को संकुचित कर देता है, जबकि मृत्यु की स्वीकार्यता जीवन को गहराई प्रदान करती है। शास्त्रों का सार यही है कि "अमृतत्व" को पहचानो। जब मृत्यु का डर समाप्त होता है, तभी वास्तविक जीवन का प्रारंभ होता है। जिसे अपनी अमरता पर विश्वास है, उसके लिए मृत्यु केवल एक द्वार है, अंत नहीं।


     यहां तो हर एक इस संसार का आदमी चाहता हैं कि वह मरना नहीं चाहता हैं। भले ही उसका जीवन कितना दुःखों से भरा हो, हर आदमी जीना चाहता है। इसमें दो बातें है पहली बात यह है कि यह है कि कुछ लोग कहते हैं कि एक मार्ग ऐसा है जिसमें दुःख और मृत्यु नहीं हैं। 

     दूसरी बात यही जिस पर मैं चल रहा हुं वह मृत्यु का मार्ग है जिसमें मुझे बार-बार मुझ मेरी मृत्यु याद आती हैं वह कुछ ऐसा संकेत मेरे लिए देती है जिसको मैं बहुत चाहकर भी नहीं त्याग कर सकता हु, क्योंकि उसनें मेरे हृदय की गहराई में अपना स्थान बना लिया है। 

     इस संसार में हम देखते हैं दो तरह के आदमी है एक प्रसन्न और सुखी रहते हैं और दूसरें वह हैं जो दुखी और परेशान रहते हैं। वह हमारी श्रेणी में आते हैं। और भी ऐसा देखने में आता है कि लोग इस दुनिया में बहुत जल्दी सफलता को अर्जित कर लेते हैं और अपने होने का परचम लहरा देते हैं हवा में जिससे उनके होने के बारें में लग-भग सभी लोग जान जाते हैं। 

    जिसको प्रसिद्धी कहते हैं। और कुछ ऐसे होते हैं जो जमिन में उस वीज की तरह से होते हैं जो मिट्टी की गर्त अंधेरे में पड़े रहते हैं, जहां पर सूर्य का प्रकाश भी नहीं पहुंच पाता है।

    तो वहां पर ज्ञान कैसे पहुंच सकता हुं। लेकिन यदि उस बाीज में जीवन होता है तो वह अपने आप को खत्म करके भी एक अंकुर के रुप में जमिन के गहरे गर्त से बाहर आजाता है और अपने होने का प्रमाण दे देता हैं जिसको देख कर स्वयं सूर्य भी शर्माता है। ऐसा ही हमारें साथ भी होरहा हैं हम भी उस बीज की तरह से हैं जहां पर मेरे मरने का संकेत मुझको मेरा अस्तित्व दे रहा है, जिसका मतलब हैं कि मेरा पुनर्जन्म होने वाला हैं, मेरे अंदर से एक नविन अंकुर जमिन के गहरे गर्त से बाहर निकलने के लिए बेताब हो रहा है।

   जिसको मैं बहुत चाह कर रोक पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहा हुं। मुझे मेरा स्वयं का साथ देना चाहिए और अपने तबाही का तमाशा देख कर आनंद लेना चाहिए।

            मैं नहीं जानता कि मैं कोई ज्ञानी हुं और यह भी नहीं जानता की मैं कोई अज्ञानी हुं क्योंकि मैं जो महसूस कर रहा हुं उसमें परमआनंद मुझे मिल रहा हैं और मेरे लिये जीवन का आकर्षण और मृत्यु का भय भी आकर्षित नहीं करता हैं मैं तो दोनो के मध्य में खड़ा हो कर परम दिव्य रस में डुब रहा हुं। मेरे लिए मेरी मृत्यु भी मेरे लिए एक संदेश ले कर आरही है जिसमें मेरे अंकुरण की संभावना मुझे दिखाई दे रही है। और यदि मेरे पास जीवन भी रहता है तो उसके लिए भी मैं पूर्ण रूप से तैयार हुं, और इस जीवन में उस परमज्ञान को प्रकाशित करने के लिए बेताब हु जीवन का अंकुर मुझे दोनो तरफ दिखाई दे रहा है।

     एक तरफ स्वयं परमेंश्वर पैदा हो रहा है दुसरी तरफ मैं स्वयं ईश्वर को पैदा कर रहा हुं। मुझे तो मेरे दोनो तरफ ईश्वर के कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। कही भी मुझे मेरा अंत नही दिखाई देरहा है । इसलिए मुझे किसी प्रकार की चिंता करने का जरुर नहीं है। मुझे तो हर तरफ से अपने आनंद को चारो तरफ बाटंने चाहिए जिससे मेरे होने का सबुत इस दूनिया को मिल सके, और यह दुनिया मेरे समान पर आनंद को प्राप्त कर सके, वह तो बहुत आसान है। कठिन तो हमने उसको बना रखा है क्योंकि हम स्वयं को किसी जड़ वस्तु से बांध रखा है यह संसार जड़ हैं और हमें अपनी जड़ता से बांध रहा हैं जबकि हम एक नदी कि धारा के समान हैं जो सागर कि तरफ दौड़ रही है यदि वह रास्ते के रेगिस्तान में ही सुख जाती हैं तो भी वह जमिन के अंधेरे गर्त से होते हुए सागर की तलहटी तक अवश्य पहुंच जायेगी भले ही लोग उसको पुरी तरह से ना देख पाये। 

    इस तरह से मैने जान लिया हैं कि मेरा ना कहीं पर अंत नहीं हैं और ना ही कहीं पर मेरा प्रारंभ ही होरहा है। क्योंकि जो पैदा होता है वह मरता हैं अभी तक तो मैं स्वयं को इस जड़ संसार में पैदा भी नहीं कर पाया हुं जिसने स्वयं को इस संसार में जन्म करा लिया हैं जिसको लोगों ने जाना और उनके जन्म का आनंद भी मनाया है उनको ही उनके मरने का शोक भी मनाना पड़ेगा। तो इस प्रकार से इस संसार में स्वयं के प्रसिद्धी का आनंद लुट रहें हैं उन्हें अपने मरने के आनंद को भी लुटने के लिए तैयार रहना चाहिए.। तो जो संसार में प्रसिद्ध नहीं हैं वह अपनी अप्रसिद्धि के लिए दुःखी नहीं होगा ।  
         

बुधवार, 12 सितंबर 2018

ब्रह्मचर्यामृत स्वामी ओमानंद सरस्वती



ओ३म्
ब्रह्मचर्यामृत
अर्थात्
जीवन - संदेश
दुखी की पुकार
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आ सुव । (यजुर्वेद अ. 30 मन्त्र 03)

         इस पवित्र वेदवाणी के द्वारा ईश्वर का एक सच्चा भक्त प्रेम से गद् गद् हो कर प्रेममय प्रभु से प्रार्थना करता है- हे दयालु देव ! आप ही संसार के कर्ता धर्ता और हर्ता हैं । मेरे सब दुर्गुण, दोष कुटिल (बुरी आदतें)  तथा सब दुःखों को दुर करो। यही नहीं, किन्तु जितने सद्गुण (अच्छी आदतें ) तुझमें हैं- मैं उन सब का भण्डार बन जाऊं । जिससे सच्चे सुख और परमानंद की प्राप्ति कर सकूं ।
किसी कवी ने कहा है-
हे जगदिश्वर दोष  हमारे सगरे दूर भगादो ।
जितने सद्गुण जगत् बिच हैं हमरे संग लगा दो ।।
हम औरों के दोष ना देखें अपने दोष विचारें।
निंदा करें ना कभी किसी की यही एक गुण धारें ।
        यदि संसार इस प्रार्थना के अनुसार चले तो सिघ्र ही स्वर्ग धाम बन  जाये । किंतु बने कैसे? जब बीज में ही दोष हो तो मिठे फल कहीं आकाश में से पक कर आजायें? भला चाहते हो तो ऋषियों की सरण में आओ और 'मातृमान पितृमान् आचार्यवान पुरुषो वेदके अनुसार चलो । फिर देखों, आनंद ही आनंद है, धन्य है वह संतान जिसके माता-पिता सदाचारी, विद्वान और धार्मिक हैं, जो गर्भाधान से लेकर पुरी विद्या होने तक धर्म और सदाचार का ही उपदेश और शिक्षा देते हैं। इतना ही नही, किंतु देव भुमी गुरुकुल में पूर्ण विद्वान धार्मिक और सदाचारी अध्यापक और गुरुओं द्वारा अपनी संतान को शिक्षा देते हैं । तब जाकर बालक दूर्गुणों (बुरी आदतों) से बच कर धर्मात्मा और सुखी हो सकते हैं। नहीं तो कितने ही पापड़ बेलो कुछ भी नहीं बनेगा। ये कच्चे बीज के फल पकने से पुर्व धड़ाम से निचे गीर सड़ कर केवल दुःख का ही कारण होंगे, इनसे मिठास या स्वाद आये तथा शक्ती और बल प्राप्त हो ऐसी आशा करना मुर्खता ही है, हम लोगों के बच्चे भारत माता की स्वाधिनता की रक्षा कर राम राज्य बतायेंगे, फिर से भारत भुमि को प्राचिन गौरव प्राप्त करायेंगे ऐसी आशा करना उपहास मात्र ही है, हम तो इतने निर्बल हैं कि उठते बैठते तो आँखों के सामने अंधेरा दिखता है, जवानी दूर भागती हैं और भुढ़ापे को बुलाती है। बल शक्ती और सुंदरता हमारे पास रहती हुई शर्माती तेज शाहस विरता हमें नमस्ते कह कर भाग गये हैं। हम भारत के सपुत सोये हुए हैं, किन्तु दुनिया के सब लोग जाग गये हैं हमारे देश में पापों की भर मार है और हमारा जीवन दुःख मय और भार है ।
      किंतु इसमें हमारा आपराध ही क्या है? न तो हमें माता - पिता ही धार्मिक मिले न ही सच्चे गुरुओं की शिक्षा मिली, अरे भाई कहां सच्चे गुरु और जीवन की शिक्षा ? यहां तो जैसे मुर्ख किसान प्रातःकाल अपने पशुओं के रस्से खोल देते हैं वे सांयकाल तक भुखे रहें वा प्यासे रहें, किसी की हानी करें, वा लाभ करें कोई देख भाल नहीं बर्ताव, नहीं, किंतु उससे बुरा, अपने जीगर के टुकड़ों- प्राणों से प्यारे बच्चों के साथ हमारे माता-पिता करते हैं न कुछ सिखाते हैं । और न पढ़ते हैं कहा धर्म और सदाचार की शिक्षा हम तो गलियों में फिरते-फिरते एवं निच और दुराचारी साथियों के साथ खेलते कुदते ना जाने कितने दुर्गुण (बुराइयां)पल्ले बांध लेते हैं, बालको का हृदय कोमल और स्वभाव सरल होता है, कुसंग की दल-दल में फंस जाता हैं और दुर्गुणों को सद्गुण समझ कर अपनी झोली भर लेता है। पहिले-पहिले बुराई भी भलाई लगती है । भला बनने में दुःख और कष्ट भी प्रतित होता हैं । यही नहीं, बालक बेचारें को बुराई भलाई का ठीक ज्ञान ही कहां होता हैविष को अमृत समझ कर खा बैठता है।
     प्रथम तो माता-पिता ने शिक्षा नहीं दी । दूसरे गली-कुचों के कुंसग की मार पड़ी । तीसरे आज कल के भारतीय स्कूलों में दुर्भाग्य वश अनेक दुराचारी अध्यापक भी आजाते हैं जिसके संग से बच्चे बिगड़ जाते हैं । इसका कारण कुछ तो देश की नैतिक दृष्टी से ही हिन अवस्था है। और कुछ यह भी है कि अध्यापको को बहुत कम वेतन मिलता है जिससे कि अच्छे और बुद्धिमान व्यक्ति अन्य पदों पर चले जाते हैं। यह सब जानते हैं कि यह अर्थ युग है । प्राचीन युग के समान केवल निर्वाह-मात्र ले कर संतुष्ट हो जाने वाले ब्राह्मण वृत्ती के अध्यापक आज कल विरले ही होते हैं । जिन्हें कहीं अनयत्र स्थान नहीं मिलता वे विवश हो कर स्कूलों में आजाते हैं, । अब देश स्वतंत्र है । राज्य को चाहिए कि अध्यापको को समुचित वेतन एवं मान दे । इनका कार्य बड़े उत्तरदाइत्व का है । अच्छे अध्यापक अवश्य आदरणीय हैं , वे भावी राष्ट्र के नेताओं के निर्माता हैं ।
     गुण्डे निच छात्रों के चंगुल से बचना टेड़ी खिर है । शायद ही कोई शौभाग्यशाली बालक बचता होगा, इनके पवित्र जीवन पर वे भयंकर धब्बे (दाग) लग जाते हैं, जो यत्न करने पर अनेक जन्मों तक नहीं धुलते परमात्मा वह शुभ दिन लाये जब हमारें स्कुल आदि शिक्षणालयों में चरित्र हिनता और गंदगी मिटे । यही सच्चे गुरुकुल और शिक्षणालय बनें ।
     यह एक दुःख की पुकार और करुण-क्रदन (रोना) है । मैं सताये हुए होनहार बालकों और युवको को एक अमृत पिलाना चाहता हुं । आपका दुःख मेरा दुःख है, यही समझ भेट देना चाहता हुं । आप श्रद्धा से स्विकार कर इसका सेवन और पान करें, यही इसका मुल्य हैं । यही अचुक और ओमघ औषधि है, इसे खाओ संजीवनी बुटी है, अंदर जाते ही सब रोग दूर होगें, आरोग्यता बढ़ेगी, निर्मलता और पाप चकनाचुर होगें, सुन्दरता सरसायेगी, और बुद्धि भी पराक्रम दिखलायेगी, बल और नवजीवन आयेगा । शरीर पर लाली और मुख पर तेज चम-चमायेगा । इसके सेवन से बुढ़े जवान होगें, और बालक पहलवान होगें, मुर्ख विद्वान होंगें । यदि मृत्यु भी आयेगी तो चार ठोकर खा कर दूर जायेगी । नव युवको ! आपको तो वह आनंद आयेगा जिसको यह वाणी कह नहीं सकती है । और लेखनी लीख नहीं सकती । यह तो गुंगें के लिए मिश्री का स्वाद है,  जो चखेगा सो जानेगा ।
   आप औषध (नुस्खा) पुछना चाहेंगे ।
   भाई! यह किसी टटपुंजिये वैद्य और ऐरे-गैरें-नत्थु-खेरे की पिसी पिसाई औषध नहीं, यह एक महान् संदेश है । यह प्राचीन भारत का जीवन संदेश हमें गंगा-यमुना की मन-लुभावनी लहरों की अनवरत कल-कल ध्वनी से मिलता है । अरण्य की निरव सुंदरता हिमालय की हिमाच्छादित गुफांये, तपस्वियों के तपस्यामय आश्रम जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर संदेश सुना रहें है । कमी है सुनने वालों की सुनो ! यह आदि श्रृष्टी का संदेश है । क्या इसे अब भी आप नहीं समझें ? लो स्पष्ट सुनलो , कान खोल कर सुन लो । फिर न कहना कि हमें पता नहीं चला यह वह संदेश है, जो इस युग के विधाता सच्चे आजीवन ब्रह्मचारी महर्षि दयानंद जी महाराज ने पुनः संसार को दिया । यह संदेश अमर संदेश है । इस पर अमरता की छाप (मोहर) महर्षि ने ही लगाई है । यह अमृत रूपी संदेश है, ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्य !!  ब्रह्मचर्य !!! इसे सुनो और संसार के कोने-कोने में सुना दो ब्रह्मचर्यामृत को सारी आयु भर स्वाद ले-ले कर औऱ घुंट-घुंटकर पीयों और इसे पीकर परशुराम, हनुमान, भीष्म, शंकर और दयानंद के समान अमर हो जाओ ।
                                            ब्रह्मचर्य क्या है ?
     ब्रह्मचर्य क्या है? जब तक इसे ठीक-ठीक ना समझ लिया जाये तब तक इससे पूर्ण लाभ उठाना और ब्रह्मचर्य की रक्षा करना असंभव है ।
    ब्रह्मचर्य यह दो शब्दों से बना है ।
    1. ब्रह्म- इसका अर्थ है- ईस्वर, वेद, ज्ञान व वीर्यादि
    2. चर्य- इसका अर्थ है- चिंतन, अध्यन, उपार्जन, और रक्षणादि
    इस प्रकार ब्रह्मचर्य के-
1 ईश्वर- चिंतन,  2 वेदाध्यन, 3 ज्ञान  (विद्या) उपार्जन, 4 वीर्य-रक्षण आदि अर्थ में
   इन सब का परस्पर घनिष्ट (गहरा) संबंध है । वैसे ब्रह्मचर्य का नाम लेतेही लोगो को हृदय में वीर्य रक्षा का भाव उठता है । इसी को ही लोग ब्रह्मचर्य समझते हैं, किंतु एक ही साथ ईश्वर चिंतन करना, वेद पढ़ना, ज्ञान औऱ विद्यादि की प्राप्ती करना तथा वीर्य रक्षा करने का नाम ब्रह्मचर्य है । जो मनुष्य वीर्य की रक्षा नहीं करता औऱ विषय भोगों में फंसा रहता है, वह वेद का अध्यन, विद्योपार्जन, और ईश्वरचिंतन कभी नहीं कर सकता । शरीर, मन और आत्मा को पूर्ण शक्तीशाली और बलवान् बनाना और किसी प्रकार इनकी शक्तीयों का ह्रास और नाश न होने देना ही ब्रह्मचर्य है। इन तीनो में से किसी एक की भी शक्ती का नाश हुआ तो वह ब्रह्मचर्य संपूर्ण नहीं अधुरा हैं । अतः शारीरिक मानसिक और आत्मिक शक्तीयों को पूर्ण उन्नत और विकसीत करो, यह कैसे होगा? ब्रह्मचर्य पालन से ब्रह्मचर्य का स्थुल (मोटा) रूप वीर्यरक्षा है ।                                                               
                                                 वीर्य क्या है ?
     पहिले इसे समझलें ,फिर इसकी रक्षा का प्रश्न होगा । जो भोजन हम प्रतिदिन करते हैं उसका पेट में जाकर पहले रस बनता है जैसे पशुओं के शरीर में दूध बनता है वैसे ही भोजन का असली सार शरीर में रहता है । उसी से रसादि धातुएं बनती है । भोजन का जो स्थूल (खराब) भाग होता है , वह मल मूत्रादि गन्दगी के रूप में शरीर से निकलता रहता है । रस फिर से जठराग्नि में पकने के लिए जाता है इससे पककर रक्त बनता है । इसी प्रकार क्रमशः एक के बाद एक, रक्त से मांस (गोश्त), मांस से मेद (चर्बी)  , मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से वीर्य सातवीं धातु बनती है। प्रत्येक धातु के बनने में पांच दिन से अधिक समय लगता है। वीर्य को तैयार करने में शरीर के यन्त्रों (मशीन) को विशेष परिश्रम करना पड़ता है।  इसमें तीस दिन से अधिक समय लगता है। तब कहीं यह मनुष्य का बीज (वीर्य) तैयार होता है सौ बूंद रक्त (खून) से एक बुंद वीर्य बनता है । लगभग जो भोजन एक मन की मात्र में किया जाता है उससे एक सेर रक्त (लहू) बनता है। एक सेर रक्त से एक तोला से कम वीर्य तैयार होता है। यदि एक तोला वीर्य शरीर से निकल जाय तो एक सेर खून अर्थात एक मन भोजन का सार नष्ट हो गया । एक बार की कुचेष्टा वा व्यभिचार से जो वीर्य-पात (नष्ट) होता है, वह एक तोले से अधिक ही होता है। एक बार के वीर्य से दस दिन की आयु घटती है, अतः हमारे पूर्वज वीर्यरक्षा में जी-जान से लगे रहते थे। यही तो बात है की पुराने  समय में हमारे देश में सौ वर्ष से पूर्व कोई मरता न था । अकाल वा बाल मृत्यु कोई  जानता भी न था । यह तो शरीर का बल है। वीर्य की अग्नि मृत्यु के पंखों को (पैरों) को भी जला डालती है । जिसका शरीर वीर्य से भरा है, उसे मृत्यु का भय कैसा? अतः वीर्य रक्षा करो और भीष्म और दयानन्द के समान मृत्युंजय (मृत्यु को जीतने वाला) बनो । 
वीर्य रक्षा का प्रताप
    176 वर्ष का ब्रह्मचारी भीष्म कुरूक्षेत्र के मैदान में वह घमासान युध्द मचाता है कि प्रतिदिन दस-दस हजार सैनिकों को वीरगति प्राप्त कराता है । ऐसी अवस्था देख सारा पाण्डव-दल घबराता है। पाण्डव योगश्वर कृष्ण को नेता बना भीष्म की शरण में आते हैं । उसी से अपनी विजय का उपाय गिडगिडाकर पूछते हैं । भीष्म की उदारता और धर्मप्रेम से पाण्डवों को उनके मरने का ढंग और रीति मिल जाती है शिखण्डी को आगे खडा करके अर्जुन निहत्य भीष्म पर तीर बरसाता है और अपनी वीरता के जौहर दिखाता है । भीष्म का शरीर छलनी हो जाता है वे शरशय्या पर ही लेट जाते है । तीरों से बिंधे प्रतिदिन रणभूमि में हि पुत्र - पौत्रों को उपदेशामृत का पान कराते है मृत्यु बार - बार आती है , परन्तु ब्रह्मचारी से डरकर उलटे पैरों भाग जाती है । ब्रह्मचारी आज्ञा देता है, अभी शीतकाल है सूर्य दक्षिणायन मे है, लगभग तीन मास पीछे ग्रीष्मकाल (गर्मी) में सूर्य उत्तरायण में आयेगा तभी यह ब्रह्मचारी शरीर को छोड़कर स्वर्गधाम को जायेगा । हुआ भी यही ,जब तीन मास पिछे ग्रीष्म- ऋतु आई, तभी उन्होंने स्वेच्छा से शरीर छोड़ा और मोक्षपद पाया । आज भी सारे संसार के लोग श्रद्धा से उनके गुण गाते हैं! उनकी सन्तान न थी, फिर भी ब्रह्मचर्य की ही तप के कारण सारे जगत् के पितामह (दादा) कहलाते हैं।
     सच्चे ब्रह्मचारी मह्रर्षि दयानन्द का आदर्श जीवन भी हमारे सन्मुख है । वह आजीवन ब्रह्मचारी रहे । भयंकर से भंयकर कष्ट हसंते-हसते सहे । नीच धुर्तों ने भोजन आदि में उन्हें सोलह बार विष खिलाया । धन्य-धन्य ब्रह्मचारी, तेरा तो विष भी कुछ न बिगाड़ सका । तूने हलाहल को भी निष्प्राण कर दिखाया। जब अन्तिम बार जोधपुर में नीच जगन्नाथ व धोलमिश्र ने कांच वा विष मिलाकर ऋषि को दुध पिलाया, तो वह फुंट-फुट कर शरीर से निकलने लगा। उस अवस्था को देख कर डाक्टर सुरजमल भी घबराये और चिल्ला उठे कि ऐसा भयंकर विष दिया गया है कि किसी अन्य पुरुष को दिया जाता तो पांच मिनट में ही मर जाता । ऋषिवर! आप तो शरीर की चिन्ता से ऊपर उठ चुके थे , न आपको जीने की इच्छा थी न मरने का भय । अपने विष देने वाले घातक को बुलाया । उसका पाप उसको समझाया । हे दया के भण्डार ! तूने उसे अपने पास से थैली देकर सपरिवार नेपाल पहुंचाया । धन्य हो ब्रह्मचारी ! तूने मौत भी उधार नही ली । आपने विष देनेवाले का नाम और भेद भी  किसी को नही बतलाया । इतना ही नही , जोधपूर महाराज के नीचे धूर्त डाक्टर अलीमर्दानखाँ ने आपको दवाई के रूप में प्रति दिन जहर खिलाया । प्रतिदिन सौ-सौ दस्त आये।  आंत कट-कट कर गीरने लगीं, फिर भी आपका मन नहीं घबराया । मृत्यु ने बार-बार आना चाहा तो आपने उसे ठुकराकर एक मास तक अपने से दूर ही बैठाया । अजमेर के विशाल नगरी में भक्त जनो ने आपको पहुंचाया । दिपमाला आपहुंची । सबने अपने-अपने दीपक जलाये । आपने अपना शरीररूपी  दिपक बुझा दिया, सब भक्त जन रोयें और चिल्लाये । आपने अंतिम समय में योगाभ्यास और प्राणायाम किया । ईश्वरस्तुती की और मन्द स्वर से वेद मंत्रो का गान किया, लोग रोयें ,किंतु तू हंसा  ! ईश्वर ! तूने अच्छी लिला की । तेरी इच्छा पूर्ण हो, तेरी इच्छा पूर्ण हो, तेरी इच्छा पूर्ण हो, यह कह कर नश्वर संसार से प्रयाण किया । तू ने इस मरी हुई आर्य जाती को जीवन दिया और इसकी डुबती हुई नैया को पार लगाया । तेरे इस मृत्यु के दृश्य ने गुरुदत्त को आस्तिक और ईश्वर का सच्चाभक्त बनाया । ब्रह्मचर्यके तप से ही परमपद की प्राप्ती की और मृत्युञ्जय कहलाया । प्रिय युवको ! तुम भी वीर्य की रक्षा करो, ऋषि के सम्मान अमरपद पाओगे और मृत्यञ्जय कहलाओगे।      
                                                                        सावधान!
      यह वीर्य शरीर में नौ दस साल की आयु में उत्पन्न होना आरंभ होता है। सौलह वर्ष की आयु में जब वृद्धि अवस्था आरंभ होती है तब खूब बढ़ता है। जब मनुष्य 25 वर्ष का होता है, तब युवावस्था (जवानी) आरंभ होती है। तब तक वीर्य तथा अन्य सब धातुएं बढ़ती हैं। यह समय मनुष्य के जीवन में बड़ा भयानक है। कुसंग के कारण काम-देवता भी इसी समय मुहं दिखाता है। जो बालक मन के पीछे चलकर कामवासना वा विषय भोग में फंस जाते हैं। वे अपना सर्वनाश करके सारी आयु रोते और पछताते है। उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। दुनिया के सभी रोग उन्हें आ घेरते हैं, उनकी आयु घट जाती है। इस आयु में वीर्य कच्चा होता है। यह इसलिए उत्पन्न नहीं होता कि इससे विषय भोग की इच्छा पुरी की जाए। यह इसलिए उत्पन्न होता है कि इसे फिर से खूब व्यायाम करके शरीर में पचाया जाए और बल और शक्ति का रूप धारण करें और शरीर का अंग बन जाए। इसलिए वृद्धि की अवस्था में "16 वर्ष की आयु से पुर्व कन्या और 25 वर्ष से पुर्व की आयु का जो लड़का वीर्यादी धातुओं का नाश करेगा, वह कुल्हाड़े से काटे वृक्ष और डण्डे से फुटे घड़े के समान अपने सर्वस्व का नाश करके  पश्चात्ताप करेगा । पुनः उसके हाथ में सुधार कुछ भी नहीं रहेगा ।" उसे स्वर्ग समान युवावस्था (जवानी) के दर्शन भी नहीं होंगे। जवान होनें पहले ही बूढ़ा होजायेगा । जीवन में वसन्त आने से पुर्व पतझड़ आजायेगा । हाय! कितने दुख की बात है कि सारे जीवन में सच्चा ब्रह्मचारी बनने के लिए केवल एक बार, निश्चय से एक बार ही अवसर मिलता है, यह भग्यहीन बालक उसे भी खो देता है।                                   
हमारे युवकों की दशा
       एक यात्री दुर देश में व्यापार करने के लिए जाता है। मार्ग मे निर्जन और बीहड़ जंगल आता हैं। पथिक चलते –चलते थक जाता हैं। विश्राम करने के लिए वृक्ष की छाया में सो जाता हैं। कुछ समय पीछे भूख और प्यास से व्याकुल होकर उठता हैं। अपनी गठरी देखता हैं तो कपडे और भोजन नही मिले। लंगूरों और बंदरों ने भोजन उठाकर खालिया। वस्त्र खाली पड़ा है । जलपात्र की और जाता है तो उसे भी खाली पाता है जल भी बन्दरों ने पीलीया, कुछ भूमि पर गीरा दिया अब कमर से बंधी रूपयों की थैली को देखता है तो वह भी नही मिलती ,उसी खोज मे इधर – उधर दौंड भाग करता है ,कोलाहल  करता है और रूदन मचाता है जिन चोर डाकुओं ने उसके रूपये लिये थे वे उसके शोर से पकड़े जाने के भय से आते हैं और उसका मुंह बन्द करने के लिए खूब डण्डे लगाते हैं और वह भूखा –प्यासा लुटा और मुहं पिटा सा रह जाता है रात्री हो जाती है चारों ओर जंगली पशुओं के घुर्घुराने के भयंकर शब्द सुनाई देते हैं । उसे अपनी रक्षा और जीवन का कोई उपाय और मार्ग नहीं दिखाई देता, चारों ओर भय और आतंक का साम्राज्य है,  जायें तो कहां जायें? ठिक उसी यात्री जैसी अवस्था आज हमारें देश के युवकों की है कुसंग मे फंसकर नष्ट और भ्रष्ट हो रहे है । वीर्य का कुछ भी मूल्य नही समझते । आंख खुलती है, तब रोते और पछताते है ।
एक मनुष्य के हाथ में एक शीशी है जिसमें 500 रूपये का बहुमूल्य इतर है । उससे पूछते हैं कि आप इसका क्या करोगे ? वह उत्तर देता है गन्दी नाली में डालूंगा । इसी प्रकार एक और मनुष्य, जिसके पास एक बहुमुल्य रत्न हीरा है उससे भी पूछते हैं कि इसका क्या करोगे ? वह उत्तर देता है की इसको बारिक पिसकर मिट्टी मं मिलाउंगा इन दोनो से भी मुर्ख और पागल हमारें देश के नव युवक और बालक हैं जो वीर्य जैसे अमूल्य - रत्न को जिसकी एक बुंद लाखों रुपये से भी बढ़ कर मुल्यवाली है, रात दिन अपने हाथों से हस्तमैथुन, पशुमैथुन, गुदामैथुन आदि पापों के द्वारा गंदी नालियों में डालते रहते है, यदि इसकी रक्षा करके ठीक समय पर खर्च किया जाये तो हनुमान, भीष्म, दयानंद, गांधी, सुभाष, जैसे देवताओं को जन्म लेना पड़ेगा।   
दुःखभरी  घटना
    किन्तु कुसंग में फंस कर हमारें बच्चें किस प्रकार से नष्ट होते हैं, यह दिखाने के लिए एक सच्ची घटना आपको सुनाता हुं, नाम लेना अच्छा नहीं है, स्कूल के विद्यार्थी ने अपनी करुणाजनक, दुःख भरी सच्ची कहानी सुनाई।
   " मैं जिस समय आठ वर्ष का था, कुसंग में फंस गया था । कई साथी स्वयं भी कुटेबों (कुचेष्टाओं) में फंसे थे । मुझे भी वह गुप्त पाप (बदकारी) गंदे नीचों ने सिखलादी । मैं कई वर्ष तक हस्तमैथुन अर्थात हाथों से नाश करता रहा । मैं बहुत सुंदर लड़का था । खाने पिने में भी चटोरा था । कई विद्यार्थी जो मेरी कक्षा में थे, मेरे से आयु में बड़े और शरीर से तगडे थे, वे बड़े नीच व गुण्डे थे । वे ऊपर से बडा प्रेम करते थे । मुझे अनेक बार पैसे देते, बजार से अच्छी अच्छी चीजें कर खिलातें और जब मैं उनकी बात नही मानता तो वे मुझे डराते और धमकाते, शनैः-शनैः-  उन्होनें ऐसे डोरे डाले की मुझे अपने जाल में फंसा ही लिया । कई  वर्ष तक  मुझे खुब खराब किया । उन्हीं दिनों मेरे स्कुल के एक अध्यापक ने मरे से प्रेम करना आरम्भ किया, इस प्रेम कारण मेरी सुन्दरता थी । उस नीच न भी न जाने मेरे साथ कितनी बार मुंह काला किया । जब मै इन बुराइयों में नहीं फंसा था, अपनी कक्षा में  पढने मैं प्रथम था, शरीर सुन्दर और स्वस्थ था । अब इन बुरायों का फल मिलने लगा । रात रो स्वपन सप्ता मे दो बार वीर्य नाश हो जाता है । पेशाब में भी गड़बड़ होने लगी । मस्तिष्क निर्बल हो गया । पढ़ने में मन नहीं लगता था, उठते-बैठते अन्धेरी आती थी, कई वर्ष अपना नाश करते रहने के कारण शरीर भी थोथा वृक्ष की तरह निर्बल हो गया । देखने को मुख पर अभी सुन्दरता अभी शेष थी, किन्तु युवा होने से पहले बुढापा आगया । घरवाले विवाह की चिन्ता मे थे, मन बड़ा, दुखी और उदास रहता था, न जीवन से निराश था । कई बार मन में आता था,  कि विष खाकर सदा के लिये सो जाऊं, रेल  के आगे कट कर मर जाऊं । इस जीने से तो मरना भी अच्छा है । गुण्डे विधार्थियों और नीच अध्यापक के चंगुल से निकलने का भी यत्न किया , किन्तु वे बडे धुर्त थे – उनके जाल में से निकलना कोई सहज बात थोडी ही थी । एक बार यत्न करने पर भी उसी प्रकार दल-दल में फंसा रहा । ऐसे विकट समय में डूबते को तिनके का साहरा आर्यसमाज के एक सदाचारी उपदेशक का सतसंग मिला । उस सच्चे देवता ने मुझे बार-बार ब्रम्हचर्य और सदाचार की शिक्षा दी । ब्रम्हचर्य संबंधी अनेक पुस्तकें उन्होंने दीं और पढ़ाई । कई वर्ष लगतार घोर परिश्रम करके मुझे उन गुण्डों  के  चंगुल से निकाला । उनके सतसंग से मेरी सब कुटेब (बुराईयां) छुट गयी । प्रतिदिन  नियमित व्यायाम करने और अन्य ब्रम्हचर्य के नियमों का पालन करने से फिर से शक्ति और बल आने लगा । निराशा समाप्त हुई । सच्चा आनन्द क्या होता है, इनका स्वाद चखने को कुछ-कुछ मिला । क्या ही अच्छा होता यह सत्संग मुझे बाल्यकाल (बचपन) में ही मिलता और में नष्ट होने से बच जाता । "
    इसी प्रकार देश के प्रायः सभी होनहार बच्चे कुटेबों (बुरी आदतों)में फंस कर नष्ट हो रहें हैं । प्यारे विधार्थियों ! यदि कोई नीच साथी तुम्हें यह गुप्त (गंदी) शिक्षा दे की मुतेन्द्रिय के हिलाने या मलने से आनन्द आयेगा, ऐसे नीच के मुंह को पीट देना । यदि तुमनें किसी के बहकावे से मूत्रेन्द्रिय के साथ कोई खेल किया तो तुम्हारे जीवन का खेल बिगड़ जाएगा । परमात्मा ने मूत्रेन्दिय और गुदेन्द्रिय को मुत्र-मल (पेशाब, पाखाना) निकालने का द्वार बनाया है । इससे भूलकर भी कोई काम न लें। पेशाब पाखाना निकालना ही एकमात्र काम है । मुत्रेन्द्रिय के द्वारा ही शरीर का राजा वीर्य भी कुचेष्टा (बुराई) करने से निकलता है । इसलिए इसे कभी हाथ न लगाओ, हाथ लगाने से कुटेबों में फंसने का डर है । स्नानादि के समय मैल अवश्य साफ कर लिया करो । मूत्रेन्द्रिय का एक और भी काम है सन्तान पैदा करना । वह 25 वर्ष के पीछे ग्रहस्थाश्रम का काम है । किन्तु सच्चा विद्यार्थी तो महात्मा शुक्राचार्य के उपदेशानुसार (विद्यार्थी ब्रह्मचारी सयात्) सच्चा ब्रह्मचारी ही होता है । जैसे दीपक में तैल बत्ती के सहारे ऊपर चढ़कर प्रकाश के रूप में बदल जाता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य का वीर्य मस्तिष्क में पहुचकर विचार-अग्नि का ईंधन बनता है, ज्ञानरुपी प्रकाश का संचार करता है । मनुष्य के अविधा रुपी अन्धकार को मिटाकर मन और आत्मा को देदीप्यमान (प्रकाशित) करता है । प्यारे युवकों ! सारी शक्ति लगाकर शरीर के सार, शक्ति के भण्डार, वीर्य की रक्षा करो । जैसे दूध में से मक्खन (घी) निकाल दिया जाये तो शेष छाछ का कोई मूल्य नहीं, गन्ने और सन्तरे का रस निकाल दिया जाये तो बचे हुए छिलके पैरों के नीचे रौदे जाते हैं, जिस साइकिल में से हवा निकल जाये तो वह सवारी के काम की नहीं, जिस वृक्ष को कीड़े (घुन) ने खाकर खोखला कर रखा हैं उसकी कडी-शहतीर आदि नही बन सकते, ऎसे ही जो मनुष्य के तत्व (कीमती जौहर) वीर्य को नष्ट कर देता हैं ऎसा वीर्य-हीन (थोथा) मनुष्य अपने सौभाग्य को नष्ट करके दुःख सागर में डूब मरता हैं ।
     ब्रह्मचारी का शरीर वज्र के समान होता है। उसकी नस नाडियां फौलाद (इस्पात) से भी कठोर होती है। शरीर दृढ, सुन्दर और सुडौल होता है । सारे शरीर और मुख-मण्डल पर ऎसी लाली, सुदरता (चमक) और तेज आता है, कि जिसके दर्शन करके मनुष्य का पेट नहीं भरता । पाठक गण ! इस ब्रह्मचर्य के आनन्द को खूब लूटिये और इस पवित्र संदेश को देश के सब विधार्थियों और युवको तक पहुचाइये ।
ब्रह्मचर्य का शत्रु बाल विवाह
    वाल विवाह भी तुम्हारे मार्ग में एक भयंकर बाधा हैं । इस अन्याय के विरूद्ध वीरता से युद्ध करो । इसके कुचक्र मे न फंसो । संसार में कोई मूर्ख किसान ऎसा नही जो चना गेहु का कच्चा बीज अगले साल कि फसल के बोने के लिए रखता हो, किंतु भारतवर्ष ही एक ऐसा भाग्यहिन देश है जिसमें सोलह वर्ष से पूर्व कन्या और पच्चिस वर्ष पूर्व बच्चों का बाल विवाह  की फांसी दे कर जबकि इनका शरीर और वीर्यादि धातुएं भी कच्ची होती हैं, इनसे संतान पैदा कराई जाती है । फिर संतान कौन सी भीम अर्जुम होनी है? किड़े- मकौड़े पैदा हो जातें हैं, जो संसार में भार बन कर पाप ही बढ़ाते हैं । बाल विवाह से प्रथम तो संतान होती नहीं, होती है तो मरी हुई । यदि जीवीत भी हुई तो सिघ्र मर जाती है, जब तक जीती है सदा रोगी रहती है । बाल विवाह से बढ़कर कोई पाप और अत्याचार संसार में नहीं है । किसी को सिघ्र ही विवाह करना हो तो कम से कम लड़के की आयु 24 वर्ष और लड़की की आयु 16 वर्ष से कम ना हो यह उधम और निकृष्ट (third class) विवाह है । इससे पूर्व विवाह करना अपनी संतान को विषय भोग की भट्टी में झोकना है । 17 वर्ष से 19 वर्ष तक कि स्त्रि और तीस वर्ष से चालिस वर्ष तक का पूरुष विवाह करें तो मध्यम ( second class) विवाह जानो और 20 वर्ष से लेकर 24 वर्ष तक की स्त्रि और 40 से 48 वर्ष तक का पुरुष विवाह करें ते सर्वत्तम है ।  जो कोई ब्रह्मचारी ऋतुगामी अर्थात संतान पैदा करने के लिए वीर्य दान देने वाला, परस्त्रि त्यागी और एक स्त्रिवाला न हो तो वह भी बना-बनाया धुल में मिल जायेगा । यदि आपके मुर्ख माता-पिता ने आपका बाल विवाह कर दिया तो अपने आप को अविवाहित समझों । जब तक तुम 25 वर्ष के ना हो जाओगे गृहस्त ( विषय भोग) को विष समझो । नहीं तो तुम्हारा सर्वनाश हो जाओगा । तुम विद्या ना पढ़ सकोगे, तुम्हारा शरीर भी बीगड़ जायेगा, पिछे पछताओगे और रोओगे । कोई आँसु भी पोछने वाला नहीं मिलेगा । घर जाना भी पड़े तो बच कर रहो । बात तो तब है कि वे सैकड़ो नवयुवक जिनके बाल विवाह हो गये हो घर वालों के विरुद्ध सत्याग्रह करें, विवाह के बंधन को तोड़ डाले और विवाह को विवाह ना मान कर गृहस्थी ना रहे । तब कहीं यह बाल विवाह का पाप मिट सकता है, नहीं तो रात-दिन इस देश के होनहार बालक मिट्टी में मिलते रहेगें । सगाई भी आधा विवाह है इससे भी 25 वर्ष की आयु से पहले स्विकार नहीं करना चाहिए । सगाइ के बहाने बालक को एक रूपया देकर ये धुर्त लोग अपने जाल में फंसा लेते है । सगाई करने वाले बड़ी मिठी-मिठी बांते करते है, इनके जाल में ना फंसो ।
     विशेष जानकारी के लिए मेरी बनाई पुस्तक "बाल विवाह से हानियां" पढ़ो ।
निराश न हों
     बहुत से नवयुवक, जिनका विवाह भी नहीं हुआ होता, किन्तु अज्ञानवश बाल्यकाल में कुसंगति में फंस अपना जीवन भ्रष्ट कर लेते हैं, उन्हें सत्संग ले जब आता है बड़े हताश और दुःखी देखे जाते हैं। उन्हें घबराना नहीं चाहिए। जब आँख खुलें, तभी प्रभात समझों। पिछली बोतों को याद करके रोने धोने में समय न खोओ । व्यर्थ चिंता करके अपनी चिता तैयार न करों । बिती का बिसार दो, रही को संभालो । जब बाल्मिकी- सा डाकु महर्षि बन सकता है, नास्तिक, शराबी तथा चरित्रहिन मनुष्य ही सच्चा साधु स्वामी श्रद्धानंद संयासी अमर सहिद का पद पाता है, प्राचिन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का उद्धार कर हल-चल मचाता है, थोड़ी सी हड्डियों का पिंजर एम. के. गांधी महात्मा पद को पाता है, तो आप क्या नहीं बन सकते ? सब कुछ बन सकते है । इनके जीवन पहले क्या कम गीरे थे ? इतना गिरा हुआ तो कोई ही नवयुवक होता है । इन्हें संसार का सिर मौर किसने बना दिया ? सदाचार  ने । अंधकार कितना ही पुराना हो, प्रकाश होते ही भाग जाता है । जो कुचेष्टाओं को छोड़ेगा, ब्रह्मचर्य के नियमों और साधनों का दृढ़ता पूर्वक पालन करेगा, उसके सब संकट और दुःख दुर हो जायेगें, और सफल होगा ।
ब्रह्मचर्य के साधन
    1. प्रातर्जागरण
     सदैव प्रातःकाल चार बजे उठो । उठते ही ईश्वर का चितंन करो । फिर अन्य कार्य करो । प्रातःकाल उठने से वुद्धि तिब्र होती है । मनुष्य रोग रहित और स्वस्थ रहता है ।  जो आलसी मनुष्य उस अमृत बेला में सोता है, स्वप्न दोष आदि रोग उसे ही सताते है, क्योंकि गंदे स्वप्न प्रातः 4 बजे के पिछे ही आते है इसलिए 4 बजे के पिछे ब्रह्मचर्य-प्रेमियों को नहीं सोना चाहिए ।
    2. उषःपान तथा चक्षु स्नान
   शुद्ध जल को लेकर मुख को पुरा भर लो- और साथ ही दूसरे जल से आंखों में खुब छिटें दो, फिर कुल्ली करके आठ दस घुंट जल पी लो । इस जलपान से वीर्य संबंधीत रोग नष्ट होता है । बावासिर नहीं होता है । अजिर्ण (कब्ज) दूर होता है और शौच खुल कर आता है । काम विकार और शरीर की उष्णता दूर होती है ।
    3. शौच
  जल पीकर लघुशंका जा कुछ समय के पिछे खुले जंगल में जाकर मल त्याग (शौच) करें ।  शौच के लिए जितना ग्राम से दूर जायेंगे उतना ही अच्छा है । जिधर से वायु आता हो उधर मुख करके बैठे । मुख तथा दातों को बंद रक्खें । बांयें पैर पर दबाव रक्खें । शौच के समय जोर ना लगाये और ना ही कांखें, बल लगाने से वीर्य नाश होता है । जो मल (टट्टी)  स्वयं आजाये, तो ठीक है । यदि खुल कर शौच नहीं आती है और कब्ज रहती है, तो शौच जाने से पूर्व पेट के आसानादि हल्के व्यायाम करें, पेट को खुब हिलायें पिछे शौच जायें तो मल बद्ध नहीं होगा । सांय काल तांबें के पात्र में जल रख दें । उसका प्रातः काल पान करने से शौच ठीक होता है ।
     शौच दोनो समय प्रातः और सांय अवश्य जायें, मल तथा मुत्र के बेग को कभी नहीं रोके इनको रोकने से अनेक रोग हो जाते हैं । मलमुत्र की उष्णता से वीर्य नाश भी हो जाता है । शौच जाते समय बड़ा जल पात्र अपने साथ अवश्य ही ले कर जायें । दोनो समय मुत्र इन्द्रिय तथा गुदा इन्द्रिय को शुद्ध ठंडे जल से कई बार मिट्टी लगा-लगाकर धोये। जो सफेद मल मुत्र के अगले भाग पर खाल के निचे जम जाता है, उसे जल से साफ कर दे और इन्द्रिय के छिद्र पर जिससे मुत्र निकलता है ठंडे पानी की बारिक धार एक दो मिनट डाले। ऐसा करते समय ईश्वर का चिंतन करें। विचार शुद्ध रखें ।, ठड़े पानी की धार से शरीर में ठंडक होकर मन की चंचलता दूर होती है। और निरंतर सेवन से स्वप्नदोष भी नहीं होता । जब - जब मुत्र त्याग करें ,तब - तब ठण्डे जल से इन्द्रिय को धो डालें। शौच के पिछे हाथ तथा जलपात्र को कई बार मिट्टी लगा कर धोयें ।
प्रातः जागरण, उषःपान ,चक्षुःस्नान, शौचादि के विषय में मेरी पुस्तक "ब्रह्मचर्य के साधन" 1-2 भाग पढे ।
4 दन्तधावनः-
    कीकर, नीम मौलसरी किसी एक वृक्ष की दातुन प्रति दिन किया करें, इससे दात रोग दुर होगें, पाचन शक्ति और आँखों की ज्योती बढ़ेगी। 
5 स्नानः-
      प्रतिदिन कुएं के ठण्डे और ताजा जल से रगड़-रगड़ कर घर्षण स्नान करें । पहले सिर पर और फिर शरीर के सभी अंगों पर पानी डाले, गर्म जल कभी भूल कर भी नहीं नहाना । नाभी के निचे खूब ठंडे जल की धार को डालें । इससे स्वप्नदोष दूर होकर वीर्य रक्षा में लाभ होगा । खद्दर के अंगोछे से पोंछ कर शरीर को सुखा लें, फिर शुद्ध खद्दर के सादे वस्त्र धारण करें । ब्रह्मचारी सदैव दोनों समय स्नान करे तो और भी अच्छा है, नहीं तो गर्मी के काल में तो अवश्य ही दोनों समय नहाये ।
6 संध्या तथा प्राणायामः-
   एकांत शुद्ध स्थान में ईश्वर का भजन तथा संध्या करें । संध्या से पूर्व तथा जब भी प्राणायाम मंत्र आये, तो कम  से कम तीन तीन प्राणायाम करें । सदा लंबे तथा गहरी स्वास लेने का स्वभाव डालें । इससे आयु बढ़ती है । प्राणायाम करते समय सिधा सिद्धासन में बैठें । मूलाधार और नाभी को ऊपर की तरफ खिंचे, इससे स्वप्न दोष आदि विकार दूर होते हैं, वीर्य रक्षा में बड़ी सहायता मिलती है, प्राणायाम ब्रह्मचर्य का सबसे उत्तम साधन है । अथवा यूं समझिये की प्राणायाम ब्रह्मचारी का प्राण है । प्राणायाम और संध्या से सब प्रकार के पाप दूर होते हैं तथा मन तथा इन्द्रियां वश में आती हैं । प्राणायाम की पूर्णविधी "सत्यार्थ प्रकाश" के तीसरे सम्मुलास और मेरी "प्राणायाम" पुस्तक में पढ़ें और स्नान, संध्या यज्ञ आदि के संबंध में मेरी "ब्रह्मचर्य के साधन" (पांचवा भाग) पूस्तक पढ़ें ।
व्यायामः-
    संध्या के पहले खुली हवा में व्यायाम करें । आसान तथा दौड़ का व्यायाम विद्यार्थियों के लिए विशेष लाभकारी है । पहले सौ गज की दौड़ आरंभ करें और शनैः शनैः एक मील की, फिर इससे भी अधिक का  अभ्यास करें । ध्यान रहें कि श्वास सदैव नाक से ही लें । शिर्षासन ब्रह्मचर्य का प्राण है और वीर्य रक्षा का उत्कृष्ट साधन है, किंतु यह ध्यान रहे कि सिर के नीचे कपडें को मोटी गद्दी रक्खें और दौड़ादि सभी व्यायामों से पूर्व इसे करें । पिछे करने से बहुत हानी होती है । इसे एक मिनट से आरंभ करके शनैः शनैः दस पन्द्रह मिनट तक करने का अभ्यास बढ़ावे । जिन्हें स्वप्न दोष होता हो तो उन्हें सांय काल भी शिर्षासन और प्राणायाम का दिर्घ काल तक अभ्यास करना चाहिए । इससे वीर्य की उर्ध्व गति हो जाती है । वीर्य संबंधी सब रोग नष्ट हो जाते है । इसी प्रकार मयुर आसन, सर्वांग आसन, हलासन, चक्रासन तथा मयूरा चालादि प्रातःकाल करने चाहिएं । सांय काल शिर्षासन, मोगरी, मुग्दल, दण्ड, बैठक और मल्लयुद्ध (कुश्ती थोड़ी सी) का व्यायाम अच्छा रहता है । यदि घी, दुध, बादाम, आदि पुष्टी कारक पदार्थ अधिक मिले तो अधिक, और कम मिले तो कम व्यायाम करें । व्यायाम शक्ती और भोजन के अनुसार ही करें । जैसे जल, वायु और अन्न, जीवन का आधार है, ऐसे ही व्यायाम भी स्वास्थ्य का मुल कारण है । संसार का कोई भी मनुष्य बिना व्यायाम के पूर्ण स्वस्थ नहीं रह सकता । व्यायाम करने में खूब आनन्द लें । व्यायाम करने से शरीर के सब अंग दृढ़ होते हैं । शरीर सुंदर और सुडौल बनता है । वीर्य शरीर में पचकर रक्त में मिल जाता है और शक्ती का रूप धारण करता है ।
         व्यायाम से रंग रोगन निकलता है । मुख पर तेज और लाली आती है । मनुष्य सदा जवान रहता है । घर के कार्य को कभी व्यायाम ना समझें । कार्य- कार्य ही है और व्यायाम-व्यायाम ही है । व्यायाम के लिए प्रातःकाल का समय सबसे अच्छा है । यदि ब्रह्चारी दोनों समय नियमित व्यायाम करें तो सोने पर सुहागा है । व्यायाम इतना करें की पसिना आजायें । पैरों के व्यायाम अपेक्षा हाथों का व्यायाम अधिक करें, जिससे भुजायें, छाती और मस्तिस्क अधिक बलशाली हो । उष्ण काल में स्नान से पूर्व और शीत काल में स्नान- संध्या के पिछे व्यायाम कर सकते हैं । खाना खाकर कभी व्यायाम ना करें । ग्रीष्मकाल में  व्यायाम के पिछे, प्यास लगती है, कभी पानी ना पीये, बहुत हानी करता है, गोदुग्ध का पान सर्वश्रेष्ठ है । यदि दुध न मिले तो बादाम आदि रगड़कर पीयें । व्यायाम के पिछे भुख लगा करती है, थोड़ा पुष्टि कारक भोजन अवश्य करलें , भूखा रहना अच्छा नहीं है।
     पूरे विवरण के लिए मेरे द्वारा लिखीत "व्यायाम का महत्त्व और व्यायाम संदेश" पुस्तक पढ़ें ।
8 भोजनः-
      भोजन, व्यायाम से दो तीन घंटे पश्चात् करना चाहिए । भोजन दो ही समय करें । पहली बारह बजे से पूर्व और सांय काल आठ बजे से पूर्व । सांय काल देर से भोजन करने की अपेक्षा भुखा रहना अच्छा है । यदि ताजा धारोष्ण गौदुग्ध मिल जाये तो भोजन ना करों । जिन्हें स्वप्नदोष की शिकायत है तो वह सांय काल सात बजे से पूर्व ताजा गौदुग्ध पान करें । भोजन एक ही समय दोपहर को ही करें, सोने  तीन घंटे पहले ही खान पान से निवृत हो जायें । गरम दुध तथा भोजन का सेवन कभी ना करें । इससे वीर्य पतला होकर हानी हो जाती है । भोजन सादा, ताजा, सात्विक प्रसन्नता पूर्वक भूख लगने पर खूब चबा-चबा कर, भुख रख कर तथा थोड़ी मात्रा मे करें । सबसे से श्रेष्ठ भोजन गाय का ताजा दुध, दही, मक्खन, घी, शाक, सब्जी औऱ फल हैं । बकरी की तरह सारें दिन ना चरते रहें । नियत समय पर भोजन करने से मन शांत और वश में रहता है । बार-बार खाना, अधिक खाना, पेटू बनना है, रोगों और मृत्यु को बुलाना है । यदि भोजन सुखा हो, शाक में भी जल ना हो तो भोजन के बीच में दो चार घुंट जल पी लें । वैसे भोजन के दो तीन घंटे के पश्चात इच्छाअनुसार जल को पीये, जल पीने में कमी न करें । सोते समय कभी भुल कर भी दुध और जल ना पीए । यदि प्यास गर्मि में बहुत अधिक तंग करें तो बार बार कुल्ला करें, पीये नहीं प्यास बुझ जायेगी । कभी भुखे ना रहें न ही अधिक खायें ।
निषिद्ध पदार्थः-
    नमक , मिर्च , खटाई, गुड़, शक्कर, लहसुन, प्याज, बैगन, तेल की चिजें, आचार, मुरब्बे, चटनी आदी कभी ना खायें । यदि ब्रह्मचर्य से प्रेम है तो इनसे दूर रहें । खाना जीने के लिए है न कि जीवन खाने के लिए है । हम खाते इसलिए है कि हमारा शरीरी पुष्ट, बलवान् और रोग रहित हो । जो भोजन वीर्यनाशक और हानिकारक हो उसे कभी ना खायें, चाहे कितना भी स्वादिष्ट हो । स्वाद के लिए जिह्वा के दास न बने । लाल, काली, सफेद, हरी किसी भी प्रकार की मिर्च ना खांयें । ये सभी ब्रह्मचर्य के लिए विष है, सोडावाटर, बर्फ, चाय, ,कहवा, काफी, यह सभी वीर्य नाशक हैं, इन्हें कभी ना छुये । मांस, मछली, अंडे मनुष्य का भोजन नहीं, इन्हें खाकर सात जन्म में ब्रह्मचार्य नहीं रह सकता । यदि खाते है तो अभी छोड़ दे ।
नशों से बचेः-
   हुक्का, बीड़ी, सीगरेट, सराब, गांजा, अफिम, चण्डू, भांग आदि खाने-पीने की वस्तु नहीं । इनको खाने पीने वाला जीवन से प्रेम छोड़ दे, कफन मगंवा कर घर में रखें । कहां वीर्य रक्षा और कहां ये नशे और व्यसन, इनका क्या मेल ? सिगरेट सराब आदि पीने वाला इन्हें बिना छोड़े ही वीर्यरक्षा करना चाहता है । यदि अपना कल्याण चाहते है तो आज ही कान पकड़ लें और व्रत लें की "कभी सिगरेट, शराब आदि विष का पान नहीं करेंगें, चाहें मर भी जायें इन्हें छुयेंगें नहीं ।" इनके पिने खाने वाला सर्वथा नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाता है । विशेष विवरण के लिए 'भोजन' पुस्तक पढ़ें ।
शयनः-
    सदा अकेले सोयें । कभी किसी अवस्था में भी किसी के साथ यहां तक की सगें भाई के साथ भी ना सोयें । सोने से पूर्व लघुशंका, (पेशाब) अवश्य करें । हाथ, पैर, मुख शीतल जल से धोयें । मुत्रेन्द्रिय का स्नान भी हितकर है । अंगोछे से हाथ पैर पोंछ लें । कुर्ता धोती आदि सब वस्त्रादि उतार दें । केवल शुद्ध और बारिक खद्दर का लंगोट (कोपीन) बांधे रहें । मर्द का लंगोट और धोड़े का तंग चौबीस घंटे बंधा ही रहना चाहिए । सदा भुमी पर सोये । एक दरी का बिछौना रखें । यदि जाड़ें में ना रह सके तो एक कम्बल और डाल लें, रुई के गद्दे वा कोमल (नरम) विस्तर पर कभी ना सोयें । सीधे, पेट के बल (ऊंधे) कभी ना सोयें, ब्रह्मचारी को दायीं करवट सोना चाहिये । सोते समय परै के उपर पैर ना रखें, आगे पीछे रखें । सिर पूर्व व दक्षिण दिशा की ओर ही रखें ।खुले स्थान पर जहां शुद्ध वायु आता हो, सोना चाहिये । खीड़की, जंगलें आदि बंद ना करें, मुख ढक कर कभी ना सोयें, सिर के निचे उंचा वस्त्रादि रखें, ईश्वर का चिंतन करें और गायत्री ओ3म का जाप करते-करते सांय काल दस बजे से पूर्व ही सो जायें । छः घंटे से अधिक ना सोयें । एक निद सोने का अभ्यास करें । यदि बीच किसी कारण से आँख खुल जाये तो तुरंत लघुशंका के लिए जायें, आलस्य ना करें । यदि रात्री अधिक शेष हो और सोना ही पड़े तो फिर मुह धोकर ईश्वर का चिंतन करते हुए सो जायें । न सोयें तो अच्छा है । सारें दिन काम में लगें रहें, निठल्ले ना बैठें । सांय काल व्यायाम भी इतना करें कि दिन के कार्य और व्यायाम से इतने थक जायें कि रात्री में एक ही गहरी नींद आये । नींद खुलने पर आलस्य में ना पड़ें रहें । अपने नित्यकर्म में लग जायें । सांयकाल यदि ठीक समय सोओगें तो प्रातःकाल ठीक समय पर उठ सकोगे । देर तक जागने से शरीर और मस्तिस्क में उष्णता बढ़कर वीर्यनाश होता है । दस बजे के बाद पढ़ने के लिए भी ना जागें, यदि रात्री में पढ़ना ही है तो प्रातःकाल उठ कर पढ़ें । इस समय थोड़ी देर में अधिक याद होता है और फिर भूलता भी नहीं । सारे दिन कार्य करते-करते शरीर औऱ मस्तिस्क थक जाता है । इन्द्रियां थकी मांदी होती हैं इस लिए विश्राम चाहती हैं । दस बजे के बाद जाग कर पढ़ना, मस्तिष्क और शरीर को निर्बल करना तथा अपनी निद्रा की मिट्टी खराब करना है, किंतु यह ध्यान रहे कि दिन में कभी न सोये,+ क्योंकि सोने के लिए प्रभु ने रात्री ही बनाई है ।
    विशेष विवरण के लिए मेरी पुस्तक ब्रह्मचर्य के साधन दसम भाग निद्रा पढ़ें ।
सत्संग और स्वध्याय
    सत्संग और स्वध्याय जो उत्तम विद्वान्, धर्मात्मा और सदाचारी हैं, उन्ही के समीप बैठें, उन्ही का विश्वास और सत्संग करें । भवसागर से पार तारने वाले कोई तीर्थ हैं तो साधु माहात्मा ही हैं । एक कवि ने कहा है-
संगत किजै साधु की हरै और की व्याधि ।
ओछी संगत नीच की आठों पहर उपाधी ।।
     कुसंग का फल नरक है और सत्संग से मोक्ष तक की प्राप्ति होती है ।
    1. एक बार महर्षि दयानन्द सरस्वती को अमीचन्द ने एक गाना सुनाया उसका गाना सुन कर ऋषि अत्यनेत प्रसन्न हुए और कहा- "अमिचन्द है तो तू रत्न, किंतु कीचड़ में पड़ा है" इतना कहना था कि शराबी और वेश्यागामी अमीचन्द सब पापों को छोड़ कर सच्चा आर्य बन जाता है और सारा जीवन आर्यसमाज के प्रचार प्रसार के कार्य में लगा देता है ।
     2. इसी प्रकार से अजमेर में महर्षि जी सिपाही लेख राम को उपदेश देते हैं कि 25 वर्ष तक ब्रह्मचारी रहना । वह 36 वर्ष तक ब्रह्मच्रय पालन करता है । ऋषि का कार्य पुरा करने के लिए प्राण तक न्यौछावर कर देता है ।
    सत्संग की बड़ी महिमा है । इसे पाकर डाकू भी माहात्मा बन जाता है और पापी भी तर जाता है । इसलिए कुसंग से बचें । स्वांग, नाच, सिनेमा, थियेटर, रामलिला, रासलिला, ड्रामा, नाटक ये सब नष्ट करने वाले हैं । इन्हें भूलकर भी न देखें । इनसे बढ़कर और क्या कुसंग हो सकता है ?
    पांच विषयों और अष्टमैथुन से बचने के लिए प्रतिदिन धार्मिक पुस्तकों का स्वाध्याय करें । नावेल- उपन्यास, सांग आदि की गंदी पुस्तकें भूलकर भी ना पढ़ें । आदर्श ब्रह्मचारी स्वामी दयानन्द जी के लिखे सत्यार्थ प्रकाश और संस्कराविधि औदि ग्रंथो को, जो ब्रह्मचर्य की महिमा से भरे पड़े हैं, श्रद्धा-पूर्वक बार-बार पढ़ें । वह वीर्यरक्षा का कौन-सा साधन है, जिस पर उन्होंने प्रकाश न डाला हो ? उनके ग्रंथों का स्वाध्याय करना मानो ब्रह्मचर्यामृत के घुंट भरना है । वह ब्रह्मचारी ही क्या है जिसने उनके ग्रथों का स्वाध्याय ना किया हो । बिना स्वध्याय के मनुष्य के विचार शुद्ध और पवित्र नहीं होते है । और बिना विचारों की शुद्धि के वीर्यरक्षा असम्भव है । इसलिए सद्ग्रन्थों का स्वाध्या करें और इस पुस्तिका को बार-बार पढ़ें तथा इसके अनुसार चलकर लाभ उठायें ।
      विशेष विवरण के लिए मेरी "सत्संग स्वाध्याय" पुस्तक पढ़ें।
 स्वामी ओमानंद सरस्वती
भुतपूर्व आचार्य महाविद्यालय गुरुकुल झज्जर हरि.