मृत्यु भयभित कर रही हैं, क्योंकि जीवन में आनंद दिख रहा है।

 


मृत्यु और जीवन—ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भारतीय दर्शन और शास्त्रों में इन दोनों के बीच के संबंध को अत्यंत गहनता से समझाया गया है। यहाँ मृत्यु के भय से मुक्ति और जीवन के वास्तविक आनंद पर एक शास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत है:

मृत्यु का भय: एक अज्ञानता 

शास्त्रों के अनुसार, मृत्यु का भय (जिसे योग सूत्र में 'अभिनिवेश' कहा गया है) मनुष्य के पांच प्रमुख क्लेशों में से एक है। यह भय इसलिए होता है क्योंकि हम स्वयं को इस नश्वर शरीर के साथ जोड़ लेते हैं।

 * श्रीमद्भगवद्गीता का दृष्टिकोण: भगवान कृष्ण कहते हैं कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर प्राप्त करती है।
   
 * अतार्किकता: मृत्यु केवल शरीर का अंत है, आत्मा का नहीं। जब हम इस सत्य को आत्मसात कर लेते हैं कि हम 'अविनाशी' हैं, तो मृत्यु का भय स्वतः समाप्त होने लगता है।

जीवन का आनंद: वर्तमान में अस्तित्व

जीवन का आनंद भौतिक वस्तुओं के संग्रह में नहीं, बल्कि 'स्व' के बोध में है। उपनिषदों के अनुसार, हमारा मूल स्वरूप सच्चिदानंद (सत्य, चित्त और आनंद) है।

आनंद की प्राप्ति के मार्ग:

 * स्थितप्रज्ञता: सुख और दुःख में समान रहना ही जीवन का वास्तविक आनंद है। जब हम बाहरी परिस्थितियों पर अपनी खुशी निर्भर करना बंद कर देते हैं, तब आनंद का झरना भीतर से फूटता है।

 * निष्काम कर्म: फल की चिंता किए बिना कर्म करना जीवन को तनावमुक्त बनाता है। भय हमेशा भविष्य का होता है, जबकि आनंद केवल 'वर्तमान क्षण' में उपलब्ध है।
 * मुमुक्षुत्व (मुक्ति की इच्छा): यह समझना कि यह संसार एक रंगमंच है, हमें जीवन को एक खेल (लीला) की तरह जीने की शक्ति देता है।

भय से आनंद की ओर संक्रमण

मृत्यु का भय तब तक बना रहता है जब तक 'मोह' (Attachment) रहता है। जिस क्षण व्यक्ति यह समझ जाता है कि जो जन्म लेता है उसका अंत निश्चित है, वह मृत्यु को एक 'विश्राम' के रूप में देखने लगता है।


    मृत्यु का भय जीवन को संकुचित कर देता है, जबकि मृत्यु की स्वीकार्यता जीवन को गहराई प्रदान करती है। शास्त्रों का सार यही है कि "अमृतत्व" को पहचानो। जब मृत्यु का डर समाप्त होता है, तभी वास्तविक जीवन का प्रारंभ होता है। जिसे अपनी अमरता पर विश्वास है, उसके लिए मृत्यु केवल एक द्वार है, अंत नहीं।


     यहां तो हर एक इस संसार का आदमी चाहता हैं कि वह मरना नहीं चाहता हैं। भले ही उसका जीवन कितना दुःखों से भरा हो, हर आदमी जीना चाहता है। इसमें दो बातें है पहली बात यह है कि यह है कि कुछ लोग कहते हैं कि एक मार्ग ऐसा है जिसमें दुःख और मृत्यु नहीं हैं। 

     दूसरी बात यही जिस पर मैं चल रहा हुं वह मृत्यु का मार्ग है जिसमें मुझे बार-बार मुझ मेरी मृत्यु याद आती हैं वह कुछ ऐसा संकेत मेरे लिए देती है जिसको मैं बहुत चाहकर भी नहीं त्याग कर सकता हु, क्योंकि उसनें मेरे हृदय की गहराई में अपना स्थान बना लिया है। 

     इस संसार में हम देखते हैं दो तरह के आदमी है एक प्रसन्न और सुखी रहते हैं और दूसरें वह हैं जो दुखी और परेशान रहते हैं। वह हमारी श्रेणी में आते हैं। और भी ऐसा देखने में आता है कि लोग इस दुनिया में बहुत जल्दी सफलता को अर्जित कर लेते हैं और अपने होने का परचम लहरा देते हैं हवा में जिससे उनके होने के बारें में लग-भग सभी लोग जान जाते हैं। 

    जिसको प्रसिद्धी कहते हैं। और कुछ ऐसे होते हैं जो जमिन में उस वीज की तरह से होते हैं जो मिट्टी की गर्त अंधेरे में पड़े रहते हैं, जहां पर सूर्य का प्रकाश भी नहीं पहुंच पाता है।

    तो वहां पर ज्ञान कैसे पहुंच सकता हुं। लेकिन यदि उस बाीज में जीवन होता है तो वह अपने आप को खत्म करके भी एक अंकुर के रुप में जमिन के गहरे गर्त से बाहर आजाता है और अपने होने का प्रमाण दे देता हैं जिसको देख कर स्वयं सूर्य भी शर्माता है। ऐसा ही हमारें साथ भी होरहा हैं हम भी उस बीज की तरह से हैं जहां पर मेरे मरने का संकेत मुझको मेरा अस्तित्व दे रहा है, जिसका मतलब हैं कि मेरा पुनर्जन्म होने वाला हैं, मेरे अंदर से एक नविन अंकुर जमिन के गहरे गर्त से बाहर निकलने के लिए बेताब हो रहा है।

   जिसको मैं बहुत चाह कर रोक पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहा हुं। मुझे मेरा स्वयं का साथ देना चाहिए और अपने तबाही का तमाशा देख कर आनंद लेना चाहिए।

            मैं नहीं जानता कि मैं कोई ज्ञानी हुं और यह भी नहीं जानता की मैं कोई अज्ञानी हुं क्योंकि मैं जो महसूस कर रहा हुं उसमें परमआनंद मुझे मिल रहा हैं और मेरे लिये जीवन का आकर्षण और मृत्यु का भय भी आकर्षित नहीं करता हैं मैं तो दोनो के मध्य में खड़ा हो कर परम दिव्य रस में डुब रहा हुं। मेरे लिए मेरी मृत्यु भी मेरे लिए एक संदेश ले कर आरही है जिसमें मेरे अंकुरण की संभावना मुझे दिखाई दे रही है। और यदि मेरे पास जीवन भी रहता है तो उसके लिए भी मैं पूर्ण रूप से तैयार हुं, और इस जीवन में उस परमज्ञान को प्रकाशित करने के लिए बेताब हु जीवन का अंकुर मुझे दोनो तरफ दिखाई दे रहा है।

     एक तरफ स्वयं परमेंश्वर पैदा हो रहा है दुसरी तरफ मैं स्वयं ईश्वर को पैदा कर रहा हुं। मुझे तो मेरे दोनो तरफ ईश्वर के कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। कही भी मुझे मेरा अंत नही दिखाई देरहा है । इसलिए मुझे किसी प्रकार की चिंता करने का जरुर नहीं है। मुझे तो हर तरफ से अपने आनंद को चारो तरफ बाटंने चाहिए जिससे मेरे होने का सबुत इस दूनिया को मिल सके, और यह दुनिया मेरे समान पर आनंद को प्राप्त कर सके, वह तो बहुत आसान है। कठिन तो हमने उसको बना रखा है क्योंकि हम स्वयं को किसी जड़ वस्तु से बांध रखा है यह संसार जड़ हैं और हमें अपनी जड़ता से बांध रहा हैं जबकि हम एक नदी कि धारा के समान हैं जो सागर कि तरफ दौड़ रही है यदि वह रास्ते के रेगिस्तान में ही सुख जाती हैं तो भी वह जमिन के अंधेरे गर्त से होते हुए सागर की तलहटी तक अवश्य पहुंच जायेगी भले ही लोग उसको पुरी तरह से ना देख पाये। 

    इस तरह से मैने जान लिया हैं कि मेरा ना कहीं पर अंत नहीं हैं और ना ही कहीं पर मेरा प्रारंभ ही होरहा है। क्योंकि जो पैदा होता है वह मरता हैं अभी तक तो मैं स्वयं को इस जड़ संसार में पैदा भी नहीं कर पाया हुं जिसने स्वयं को इस संसार में जन्म करा लिया हैं जिसको लोगों ने जाना और उनके जन्म का आनंद भी मनाया है उनको ही उनके मरने का शोक भी मनाना पड़ेगा। तो इस प्रकार से इस संसार में स्वयं के प्रसिद्धी का आनंद लुट रहें हैं उन्हें अपने मरने के आनंद को भी लुटने के लिए तैयार रहना चाहिए.। तो जो संसार में प्रसिद्ध नहीं हैं वह अपनी अप्रसिद्धि के लिए दुःखी नहीं होगा ।  
         

1 टिप्पणियाँ

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  1. मन ही सारी समस्या की जड़ है मन से पार निकलने का प्रयाश करो क्योंकि मन ही सिर्फ दो प्रकार की भाषा को समझता है एक प्रेम की भाषा को दुसरी नफरत की भाषा को जिसको राग और द्वेश कहते है, और जहां तक राग द्वेश है वहां तक अज्ञान ही का राज्य हैं ज्ञान के राज्य में प्रवेश की पहली सर्त है कि आपको इस बहुरूपिया मन से मुक्त होना होगा इसलिए ही कहते हैं "ऋतेनज्ञानेनमुक्ती"

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