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परस्पर निर्भरता हमारी आवश्यक्ता है

राष्ट्रों के दिन लद गए। लेकिन अभी भी वे बने हैं, और वे ही सबसे बड़ी समस्या हैं। विश्व का सिंहावलोकन करने पर विचित्र अहसास मन में उभरता है कि हमारे पास सब कुछ है, बस हमें एक मानवता की जरूरत है। उदाहरण के लिए, इथोपिया में लोग मर रहे थे-प्रतिदिन एक हजार लोग-और यूरोप में करोड़ों डालर की कीमत का अन्न सागर में डुबोया जा रहा था। बाहर से देखने वाला कोई भी प्राणी सोचेगा, मानवता पागल हो गई है। हजारों लोग भूखों मर रहे हैं। और मक्खन और अन्य खाद्य वस्तुओं के अंबार सागर में डुबोए जा रहे हैं। लेकिन इथोपिया से पाश्चत्य जगत को कोई लेना-देना नहीं है। उनकी चिंता इतनी ही है कि उनकी अर्थव्यवस्था बच जाए और उनकी यथापूर्व स्थिति (स्टेटस-को)बनी रहे। और अपने आर्थिक ढांचे की रक्षा करने की खातिर वे उस भोजन को विनष्ट करने को तैयार हैं जो हजारों लोगों की जानें बचा सकता था। समस्याएं विश्वव्यापक हैं, समाधान भी विश्वव्यापक होने चाहिए। और मेरी समझ बिलकुल साफ है कि चीजें ऐसी जगहों में हैं जहां उनकी जरूरत नहीं है; और अन्यत्र सारा जीवन ही उन पर निर्भर करता है। विश्व शासन का अर्थ है: इस भूगोल की समग्र परिस्थिति का सर्वेक्षण ...

एक विश्व शासन ओशो प्रवचन

 दूसरे विश्व-युद्ध के पहले राष्ट्र-संघ (लीग ऑफ नेशन्स) ने एक विश्व शासन का प्रयोग करके देखा था लेकिन वह सफल नहीं हो सका। वह एक वाद-विवाद का क्लब बन कर रह गया। दूसरे विश्व-युद्ध ने राष्ट्र-संघ की विश्वसनीयता ही खत्म कर दी। लेकिन उसकी जरूरत अभी भी थी। इसलिए उन्हें संयुक्त राष्ट्र-संघ निर्मित करना पड़ा। लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ उतना ही असफल रहा जीतना कि राष्ट्र-संघ। फिर से वह एक वाद-विवाद क्लब बन गया है क्योंकि उसके हाथ में कोई ताकत नहीं है। वह कुछ भी कार्यान्वित नहीं कर सकता। वह सिर्फ एक औपचारिक चर्चा करने का क्लब है। उसे सफल बनाने का सरल उपाय यह होगा कि उसे विश्व शासन बना दें। सभी देशों को चाहिए कि वे अपनी फ़ौजें, अपने हथियार विश्व शासन को समर्पित कर दें। निश्चित ही, अगर एक ही शासन हो तो न फ़ौजों की जरूरत होगी न हथियारों की। तुम युद्ध किसके साथ करोगे?  अब हर बड़े देश के पास, हर ताकत के पास परमाणु हथियारों के अंबार लगे हैं; इतने अधिक कि अगर हम चाहें तो इस जैसी सात सौ पृथ्वियों का विनाश कर सकते हैं - इसी वक्त। इतनी परमाणु शक्ति यहां पर उपलब्ध है-एक-एक व्यक्ति को सात सौ दफे मारा जा स...

अतित के साथ असातत्य ओशो

 इसी रिपोर्ट "हमारा सामूहिक भविष्य' ने जिन बुनियादी समस्याओं की चर्चा की है-भोजन की सुरक्षा, जनसं"या और साधन, जातियां और पर्यावरण व्यवस्था, उद्योग, प्रदूषण तथा शहरी समस्याएं-वे वस्तुतः एक व्यापक समस्या के सिर्फ अल्प अंश हैं। रिपोर्ट वास्तविक समस्याओं की उपेक्षा करती है। वह कहती है, राष्ट्रों को मिल-जुल कर काम करना चाहिए लेकिन जड़ों की तरफ ध्यान नहीं देती: इस पृथ्वी के टुकड़े कौन कर रहा है? वह कहती है कि अर्थशास्त्र और पर्यावरण जुड़े हुए हैं, लेकिन धर्म और राजनीति-अतीत के इन दो निहित स्वार्थों के संबंध में क्या, जो राष्ट्रों के खंडों के लिए जिम्मेवार हैं? यह कह कर कि अब हमें भविष्य के लिए काम करना है, रिपोर्ट ने यह मान लिया है कि वर्तमान परिस्थिति का निर्माण अतीत ने किया है। लेकिन अभी भी हम हर तरह से अतीत से चिपके हुए हैं। अगर भविष्य के लिए हम जिम्मेवार हैं तो हमारे लिए कौन जिम्मेवार है? अतीत ने हमें निर्मित किया है और हम संकट में जी रहे हैं। ये समस्याएं हमने पैदा नहीं की हैं, ये अतीत की मनुष्यता ने पैदा की हैं। अगर हमें सचमुच भविष्य के लिए कुछ समाधान खोजना है तो हमें इन समस्...

बेशर्त प्रेम ओशो प्रवचन

 प्रेम और प्रेम में बहुत भेद है, क्योंकि प्रेम बहुत तलों पर अभिव्यक्त हो सकता है। जब प्रेम अपने शुद्धतम रूप में प्रकट होता है--अकारण, बेशर्त--तब मंदिर बन जाता है। और जब प्रेम अपने अशुद्धतम रूप में प्रकट होता है, वासना की भांति, शोषण और हिंसा की भांति,र् ईष्या-द्वेष की भांति, आधिपत्य, पजेशन की भांति, तब कारागृह बन जाता है। कारागृह का अर्थ है: जिससे तुम बाहर होना चाहो और हो न सको। कारागृह का अर्थ है: जो तुम्हारे व्यक्तित्व पर सब तरफ से बंधन की भांति बोझिल हो जाए, जो तुम्हें विकास न दे, छाती पर पत्थर की तरह लटक जाए और तुम्हें डुबाए। कारागृह का अर्थ है: जिसके भीतर तुम तड़फड़ाओ मुक्त होने के लिए और मुक्त न हो सको; द्वार बंद हों, हाथ-पैरों पर जंजीरें पड़ी हों, पंख काट दिए गए हों। कारागृह का अर्थ है: जिसके ऊपर और जिससे पार जाने का उपाय न सूझे। मंदिर का अर्थ है: जिसका द्वार खुला हो; जैसे तुम भीतर आए हो वैसे ही बाहर जाना चाहो तो कोई प्रतिबंध न हो, कोई पैरों को पकड़े न; भीतर आने के लिए जितनी आजादी थी उतनी ही बाहर जाने की आजादी हो। मंदिर से तुम बाहर न जाना चाहोगे, लेकिन बाहर जाने की आजादी सदा...

साधक और सतगुरु ओशो

 प्रश्न: सदगुरु मिल गए। साधक को इसकी प्रत्यभिज्ञा, पहचान कैसे हो?  साधक हो, तो क्षणभर की देर नहीं लगती। साधक ही न हो, तो प्रत्यभिज्ञा का कोई उपाय नहीं। प्यासा हो, तो पानी मिल गया--क्या इसे किसी और से पूछने जाना पड़ेगा? प्यास ही प्रत्यभिज्ञा बन जाएगी। कंठ की तृप्ति ही प्रमाण हो जाएगी। लेकिन प्यास ही न हो, जल का सरोवर भरा रहे और तुम्हारे कंठ ने प्यास न जानी हो, तो जल की पहचान न हो सकेगी। पानी तो प्यास से पहचाना जाता है, शास्त्रों में लिखी परिभाषाओं से नहीं। अगर साधक है कोई--साधक का अर्थ क्या है? साधक का अर्थ है कि खोजी है, आकांक्षी है, अभीप्सा से भरा है। साधक का अर्थ है, कि प्यासा है सत्य के लिए। सौ साधकों में निन्यानवे साधक होते नहीं, फिर भी साधन की दुनिया में उतर जाते हैं। इससे सारी उलझन खड़ी होती है। तुम्हें प्यास न लगी हो और किसी दूसरे ने जिसने प्यास को जानी है, प्यास की पीड़ा जानी है और फिर जल के पीने की तृप्ति जानी है, तुमसे अपनी तृप्ति की बात कही: बात-बात में तुम प्रभावित हो गए। तुम्हारे मन में भी लोभ जगा। तुमने भी सोचा, कि ऐसा आनंद हमें भी मिले, ऐसी तृप्ति हमें भी मिले। ...

क्या पुरब पश्चिम एक होगें ओशो

 मैं हमेशा ऐसा अनुभव क्यों करता हूं, जैसे कि मेरा एक हिस्सा दूसरे हिस्से के विरुद्ध लड़ रहा है?  मनुष्य का इतिहास एक अत्यंत दुखद घटना रहा है, और इसके दुखद होने का कारण समझना बहुत कठिन नहीं है। उसे खोजने के लिए तुम्हें ज्यादा दूर जाना न पड़ेगा, वह प्रत्येक व्यक्ति में मौजूद है। मनुष्य के पूरे अतीत ने मनुष्य में एक विभाजन पैदा कर दिया है, हर आदमी के भीतर निरंतर एक शीत युद्ध चल रहा है। यदि तुम्हें बेचैनी का अनुभव होता है, तो उसका कारण व्यक्तिगत नहीं है। तुम्हारी बीमारी सामाजिक है। और जिस चालाकी से भरी तरकीब का उपयोग किया गया है, वह है: तुम्हें दुश्मनों के दो खेमों में बांटना-भौतिकवादी और अध्यात्मवादी, जोरबा और बुद्ध। वस्तुतः तुम बंटे हुए नहीं हो। वास्तविकता यह है कि तुम अखंड हो - एक स्वर में, एक लय में आबद्ध। लेकिन तुम्हारे मन में यह संस्कार गहरा बैठा है कि तुम एक नहीं हो, अखंड नहीं हो, पूर्ण नहीं हो। तुम्हें अपने शरीर के खिलाफ लड़ना होगा। यदि आध्यात्मिक होना चाहते हो तो तुम्हें अपने शरीर को हर संभव तरीके से जीतना पड़ेगा, उसे हराना पड़ेगा, उसे सताना और नष्ट करना पड़ेगा। पूरी दुनि...

कोई भविष्य नहीं है ओशो

इसकी पूरी संभावना है कि जहां तक जीवन का संबंध है, कोई भविष्य नहीं होगा। हम ऐसे रास्ते के करीब आ रहे हैं जिसके अंत में एक बंद गली है। इस तथ्य को स्वीकार करना दुखद है, लेकिन अच्छा होगा कि हम इसे स्वीकार करें; क्योंकि तब फिर एक नया मोड़ लेने की संभावना बनती है। आज घटनाएं जिस दिशा में गतिमान हैं, उनकी तार्किक निष्पत्ति एक ही है: सार्वभौमिक आत्मघात। और सर्वाधिक चौंका देने वाली बात यह है कि संसार का बुद्धिजीवी वर्ग, संसार के वैज्ञानिक, संसार के दार्शनिक इन सब तथ्यों की उपेक्षा कर रहे हैं। प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति में यह संकल्प होना चाहिए कि हम किन्हीं निहित स्वार्थों को इस ग्रह को नष्ट करने नहीं देगें। मनुष्य को बचाना अस्तित्व के महानतम सृजन को बचाना है। इस पृथ्वी को मनुष्य का सृजन करने में चालीस लाख वर्ष लगे। वह इतना मूल्यवान है! और भविष्य कहीं अधिक मूल्यवान है। यदि भविष्य के लिए कुछ करना हो तो यही समय है; अन्यथा अस्तित्व का यह चेतना का सर्वश्रेष्ठ विकास खो जाएगा। यह न केवल पृथ्वी की हानि होगी बल्कि पूरे अस्तित्व की हानि होगी। इन लाखों वर्षों में हम चेतना की थोड़ी संभावना पैदा कर सके हैं, ल...

वैज्ञानिक युग में धर्म का स्थान ओशो

विज्ञान से अर्थ ज्ञान की उस पद्धति का है, जो पदार्थ में छिपी हुई अंतस शक्ति को खोजती है। धर्म से अर्थ उस ज्ञान की पद्धति का है, जो चेतना के भीतर छिपी हुई अंतस शक्ति को खोजती है। धर्म और विज्ञान का कोई विरोध नहीं है, वर्ना धर्म और विज्ञान परिपूरक हैं। जो युग मात्र वैज्ञानिक होगा, उसके पास सुविधा तो बढ़ जाएगी, लेकिन सुख नहीं बढ़ेगा। जो युग मात्र धार्मिक होगा, उसके कुछ थोड़े-से लोगों को सुख तो उपलब्ध हो जाएगा, लेकिन अधिकतर लोग असुविधा से ग्रस्त हो जाएंगे। विज्ञान सुविधा देता है, धर्म शांति देता है। सुविधा न हो, तो बहुत कम लोग शांति को उपलब्ध कर सकते हैं। शांति न हो, तो बहुत लोग सुविधा को उपलब्ध कर सकते हैं, लेकिन उसका उपयोग नहीं कर सकेंगे। अब तक मनुष्य ने जिन सभ्यताओं को जन्म दिया है, वे सब सभ्यताएं अधूरी और खंडित थीं। पूरब ने जिस संस्कृति को जन्म दिया था, वह संस्कृति विशुद्ध धर्म पर खड़ी थी। विज्ञान का पक्ष उसका अत्यंत कमजोर था। परिणाम में पूरब परास्त हुआ, दरिद्र हुआ, पराजित हुआ। पश्चिम ने जो संस्कृति पैदा की है, वह दूसरी अति, दूसरी एक्सट्रीम पर है। उसकी बुनियादें विज्ञान पर रखी हैं और ध...

साक्षी: समस्त धर्म-अनुभव की एकमात्र वैज्ञानिक आधारशिला

 साक्षी का मतलब क्या है? साक्षी का मतलब है: देखने वाला, गवाह। मैं शरीर नहीं हूं, ऐसा किसको अनुभव होता है? मैं मन नहीं हूं, ऐसा किसको अनुभव होता है? ऐसा कौन इनकार करता चला जाता है कि मैं यह नहीं हूं, मैं यह नहीं हूं, मैं यह नहीं हूं? एक तत्व है हमारे भीतर दर्शन का, दृष्टि का, द्रष्टा का, देखने का। हम देख रहे हैं; हम जांच रहे हैं। वह जो देख रहा है, वही है साक्षी; जो दिखाई पड़ रहा है, वही है जगत। जो देख रहा है, वही हूं मैं; और जो दिखाई पड़ रहा है, वही है जगत। अध्यास का अर्थ है कि जो देख रहा है, वह भूल से यह समझ लेता है कि जो दिखाई पड़ रहा है वह मैं हूं। यह अध्यास है। एक हीरा मेरे हाथ में रखा है। उसे मैं देख रहा हूं। अगर मैं यह कहने लगूं कि मैं हीरा हूं तो अभ्यास होगा। क्योंकि हीरा मेरे हाथ पर रखा है, दिखाई पड़ रहा है, आब्जेक्ट है, एक विषय है, और मैं देखना वाला हूं, अलग हूं। देखना वाला सदा ही अलग है उससे जो दिखाई पड़ता है। देखने वाला कभी भी दृश्य के साथ एक नहीं है। देखने वाला सदा ही दिखाई पड़ने वाले से भिन्न है। मैं आपको देख रहा हूं क्योंकि आपसे भिन्न हूं, आप मुझे देख रहे हैं क्योंकि म...

मंत्र तो मन का खेल है,ओशो

 मंत्र तो मन का ही खेल है। मंत्र शब्द का भी यही अर्थ है: मन का जाल, मन का फैलाव। मंत्र से मुक्त होना है, क्योंकि मन से मुक्त होना है। मन न रहेगा तो मंत्र को सम्हालोगे कहां? और अगर मंत्र को सम्हालना है तो मन को बचाये रखना होगा। निश्चय ही मैंने तुम्हें कोई मंत्र नहीं दिया। नहीं चाहता कि तुम्हारा मन बचे। तुमसे मंत्र छीन रहा हूं। तुम्हारे पास वैसे ही मंत्र बहुत हैं। तुम्हारे पास मंत्रों का तो बड़ा संग्रह है। वही तो तुम्हारा सारा अतीत है। बहुत तुमने सीखा। बहुत तुमने ज्ञान अर्जित किया। कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है, कोई जैन है, कोई ईसाई है। किसी का मंत्र कुरान में है, किसी का मंत्र वेद में है। कोई ऐसा मानता, कोई वैसा मानता। मेरी सारी चेष्टा इतनी ही है कि तुम्हारी सारी मान्यताओं से तुम्हारी मुक्ति हो जाए। तुम न हिंदू रहो, न मुसलमान, न ईसाई। न वेद पर तुम्हारी पकड़ रहे, न कुरान पर। तुम्हारे हाथ खाली हो जायें। तुम्हारे खाली हाथ में ही परमात्मा बरसेगा। रिक्त, शून्य चित्त में ही आगमन होता परम का; द्वार खुलते हैं। तुम मंदिर हो। तुम खाली भर हो जाओ तो प्रभु आ जाए। उसे जगह दो। थोड़ा स्थान बनाओ। अभी...

भगवत्ता एक सत्य है ओशो

 भगवत्ता एक सत्य है; भगवान एक कल्पना। भगवत्ता एक अनुभव है; भगवान, एक प्रतीक, एक प्रतिमा। जैसे तुमने भारत माता की तस्वीरें देखी हों। कोई चाहे तो प्रेम की तस्वीर बना ले। लोगों ने प्रभात की तस्वीरें बनाई हैं, रात्रि की तस्वीरें बनाई हैं। प्रकृति को भी रूपायित करने की चेष्टा की है। काव्य की तरह वह सब ठीक, लेकिन सत्य की तरह उसका कोई मूल्य नहीं। जीवन, अस्तित्व संज्ञाओं से नहीं बनता, क्रियाओं से बनता है। और हमारी भाषा संज्ञाओं पर जोर देती है। जैसे सच पूछो तो जब हम कहते हैं वृक्ष है, तो गलत कहते हैं। कहना चाहिए... वृक्ष हो रहा है। वृक्ष एक क्रिया है, जीवंतता है। वृक्ष कोई ऐसी चीज नहीं जो ठहरी है; गतिमान है, गत्यात्मक है, प्रवाहमान है। वृक्ष की तो छोड़ ही दो, हम तो यह भी कहते हैं कि नदी है। यूनान के रहस्यवादी हेराक्लाइटस ने कहा है: एक ही नदी में दुबारा उतरना संभव नहीं है। और मैं तो कहता हूं: एक ही नदी में एक बार भी उतरना संभव नहीं। क्योंकि जब तुम्हारा पैर नदी के ऊपरी तल को छूता है तब नदी भागी जा रही है। जब तुम्हारा पैर थोड़ा पानी में भीतर धंसता है तब तक ऊपर का पानी भागा जा रहा है। जब तक तुम...

नया मनुष्य ,ओशो

नया मनुुष्य ओशो  आनंदित हों कि पुराना मर रहा है... नया मनुष्य कोई युद्धक्षेत्र नहीं है, विभाजित व्यक्तित्व नहीं है बल्कि एक अविभाज्य मानव की प्रतिमा है, अद्वितीय, जीवन के साथ समग्रता से सहक्रियाशील। नया मनुष्य मूर्तरूप है अधिक सक्षम, रूपांतरित व्यक्तित्व का, ब्रह्मांड में नये ढंग से होने का, सत्य को एक गुणात्मक भेद से देखने और अनुभव करने का। तो कृपा करें और अतीत के बीत जाने का शोक न मनाएं। आनंदित हों कि पुराना मर रहा है, रात्रि विदा हो रही है और क्षितिज पर पौ फटने लगी है। मैं प्रसन्न हूं, अत्यंत प्रसन्न हूं कि पारंपरिक मनुष्य विदा हो रहा है... कि पुराने चर्च खंडहर बन रहे हैं, कि पुराने मंदिर सूने पड़े हैं। मुझे असीम प्रसन्नता है कि पुरानी नैतिकता धरती पर चारों खाने चित्त पड़ी है। यह एक महान संकट की घड़ी है। यदि हम चुनौती स्वीकार कर लें तो यह एक अवसर है नये को निर्मित करने का। अतीत में इतना उपयुक्त समय कभी भी नहीं था। तुम अत्यंत सुंदरतम युग में रह रहे हो, क्योंकि पुराना विदा हो रहा है, या विदा हो गया है, और एक अराजकता पैदा हो गयी है। और अराजकता में से ही महान सितारों का जन्म होता है। त...

क्या दुनिया अधिक पागल होती जा रही है?

 "ऐसा लगता है कि दुनिया दिन पर दिन अधिक से अधिक पागल होती जा रही है। कोई नहीं जानता कि क्या हो रहा है और हर चीज उलटी-सीधी और गड़बड़ हो गई है। यह बात अखबार कहते हैं। क्या यह सच है? और यदि ऐसा है तो क्या जीवन में कोई आत्यंतिक संतुलन है जो हर चीज को स्थिर रखे हुए है?'   दुनिया वैसी ही है; यह हमेशा ऐसी ही रही है-उलटी, पागल, विक्षिप्त। सच तो यह है कि सिर्फ एक नई बात दुनिया में हुई है और वह यह होश कि हम पागल हैं, कि हम उलटे हैं, कि हममें कुछ मौलिक गलती है। और यह महान आशीर्वाद है-यह होश। निश्चित ही यह शुरुआत है; एक लंबी प्रक्रिया का सिर्फ क ख ग, सिर्फ बीज, लेकिन बहुत अर्थपूर्ण। दुनिया अपने विक्षिप्त ढंगों के प्रति कभी भी सचेत नहीं थी जितनी कि आज है। यह हमेशा ऐसी ही रही है। तीन हजार सालों में मानव ने पांच हजार युद्ध किए। क्या तुम कह सकते हो कि मानवता स्वस्थ रही है? कोई मानवता के इतिहास में यह याद भी नहीं कर सकता कि कोई ऐसा समय रहा हो जब लोग एक-दूसरे को धर्म के नाम पर या परमात्मा के नाम पर या शांति, मानवता, वैश्विक भाईचारे के नाम पर नष्ट न करते रहे हों। बड़े-बड़े शब्दों के पीछे कुरूप अ...