परस्पर निर्भरता हमारी आवश्यक्ता है
राष्ट्रों के दिन लद गए। लेकिन अभी भी वे बने हैं, और वे ही सबसे बड़ी समस्या हैं। विश्व का सिंहावलोकन करने पर विचित्र अहसास मन में उभरता है कि हमारे पास सब कुछ है, बस हमें एक मानवता की जरूरत है। उदाहरण के लिए, इथोपिया में लोग मर रहे थे-प्रतिदिन एक हजार लोग-और यूरोप में करोड़ों डालर की कीमत का अन्न सागर में डुबोया जा रहा था। बाहर से देखने वाला कोई भी प्राणी सोचेगा, मानवता पागल हो गई है। हजारों लोग भूखों मर रहे हैं। और मक्खन और अन्य खाद्य वस्तुओं के अंबार सागर में डुबोए जा रहे हैं। लेकिन इथोपिया से पाश्चत्य जगत को कोई लेना-देना नहीं है। उनकी चिंता इतनी ही है कि उनकी अर्थव्यवस्था बच जाए और उनकी यथापूर्व स्थिति (स्टेटस-को)बनी रहे। और अपने आर्थिक ढांचे की रक्षा करने की खातिर वे उस भोजन को विनष्ट करने को तैयार हैं जो हजारों लोगों की जानें बचा सकता था। समस्याएं विश्वव्यापक हैं, समाधान भी विश्वव्यापक होने चाहिए। और मेरी समझ बिलकुल साफ है कि चीजें ऐसी जगहों में हैं जहां उनकी जरूरत नहीं है; और अन्यत्र सारा जीवन ही उन पर निर्भर करता है। विश्व शासन का अर्थ है: इस भूगोल की समग्र परिस्थिति का सर्वेक्षण ...