जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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प्रकृति के अनसुलझे रहस्य-दुनिया का लक्ष्मण रेखा

 

प्रकृति के अनसुलझे रहस्य-दुनिया का लक्ष्मण रेखा


प्रकृति के अनसुलझे रहस्य-दुनिया का लक्ष्मण रेखा

पूर्ववती रेखा को राम के भाई लक्ष्मण ने सीधे रूप में जानकीजी की रक्षार्थ खीचा था। यह बात सर्वविदित है। लेकिन इसी पृथ्वी की समुद्री सतह पर त्रिकोण रूप में भी एक रेखा खिंची हुई है। यह किसने खींची यह अज्ञात है। 

तो आइए, इस नई लक्ष्मण रेखा के विषय में जानकारी प्राप्त करें। अन्ध महासागर जिसे अटलांटिक महासागर कहा जाता है, में बरमूड़ा द्वीप समूह के पास एक ऐसा तिकोना क्षेत्र है, जिसे आधुनिक लक्ष्मण रेखा कहा जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

प्रकृति के अनसुलझे रहस्य-दुनिया का लक्ष्मण रेखा

समझा जाता है कि जो भी इस त्रिकोण के क्षेत्र में प्रवेश करता है, गायब हो जाता है। यह बात केवल मनुष्य जाति पर ही लागू नहीं होती बल्कि जलयान तथा वायुयान तक इस क्षेत्र में चालन करने पर तुरन्त गायब हो जाते हैं। 

यह जादई क्षेत्र त्रिकोण रूप में अमेरिकी तटवर्ती प्रदेश फ्लोरिडा से खेतोरिकों, बरमूड़ा द्वीप समूह तथा सान्तडोमिंगो से क्यूबा तक फैला हुआ है। 

वज्ञानिका तथा शोधार्थियों के अनसार क्षेत्र की विभीषिकाएं ऐसी है कि जिन प्राणियों को वे अपने क्षेत्र से बाहर रखना चाहती है, उन्हें निगल जाती हैं|

प्रकृति के अनसुलझे रहस्य-दुनिया का लक्ष्मण रेखा

एक समय था जब ऐसे घटनाक्रमों को दैवी प्रकोप कहकर टाल दिया जाता था. किन्त इन दिनों जो प्रत्यक्ष प्रमाण सामने आए हैं उन्हें देखते हुए उन पर विचार करना और कारणों को खोज निकालना आवश्यक समझा जाने लगा है। 

अटलांटिक महासागर की यह तिकोनी लक्ष्मण रेखा अब तक सौ से भी अधिक वायुयानों तथा जलयानों को निगल चुकी है। जिन वायुयानों तथा जलयानों की प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी है, ऐसों की संख्या भी कुछ कम नहीं होगी। 

इस खतरनाक जादुई क्षेत्र से जो मनुष्य या यान किसी भी प्रकार बच निकले, उनके द्वारा मिलने वाले विवरण निश्चय ही आश्चर्य में डालने वाले हैं। इस क्षेत्र में एक जलयान ऐसा मिला है, जिसका ढांचा भर हाथ लगा है। उसमें बैठे हुए यात्रियों का कोई अता-पता ही नहीं है। 

कभी-कभी इस खतरनाक क्षेत्र में एक विशालकाय जलयान निरुद्देश्य और दिशाहीन विचरण करते पाया जाता है। लोगों का अनुमान है कि यह विशालकाय जलयान सन् 1912 में इस क्षेत्र में डूबे टाइटैनिक नामक जलयान का प्रेत है जो कभी लोगों को नजर आता है तो कभी स्वत: ही गायब हो जाता है। 

इस खतरनाक क्षेत्र के विषय में सन् 1966 की एक घटना के बारे में कप्तान डौन हैनरी ने लिखा है। उनके अनुसार उनका जलयान जब इस क्षेत्र से गुजर रहा था, तब अचानक ही दिशा सूचक यन्त्र बन्द हो गया और जहाज में भयंकर छाया दिखलाई देने लगी। 

प्राणों की बाजी लगाकर ही बड़ी कोशिश के बाद जहाज को वापस लौटा सकना सम्भव हो सका। इसी प्रकार जीवित लौटे रिचर्डसन और नेकली नामक दो चालकों ने अपना अनुभव बतलाया कि उस क्षेत्र पर उड़ते हुए उनका दिशा सूचक यन्त्र यकायक बन्द हो गया और वे रास्ता भूल गए। 

नीच-ऊपर भयंकर धुन्ध छाई हुई थी। धुन्ध इतनी अधिक थी कि उसक कारण कुछ भी दिखलाई नहीं दे पा रहा था। फलतः जोर लगाकर का कोशिश की गई। संयोग ही था कि दिशा जान न होने पर भी वापस लाटना और जीवित बचना सम्भव हो सका। 

इस क्षेत्र का पता लगाने तथा विशेष जानकारी प्राप्त करने के लिए सन् 1955 में जापान के वैज्ञानिकों का एक दल इस क्षेत्र में आया था। दल तो यहां तथ्यों की जानकारी लेने के लिए आया था। लेकिन तथ्यों का पता लगाना तो दूर रहा, पूरा जहाज ही गायब हो गया जिसका आज तक कोई पता नहीं चल सका। 

कई अन्य शोधकर्ताओं ने इस रहस्यमय क्षेत्र के सम्बन्ध में विभिन्न अनुमान लगाए और निष्कर्ष निकाले हैं। हैराल्ड वाइकिंग इसे अन्तरिक्ष के किसी अन्य लोकवासियों के साथ पृथ्वी से सम्बन्ध रखने वाला क्षेत्र मानते हैं। 

प्रकृति के अनसुलझे रहस्य-दुनिया का लक्ष्मण रेखा

इस मार्ग से होकर अन्य लोकवासी आसमान से धरती पर आते हैं और खोज खबर तथा अभीष्ट पदार्थ लेकर वापस लौट जाते हैं। ऐसा ही कुछ मिलता-जुलता अनमान अर्जेन्टाइना के विज्ञानी रोमनी अंक ने भी लगाया है। उनका कथन है कि यह क्षेत्र अंतरिक्षीय आदान-प्रदान का अपने ढंग का विचित्र केन्द्र है।

वैज्ञानिक अब भी इस क्षेत्र पर बराबर नजर रखे हुए हैं। किन्तु कुछ भी हाथ नहीं लग पा रहा है। सचमुच यह एक और लक्ष्मण रेखा ही है। 

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