जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

About Us

About Us
Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

यह ब्लॉग खोजें

MK PANDEY PRESIDNT OF GVB

MK PANDEY PRESIDNT OF GVB

Contribute

Contribute
We are working for give knowledge, science, spiritulity, to everyone.

Ad Code

क्या नील आर्मस्ट्रांग सचमुच चांद पर पहुंचे थे?

 

क्या नील आर्मस्ट्रांग सचमुच चांद पर पहुंचे थे?



क्या नील आर्मस्ट्रांग सचमुच चांद पर पहुंचे थे? 

39 साल पहले 16 जुलाई को ब्रह्मांड विजय का एक महान इतिहास रचा गया था। जब 2 बजकर 56 मिनट और 15 सेकंड (जीएमटी के मुताबिक) पर अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग के कदम चांद की धरती पर पड़े। मानव इतिहास में रोमांच और विजय का यह अद्भुत क्षण था। मगर क्या सचमुच ऐसा था? कई खोजें इस संबंध में बेहद सनसनीखोज तथ्य पेश कर रही हैं जो यह साबित करते हैं कि नील आर्मस्ट्रांग चांद पर कतई नहीं पहुंचे थे। वह तो बस अमेरिका द्वारा सोवियत संघ को उल्लू बनाने के लिए ट्रिक फोटोग्राफी के जरिए किया गया कमाल था। 

क्या नील आर्मस्ट्रांग सचमुच चांद पर पहुंचे थे? 

इस महान चंद्र अभियान को संदेह की निगाहों से देखा जा रहा है और जो ऐसा कर रहे हैं, वे कोई सामान्य लोग नहीं हैं। बल्कि धुरंधर अंतरिक्ष शास्त्री हैं। कई दूसरे विशेषज्ञ इसकी विश्वसनीयता के विश्लेषण में संलग्न हैं। उनकी राय में सोवियत संघ को महाकाश की दौड़ में मात देने के लिए अमेरिका द्वारा संभवतः ‘ट्रिक फोटोग्राफी’ का सहारा लिया गया था और इस तरह सारे संसार के दर्शकों की आंखों में धूल झोंकी गई थी। 

क्या नील आर्मस्ट्रांग सचमुच चांद पर पहुंचे थे? 

कुछ साल पहले अंतरिक्ष अभियानों की स्वर्ण जयंती के पहले सोशल नेटवर्किंग साइटों पर ऐसे संदेह के बीज बोए जा रहे थे कि 1969 से 1962 के बीच हुए चंद्र विजय के दृश्य असली नहीं थे और चंद्र विजय के शुरूआती ऐतिहासिक दावे खोखले हैं। संदेह जताने वाले रैल्फ रेने के मुताबिक चंद्र विजय के दौरान अमेरिका का राष्ट्रीय ध्वज लहराता दिख रहा था। ऐसा वातावरण विहीन चांद पर कैसे मुमकिन है? उन्होंने अपनी किताब ‘नासा मूंड अमेरिका’ में बाकायदा ये सवाल खड़े किए हैं। उनकी दलीलें दमदार हैं। क्योंकि बिना हवा के कोई ध्वज किस करिश्मे के तहत लहराते दिखे? इतना ही नहीं, अंतरिक्ष में 560 मील की ऊंचाई पर ‘वैन ऐलेन बेल्ट’ नामक रेडियोधर्मी पट्टी से गुजरते हुए इन यात्रियों को तो तिनके की तरह जलभुन कर खाक हो जाना चाहिए था। हालांकि इस आग के दरिया से गुजरने के वीडियो दृश्य स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन उनकी पुस्तक में प्रकाशित तस्वीरों को देखने से लगता है कि उन्हें किसी विज्ञापन एजेंसी ने इत्मीनान से जारी किया है। ध्यानपूर्वक देखने से इन दोनों में कहीं कोई समानता दिखाई नहीं देती। वीडियो दृश्य और उनकी किताबी तस्वीर में इतना फर्क? 

एक और संदेहकर्ता बिल कोसिंग ने अपनी किताब ‘वी नंबर वेंट टू दी मून’ में तो यहां तक दावा किया है कि ‘सैटर्न-वी’ रॉकेट में अंतरिक्ष यात्रियों की शूटिंग किसी गोपनीय ठिकाने पर हुई और वापसी का कैप्सूल वायुयान से समुद्र में गिरा दिया गया। चंद्र अभियान में सोवियत संघ को पछाड़ने की नीति के अलावा दक्षिण पूर्व एशिया में कम्युनिस्ट विरोधी तोड़फोड़ के मद से हुए भारी खर्च को छिपाना था। उसमें 40 बिलियन की रकम खर्च हो चुकी थी। 

बहरहाल कई विशेषज्ञों की राय में वेन ऐलेन बेल्ट’ की रेडियोधर्मिता इतनी नहीं होती कि कोई गुजरने वाला जल-भुनकर राख हो जाए। ‘डार्कमून अपोलो एंड दी व्हिसल ब्लोअर्स’ के लेखक डेविस एस पर्सी ने माना है कि अंतरिक्ष यात्री चांद पर तो उतरे थे, लेकिन उनकी गतिविधियों के दृश्यों का हुबहू विवरण नहीं था। यानी नासा ने अवतरण के दृश्यों के साथ छेड़छाड़ की और दर्शकों के लिए उन्हें रोमांचक बनाया। अपोलो-11 के कमांडर थे नील आर्मस्ट्रांग। मुख्यालय ‘कोलंबिया’ के चालक थे मिचाइल कालिंस और अवतरण खंड ‘ईगल’ के चालक थे ई. एल्ड्रिन। अपोलो कार्यक्रम के तहत 26 फरवरी 1966 को अंतरिक्ष यात्रियों ने पहले अपोलो चंद्रयात्राएं की थीं। जाहिर है इन यात्राओं का मख्य उददेश्य मानव सहित यान भेजकर सुरक्षित तौर पर उसे धरती पर वापस लाना था। साथ में पांच चुहे भी गए थे। 

इस अभियान में कॉस्मिक किरणों का अध्ययन किया गया। चंद्रमा पर नारगी रग की मिट्टी खोजी गई। जो उल्काओं की ऊष्मा के कारण मिट्टी के पिघलने से उत्पन्न कांच के दानों से बनी थी। उस समय संदेह का ऐसा सनसनीखेज माहौल व्याप्त था कि तीनों अंतरिक्षों को नजरबंद कर दिया गया। अंतरिक्ष वैज्ञानिक किसी भी तरह का जोखिम उठाने को तैयार नहीं थे। हर कदम फूंक-फूंक कर रखा जा रहा था कि उनके साथ कोई ऐसा संकटजनक सामान तो अंतरिक्ष से धरती पर नहीं पहुंच गया जिसकी जानकारी नहीं हो और सभी को खामियाजा भुगतना पड़े। यही वजह थी कि जैसे ही ऐतिहासिक चंद्र विजय के बाद अपोलो-11 जमीन पर उतरा उसके उतरते ही हेलिकॉप्टर उनके ऊपर मंडराने लगे। इसके लिए पूर्व सावधानी बरती गई थी कि कहीं चंद्रतल के कोई जीवाणु या विषाणु अंतरिक्ष यात्रियों के साथ पृथ्वी में प्रवेश न कर जाएं। अंतरिक्ष यात्रियों को विशेष रूप से बनाई गई औषधि छिड़की पोशाकें दी गईं, जिन्हें पहनकर वह शान से बाहर निकले और तीन यात्रियों को लेकर हेलिकॉप्टर 16 किलोमीटर दूर खड़े विमान वाहक पोत के डेक पर उतरा। 

पोत पर तीनों अंतरिक्ष यात्रियों को तीन दिनों तक एक अलग कमरे में रखा गया। फिर अंतरिक्ष यात्रा के केंद्र ह्यूस्टन में विशेष रूप से निर्मित एक ईमारत में 21 दिनों अलग-थलग रखा गया। 4 अक्टूबर 1956 को सोवियत संघ ने संसार का पहला कृत्रिम उपग्रह स्कूतनिक-1 कक्षा में स्थापित कर अंतरिक्ष युग का सूत्रपात किया था और उसके बारह वर्षों के भीतर ही अमेरिका की चंद्र विजय ने चमत्कार कर दिया था। अपोलो-11 के चंद्र यात्री 11 किलोग्राम मिट्टी-पत्थर के नमूने विशेष धातु से बने दो वायुरहित बसों में सीलबंद कर लाए थे। अंतरिक्ष यान के पृथ्वी पर अवतरण के बाद अलग-अलग वायुयानों का इस्तेमाल किया गया कि कहीं दुर्घटनावश चांद के नमूने नष्ट न हो जाएं। चंद्र-चट्टानों के परीक्षण से पता चला है कि चंद्रमा का अस्तित्व 4.8 अरब वर्ष के आसपास है जो कि पृथ्वी का हमउम्र है। ऐसा नहीं लगता कि चंद्रमा पृथ्वी से टूटकर बना हो या कहीं और बना हो। चंद्रमा के पर्वतीय भाग की चट्टानें मैदानी भागों की चट्टानों की अपेक्षा अधिक पुरानी प्रतीत होती हैं। 

इसमें शक नहीं कि इन नमूनों के आधार पर चांद की चर्चा आधी-अधूरी ही है। चंद्र-यात्रा की चाहत से कई सवाल भी उठे हैं, जिनका अभी तक कोई भी निष्कर्ष निर्णायक नहीं है। दरअसल, अभी तक चंद्रविज्ञान आरंभ हुआ है, अंत नहीं। चंद्रमा का आकाश नीला नहीं स्याह है। कालिमा की कालिख के नीचे विभिन्न आकार वाले गड्डे, खाइयां, पर्वत और टीले, कंकड़-पत्थर, धूल भरे विशाल मैदान हैं। न हवा है, न पानी, न हरियाली, न ध्वनि। खामोशी ही खामोशी है। यहां किसी तरह की खुसर-पुसर नहीं हो सकती। उससे बड़ी-बड़ी गहरे गर्तो का राज जन्म काल से ही उल्काओं के प्रहारों में छिपा है। वह भी मजबूर है क्योंकि उल्कापिंडों से बचाव के लिए वहां पृथ्वी की तरह वायुमंडल नहीं है। 

क्या नील आर्मस्ट्रांग सचमुच चांद पर पहुंचे थे? 

अब वह दिन दूर नहीं जब अंतरिक्ष यात्रियों की तरह साधारण लोग भी चांद का सफर करने में सक्षम हो जाएंगे और उसका छिपा हुआ चेहरा देख सकेंगे। पृथ्वी से अदृश्य रहने वाला चांद का चेहरा पहाड़ी है और क्रेटरों से भरा पड़ा है। समतल मैदानी भाग नदारद है। चांद के सफर के बाद सच-झूठ का भेद अपने आप खुल जाएगा और छल-कपट के आरोप-प्रत्यारोपों की अहमियत जाती रहेगी। 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ