जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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रहस्य जो सुलझ न सके-हिम मानव हकीकत है!

 

रहस्य जो सुलझ न सके-हिम मानव हकीकत है!


रहस्य जो सुलझ न सके-हिम मानव हकीकत है!

रहस्य रोमांच सस्पेंस और हैरत में डाल देने वाली विश्व की ऐसी सत्य घटना है जो आज भी रहस्य की धुन में दफन है।

अफगानिस्तान से लगी रूस की सीमा पर पामीर पहाड़ियों के बीहड़ जंगलों में चार व्यक्ति अपने कैंप में सो रहे थे। चारों ओर चांदनी रात की रोशनी बिखरी हुई थी और था गहन सन्नाटा! इन्हीं चार लोगों में गेतान्या सिफोरोवा नाम की एक महिला भी थी। पता नहीं, उसने क्या महसूस किया कि वह सोते हुए अचानक उट कर बैठ गई। सामने नजर दौड़ाते ही वह चकित रह गई।

बामुश्किल 10 गज दूर चट्टान पर लंगूर और आदमी के बीच की शक्ल-सूरत का एक जीव बैठा हुआ था। उस घटना को याद करते हुए सिफोरोवा बताती है कि वह एक विशालकाय जीव था। उसके पूरे शरीर पर भूरे रंग के बाल थे और वह किसी खिलाड़ी की तरह घुटनों पर कोहनियां टेके बैठा था। 

उसकी आकृति लगभग मनुष्य की तरह की थी तथा जाहिरा तौर पर वह मादा थी। उसकी पकौड़ी जैसी नाक और छोटी-छोटी आंखें थीं तथा उसके चेहरे के दोनों ओर बालों की सीधी लटें लटक रही थीं। उसे देखते ही उत्तेजना के मारे मेरे हृदय की धड़कन तेज हो गई, क्योंकि वह वही जीव था जिसकी तलाश में, मैं और मेरे साथी यहां आए हुए थे। वह ‘होमिनायड’ यानी लंगूर-आदमी के बीच का दो टांगों वाला तथा अब तक मिलने वाले प्रागैतिहासिक जीव के बीच की कड़ी का जीव था। जिससे हिम मानव की कल्पना साकार होती है। 

हिम मानव के पैरों के निशान बहुत से लोग ले आए हैं, लेकिन अब तक इस संबंध में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिल पाई है। वैसे अब रूसी वैज्ञानिकों को विश्वास हो चला है कि हिम मानवों के रहस्य को वह जल्दी ही सुलझा लेंगे। क्योंकि पामीर पहाड़ियों में वा|व गार्ज नामक स्थान पर बहुत से कपिमानवों (एपमैन) के रहने का पता चल चुका है। 

हाल के वर्षो में इस क्षेत्र में ‘होमिनायड’ के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रागैतिहासिक विशेषज्ञ इगोर बोत्सर्वे के नेतृत्व मकर बार वैज्ञानिको का दल वहां गया है। उनका दावा है कि मानव-विशेषज्ञ गेलोन्या मिफोरोवा के मानसिक संप्रेषण शक्ति (टेलीपैथी) के प्रयोगों से इस सबब काफी सफलता भी मिली है। 

बोत्सर्वे का कहना है कि कलाहारी बुशमेन (दक्षिणी अफ्रीकी जंगली जाति के आदिमानव) तथा आस्ट्रेलिया के आदिमानव की तरह के आदिमानव अब भी एक दसरे को टेलीपैथी से मानसिक संदेश पहुंचा सकते हैं। ऐसा लगता है कि प्रागैतिहासिक मानव में संवेदना शक्ति अधिक विकसित थी। इसलिए कपिमानव से मानसिक संप्रेषण करने तथा उन्हें उनके गुप्त संप्रेषण का यह तरीका कारगर सिद्ध हो सकता है। 

श्रीमती गेलोन्या सिफोरोवा एक अनुभवी मानस विशेषज्ञ हैं और उन्होंने कई सफल वैज्ञानिक प्रयोग किए हैं। उन्होंने एक कपिमानव के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि उसे मानसिक संदेश भेजकर यह कहा गया कि वह हमारे सामने आए। साथ ही मैंने उसे आश्वासन भी दिया कि हम उसे कोई हानि नहीं पहुंचाएंगे।

सिफोरोवा ने आगे बताया कि एक बार हमने एक तालाब के किनारे कैंप लगाया। कैंप लगाने के बाद मैं तालाब में तैरने के लिए चल पड़ी। अचानक मैंने महसूस किया कि कोई मेरे ऊपर नजर रखे हुए है। मुझे पता चल गया कि वह एक ‘होमिनायड’ है, जो झोंपड़ियों में छिपा बैठा है। मैंने उसे संदेश भेजा कि हम एक मित्र की हैसियत से आए हैं। इसके बाद मैं शीघ्र कैंप को लौट आई। क्योंकि उस दिन काफी थक गई थी। रात को सोते समय मैं अचानक जाग गई। घड़ी एक बजकर पचास मिनट बजा रही थी। 

उस समय मैंने फिर महसूस किया कि कोई मेरे ऊपर नजर रखे हुए है। देखा तो पाया कि एक कपिमानव दस गज की दूरी पर चांदनी रात में बैठी हुई है। हम थोड़ी-थोड़ी देर बाद एक दूसरे को देखते रहे। बीच में उसने कई बार बिल्ली की तरह ‘म्याऊं-म्याऊं’ की आवाज की। मानो कुछ कह रही हो। इसके बाद उठकर चली गई। 

दूसरे दिन हम लोगों ने चट्टान के पास उसके कदमों के निशान देखे। वह निशान 14 इंच के थे। वहां इस बात के भी संकेत मिले कि वह दस गज के तालाब को छलांग कर गई है। इसके बाद उससे मेरा संपर्क तब हुआ, जब हम लौटने लगे। मैंने झाड़ी के पीछे से उसकी बिल्ली की तरह की आवाज सुनी। मैंने मानसिक तौर पर यह महसूस किया कि वह तीन ‘होमिनायड’ हैं जो हमें वापस जाते हुए देख रहे हैं।

एक अन्य मानस विशेषज्ञ नीना ग्रिन्योवा ने एक अन्य ‘होमिनायड’ को देखा है, जिसके बारे में उनका कहना है कि उसका गला काफी छोटा था और वह आदमी से ज्यादा मेल खाता था। उसका सिर आगे की ओर था और दोनों हाथ दोनों बगलों में झूल रहे थे। वह भी बिल्ली की तरह की आवाज में उससे बातें करने की कोशिश कर रहा था। 

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