जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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विचित्र घटना-सांसों में आग

 

विचित्र घटना-सांसों में आग 

विचित्र घटना-सांसों में आग 

सन् 1882 में मिशिगन में एक ऐसे आदमी ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया, जो मुंह से सांस छोड़ता था तो उसके मुंह से निकलने वाली हवा आग पैदा करती थी। उस समय उसकी उम्र 24 साल थी और उसका नाम था ए. डब्ल्यू. अंडरवुड। उसकी इस विलक्षण बीमारी का पता सबसे पहले मिशिगन के डॉ. एल. सी. वुडमेन को लगा जब उसके पास अंडरवुड चिकित्सा सहायता मांगने के लिए आया। डॉ. वूडमेन ने अपने साथियों के साथ उसका परीक्षण किया और वे यह देख कर अवाक रह गए कि जब अंडरवुड ने अपने मुंह से छोड़ी सांस से आग पैदा करके दिखाई। 

विचित्र घटना-सांसों में आग 

11 सितम्बर, 1882 को मिशिगन मेडिकल न्यूज पत्रिका में डॉ. वुडमेन ने लिखा है कि उनके सामने अंडरवड ने जब एक रूमाल अपने मुंह पर रखा और उस सास छोड़ते वक्त जोर से रगड़ा तो रूमाल भक से जल उठा। हमने उसको निर्वस्त्र किया और उसके हाथ अच्छी तरह से धोए। उसके बाद भी उसने अपने मुंह के पास लाए कागज और कपड़े के टुकड़े को अपनी सांस से जलाकर दिखाया। उसने पेड़ों की सूखी पत्तियों के ढेर को भी अपनी सांस से जलाकर दिखाया। डॉ. वुडमेन ने सार्वजनिक तौर पर इस बात की पुष्टि की कि अंडरवुड कोई अद्वितीय करामात का धनी है और उसकी इस करामात में सच्चापन है।

डॉ. वुडमेन ने अंडरवुड का मुंह अच्छी तरह धोया और उसे कुछ रसायनों से साफ किया, उसके हाथों में सर्जन के काम में आने वाले दस्ताने पहनाए। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। अंडरवुड अपने मुंह से कपड़े की बनी चीजें आसानी से जलाता रहा। कई माह तक उसका परीक्षण किया गया लेकिन उसके बाद भी वैज्ञानिकों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि अंडरवुड मुंह की सांस से किस तरह कपड़े जला देता है। 

इतिहास में ऐसे और लोग भी हुए हैं जो अपनी इच्छा से आग लगा देते थे। इसी तरह का एक और मामला 1927 में तब सामने आया जब अमेरिका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति चार्ल्स डेवास की मौजूदगी में टेनिस प्रांत मेमफेस के निवासी एक मोटर मैकेनिक ने उपराष्ट्रपति का रूमाल लिया और उसमें जोर से सांस छोड़ी तो वह रूमाल धू-धू कर जल उठा। उपराष्ट्रपति और वहां मौजूद लोगों ने अच्छी तरह जांच लिया कि यह सब सचमुच हुआ था, कोई जादू नहीं था। 

अक्टूबर, 1886 में बारह वर्षीय एक लड़के विली ब्रोह पर कैलिफोर्निया में आरोप लगाया गया कि वह निगाह डाल कर ही किसी चीज को जला देता है। स्कूल में उससे यह करके दिखाने को कहा गया और उसने सबके सामने पांच चीजों को एक-एक कर अपनी निगाह से जला कर दिखाया। इस आधार पर उसे स्कूल से निकाल दिया गया। उसके मां-बाप ने सोचा कि उस पर शैतान की आत्मा हावी हो गई है और इसी कारण उन्होंने उसे घर से भी निकाल दिया। बाद में उसका पता नहीं चला कि वह कहां गया। 

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