जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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अनसुलझे रहस्य-हिमालय में अमरत्व

 

अनसुलझे रहस्य-हिमालय में अमरत्व



हिमालय में अमरत्व 

भारत के उत्तरी सीमान्त प्रहरी हिमालय जिसे संसार के पर्वतों का राजा कहा जाता हैं, के विषय में अनेक प्रकार की कथाएं मिलती हैं। वहां पर अमर आत्माओ के निवास की भी संभावनाएं कुछ कम महत्व नहीं रखती। 

हाल ही में यहाँ यति नामक एक विशाल व महान शक्तिशाली बाबा जिस पर गोली भी असर नहीं करती, के कई विवरण प्राप्त हुए हैं। जो हिमालय में अमरत्व की सम्भावना की पुष्टि करते हैं। 

पिछली बार एक गौरीशंकर श्रेणी (एवरेस्ट) पर चढ़ने के जितने भी अभियान हुए हैं, उन सबमें यति या हिम मानव के बारे में बताया गया है। ऊंचे चढ़ने वाले पर्वतारोहियों में से प्राय: सभी ने या तो हिम मानव की आकृति अथवा उसके पैरों के निशान देखे जाने का जिक्र किया है। 

कुछ वर्षों पूर्व एक साधु की हिमालय यात्रा का वर्णन प्रकाशित किया गया था। जिसमें बतलाया गया था कि उक्त साधु ने हिमालय में महाभारत काल के मनीषियों को समाधिस्थ देखा है। 

उक्त वर्णन के अनुसार वहां पर अग्नि-धूनियां जल रही थीं। यह वर्णन कितना सत्य है पता नहीं। किन्तु आयुर्वेद में ऐसी जड़ी-बूटियों का जिक्र अवश्य है उनसे शरीर के कोषाण निरन्तर नवीन बने रहते हैं। 

अनसुलझे रहस्य-हिमालय में अमरत्व

अमरता के विषय में न केवल भारतीय मनीषी ही उत्सुक हैं बल्कि आज विश्व भर के वैज्ञानिकों की शोध भी इस ओर कुछ कम नहीं हो रही है। अकेले अमेरिका में ही इस ओर लगभग एक हजार दल सक्रिय हैं। इनके निष्कर्षो से यह ज्ञात होता है कि अमरता कोई असम्भव चीज नहीं है और मृत्यु कोई आवश्यक घटना नहीं है। जबकि वृद्धावस्था एक प्रकार का जटिल रोग है। अतः हिमालय में अमर व्यक्तियों के मिलने की सम्भावनाओं को नकारा नहीं जा सकता है। 

जावाली (गढवाल) पहाडी जो लगभग 22000 फीट ऊचा हा एक पर्वतारोहण का रोचक वतांत देते हए एक लेखक ने स्वीकार किया हिम स्खलन की एक भयंकर दर्घटना से किसी अज्ञात शक्ति ने ही बचाया था। अन्यथा हम सब वहीं पर मर गए होते। 

वास्तव में क्या वह अज्ञात शक्ति कोई अमर आत्मा थी? अथवा कोई विशेष प्रकार की हिम मानव जैसी अजेय शक्ति। कहने का आशय यह है कि अवश्य ही काइ अलोकिक शक्ति थी। इस सन्दर्भ में एक अंग्रेज अधिकारी ( तत्कालीन पाश्चमी कमान के कमान्डेन्ट) श्री एल. पी. फैरेल जो स्वयं कई बार ऐसी आत्माओं से साक्षात्कार कर चुके थे, को उद्धृत करना असंगत न होगा। 

एक बार तत्कालीन कुमाऊं नरेश के साथ वे हिमालय की यात्रा का प्राकृतिक आनन्द लेने के लिए गए। यह घटना सन् 1940 ई. की है। एक दिन अचानक ही उनकी भेंट एक हुतात्मा-महात्मा से हुई। 

महात्मा जी ने अपनी पराशक्ति द्वारा प्रेरणा देकर भारत के मैदानी भाग से एक युवक को बुलाया। उन्होंने युवक से कहा, ‘वत्स, मैं तुम्हारे एक जन्म का नहीं बल्कि कई जन्मों का मार्गदर्शक हूं। इसलिए समझाता हूं कि सारा वक्त इन्द्रिय सुख की प्राप्ति पर ही खर्च न कर देना।’ 

उन्होंने आगे कहा, ‘तुम्हें नैतिक शिक्षा का भी काम करना है। इस घटना का उल्लेख स्वयं फैरेल ने किया है। वे लिखते हैं, ‘युवक ने प्रश्न किया। भगवान मेरी बुद्धि पर अज्ञान का पर्दा पड़ा है। मैं कैसे जानूं कि आप मेरे जन्म-जन्मान्तरों के मार्गदर्शक हैं।’ 

युवक के प्रश्न के उत्तर में महात्मा जी ने एक प्रकाश बिम्ब एक वृक्ष पर बनाकर दिखलाया, ठीक चलचित्र जैसा। जिसमें युवक से सम्बन्धित अनेक जन्मों के चित्र उभरकर एक के बाद एक आते गए। वह चित्र मैंने स्वयं भी देखा।’ 

 ‘महात्मा जी ने किसी अज्ञात शक्ति के बल पर ऐसा किया। वह चित्र देखकर मुझे ऐसा लगा कि इन महात्मा की आयु लगभग 1000 वर्ष से अधिक की रही होगी।’ 

सम्भव है, उन्होंने अपने स्थूल शरीर का कई बार कायाकल्प किया होगा। यह सब भी उन्हीं की कृपा से ज्ञात हो सका। साल्योन नामक पक्षी को देखा गया है कि अक्सर वह अण्डा देकर रोग का शिकार हो जाता है। 

खोज से पता चलता है कि उसकी पिट्यूटरीग्लैण्ड उत्तेजित हो उठती है। उससे एस. टी. हारमोन स्रवित होने लगता है जिससे वह अक्सर बीमार ही बना रहता है। 

1929 में स्ट्रांसबर्ग के कछ वैज्ञानिकों ने बत्तखों का जीन्स बदलने का प्रयोग किया। जिसके प्रयोग के लिए कम्पवेल तथा पैकिंस जाति की बतखें चुनी गई। दूसरे के पहले में प्रवेश कराए जीन्स से विशेष परिवर्तन का आभास हुआ तथा आयु वृद्धि का भी वैज्ञानिकों का अनुभव सुखद रहा। 

अश्वत्थामा, हनुमान, शिव आदि देवताओं के अमर होने का उल्लेख तो भारतीय धर्मग्रन्थों में बहतायत से मिलता है। परशराम के अमर होने का विवरण भी मिलता है। 

ये वे अनेक ऐसी घटनाएं हैं जिनके कारण यह बात असम्भव प्रतीत नहीं होती कि हिमालय में अमर आत्माएं हैं अथवा नहीं। उनका अमर होकर रहना अब भी रहस्यमय बना हुआ है। अनेक वैज्ञानिकों ने इसके लिए तापमान की आवश्यकता भी बतलाई है जो कि शून्य से भी कम हो। ‘स्पेश ओडेसी’ में श्री क्लार्क महोदय ने लिखा है कि 200-200, 400-400 वर्षों में पूरी होने वाली अन्तरिक्ष यात्राओं में मनुष्य को सुषुप्त अवस्था में रखकर लम्बी आयु प्रदान करने में सफलता प्राप्त की जा सकती है। जबकि हिमालय में उक्त तापमान मौजूद है। इसलिए अमर आत्मा के रहस्य को चाहे वे रहस्य ही क्यों न बना रहने दें किन्तु उसे नकारा नहीं जा सकता है। 

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