👉शरीर रैन बसेरा
🔷 राजा परीक्षित को भागवत् सुनाते हुए जब शुकदेव
को छः दिन बीत गये और सर्प के काटने से मृत्यु होने का एक दिन रह गया तब भी राजा का
शोक और मृत्यु भय दूर न हुआ। कातर भाव से अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा क्षुब्ध
हो रहा था।
🔶 शुकदेव जी ने राजा को एक कथा सुनाई- राजन्
बहुत समय पहले की बात है। एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता
भूलकर बड़े घने जंगल में जा निकला, रात्रि हो गई। वर्षा पड़ने
लगी। सिंह व्याघ्र बोलने लगे। राजा बहुत डरा और किसी प्रकार रात्रि बिताने के लिए
विश्राम का स्थान ढूँढ़ने लगा। कुछ दूर पर उसे दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने
एक गन्दे बीमार बहेलिये की झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान
बना रखा था। अपने खाने के लिये जानवरों का माँस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा
था। बड़ी गन्दी, छोटी, अन्धेर और
दुर्गन्ध युक्त वह कोठरी थी। उसे देखकर राजा पहले तो ठिठके पर पीछे उसने और कोई
आश्रय न देखकर विवशता वश उस बहेलिये से अपनी कोठरी में रात भर ठहर जाने देने के
लिए प्रार्थना की।
🔷 बहेलिये ने कहा- आश्रय हेतु कुछ राहगीर कभी-कभी
यहाँ आ भटकते हैं और मैं उन्हें ठहरा लेता हूँ। लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत
झंझट करते हैं। इस झोंपड़ी की गन्ध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर उसे छोड़ना ही
नहीं चाहते। इसी में रहने की कोशिश करते हैं और अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट
में मैं कई बार पड़ चुका हूँ। अब किसी को नहीं ठहरने देता। आपको भी इसमें नहीं
ठहरने देता। आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा।” राजा ने प्रतिज्ञा की- कसम खाई कि
वह दूसरे दिन इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो बहुत बड़ा है। यहाँ
तो वह संयोगवश ही आया है। सिर्फ एक रात ही काटनी है।
🔶 बहेलिये न अन्यमनस्क होकर राजा को झोंपड़ी
के कोने में ठहर जाने दिया, पर दूसरे दिन प्रातःकाल ही बिना झंझट किए
झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त की फिर दुहरा दिया। राजा एक कोने में पड़ा रहा। रात
भर सोया। सोने में झोंपड़ी की दुर्गन्ध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सवेरे उठा
तो उसे वही सब परमप्रिय लगने लगा। राज-काज की बात भूल गया और वहीं निवास करने की
बात सोचने लगा।
🔶 प्रातःकाल जब राजा और ठहरने के लिये आग्रह
करने लगा तो बहेलिये ने लाल पीली आँखें निकाली और झंझट शुरू हो गया। झंझट बढ़ा। उपद्रव
और कलह का रूप धारण कर लिया। राजा मरने मारने पर उतारू हो गया। उसे छोड़ने में
भारी कष्ट और शोक अनुभव करने लगा।”
🔷 शुकदेव जी ने पूछा-परीक्षित बताओ, उस
राजा के लिए क्या यह झंझट उचित था? परीक्षित ने कहा- भगवान
वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइए। वह तो बड़ा मूर्ख मालूम
पड़ता है कि ऐसी गन्दी कोठरी में अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर राज-काज छोड़कर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता था। उसकी मूर्खता पर तो मुझे भी क्रोध
आता है।”
🔶 शुकदेव जी ने कहा-परीक्षित वह और कोई नहीं
तुम स्वयं हो। इस मल मूत्र की कोठरी देह में जितने समय तुम्हारी आत्मा को रहना आवश्यक
था वह अवधि पूरी हो गई। अब उस लोक को जाना है जहाँ से आप आये थे। इस पर भी आप झंझट
फैला रहे हैं। मरना नहीं चाहते एवं मरने का शोक कर रहे हों। क्या यह उचित है?”
🔷 राजा ने कथा के मर्म को स्वयं पर आरोपित किया
एवं मृत्यु भय को भुलाते हुए मानसिक रूप से निर्वाण की अपनी तैयारी कर ली। अन्तिम
दिन का कथा श्रवण उन्होंने पूरे मन से किया।
🔶 वस्तुतः मरने के लिये हर मानव हो हर घड़ी तैयार
रहना चाहिये। यह शरीर तो कभी न कभी विनष्ट होना ही है। लेकिन आत्मा कभी नहीं मरती।
उसी को ऊँचा उठाने के प्रयास जीवन पर्यन्त किए जाते रहें तो भागी जन्म सार्थक किया
जा सकता है।
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