मयूर एवं क्रेन
एकः मयूरः तस्याः पंखस्य जडतां कृत्वा क्रेनं तातयति स्म । "मम तेजस्वीवर्णान् पश्यतु" इति सा अवदत्, "पश्यतु ते भवतः दरिद्रपक्षिणां अपेक्षया कियत् उत्तमाः सन्ति।" "अहं न अङ्गीकुर्वन् अस्मि" इति क्रेनः उत्तरितवान्, "यत् तव मम मम अपेक्षया दूरं समलैङ्गिकं भवति, परन्तु यदा उड्डयनस्य विषयः आगच्छति तदा अहं मेघेषु उड्डीयितुं शक्नोमि, यदा तु त्वं पृथिव्यां निमित्तः कस्मैचित् डङ्गिल् मुर्गः इव।
बिडालः पक्षी च .
एकः बिडालः श्रुतवान् यत् एकस्मिन् पक्षिणः पक्षिणः सन्ति इति । अतः सः स्वं वैद्यरूपेण स्वं उत्थापितवान्, अपि च स्वेन सह स्वव्यापारस्य सम्यक् वाद्यसमूहं गृहीत्वा द्वारे स्वयमेव प्रस्तुतवान्, पक्षिणां स्वास्थ्यस्य अनन्तरं पृष्टवान् च। "वयं बहु सुन्दरं करिष्यामः" इति ते प्रत्युवाच, तं न मुञ्चन्ति, "यदा वयं भवतः अन्तिमं दृष्टवन्तः तदा" इति।
खलनायकः स्वयमेव वेषं कर्तुं शक्नोति, परन्तु सः बुद्धिमान् न वञ्चयिष्यति।
(अहंकार और कपट पर आधारित दो शिक्षाप्रद कथाएँ)
एक बार एक मयूर अपने रंग-बिरंगे, चमकदार पंखों पर अत्यन्त गर्व करने लगा। वह पास खड़े क्रेन (सारस) को नीचा दिखाते हुए बोला—
“मेरे पंखों की शोभा तो देखो!
तुम जैसे साधारण और निर्धन पक्षियों की तुलना में
मैं कितना सुंदर और आकर्षक हूँ।”
क्रेन ने शान्त भाव से उत्तर दिया—
“मैं यह स्वीकार करता हूँ कि
तुम्हारे पंख मुझसे अधिक सुंदर हैं।
परन्तु जब उड़ान की बात आती है,
तब मैं बादलों तक पहुँच सकता हूँ,
आकाश में स्वतंत्र विचरण कर सकता हूँ।और तुम?
तुम तो धरती पर ही सीमित रहते हो,
जैसे कोई भारी-भरकम घरेलू पक्षी।”
मयूर निरुत्तर हो गया।
बाहरी सौंदर्य गर्व का कारण नहीं होना चाहिए।
वास्तविक श्रेष्ठता क्षमता, उपयोगिता और स्वतंत्रता में होती है,
न कि केवल दिखावे में।
दिखावटी सुंदरता से अधिक
गुण और सामर्थ्य का महत्व होता है।
एक बार एक बिडाल (बिल्ली) ने सुना कि कुछ पक्षी आपस में
शांति और सुरक्षा की बात कर रहे हैं।
यह सुनकर उस कपटी बिडाल के मन में एक चाल आई।
उसने स्वयं को वैद्य (डॉक्टर) के रूप में प्रस्तुत किया।
अपने साथ औषधियाँ और उपकरण लेकर
वह पक्षियों के द्वार पर पहुँचा और बोला—
“मैं तुम्हारे स्वास्थ्य की रक्षा करना चाहता हूँ।
तुम्हारे रोग दूर कर दूँगा,
तुम्हें पूर्ण सुरक्षा दूँगा।”
परन्तु पक्षी बुद्धिमान थे।
उन्होंने उत्तर दिया—
“जब हमने तुम्हें अन्तिम बार देखा था,
तब तुम हमें खाने की फिराक में थे।
अब अचानक उपकारी कैसे बन गए?”
इतना कहकर उन्होंने उस बिडाल को भीतर प्रवेश नहीं करने दिया।
जो व्यक्ति स्वभाव से दुष्ट होता है,
वह चाहे कितना ही साधु या सेवक का वेष बना ले,
उसकी नीयत बदलती नहीं।
खलनायक अपना वेष बदल सकता है,
पर अपनी बुद्धि और स्वभाव नहीं।
इन दोनों कथाओं से यह शिक्षा मिलती है कि—
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