जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

About Us

About Us
Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

यह ब्लॉग खोजें

MK PANDEY PRESIDNT OF GVB

MK PANDEY PRESIDNT OF GVB

Contribute

Contribute
We are working for give knowledge, science, spiritulity, to everyone.

Ad Code

महाभारत से जीवन-दर्शन: धन, धर्म और विवेक का संदेशमहाभारत से जीवन-दर्शन: धन, धर्म और विवेक का संदेश

महाभारत के 21 श्लोकों का विस्तृत विश्लेषण: धन, धर्म, दान, विवेक, अनुशासन और वैराग्य का जीवन-दर्शन। जानिए कैसे इन शिक्षाओं को आधुनिक जीवन में लागू करें



महाभारत से जीवन-दर्शन: धन, धर्म और विवेक का संदेश


प्रस्तावना

महाभारत केवल युद्ध, राजनीति और महाकाव्य नहीं है। यह जीवन और व्यवहार का गहन दर्शन प्रस्तुत करता है। इसमें धन, धर्म, दान, विवेक, अनुशासन और वैराग्य से जुड़े नियम और सूक्तियाँ हैं। यह लेख आपके लिए 21 चयनित श्लोकों के माध्यम से जीवन-दर्शन का सार प्रस्तुत करता है।

महाभारत का यह दृष्टिकोण विवेकपूर्ण जीवन जीने, समाज में सम्मान और आन्तरिक शांति प्राप्त करने का मार्ग बताता है।


1. अद्रोह, दान और करुणा

श्लोक उदाहरण:

अद्रोह सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते ॥ १२.१२४.६६

भावार्थ

  • किसी पर द्रोह न रखना और सभी जीवों के प्रति करुणाशील होना धर्म का पहला नियम है।
  • दान, अनुग्रह और शील इनसे पूरित होते हैं।

व्याख्या

यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि धर्म केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि मन और कर्म का संयोजन है।

  • क्रोध और द्वेष से जीवन विषम हो जाता है।
  • करुणा और दान से व्यक्ति अपने समाज और परिवार में स्थायी सम्मान प्राप्त करता है।

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

आज के समय में भी, सहानुभूति और सहायता ही व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक संतुलन बनाए रखते हैं।


2. धन और सामाजिक यथार्थ

श्लोक उदाहरण:

अधनं दुर्बलं प्राहुर्धनेन बलवान्भवेत् ।
सर्वं धनवता प्राप्यं सर्वं तरति कोशवान् ॥ १२.१३०.४९

भावार्थ

  • धन समाज में शक्ति का प्रतीक है।
  • निर्धन व्यक्ति दुर्बल माना जाता है।
  • धन से ही व्यक्ति अपने कार्य को सफल बना सकता है।

व्याख्या

महाभारत यह दिखाता है कि धन और संसाधन सामाजिक शक्ति देते हैं, लेकिन यह स्थायी नहीं हैं।

  • धनवान व्यक्ति समाज में अधिक प्रभावशाली होता है।
  • निर्धन व्यक्ति को आर्थिक कठिनाइयों के कारण अक्सर अवमानना झेलनी पड़ती है।

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

धन का सही उपयोग और विवेकपूर्ण दान ही आज भी समाज में स्थायी सम्मान दिलाते हैं।


3. धर्म और कर्तव्य

श्लोक उदाहरण:

अधर्मः क्षत्रियस्यैष यच्छय्यामरणं भवेत् ॥ १२.९७.२३

भावार्थ

  • क्षत्रिय का धर्म है युद्ध में भाग लेना।
  • शय्या पर बैठे मरना उसके लिए अधर्म है।

व्याख्या

धर्म को केवल नियमों से नहीं परखा जा सकता।

  • उसका मूल्य कर्तव्य और परिस्थितियों से तय होता है।
  • राजा या शासक का धर्म समाज के धर्म को आकार देता है।

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

  • हर व्यक्ति को अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियों को समझना और निभाना चाहिए।
  • पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन में निर्णय लेने में विवेक अनिवार्य है।

4. अनित्य और वैराग्य

श्लोक उदाहरण:

अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसञ्चयः ।
आरोग्यं प्रियसंवासो गृध्येत्तत्र न पण्डितः ॥ १२.३३०.१४

भावार्थ

  • यौवन, सौंदर्य, जीवन, धन, स्वास्थ्य और प्रियजनों का साथ अस्थायी हैं।
  • बुद्धिमान व्यक्ति इनसे अत्यधिक आसक्त नहीं होता।

व्याख्या

  • स्थायी पूँजी धर्म, विवेक और संयम हैं।
  • क्षणभंगुर वस्तुओं में अत्यधिक आसक्ति से दुःख बढ़ता है।

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

  • मानसिक संतुलन और दीर्घकालिक सुख के लिए आसक्ति का त्याग और विवेकपूर्ण व्यवहार जरूरी है।

5. कर्म और विवेक

श्लोक उदाहरण:

अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः ।
द्वावेव सुखमेधते दीर्घसूत्री विनश्यति ॥ १२.१३७.११

भावार्थ

  • भविष्य की योजना करने वाला और वर्तमान में तत्पर व्यक्ति ही सुखपूर्वक उन्नति करता है।
  • आलसी और टालमटोल करने वाला नष्ट हो जाता है।

व्याख्या

  • कर्म आरम्भ करना ही सफलता की पहली शर्त है।
  • विवेक और समयबोध के बिना कोई कार्य फलदायी नहीं होता।

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

  • कार्यों को स्थगित न करना, समय पर निर्णय लेना और सक्रिय रहना सफलता की कुंजी है।

6. दान और सामाजिक बुद्धि

श्लोक उदाहरण:

अनर्हते यद्ददाति न ददाति यदर्हते ।
अर्हानर्हापरिज्ञानाद्दानधर्मोऽपि दुष्करः ॥ १२.२०.९

भावार्थ

  • योग्य को दान देना और अयोग्य को न देना ही दान धर्म है।
  • बिना विवेक का दान कभी-कभी अधर्म का रूप ले लेता है।

व्याख्या

  • दान केवल देने का नाम नहीं,
  • बल्कि योग्यता, विवेक और परिपक्वता की परीक्षा है।

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

  • दान और सहयोग में विवेक, समय और पात्र की पहचान जरूरी है।
  • अन्यथा साधु कर्म भी असफल हो सकते हैं।

7. दिनचर्या और स्वास्थ्य

श्लोक उदाहरण:

अनायुष्यं दिवा स्वप्नं तथाभ्युदितशायिता ॥ १३.१०४.१३९

भावार्थ

  • दिन में सोना और सूर्योदय के बाद तक शय्या पर रहना आयु को क्षीण करता है।

व्याख्या

  • जीवन का संयम और दिनचर्या स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए अनिवार्य हैं।
  • प्राकृतिक समय के अनुसार जीवन व्यतीत करना ही सच्चा धर्म है।

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

  • सुबह जल्दी उठना, समय पर भोजन और कार्य—आधुनिक विज्ञान भी यही सिखाता है।

निष्कर्ष

21 श्लोकों की इस श्रृंखला से यह स्पष्ट होता है कि महाभारत केवल कथा या युद्ध नहीं है। यह व्यवहारिक जीवन, सामाजिक विवेक और आन्तरिक संतुलन का गहन दर्शन देता है।

मुख्य संदेश:

  1. धन महत्वपूर्ण है, पर विवेक और धर्म से होना चाहिए।
  2. धर्म सूक्ष्म है और परिस्थितियों से प्रभावित होता है।
  3. आन्तरिक वैराग्य और संयम स्थायी संपदा हैं।
  4. कर्म आरम्भ करना और तत्पर रहना सफलता का मूल है।
  5. सामाजिक बुद्धि और मर्यादा जीवन को सुरक्षित और संतुलित बनाती हैं।

महाभारत के श्लोक केवल दर्शन नहीं, बल्कि व्यावहारिक जीवन की सीख भी हैं।


यहां सभी 21 श्लोक का विस्तार से हिन्दी व्याख्या के साथ दिया गया है 

दृश्य 1 (अहिंसा और सत्य): एक शांत ऋषि या व्यक्ति जो वन में बैठा है, उसके पास एक हिरण सुरक्षित खड़ा है (अहिंसा), और वातावरण में एक दिव्य प्रकाश है जो सत्य का प्रतीक है। ​दृश्य 2 (दान और तप): एक राजा अपना राजसी आभूषण किसी जरूरतमंद को दे रहा है (दान), और पृष्ठभूमि में धूनी रमाए एक योगी ध्यान में मग्न है (तप)। ​दृश्य 3 (धर्म के लक्षण): एक प्राचीन मंदिर के प्रांगण में पत्थर के स्तंभ पर यह श्लोक संस्कृत में खुदा हुआ है, और उसके चारों ओर शांतिपूर्ण वातावरण है।


१ अदत्तस्यानुपादानं दानमध्ययनं तपः ।

अहिंसा सत्यमक्रोध इज्या धर्मस्य लक्षणम् ॥ १२.३६.१०

बहुत सुंदर श्लोक है। यह श्रीमद्भागवत पुराण (१२.३६.१०) का श्लोक है, जिसमें धर्म के लक्षण बताए गए हैं।


शब्दार्थ (पद-भेद सहित)

  • अदत्तस्य अनुपादानम् — जो दिया न गया हो, उसे न लेना (चोरी न करना)
  • दानम् — दान करना
  • अध्ययनम् — शास्त्रों का अध्ययन
  • तपः — संयम, तपस्या
  • अहिंसा — किसी को कष्ट न देना
  • सत्यम् — सत्य बोलना
  • अक्रोधः — क्रोध का त्याग
  • इज्या — ईश्वर-पूजन, यज्ञ
  • धर्मस्य लक्षणम् — धर्म के लक्षण हैं

भावार्थ (सरल हिन्दी में)

धर्म के लक्षण ये हैं—
जो वस्तु हमें दी न गई हो, उसे ग्रहण न करना;
दान करना;
शास्त्रों का अध्ययन करना;
तप और संयम का पालन करना;
अहिंसा रखना;
सत्य बोलना;
क्रोध का त्याग करना;
और ईश्वर की पूजा करना।


गूढ़ अर्थ (थोड़ा चिंतन)

यह श्लोक बताता है कि धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि

  • आचरण की शुद्धता,
  • मन की शांति,
  • और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का समन्वय है।

कलियुग में विशेष रूप से यह श्लोक बताता है कि धर्म का मूल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि आंतरिक संयम और करुणा है

2. यह श्लोक श्रीमद्भागवत पुराण (२.५५.१३) के भाव से जुड़ा हुआ है और राजनीति, शत्रु-नीति तथा धर्म की सूक्ष्म व्याख्या करता है।

श्लोक

अद्रोहसमयं कृत्वा चिच्छेद नमुचेः शिरः ।
शक्रः, साभिमता तस्य रिपौ वृत्तिः सनातनी ॥

एक भव्य और पौराणिक दृश्य (Epic Mythological Scene): देवराज इंद्र समुद्र के तट पर सूर्यास्त के समय विशाल असुर नमुचि का वध कर रहे हैं। इंद्र के हाथ में एक दिव्य और चमकता हुआ अस्त्र है। नमुचि का शरीर विशाल और डरावना है। वातावरण में प्राचीन भारत की कला शैली और नाटकीय रोशनी (Dramatic Lighting) है। आकाश में बिजली कड़क रही है और समुद्र की लहरें उठ रही हैं।"



शब्दार्थ

  • अद्रोह-समयम् कृत्वा — द्रोह न करने की शर्त/समझौता करके
  • चिच्छेद — काट दिया
  • नमुचेः शिरः — नमुचि असुर का सिर
  • शक्रः — इन्द्र
  • सा अभिमता — वही उचित मानी गई
  • तस्य — उसके (इन्द्र के) लिए
  • रिपौ वृत्तिः — शत्रु के प्रति व्यवहार
  • सनातनी — शाश्वत, परंपरागत

भावार्थ (सरल हिन्दी)

इन्द्र ने पहले यह शर्त स्वीकार की कि वह द्रोह नहीं करेंगे, फिर भी उन्होंने नमुचि असुर का सिर काट दिया। शत्रु के प्रति ऐसी नीति को ही इन्द्र के लिए उचित और सनातन माना गया है।


तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक धर्म की कठोर वास्तविकता दिखाता है—

  • शत्रु के साथ सीधी सरल नैतिकता हमेशा लागू नहीं होती
  • राष्ट्र, धर्म और लोक-रक्षा के लिए कभी-कभी
    रणनीति और नीति-चातुर्य आवश्यक हो जाता है

यहाँ “अद्रोहसमय” का उल्लंघन स्वार्थ के लिए नहीं,
बल्कि अधर्म के विनाश हेतु दिखाया गया है।


महत्वपूर्ण संकेत

यह श्लोक यह नहीं सिखाता कि छल करना धर्म है,
बल्कि यह बताता है कि—

अधर्मी के साथ वही नीति अपनाई जाती है,
जो धर्म की रक्षा कर सके।

इसी भाव को महाभारत में श्रीकृष्ण की नीति में भी देखा जाता है।

श्लोक

3. अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते ॥ १२.१२४.६६

केंद्र में: एक सौम्य और शांत व्यक्तित्व वाला व्यक्ति (एक ऋषि या आदर्श मनुष्य), जिसके चेहरे पर असीम शांति है। ​अद्रोह (Non-malice): उसके एक हाथ के पास एक छोटा पक्षी या हिरण निर्भय होकर बैठा है, जो यह दर्शाता है कि उस व्यक्ति से किसी भी जीव को भय नहीं है। ​दान और अनुग्रह (Charity & Grace): उसका दूसरा हाथ एक जरूरतमंद व्यक्ति की ओर मदद के लिए बढ़ा हुआ है, जो दया और उदारता का प्रतीक है। ​वातावरण: पृष्ठभूमि में एक प्राचीन भारतीय गुरुकुल या नदी का शांत किनारा है। सुनहरी धूप की किरणें (सकारात्मकता) चारों ओर फैली हुई हैं। ​शील (Character): व्यक्ति की सादगी और उसकी आभा (Aura) से उसके उत्तम चरित्र का बोध हो रहा है।


शब्दार्थ

  • अद्रोहः — द्रोह का अभाव, वैरभाव न रखना
  • सर्वभूतेषु — समस्त प्राणियों के प्रति
  • कर्मणा — कर्म से
  • मनसा — मन से
  • गिरा — वाणी से
  • अनुग्रहः — करुणा, उपकार की भावना
  • दानम् — दान
  • शीलम् — स्वभाव, आचरण
  • एतत् प्रशस्यते — यही प्रशंसनीय माना गया है

भावार्थ (सरल हिन्दी)

मन, वाणी और कर्म—तीनों से
सभी प्राणियों के प्रति द्रोह न रखना,
उन पर करुणा करना और दानशील होना—
यही श्रेष्ठ और प्रशंसनीय चरित्र है।


महाभारत का गूढ़ संदेश

शान्ति-पर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को समझाते हैं कि—

  • धर्म केवल नियम नहीं, स्वभाव है
  • जो व्यक्ति भीतर (मन), बाहर (वाणी) और व्यवहार (कर्म)
    तीनों में अहिंसक और करुणामय है,
    वही सच्चा धर्मात्मा है

यह श्लोक पहले बताए गए श्लोकों से सीधा जुड़ता है:

  • अदत्तस्यानुपादानम् → कर्म की शुद्धता
  • अहिंसा, सत्यम्, अक्रोधः → मन की शुद्धता
  • दान, अनुग्रह → सामाजिक धर्म

एक पंक्ति में सार

जो किसी से द्रोह नहीं करता, करुणा रखता है और दानशील है—
वही महाभारत की दृष्टि में आदर्श मनुष्य है।

४ अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः ।

या वृत्तिः स परोधर्मस्तेन जीवामि जाजले ॥ १२.२६२.६

केंद्र में: एक साधारण लेकिन तेजस्वी तुलाधार (व्यापारी) अपनी तराजू (Scales) के साथ बैठा है। उसकी तराजू पूरी तरह संतुलित है, जो न्याय और निष्पक्षता का प्रतीक है। ​अद्रोह (Non-harming): उसके आस-पास प्रकृति का सामंजस्य है। दुकान के पास छोटे जीव (जैसे चिड़ियाँ या बिल्ली) बिना किसी डर के घूम रहे हैं। ​सादगी: व्यापारी के चेहरे पर एक गहरी संतोष की मुस्कान है। वह केवल उतना ही लाभ ले रहा है जिससे किसी का अहित न हो। ​वातावरण: एक प्राचीन भारतीय बाज़ार का शांत दृश्य, जहाँ लेन-देन में छल-कपट के बजाय विश्वास और दया का भाव झलक रहा है। दूर पृष्ठभूमि में जाजलि ऋषि श्रद्धा भाव से इस दृश्य को देख रहे हैं।

यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.२६२.६) का ही विस्तारात्मक पाठ है और जाजलि–तुलाधार संवाद में आता है। यहाँ वृत्ति (जीविका/आचरण) के आधार पर परम धर्म का निर्णय किया गया है।


शब्दार्थ

  • अद्रोहेण एव भूतानाम् — समस्त प्राणियों के प्रति द्रोह किए बिना
  • अल्प-द्रोहेण वा पुनः — अथवा अत्यल्प, अनिवार्य द्रोह के साथ
  • आरम्भः — जीवन-यापन/कर्म का आरम्भ (जीविका)
  • या वृत्तिः — जो जीवन-वृत्ति है
  • सः परः धर्मः — वही सर्वोच्च धर्म है
  • तेन जीवामि — उसी के अनुसार मैं जीता हूँ
  • जाजले — हे जाजलि!

भावार्थ (सरल हिन्दी)

हे जाजलि!
जिस जीवन-वृत्ति से मनुष्य
या तो किसी भी प्राणी के प्रति द्रोह किए बिना,
या अत्यल्प और अनिवार्य द्रोह के साथ जीवन यापन करता है—
वही वृत्ति परम धर्म है।
मैं उसी धर्म से जीवन जीता हूँ।


गूढ़ व्याख्या

महाभारत यहाँ यथार्थ धर्म सिखाता है:

  • आदर्श स्थिति → पूर्ण अद्रोह
  • व्यवहारिक संसार → कभी-कभी अल्प, अनिवार्य द्रोह (जैसे खेती, रक्षा, जीविका)
  • निर्णय का मापदंड → भाव, करुणा और न्यूनतम हिंसा

इसलिए धर्म को अव्यवहारिक कठोरता नहीं,
बल्कि करुणा-प्रधान जीवन-पद्धति माना गया है।


एक सूत्र में सार

जिस जीविका में द्रोह न्यूनतम हो और करुणा अधिकतम—
वही महाभारत की दृष्टि में परम धर्म है।

५ अधनं दुर्बलं प्राहुर्धनेन बलवान्भवेत् ।

सर्वं धनवता प्राप्यं सर्वं तरति कोशवान् ॥ १२.१३०.४९

केंद्र में: एक भव्य राजा या शक्तिशाली व्यक्तित्व जो एक ऊँचे आसन पर विराजमान है। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास और सत्ता का तेज है। ​धन और शक्ति (Wealth & Power): उसके पास स्वर्ण मुद्राओं से भरी थैलियाँ और रत्न रखे हैं। उसके हाथ में एक राजदंड है, जो उसके "बलवान" होने का प्रतीक है। ​कोशवान (Resourceful): पृष्ठभूमि में एक बड़ा राजकोष या खजाना दिखाई दे रहा है, जो यह दर्शाता है कि उसके पास हर संकट से निपटने के संसाधन मौजूद हैं। ​सफलता का मार्ग: एक बड़ी बाधा (जैसे कोई गहरी खाई या पर्वत) के ऊपर एक मजबूत पुल बना हुआ है, जिसे वह अपने संसाधनों के बल पर आसानी से पार कर रहा है (सर्वं तरति)। ​वातावरण: एक समृद्ध साम्राज्य का दृश्य, जहाँ हाथी, घोड़े और सैनिक उसकी शक्ति की गवाही दे रहे हैं। चारों ओर वैभव और ऐश्वर्य की सुनहरी चमक है।

यह श्लोक भी महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.१३०.४९) का है और समाज के कठोर यथार्थ को बिना संकोच प्रकट करता है।


शब्दार्थ

  • अधनम् — निर्धन व्यक्ति को
  • दुर्बलम् — निर्बल कहा जाता है
  • प्राहुः — लोग कहते हैं
  • धनेन — धन के द्वारा
  • बलवान् भवेत् — मनुष्य बलवान हो जाता है
  • सर्वम् — सब कुछ
  • धनवता प्राप्यम् — धन वाले को प्राप्त हो सकता है
  • सर्वम् तरति — वह सब बाधाएँ पार कर लेता है
  • कोशवान् — जिसके पास धन है

भावार्थ (सरल हिन्दी)

लोग निर्धन को निर्बल कहते हैं;
धन के द्वारा मनुष्य बलवान बन जाता है।
धनवान के लिए सब कुछ प्राप्त करना संभव है
और वही सब संकटों को पार कर लेता है।


महाभारत का यथार्थवाद

यह श्लोक धन-पूजा का उपदेश नहीं देता,
बल्कि समाज की वास्तविक मानसिकता उजागर करता है—

  • सम्मान और प्रभाव अक्सर धन के साथ जुड़ जाते हैं
  • निर्धन की बात अनसुनी रह जाती है
  • धन साधन है, लक्ष्य नहीं—पर उसके अभाव में धर्म भी कठिन हो जाता है

इसी शान्ति-पर्व में यह संकेत भी है कि

धन का अर्जन धर्म से हो और उसका उपयोग लोक-कल्याण में।


पूर्व श्लोकों से संगति

आप जिन श्लोकों की शृंखला दे रहे हैं,
उनका क्रम बहुत अर्थपूर्ण बन रहा है:

  • अद्रोह, अनुग्रह → आंतरिक धर्म
  • वृत्ति → व्यवहारिक धर्म
  • धन → सामाजिक शक्ति

महाभारत दिखाता है कि धर्म, जीविका और धन—तीनों का संतुलन ही जीवन है


एक पंक्ति में सार

धन स्वयं धर्म नहीं, पर धर्म के आचरण का सशक्त साधन अवश्य है।

केंद्र में: एक व्यक्ति जो जर्जर और पुराने वस्त्रों में है, एक सुनसान रास्ते पर एकाकी बैठा है। उसके चेहरे पर गहरी चिंता, थकान और उदासी के भाव हैं। ​प्रतीकात्मकता (Symbolism): उसके पास एक खाली कटोरा या खाली थैली पड़ी है, जो उसकी विवशता को दर्शाती है। पृष्ठभूमि में दूर एक चमकता हुआ समृद्ध शहर है, जो उसकी स्थिति और समाज के बीच की दूरी को दर्शाता है। ​वातावरण: शाम का धुंधला समय (twilight), जो जीवन के अवसान या निराशा का प्रतीक है। सूखी घास और एक ठूंठदार पेड़ (withered tree) उसकी रिक्तता को व्यक्त कर रहे हैं। ​कला शैली: एक शांत, विचारोत्तेजक और 'Somatic' कला शैली, जिसमें रंगों का प्रयोग बहुत ही हल्का और मद्धम (muted tones) है, ताकि श्लोक की करुणा स्पष्ट हो सके।


६ अधनस्य मृतं श्रेयः ॥ ६.९६.६

निर्धन मनुष्याला मरण श्रेयस्कर !

यह वाक्य सच में कठोर, झकझोर देने वाला है।
महाभारत, कर्ण-पर्व (६.९६.६) का यह अंश उस समय की निर्दय सामाजिक सच्चाई को उजागर करता है—उपदेश नहीं, निदान है।


शब्दार्थ

  • अधनस्य — निर्धन मनुष्य के लिए
  • मृतम् — मृत्यु
  • श्रेयः — अधिक श्रेष्ठ / उत्तम

भावार्थ

उस समय के सामाजिक व्यवहार में
निर्धन मनुष्य के लिए
जीवन से अधिक मृत्यु को “श्रेयस्कर” माना जाता था।

(मराठी भावार्थ आपने बिल्कुल ठीक दिया है:
“निर्धन मनुष्याला मरण श्रेयस्कर !”)


सही संदर्भ समझना बहुत ज़रूरी है

महाभारत यहाँ मूल्य-निर्देशन नहीं कर रहा, बल्कि—

  • समाज की क्रूर मानसिकता दिखा रहा है
  • उस व्यवस्था की आलोचना कर रहा है
    जहाँ मनुष्य का मूल्य धन से आँका जाता है

इसीलिए शान्ति-पर्व में आगे चलकर—

  • दान, करुणा, अद्रोह
  • और निर्धनों के संरक्षण को राजधर्म बताया गया है

पिछले श्लोकों से सीधा सम्बन्ध

 श्लोक-श्रृंखला बहुत सटीक है:

  • धन से बल → सामाजिक शक्ति
  • धनवान सब पार करता है → व्यवहारिक यथार्थ
  • अधनस्य मृतं श्रेयः → उसी यथार्थ की चरम विडंबना

यही देखकर महाभारत पूछता है—

क्या ऐसा समाज धर्मी कहलाने योग्य है?

उत्तर है—नहीं।


एक पंक्ति में निष्कर्ष

जहाँ निर्धन का जीवन तुच्छ समझा जाए,
वहाँ अधर्म अपने चरम पर होता है।
 

७ अधनाद्धि निवर्तन्ते ज्ञातयः सुहृदो द्विजाः ।

अपुष्पादफलाद्वृक्षाद्यथा कृष्ण पतत्त्रिणः ॥ ५.७२.२०

मुख्य केंद्र (The Metaphor): एक पुराना, सूखा हुआ विशाल वृक्ष (Withered Tree) जिस पर न कोई पत्ता है और न फल। ​प्रतीकात्मकता (Symbolism): वृक्ष के ऊपर से पक्षियों का एक झुंड उड़कर दूर जा रहा है, जो उन "संबंधियों और मित्रों" का प्रतीक है जो केवल समृद्धि में साथ रहते हैं। ​मानवीय पक्ष: वृक्ष के नीचे एक निर्धन वृद्ध व्यक्ति बैठा है, जो अकेला और उपेक्षित दिखाई दे रहा है। उसके चेहरे पर अपनों के बिछड़ने का मौन दर्द है। ​वातावरण: पतझड़ का दृश्य, सूखी जमीन और धुंधली रोशनी, जो एकाकीपन (Loneliness) और सामाजिक अलगाव को दर्शाती है। ​कला शैली: एक भावुक और शास्त्रीय भारतीय चित्रण शैली, जिसमें भावनाओं की गहराई और वास्तविकता का मेल है।

यह श्लोक महाभारत, उद्योग-पर्व (५.७२.२०) का है और  जिस क्रम में श्लोक रखे हैं, वह समाज की निष्ठुर वास्तविकता को एक-एक परत खोलता जाता है।


शब्दार्थ

  • अधनात् हि — निर्धन होने पर ही
  • निवर्तन्ते — दूर हो जाते हैं / हट जाते हैं
  • ज्ञातयः — संबंधी
  • सुहृदः — मित्र
  • द्विजाः — सम्मानित लोग / विद्वान
  • अपुष्पात्-अफलात् वृक्षात् — बिना फूल-फल वाले वृक्ष से
  • यथा — जैसे
  • कृष्ण पतत्त्रिणः — काले पक्षी (कौए)

भावार्थ (सरल हिन्दी)

जब मनुष्य निर्धन हो जाता है,
तो उसके संबंधी, मित्र और सम्मानित लोग
उससे वैसे ही दूर हो जाते हैं
जैसे बिना फूल-फल वाले वृक्ष को
कौए छोड़ देते हैं।


महाभारत की तीखी आलोचना

यह श्लोक मनुष्य की स्वार्थपरक प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य है—

  • रिश्तों की परीक्षा संकट में होती है
  • धन समाप्त होते ही
    सामाजिक गरिमा भी समाप्त हो जाती है
  • मित्रता और संबंध
    अक्सर उपयोगिता पर टिके होते हैं

यह उपदेश नहीं,
बल्कि समाज के मुख पर आईना है।


 श्लोकों की शृंखला में स्थान

 श्लोक-माला अब स्पष्ट रूप से यह कथा कह रही है—

  1. धन से बल मिलता है
  2. निर्धन को दुर्बल समझा जाता है
  3. निर्धन का जीवन तुच्छ माना जाता है
  4. निर्धन से अपने ही दूर हो जाते हैं

इसी पृष्ठभूमि में महाभारत
राजधर्म, दान और करुणा को अनिवार्य घोषित करता है।


एक पंक्ति में सार

जहाँ धन के बिना संबंध सूख जाएँ,
वहाँ समाज नहीं, केवल सौदे शेष रह जाते हैं।

८ अधनेनार्थकामेन नार्थः शक्यो विधित्सितुम् ।

अर्थैरर्था निबध्यन्ते गजैरिव महागजाः ॥ १२.८.२०

मुख्य केंद्र (The Strategy): जंगल का एक दृश्य जहाँ प्रशिक्षित और शक्तिशाली पालतू हाथी (Trained Elephants) जंजीरों और अपनी शक्ति का उपयोग करके एक विशाल जंगली हाथी (Wild Elephant) को नियंत्रित कर रहे हैं। ​प्रतीकात्मकता (Symbolism): यहाँ पालतू हाथी 'मौजूदा धन/संसाधन' के प्रतीक हैं और जंगली हाथी 'आने वाली सफलता या नए लाभ' का प्रतीक है। यह दृश्य दर्शाता है कि बड़े लक्ष्यों को पाने के लिए पहले से ही मजबूत संसाधनों की आवश्यकता होती है। ​वातावरण: एक घना, प्राचीन भारतीय जंगल जहाँ धूल उड़ रही है और हाथियों की शक्ति का प्रदर्शन हो रहा है। सूर्य की किरणें घने पेड़ों के बीच से छनकर आ रही हैं (Cinematic Lighting)। ​कला शैली: एक भव्य, महाकाव्य शैली (Epic Style) का चित्रण, जिसमें गति, शक्ति और प्राचीन रणनीति का आभास हो।

यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.८.२०) का है और यह धन, काम और साधनों के बीच के व्यावहारिक सम्बन्ध को बहुत स्पष्ट शब्दों में रखता है।


शब्दार्थ

  • अधनेन — निर्धन व्यक्ति द्वारा
  • अर्थकामेन — जो अर्थ (लाभ) की इच्छा रखता है
  • न अर्थः शक्यः विधित्सितुम् — अर्थ प्राप्त करना संभव नहीं
  • अर्थैः — साधनों / धन के द्वारा
  • अर्थाः निबध्यन्ते — साध्य बाँधे जाते हैं / पूरे होते हैं
  • गजैः इव महागजाः — जैसे हाथियों से बड़े हाथी बाँधे जाते हैं

भावार्थ (सरल हिन्दी)

जो स्वयं निर्धन है और धन की इच्छा रखता है,
वह बिना साधनों के धन प्राप्त नहीं कर सकता।
धन की प्राप्ति भी धन से ही होती है,
जैसे बड़े हाथी हाथियों से ही बाँधे जाते हैं।


गूढ़ संकेत

महाभारत यहाँ कह रहा है कि—

  • साध्य के लिए साधन आवश्यक हैं
  • केवल इच्छा, नैतिकता या पुरुषार्थ पर्याप्त नहीं
  • धन-अर्जन के लिए भी
    प्रारम्भिक संसाधन, सहयोग और संरचना चाहिए

यह श्लोक
“धन से धन आता है”
इस कटु सत्य को दर्शाता है—
पर इसका अर्थ यह नहीं कि
अधर्म से धन कमाओ।


 श्लोक-क्रम में इसकी भूमिका

अब शृंखला पूर्ण होती दिख रही है:

  • निर्धन दुर्बल माना जाता है
  • निर्धन से संबंध टूटते हैं
  • निर्धन के लिए जीवन भी तुच्छ समझा जाता है
  • और बिना धन के
    इच्छित लक्ष्य भी प्राप्त नहीं होते

इसीलिए महाभारत बार-बार कहता है—
धर्मपूर्वक अर्थ का अर्जन अनिवार्य है।


एक वाक्य में सार

धन का त्याग नहीं,
धर्मयुक्त अर्जन ही जीवन को सम्भव बनाता है।

९ अधर्मः क्षत्रियस्यैष यच्छय्यामरणं भवेत् ॥ १२.९७.२३

यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.९७.२३) का है और यह क्षत्रिय-धर्म को अत्यन्त स्पष्ट और कठोर शब्दों में परिभाषित करता है।


शब्दार्थ

  • अधर्मः — अधर्म, धर्म के विरुद्ध
  • क्षत्रियस्य — क्षत्रिय के लिए
  • एषः — यह
  • यत् — जो
  • शय्या-मरणम् — शय्या (बिस्तर) पर मृत्यु
  • भवेत् — हो

भावार्थ (सरल हिन्दी)

क्षत्रिय के लिए यह अधर्म है
कि वह शय्या पर (युद्ध किए बिना) मरे।


शान्ति-पर्व का आशय

भीष्म पितामह युधिष्ठिर को बताते हैं कि—

  • क्षत्रिय का धर्म संघर्ष से पलायन नहीं
  • अन्याय के विरुद्ध खड़े होना
  • और आवश्यकता पड़े तो
    रणभूमि में प्राण देना ही उसका कर्तव्य है

यह श्लोक
वीर-मृत्यु बनाम पलायन का स्पष्ट भेद करता है।


अन्य धर्मों से भिन्नता

महाभारत यह भी स्पष्ट करता है कि—

  • जो धर्म ब्राह्मण के लिए पुण्य है,
    वही क्षत्रिय के लिए अधर्म हो सकता है
  • अतः धर्म सार्वभौमिक होते हुए भी
    वर्ण-आधारित कर्तव्यों में भिन्न है

एक पंक्ति में सार

क्षत्रिय का धर्म है—
अन्याय से लड़ते हुए जीना
और आवश्यकता हो तो रणभूमि में मरना।

१० अधर्मरूपो धर्मो हि कश्चिदस्ति नराधिप ।

धर्मश्चाधर्मरूपोऽस्ति तच्च ज्ञेयं विपश्चिता ॥ १२.३३.३२

केंद्र में: एक बुद्धिमान न्यायकर्ता या ऋषि (जैसे भीष्म या कृष्ण) जो एक हाथ में सत्य की मशाल थामे हुए हैं। उनके सामने दो मार्ग या दो स्थितियाँ हैं जो धुंधली और भ्रमित करने वाली हैं। ​विरोधाभास (The Paradox): एक ओर एक कठोर कार्य (जैसे युद्ध या दंड) दिखाया गया है जो ऊपर से 'अधर्म' जैसा क्रूर दिखता है, लेकिन उसके पीछे समाज की रक्षा का महान उद्देश्य (धर्म) छिपा है। दूसरी ओर, एक शांत दिखने वाला कार्य दिखाया गया है जो 'धर्म' जैसा लगता है, लेकिन उसके पीछे स्वार्थ या विनाश छिपा है। ​विवेक का प्रतीक: केंद्र में स्थित व्यक्ति की आँखें दिव्य चमक वाली हैं, जो बाहरी दिखावे के पार देख सकती हैं। उनके पीछे एक विशाल तराजू (Scales of Justice) है जो भौतिक नहीं, बल्कि नैतिक संतुलन को दर्शाता है। ​वातावरण: प्रकाश और छाया का खेल (Chiaroscuro), जहाँ सच और झूठ की रेखाएँ आपस में मिल रही हैं। वातावरण में एक रहस्यमयी और गंभीर गरिमा है। ​कला शैली: एक वैचारिक और दार्शनिक चित्रण (Conceptual Art), जो दर्शक को सोचने पर मजबूर करे।

यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.३३.३२) का है और यह महाभारत के सबसे गूढ़ धर्म-दर्शन को सीधे शब्दों में रख देता है।


शब्दार्थ

  • अधर्मरूपः धर्मः — ऐसा धर्म जो देखने में अधर्म जैसा हो
  • हि कश्चित् अस्ति — वास्तव में कहीं-कहीं होता है
  • नराधिप — हे राजन्
  • धर्मः च अधर्मरूपः अस्ति — और ऐसा अधर्म भी होता है जो धर्म जैसा दिखता है
  • तत् च ज्ञेयम् विपश्चिता — इसे बुद्धिमान को पहचानना चाहिए

भावार्थ (सरल हिन्दी)

हे राजन्!
कभी-कभी ऐसा धर्म होता है जो बाहर से अधर्म जैसा प्रतीत होता है,
और कभी ऐसा अधर्म भी होता है जो धर्म का रूप धारण कर लेता है।
इस भेद को बुद्धिमान मनुष्य को समझना चाहिए।


महाभारत का केंद्रीय संदेश

यह श्लोक कहता है—

  • धर्म स्थूल नियम नहीं, सूक्ष्म विवेक है
  • कर्म का मूल्य उसके रूप से नहीं, उद्देश्य और परिणाम से तय होता है
  • इसी कारण कहा गया— धर्मः सूक्ष्मः

यही कारण है कि

  • कृष्ण की नीति कभी-कभी कठोर लगती है
  • पर उसका लक्ष्य लोक-रक्षा होता है

 श्लोकों से गहरी संगति

अब पूरी श्लोक-श्रृंखला एक दार्शनिक चाप बनाती है:

  • अद्रोह, अनुग्रह → आदर्श धर्म
  • वृत्ति → व्यवहारिक धर्म
  • धन → सामाजिक यथार्थ
  • क्षत्रिय-धर्म → कर्तव्य-विशेष
  • और यह श्लोक → विवेक का शिखर

एक वाक्य में सार

जो बाहर से धर्म दिखे, वही धर्म नहीं;
और जो कठोर लगे, वह अधर्म ही हो—यह आवश्यक नहीं।

११ अधर्मो धर्मतां याति स्वामी चेद्धार्मिको भवेत् ।

स्वामिनो गुणदोषाभ्यां भृत्याः स्युर्नात्र संशयः ॥ ११.८.३३

केंद्र में: एक प्रतापी और ओजस्वी राजा (स्वामी) अपने सिंहासन पर बैठा है। उसके व्यक्तित्व से धर्म, न्याय और सात्विकता की आभा (Radiance) निकल रही है। ​अनुसरण (Followers): राजा के चारों ओर उसके सेवक और दरबारी खड़े हैं। उनके हाव-भाव और वेशभूषा बिल्कुल राजा की तरह ही संयमित और अनुशासित हैं। ऐसा लग रहा है जैसे वे राजा के नैतिक आचरण का प्रतिबिंब (Mirror image) हों। ​प्रतीकात्मकता (Symbolism): राजा के पीछे एक विशाल वटवृक्ष की छाया है, जो दर्शाता है कि एक अच्छा नेता अपने नीचे काम करने वालों को संरक्षण और सही दिशा देता है। ​परिवर्तन (Transformation): पृष्ठभूमि में कुछ ऐसे दृश्य हैं जहाँ पहले अव्यवस्था (अधर्म) थी, लेकिन राजा के धार्मिक होने के प्रभाव से अब वहाँ व्यवस्था और शांति स्थापित हो रही है। ​वातावरण: दरबार का दृश्य अत्यंत गरिमामय और स्वर्णिम प्रकाश से भरा हुआ है, जो सकारात्मक ऊर्जा और नैतिकता का प्रतीक है।

यह श्लोक महाभारत, अनुशासन-पर्व (११.८.३३) का है और यह नेतृत्व, सत्ता और नैतिक उत्तरदायित्व का अत्यन्त सूक्ष्म सिद्धान्त प्रस्तुत करता है।


शब्दार्थ

  • अधर्मः — अधर्म भी
  • धर्मताम् याति — धर्म का रूप ले लेता है
  • स्वामी चेत् धार्मिकः भवेत् — यदि स्वामी/शासक धर्मात्मा हो
  • स्वामिनः गुण-दोषाभ्याम् — स्वामी के गुण-दोषों से
  • भृत्याः स्युः — सेवक/प्रजा वैसे ही बनते हैं
  • न अत्र संशयः — इसमें कोई संदेह नहीं

भावार्थ (सरल हिन्दी)

यदि शासक धर्मात्मा हो,
तो कठोर कर्म भी धर्म का रूप ले लेते हैं।
सेवक और प्रजा
अपने स्वामी के गुणों और दोषों के अनुसार ही बनते हैं—
इसमें कोई संदेह नहीं।


गूढ़ आशय

यह श्लोक कहता है कि—

  • धर्म केवल नियम नहीं, नेतृत्व की चेतना है
  • सत्ता का चरित्र
    पूरे समाज के आचरण को आकार देता है
  • इसलिए राजा/नेता का धर्मी होना
    समाज के धर्मी होने की शर्त है

इसी भाव से कहा गया है—

यथा राजा तथा प्रजा


पहले श्लोक से गहरी कड़ी

यह श्लोक सीधे जुड़ता है आपके पहले उद्धृत वाक्य से—

अधर्मरूपो धर्मो हि कश्चिदस्ति…

यहाँ उसका व्यावहारिक सूत्र दिया गया है—
निर्णायक तत्व है “स्वामी का धर्म”।


एक पंक्ति में निष्कर्ष

नेतृत्व धर्मी हो, तो कठोर निर्णय भी धर्म बन जाते हैं;
और नेतृत्व अधर्मी हो, तो धर्म भी अधर्म बन जाता है।

१२ अध्रुवा सर्वमर्त्येषु श्रीरुपालक्ष्यते भृशम् ॥ ९.६५.२०

केंद्र में: देवी लक्ष्मी का एक दिव्य स्वरूप, जो बादलों के ऊपर या बहते हुए जल के बीच खड़ी हैं। उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान है और वे एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर प्रस्थान करती हुई प्रतीत हो रही हैं (चंचलता का प्रतीक)। ​अध्रुवा (Instability): उनके एक हाथ से सुनहरी मुद्राएँ नीचे गिर रही हैं, जिन्हें नीचे खड़े लोग पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मुद्राएँ हवा में धुएँ या रेत की तरह विलीन हो रही हैं। ​मानवीय पक्ष: नीचे विभिन्न अवस्थाओं के लोग दिखाए गए हैं—एक राजा जिसका मुकुट गिर रहा है और एक साधारण व्यक्ति जिसे अचानक कुछ प्राप्त हो रहा है। यह धन के आने-जाने के चक्र को दर्शाता है। ​वातावरण: आकाश में ढलते हुए सूर्य और बढ़ते हुए बादलों का दृश्य, जो समय के निरंतर परिवर्तनशील होने का प्रतीक है। बहता हुआ जल और उड़ती हुई रेत इस "अस्थिरता" को और गहराई देते हैं। ​कला शैली: एक शास्त्रीय भारतीय पौराणिक शैली (Classical Indian Mythological Style), जिसमें रंगों का प्रयोग "स्वप्निल" (Dreamy) और "क्षणभंगुर" (Transient) अहसास कराने के लिए किया गया है।

यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (९.६५.२०) में आता है और श्री (लक्ष्मी) के स्वभाव—अस्थिरता—को अत्यन्त मार्मिक रूप में बताता है।

श्लोक

अध्रुवा सर्वमर्त्येषु श्रीरुपालक्ष्यते भृशम् ॥


शब्दार्थ

  • अध्रुवा — स्थिर न रहने वाली, क्षणभंगुर
  • सर्व-मर्त्येषु — सभी मनुष्यों में / समस्त नश्वर प्राणियों में
  • श्रीः — लक्ष्मी, ऐश्वर्य, समृद्धि
  • उपलक्ष्यते भृशम् — स्पष्ट रूप से देखी जाती है

भावार्थ (सरल हिन्दी)

सभी नश्वर मनुष्यों के जीवन में
लक्ष्मी अत्यन्त अस्थिर दिखाई देती है—
वह कहीं स्थायी नहीं रहती।


महाभारत का गहरा संकेत

यह श्लोक बताता है कि—

  • धन, पद, प्रतिष्ठा कभी स्थायी नहीं
  • जो आज समर्थ है, वह कल असहाय हो सकता है
  • इसलिए मनुष्य को
    श्री पर नहीं, शील पर टिकना चाहिए

यही कारण है कि महाभारत
धन का उपभोग तो स्वीकार करता है,
पर आसक्ति को त्यागने की शिक्षा देता है।


 श्लोक-शृंखला में इसका स्थान

चुने गए श्लोक एक पूर्ण दर्शन रचते हैं:

  • धन सामाजिक शक्ति है
  • निर्धनता समाज का कठोर सत्य है
  • धर्म-अधर्म सूक्ष्म है
  • शासक का चरित्र निर्णायक है
  • और अंततः—
    श्री स्वयं अस्थिर है

एक पंक्ति में सार

जो अस्थिर है, उस पर जीवन टिकाना बुद्धिमानी नहीं;
धर्म और शील ही स्थायी पूँजी हैं।

१३ अनन्तं बत मे वित्तं यस्य मे नास्ति किञ्चन ।

मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किञ्चन ॥ १२.१७.१९

केंद्र में: राजा जनक एक ऊंची पहाड़ी या महल के झरोखे पर अत्यंत शांत और स्थिर मुद्रा में बैठे हैं। उनके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं, बल्कि एक दिव्य मुस्कान और आत्मिक संतोष है। ​पृष्ठभूमि (मिथिला का दृश्य): दूर नीचे मिथिला नगरी में आग की लपटें उठ रही हैं (प्रतीकात्मक रूप से संसार की नश्वरता को दर्शाते हुए)। लेकिन राजा जनक के चारों ओर का वातावरण एकदम शीतल और प्रकाशमय है। ​वैराग्य (Detachment): राजा के वस्त्र राजसी हैं, लेकिन उनकी आंखों में ऐसा भाव है जैसे वे इन सब भौतिक वस्तुओं से परे किसी अनंत सत्य को देख रहे हों। उनके पास रखे स्वर्ण आभूषणों या सिंहासन की ओर उनका ध्यान बिल्कुल नहीं है। ​प्रतीकात्मकता: आग की लपटें भौतिक विनाश का प्रतीक हैं, जबकि राजा जनक की शांति उस 'अनंत वित्त' (भीतरी धन) की प्रतीक है जिसे कोई आग नहीं जला सकती। ​कला शैली: एक प्रभावशाली और भावनात्मक शैली (Dramatic Contrast), जिसमें एक तरफ लाल और नारंगी रंग की आग की गर्मी है और दूसरी तरफ राजा जनक के चारों ओर नीले और सफेद रंगों की शांति।


यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.१७.१९) का अत्यन्त प्रसिद्ध वाक्य है—
जनक–वैदेह संवाद में आया हुआ, जहाँ वैराग्य और वास्तविक संपदा का अद्भुत उद्घोष है।


शब्दार्थ

  • अनन्तम् बत मे वित्तम् — वास्तव में मेरी संपदा अनन्त है
  • यस्य मे न अस्ति किञ्चन — क्योंकि मेरा कुछ भी (मेरा कहने को) नहीं है
  • मिथिलायाम् प्रदीप्तायाम् — जब मिथिला जल रही हो
  • न मे दह्यति किञ्चन — तब भी मेरा कुछ नहीं जलता

भावार्थ (सरल हिन्दी)

मेरी संपत्ति अनन्त है,
क्योंकि मेरा कुछ भी निजी नहीं है।
यदि मिथिला नगरी जल भी जाए,
तो मेरा कुछ भी नष्ट नहीं होता।


दार्शनिक गहराई

यह श्लोक विरक्ति का चरम सूत्र है—

  • असली धन अधिकार-भाव का अभाव है
  • जिसके पास “मेरा” कुछ नहीं,
    उससे कुछ छीना नहीं जा सकता
  • राजा होकर भी जनक
    आंतरिक संन्यास में स्थित हैं

यही कारण है कि उन्हें
राजर्षि कहा गया।


श्लोक-श्रृंखला का सुंदर निष्कर्ष

 जिन श्लोकों को क्रम से रखा है,
वे जैसे एक यात्रा पूरी करते हैं—

  1. समाज धन से चलता है
  2. निर्धनता अपमान लाती है
  3. सत्ता धर्म को मोड़ सकती है
  4. लक्ष्मी अस्थिर है
  5. और अंततः—
    जो कुछ नहीं मानता, वही सब कुछ पा लेता है

एक वाक्य में सार

जिसने “मेरा” छोड़ दिया,
उसी ने अनन्त संपदा पा ली।

१४ अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ ६.३३.२२

केंद्र में (The Devotee): एक सात्विक भक्त (पुरुष या महिला) जो शांत मुद्रा में बैठा है, आँखें बंद हैं और पूर्णतः भक्ति में लीन है। उसके चारों ओर एक सौम्य, नीला-सफेद प्रकाश (Aura) है, जो उसकी आंतरिक शांति को दर्शाता है। ​दिव्य उपस्थिति (Divine Presence): भक्त के ठीक पीछे भगवान श्रीकृष्ण के विशाल चतुर्भुज स्वरूप की धुंधली और दिव्य आकृति है। उनके हाथ भक्त के ऊपर सुरक्षात्मक मुद्रा (Blessing pose) में हैं। ​योगक्षेम का प्रतीक: भगवान के एक हाथ में एक दिव्य प्रकाश है जो भक्त की ओर जा रहा है (आवश्यकताओं की पूर्ति), और दूसरा हाथ एक अदृश्य कवच की तरह भक्त के चारों ओर है (रक्षा का प्रतीक)। ​वातावरण: एक शांत वातावरण जैसे गंगा का तट या कोई पवित्र मंदिर का कोना। दूर आकाश में स्वर्णिम आभा है। वातावरण में समर्पण और सुरक्षा का भाव है। ​कला शैली: एक आध्यात्मिक और 'Ethereal' चित्रण शैली, जिसमें कोमल रंगों और दिव्य प्रकाश का अधिक उपयोग हो, ताकि भगवान के 'योगक्षेमं वहाम्यहम्' के वादे की गहराई महसूस हो सके।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता (९.२२) का है—
महाभारत के भीष्म-परंपरागत पाठों में इसका पर्व/अध्याय क्रम (६.३३.२२) भी मिलता है, इसलिए आपका संदर्भ भी परंपरागत रूप से सही समझा जाता है। 

महाभारत जीवन-दर्शन: श्लोक एवं डिजिटल चित्रण 1


शब्दार्थ

  • अनन्याः — अन्य किसी का सहारा न लेने वाले
  • चिन्तयन्तः माम् — निरन्तर मेरा स्मरण करने वाले
  • ये जनाः पर्युपासते — जो भक्ति-भाव से मेरी उपासना करते हैं
  • तेषाम् नित्य-अभियुक्तानाम् — जो सदा मुझमें लगे रहते हैं
  • योग-क्षेमम् — अप्राप्त का प्राप्त होना और प्राप्त की रक्षा
  • वहामि अहम् — मैं स्वयं वहन करता हूँ

भावार्थ (सरल हिन्दी)

जो मनुष्य अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हुए मेरी उपासना करते हैं,
उनके लिए जो आवश्यक है उसे मैं स्वयं उपलब्ध कराता हूँ
और जो उन्हें प्राप्त है, उसकी मैं स्वयं रक्षा करता हूँ।


गूढ़ अर्थ (महाभारत–गीता की दृष्टि से)

यह श्लोक कर्म–धन–धर्म–वैराग्य की आपकी पूरी श्लोक-श्रृंखला का
आध्यात्मिक शिखर है।

  • यहाँ भगवान कहते हैं—
    “तुम परिणाम की चिंता छोड़ो, समर्पण करो।”
  • यह अकर्मण्यता नहीं,
    बल्कि अहंकार-त्याग है।
  • योग = जो चाहिए, वह मिलना
  • क्षेम = जो मिला है, उसका सुरक्षित रहना

अर्थात—

भक्त का बोझ ईश्वर स्वयं उठा लेते हैं।


पहले श्लोकों से अद्भुत संगति

 श्लोकों को चुना, वे यहाँ पूर्ण होते हैं—

  • धन आवश्यक है, पर अस्थिर है
  • धर्म सूक्ष्म है, सत्ता उसे मोड़ सकती है
  • जनक कहते हैं: “मेरा कुछ नहीं”
  • और अब गीता कहती है:
    जब ‘मेरा’ छोड़ा, तब ‘मैं’ (ईश्वर) जिम्मेदार हुआ

एक वाक्य में सार

जहाँ चिंता समाप्त होती है,
वहीं से ईश्वर की जिम्मेदारी प्रारम्भ होती है।

१५ अनर्हते यद्ददाति न ददाति यदर्हते ।

अर्हानर्हापरिज्ञानाद्दानधर्मोऽपि दुष्करः ॥ १२.२०.९

मुख्य केंद्र (The Dilemma): एक उदार दानी व्यक्ति (राजा या धनी पुरुष) केंद्र में खड़ा है, जिसके दोनों ओर दो अलग-अलग प्रकार के लोग हैं। वह दुविधा में है कि उसका दान सही हाथों में जा रहा है या नहीं। ​सुपात्र (The Deserving): एक ओर एक सच्चा विद्वान या अभावग्रस्त व्यक्ति है जो विनम्र है, जिसके पीछे ज्ञान या सात्विकता का प्रकाश है। वह दान के लिए लालायित नहीं है, पर वास्तव में उसे इसकी आवश्यकता है। ​कुपात्र (The Undeserving): दूसरी ओर एक धूर्त या आलसी व्यक्ति है जो दीनता का ढोंग कर रहा है, लेकिन उसके पीछे लालच या अधर्म की छाया दिख रही है। ​प्रतीकात्मकता (Symbolism): दानी के हाथ में एक स्वर्ण पात्र है। दानी की आँखों पर एक हल्की सी पट्टी या धुंध है, जो 'परिज्ञान' (पहचानने की क्षमता) की कमी को दर्शाती है। पृष्ठभूमि में धर्मराज युधिष्ठिर या भीष्म उपदेश देते हुए दिखाई दे रहे हैं। ​वातावरण: एक मंदिर के प्रांगण या राजसभा का दृश्य जहाँ न्याय और दान की चर्चा हो रही हो। प्रकाश का स्रोत केंद्र से आ रहा है जो 'सत्य' को खोजने की कोशिश कर रहा है। ​कला शैली: एक गंभीर, शास्त्रीय भारतीय चित्रकला (Classical Indian Art) जिसमें 'धर्म' की सूक्ष्मता और मानवीय दुविधा को रंगों के माध्यम से उभारा गया है।

यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.२०.९) का है और यह दान-धर्म की सूक्ष्म कठिनाई को बड़ी स्पष्टता से बताता है।


शब्दार्थ

  • अनर्हते यत् ददाति — जो अयोग्य को दान देता है
  • न ददाति यत् अर्हते — और योग्य को नहीं देता
  • अर्ह-अनर्ह-अपरिज्ञानात् — योग्यता और अयोग्यता का विवेक न होने से
  • दान-धर्मः अपि दुष्करः — दान का धर्म भी कठिन हो जाता है

भावार्थ (सरल हिन्दी)

जो व्यक्ति अयोग्य को दान देता है
और योग्य को दान नहीं देता,
उसका कारण योग्यता-अयोग्यता का विवेक न होना है।
इसी कारण दान जैसा पुण्य कर्म भी कठिन हो जाता है।


गूढ़ अर्थ

महाभारत यहाँ बताता है कि—

  • दान केवल देना नहीं, समझकर देना है
  • बिना विवेक का दान
    पुण्य के स्थान पर कभी-कभी
    अधर्म को भी पोषित कर देता है
  • इसलिए दान के साथ
    बुद्धि, करुणा और न्याय अनिवार्य हैं

यह श्लोक
“दान से सब ठीक हो जाता है”
इस सरल धारणा को तोड़ देता है।


 श्लोक-श्रृंखला में स्थान

अब यह सूत्र स्पष्ट हो जाता है—

  • धन आवश्यक है
  • पर उसका मूल्य उपयोग से तय होता है
  • लक्ष्मी अस्थिर है
  • और दान भी तभी धर्म है
    जब विवेकयुक्त हो

एक वाक्य में सार

विवेक के बिना किया गया दान भी
धर्म नहीं, भार बन सकता है।

१६ अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः ।

द्वावेव सुखमेधते दीर्घसूत्री विनश्यति ॥ १२.१३७.११

मुख्य केंद्र (The Contrast): चित्र को तीन स्पष्ट भागों में विभाजित किया गया है जो मानवीय प्रवृत्तियों को दर्शाते हैं। ​अनागतविधाता (The Planner): बाईं ओर एक चतुर व्यक्ति है जो ऊंचे स्थान पर खड़ा होकर दूर क्षितिज पर आ रहे तूफान को देख रहा है और पहले से ही अपनी नाव या घर को मजबूत कर रहा है। ​प्रत्युत्पन्नमति (The Quick Thinker): केंद्र में एक व्यक्ति है जो अचानक आए संकट (जैसे अचानक लगी आग या टूटता हुआ बांध) के बीच खड़ा है, लेकिन घबराने के बजाय अपनी बुद्धि से तुरंत कोई युक्ति निकालकर खुद को और दूसरों को बचा रहा है। ​दीर्घसूत्री (The Procrastinator): दाईं ओर एक व्यक्ति है जो आराम से सो रहा है या आलस्य में बैठा है, जबकि संकट उसके बिल्कुल करीब पहुँच चुका है। उसके पास रखे अधूरे काम के कागज़ या औज़ार उसकी टालमटोल की आदत को दर्शा रहे हैं। ​वातावरण: एक ओर तैयारी की शांति है, दूसरी ओर संकट की हलचल, और तीसरी ओर आलस्य की छाया। पूरे दृश्य में समय के चक्र (Time Wheel) को पृष्ठभूमि में धुंधला दिखाया गया है। ​कला शैली: एक शिक्षाप्रद और भव्य भारतीय कला शैली (Narrative Art Style), जिसमें पात्रों के चेहरों पर उनके स्वभाव के अनुसार सतर्कता, बुद्धिमत्ता और प्रमाद के भाव स्पष्ट हों।


यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.१३७.११) का अत्यन्त व्यावहारिक नीति-सूत्र है— जीवन में बुद्धि, समयबोध और कर्म-तत्परता का महत्व बताने वाला।


शब्दार्थ

  • अनागत-विधाता — भविष्य की योजना करने वाला
  • प्रत्युत्पन्न-मतिः — वर्तमान परिस्थिति में तुरंत निर्णय लेने वाला
  • यः — जो व्यक्ति
  • द्वौ एव — केवल ये दो
  • सुखम् एधते — सुखपूर्वक उन्नति करते हैं
  • दीर्घसूत्री — काम को टालने वाला, देर करने वाला
  • विनश्यति — नष्ट हो जाता है

भावार्थ (सरल हिन्दी)

जो व्यक्ति भविष्य की योजना भी करता है
और वर्तमान में शीघ्र बुद्धि से निर्णय भी लेता है,
वही सुखपूर्वक उन्नति करता है।
काम टालने वाला व्यक्ति अंततः नष्ट हो जाता है।


महाभारत का जीवन-सूत्र

यह श्लोक कहता है—

  • केवल योजना पर्याप्त नहीं
  • केवल तत्काल चतुराई भी पर्याप्त नहीं
  • दोनों का संतुलन ही सफलता है

और जो व्यक्ति
“कल करेंगे” की आदत में फँसा रहता है,
उसके हाथ से अवसर निकल जाते हैं।


 श्लोक-शृंखला में इसकी भूमिका

चयनित श्लोक एक पूर्ण जीवन-दर्शन बनाते हैं—

  • धर्म सूक्ष्म है
  • धन अस्थिर है
  • दान विवेक माँगता है
  • भक्ति चिंता हर लेती है
  • और अब—
    कर्म में तत्परता ही फल देती है

एक पंक्ति में सार

जो आगे भी सोचता है और अभी भी करता है, वही आगे बढ़ता है।

१७ अनायुष्यं दिवा स्वप्नं तथाभ्युदितशायिता ॥ १३.१०४.१३९

​मुख्य केंद्र (The Habit): एक व्यक्ति को एक सुसज्जित कक्ष में सूर्योदय के बहुत बाद तक गहरी नींद में सोए हुए दिखाया गया है। कमरे की खिड़की से तेज धूप (Sunlight) उसके चेहरे पर पड़ रही है, जो यह संकेत दे रही है कि दिन काफी चढ़ चुका है। ​प्रतीकात्मकता (Symbolism): व्यक्ति के सिरहाने के पास एक धुंधली और काली छाया (समय या आयु के क्षय का प्रतीक) खड़ी है, जो एक रेत-घड़ी (Hourglass) पकड़े हुए है जिसकी रेत बहुत तेजी से गिर रही है। यह 'अनायुष्यं' (आयु कम होने) के विचार को दर्शाता है। ​वातावरण का विरोधाभास: खिड़की के बाहर प्रकृति जागृत है—पक्षी उड़ रहे हैं, लोग अपने कार्यों में लगे हैं और ताजी हवा का आभास है, जबकि कमरे के भीतर का वातावरण भारी, आलस्यपूर्ण (Lethargic) और स्थिर है। ​विजुअल संकेत: कमरे में बिखरी हुई वस्तुएं और अधूरी दिनचर्या उसके अनुशासनहीन जीवन को और स्पष्ट करती हैं। ​कला शैली: एक यथार्थवादी और शास्त्रीय भारतीय शैली (Realistic Classical Style), जिसमें प्रकाश (धूप) और अंधकार (कमरे का कोना और आयु की छाया) का गहरा कंट्रास्ट उपयोग किया गया है।


यह श्लोक महाभारत, अनुशासन-पर्व (१३.१०४.१३९) का है और यह आयुष्य, संयम और दिनचर्या से जुड़ा हुआ एक सीधा-सा लेकिन बहुत व्यावहारिक उपदेश देता है।


शब्दार्थ

  • अनायुष्यम् — आयु को घटाने वाला
  • दिवा स्वप्नम् — दिन में सोना
  • तथा — इसी प्रकार
  • अभ्युदित-शायिता — सूर्योदय के बाद तक शय्या पर पड़े रहना

भावार्थ (सरल हिन्दी)

दिन में सोना
और सूर्योदय के बाद तक बिस्तर पर पड़े रहना—
ये दोनों आयु को क्षीण करने वाले माने गए हैं।


गूढ़ संकेत (धर्म + स्वास्थ्य)

महाभारत यहाँ केवल नैतिक उपदेश नहीं दे रहा,
बल्कि स्वास्थ्य-विज्ञान और जीवन-अनुशासन की बात कर रहा है—

  • प्रकृति के साथ तालमेल = दीर्घायु
  • आलस्य और प्रमाद = आयुष्य का ह्रास
  • समय पर जागना = धर्म, आरोग्य और तेज

आयुर्वेद में भी यही कहा गया है—

ब्रह्ममुहूर्ते उत्तिष्ठेत्…


 श्लोक-श्रृंखला में इसका अर्थ

 चुनी हुई श्लोक-माला अब व्यक्ति के आन्तरिक धर्म से निकलकर दैनिक जीवन-अनुशासन तक आ पहुँची है—

  • विवेक → आचरण
  • आचरण → दिनचर्या
  • और दिनचर्या → आयु

एक पंक्ति में सार

जो प्रकृति के समय-चक्र के विरुद्ध जीता है,
वह अपने ही आयुष्य को क्षीण करता है।

१८ अनारम्भात्तु कार्याणां नार्थः सम्पद्यते क्वचित् ॥ १०.२.३४

मुख्य केंद्र (The Action): एक दृढ़ निश्चयी शिल्पकार या कर्मयोगी को एक विशाल शिला (पत्थर) पर कार्य शुरू करते हुए दिखाया गया है। उसके हाथ में छेनी और हथौड़ा है, और वह पत्थर को आकार देने का पहला प्रहार कर रहा है। ​प्रतीकात्मकता (Symbolism): पत्थर के भीतर एक सुंदर मूर्ति की धुंधली आकृति (Vision) दिखाई दे रही है, जो यह दर्शाती है कि सफलता (अर्थ) पत्थर के भीतर ही छिपी है, लेकिन वह 'अनारम्भात्' (आरम्भ न करने) की स्थिति में कभी बाहर नहीं आएगी। ​विरोधाभास (Contrast): पृष्ठभूमि में कुछ लोग केवल बैठकर चर्चा कर रहे हैं या नक्शे देख रहे हैं, लेकिन उनका कार्य शून्य है। उनके पास कोई परिणाम नहीं है, जबकि मुख्य पात्र के पसीने और मेहनत से परिणाम निकलना शुरू हो गया है। ​वातावरण: सूर्योदय का समय, जो नई शुरुआत और ऊर्जा का प्रतीक है। वातावरण में धूल के कण और छिटकते हुए पत्थर के टुकड़े कर्म की गतिशीलता को दर्शा रहे हैं। ​कला शैली: एक ओजस्वी और प्रेरणादायक भारतीय शैली (Dynamic Classical Style), जिसमें 'पुरुषार्थ' और 'श्रम' को अत्यंत गौरवशाली तरीके से दिखाया गया है।

यह श्लोक महाभारत, सभा-पर्व (१०.२.३४) का एक सीधा-सा लेकिन अत्यन्त शक्तिशाली कर्म-सूत्र है—आलस्य और निष्क्रियता पर कठोर प्रहार। 

शब्दार्थ

  • अनारम्भात् — आरम्भ न करने से
  • तु — निश्चय ही
  • कार्याणाम् — कार्यों का
  • न अर्थः सम्पद्यते — फल / उद्देश्य सिद्ध नहीं होता
  • क्वचित् — कभी भी

भावार्थ (सरल हिन्दी)

यदि किसी कार्य का आरम्भ ही न किया जाए,
तो उसका फल कभी भी प्राप्त नहीं होता।


महाभारत का कर्म-दर्शन

यह श्लोक घोषित करता है—

  • इच्छा, योजना, नीति—सब व्यर्थ हैं
    जब तक कर्म का आरम्भ न हो
  • भाग्य भी उसी का साथ देता है
    जो पहले कदम रखता है

इसी भाव को गीता कहती है—
कर्मण्येवाधिकारस्ते…


 श्लोक-क्रम में इसका स्थान

अब शृंखला पूर्ण रूप लेती है—

  • भविष्य की योजना + तात्कालिक बुद्धि
  • दिनचर्या और अनुशासन
  • और अंततः—
    कर्म का प्रारम्भ

महाभारत यहाँ स्पष्ट करता है कि
धर्म, धन, दान, भक्ति—
सबका द्वार आरम्भ से ही खुलता है।


एक वाक्य में सार

जो शुरू नहीं करता,
वह कभी भी नहीं पाता।

१९ अनार्याचरितं तात परस्वस्पृहणं भृशम् ॥ २.५४.६

मुख्य केंद्र (The Greed): एक व्यक्ति (अनार्य के प्रतीक स्वरूप) अंधेरे में खड़ा है, जिसकी आँखें लालच से चमक रही हैं। वह छिपकर दूसरे के वैभवशाली महल या स्वर्ण के भंडार की ओर देख रहा है। उसके चेहरे पर ईर्ष्या और कुटिलता के भाव स्पष्ट हैं। ​परस्वस्पृहणं (Cravings for others' wealth): सामने की ओर एक सुखी परिवार या धर्मात्मा व्यक्ति का घर है जहाँ शांति और समृद्धि है। लालची व्यक्ति के हाथ उस समृद्धि को छीनने के लिए आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन वे हाथ धुएँ या छाया जैसे काले और डरावने दिख रहे हैं। ​प्रतीकात्मकता (Symbolism): लालची व्यक्ति के पैरों के पास कांटे और जहरीले सांप दिखाए गए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि 'अनार्य' आचरण अंततः खुद के लिए ही विनाशकारी होता है। उसके पीछे एक विशाल काली छाया है जो उसके पतन का प्रतीक है। ​वातावरण: दृश्य में एक गहरा विरोधाभास है। एक तरफ ईर्ष्यालु व्यक्ति का अंधेरा और अशांत कोना है, और दूसरी तरफ 'परस्व' (दूसरे की संपत्ति) का सात्विक और उज्ज्वल प्रकाश है। ​कला शैली: एक गंभीर और नाटकीय भारतीय पौराणिक शैली (Dramatic Mythological Style), जिसमें लालच के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को रंगों के माध्यम से उभारा गया है।

यह श्लोक महाभारत, आदिपर्व (२.५४.६) का है और यह आर्य–अनार्य आचरण का स्पष्ट भेद बताता है—विशेषकर पराये धन/वस्तु पर लोभ को लेकर।


शब्दार्थ

  • अनार्य-आचरितम् — अनार्य (अशिष्ट/अधार्मिक) लोगों का आचरण
  • तात — हे पुत्र! (स्नेहपूर्ण संबोधन)
  • पर-स्व-स्पृहणम् — दूसरे की वस्तु/धन की तीव्र इच्छा करना
  • भृशम् — अत्यन्त, बहुत अधिक

भावार्थ (सरल हिन्दी)

हे पुत्र!
दूसरों की वस्तु या धन की तीव्र लालसा रखना
अनार्य लोगों का आचरण है।


गूढ़ संकेत

महाभारत यहाँ “आर्य” को वंश या जाति से नहीं,
बल्कि आचरण से परिभाषित करता है—

  • संयम → आर्यत्व
  • लोभ → अनार्यता
  • पर-स्व की लालसा → अधर्म का मूल

इसीलिए महाभारत में बार-बार कहा गया है कि
धर्म का आरम्भ इच्छाओं के संयम से होता है


 श्लोक-श्रृंखला में इसका स्थान

 पूरी माला एक स्पष्ट संदेश देती है—

  • कर्म का आरम्भ आवश्यक है
  • पर कर्म लोभ-रहित होना चाहिए
  • धन आवश्यक है,
    पर पराये धन की कामना अधर्म है

एक वाक्य में सार

जो अपने से संतुष्ट नहीं और दूसरे की वस्तु चाहता है,
वही अनार्य आचरण करता है।

२० अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते ।

अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥ ५.३३.३६

मुख्य केंद्र (The Fool): एक व्यक्ति को एक गंभीर राजसभा या विद्वानों की सभा के बीच में दिखाया गया है। उसके चेहरे पर एक अजीब सी अति-आत्मविश्वास वाली मुस्कान है, जबकि वह वहां आमंत्रित नहीं है। ​अनाहूतः और बहु भाषते: वह व्यक्ति हाथ हिला-हिलाकर ज़ोर-ज़ोर से बोल रहा है, जबकि बाकी सभी दरबारी और विद्वान उसे अचरज और झुंझलाहट भरी नज़रों से देख रहे हैं। मेज पर रखे महत्वपूर्ण मानचित्रों या ग्रंथों के बीच वह अकारण हस्तक्षेप कर रहा है। ​अविश्वस्ते विश्वसिति: पृष्ठभूमि में एक धूर्त पात्र (जैसे शकुनि जैसा कोई व्यक्ति) उसे कुछ कान में फुसफुसा रहा है और यह मूर्ख व्यक्ति आँखें बंद करके उस पर पूरा भरोसा कर रहा है, जबकि उस धूर्त के हाथ में पीछे की ओर एक खंजर या कपट की योजना है। ​प्रतीकात्मकता (Symbolism): मूर्ख व्यक्ति के सिर के पीछे एक गधे की हल्की छाया या एक जलता हुआ दीपक दिखाया गया है जो उलटा रखा है, जो विवेक की कमी का प्रतीक है। ​वातावरण: दरबार का दृश्य गरिमामय है, लेकिन इस व्यक्ति की उपस्थिति वहां एक 'विरोधाभास' (Contrast) पैदा कर रही है। प्रकाश का कोण ऐसा है कि विद्वानों पर सौम्य प्रकाश है और इस व्यक्ति पर थोड़ा असंतुलित और तीखा प्रकाश। ​कला शैली: एक शिक्षाप्रद भारतीय पौराणिक शैली (Narrative Mythological Style), जिसमें हाव-भाव (Expressions) को प्रमुखता दी गई है।

यह श्लोक महाभारत, उद्योग-पर्व (५.३३.३६) का है और यह अविवेकी, अशिष्ट मनुष्य के लक्षण बहुत तीखे शब्दों में बताता है।


शब्दार्थ

  • अनाहूतः प्रविशति — बिना बुलाए प्रवेश करता है
  • अपृष्टः बहु भाषते — बिना पूछे बहुत बोलता है
  • अविश्वस्ते विश्वसिति — जिस पर भरोसा नहीं करना चाहिए, उस पर भरोसा करता है
  • मूढ-चेता — मूर्ख बुद्धि वाला
  • नराधमः — मनुष्यों में अधम

भावार्थ (सरल हिन्दी)

जो व्यक्ति
बिना बुलाए भीतर घुस जाता है,
बिना पूछे अधिक बोलता है,
और अविश्वसनीय लोगों पर भरोसा करता है—
वह मूर्ख बुद्धि वाला और अधम मनुष्य कहलाता है।


गूढ़ संकेत

यह श्लोक सामाजिक बुद्धि (social intelligence) का सूत्र है—

  • मर्यादा का अभाव → बिना बुलाए प्रवेश
  • वाणी पर असंयम → बिना पूछे बोलना
  • विवेक की कमी → गलत व्यक्ति पर विश्वास

महाभारत यहाँ साफ कहता है कि
धर्म केवल सत्य–अहिंसा नहीं,
समय, स्थान और पात्र की पहचान भी है।


 श्लोक-श्रृंखला से संगति

आपके पहले श्लोकों में

  • लोभ-त्याग,
  • कर्म-आरम्भ,
  • अनुशासन और विवेक
    पर ज़ोर था।
    यह श्लोक उसी का सामाजिक अनुप्रयोग है—
    कैसे बोलें, कहाँ जाएँ, और किस पर भरोसा करें।

एक पंक्ति में सार

मर्यादा, मौन और विवेक—
इनके बिना मनुष्य बुद्धिमान नहीं कहलाता।

२१ अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसञ्चयः ।

आरोग्यं प्रियसंवासो गृध्येत्तत्र न पण्डितः ॥ १२.३३०.१४

मुख्य केंद्र (The Wise Observer): एक शांत और सौम्य विद्वान (पण्डित) को केंद्र में बैठा दिखाया गया है। उसकी आँखें आधी खुली हैं और चेहरे पर एक तटस्थ शांति है। वह अपने सामने एक 'समय के प्रवाह' या एक 'जादुई दर्पण' को देख रहा है। ​अनित्यता का चक्र (The Cycle of Impermanence): उस प्रवाह के भीतर विभिन्न अवस्थाएँ धुंधली और बदलती हुई दिखाई दे रही हैं: ​एक ओर एक युवा और सुंदर चेहरा है, जो धीरे-धीरे झुर्रियों वाले वृद्ध चेहरे में बदल रहा है (यौवन और रूप)। ​एक स्वर्ण से भरी तिजोरी या धन का ढेर है, जो धीरे-धीरे धूल में मिल रहा है (द्रव्यसञ्चय)। ​एक हंसता-खेलता परिवार और मित्रों का समूह है, जो बादलों की तरह बिखर रहे हैं (प्रियसंवासो)। ​प्रतीकात्मकता (Symbolism): पण्डित के पीछे एक विशाल वट वृक्ष (अक्षय सत्य का प्रतीक) है, जबकि उसके सामने की दुनिया बहती नदी या रेत की तरह दिखाई गई है। वह इन सब के बीच अडिग है क्योंकि उसने 'नित्य' (परमात्मा या आत्म-ज्ञान) को पा लिया है। ​वातावरण: रंगों में एक 'सेपिया' (Sepia) या विंटेज टोन का उपयोग है, जो पुरानी यादों और बीतते समय को दर्शाता है। विद्वान के चारों ओर एक सुनहरी सात्विक आभा (Aura) है जो बाहरी बदलावों से अप्रभावित है। ​कला शैली: एक गहरी, दार्शनिक और शास्त्रीय भारतीय शैली (Philosophical Narrative Art), जिसमें आध्यात्मिक गहराई को कलात्मक रूप दिया गया है।

यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.३३०.१४) का है और यह जीवन की अनित्यता पर अत्यन्त स्पष्ट, शान्त और गहन उपदेश देता है।


शब्दार्थ

  • अनित्यम् — नश्वर, अस्थायी
  • यौवनम् — यौवन
  • रूपम् — सौंदर्य
  • जीवितम् — जीवन
  • द्रव्य-सञ्चयः — धन का संग्रह
  • आरोग्यम् — स्वास्थ्य
  • प्रिय-संवासः — प्रियजनों का साथ
  • न पण्डितः गृध्येत् — बुद्धिमान व्यक्ति इनसे आसक्त नहीं होता

भावार्थ (सरल हिन्दी)

यौवन, सौंदर्य, जीवन, धन-संग्रह,
स्वास्थ्य और प्रियजनों का साथ—
ये सभी अस्थायी हैं।
इसलिए बुद्धिमान मनुष्य
इनमें अत्यधिक आसक्ति नहीं रखता।


दार्शनिक गहराई

महाभारत यहाँ वैराग्य नहीं,
यथार्थ-बोध सिखाता है—

  • वस्तुएँ रहेंगी, पर सदा नहीं
  • संबंध मधुर हैं, पर शाश्वत नहीं
  • इसलिए आसक्ति नहीं, उपयोग
  • ममता नहीं, मर्यादा

इसी भाव को गीता कहती है—
अनित्यं असुखं लोकम्…


 श्लोक-यात्रा का स्वाभाविक बिंदु

हमारे द्वारा चुने गए श्लोक अब
एक परिपक्व जीवन-दृष्टि पर आ टिकते हैं—

  • कर्म करो, पर आसक्त मत हो
  • धन अर्जित करो, पर उससे बँधो मत
  • संबंध निभाओ, पर उनसे बिखरो मत

एक पंक्ति में सार

जो क्षणभंगुर है, उस पर बन्धन नहीं—
यही पण्डित का लक्षण है

Sanskrit Subhashiton collection 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ