महाभारत केवल युद्ध, राजनीति और महाकाव्य नहीं है। यह जीवन और व्यवहार का गहन दर्शन प्रस्तुत करता है। इसमें धन, धर्म, दान, विवेक, अनुशासन और वैराग्य से जुड़े नियम और सूक्तियाँ हैं। यह लेख आपके लिए 21 चयनित श्लोकों के माध्यम से जीवन-दर्शन का सार प्रस्तुत करता है।
महाभारत का यह दृष्टिकोण विवेकपूर्ण जीवन जीने, समाज में सम्मान और आन्तरिक शांति प्राप्त करने का मार्ग बताता है।
श्लोक उदाहरण:
अद्रोह सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते ॥ १२.१२४.६६
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि धर्म केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि मन और कर्म का संयोजन है।
आज के समय में भी, सहानुभूति और सहायता ही व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक संतुलन बनाए रखते हैं।
श्लोक उदाहरण:
अधनं दुर्बलं प्राहुर्धनेन बलवान्भवेत् ।
सर्वं धनवता प्राप्यं सर्वं तरति कोशवान् ॥ १२.१३०.४९
महाभारत यह दिखाता है कि धन और संसाधन सामाजिक शक्ति देते हैं, लेकिन यह स्थायी नहीं हैं।
धन का सही उपयोग और विवेकपूर्ण दान ही आज भी समाज में स्थायी सम्मान दिलाते हैं।
श्लोक उदाहरण:
अधर्मः क्षत्रियस्यैष यच्छय्यामरणं भवेत् ॥ १२.९७.२३
धर्म को केवल नियमों से नहीं परखा जा सकता।
श्लोक उदाहरण:
अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसञ्चयः ।
आरोग्यं प्रियसंवासो गृध्येत्तत्र न पण्डितः ॥ १२.३३०.१४
श्लोक उदाहरण:
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः ।
द्वावेव सुखमेधते दीर्घसूत्री विनश्यति ॥ १२.१३७.११
श्लोक उदाहरण:
अनर्हते यद्ददाति न ददाति यदर्हते ।
अर्हानर्हापरिज्ञानाद्दानधर्मोऽपि दुष्करः ॥ १२.२०.९
श्लोक उदाहरण:
अनायुष्यं दिवा स्वप्नं तथाभ्युदितशायिता ॥ १३.१०४.१३९
21 श्लोकों की इस श्रृंखला से यह स्पष्ट होता है कि महाभारत केवल कथा या युद्ध नहीं है। यह व्यवहारिक जीवन, सामाजिक विवेक और आन्तरिक संतुलन का गहन दर्शन देता है।
मुख्य संदेश:
महाभारत के श्लोक केवल दर्शन नहीं, बल्कि व्यावहारिक जीवन की सीख भी हैं।
यहां सभी 21 श्लोक का विस्तार से हिन्दी व्याख्या के साथ दिया गया है
१ अदत्तस्यानुपादानं दानमध्ययनं तपः ।
अहिंसा सत्यमक्रोध इज्या धर्मस्य लक्षणम् ॥ १२.३६.१०
बहुत सुंदर श्लोक है। यह श्रीमद्भागवत पुराण (१२.३६.१०) का श्लोक है, जिसमें धर्म के लक्षण बताए गए हैं।
धर्म के लक्षण ये हैं—
जो वस्तु हमें दी न गई हो, उसे ग्रहण न करना;
दान करना;
शास्त्रों का अध्ययन करना;
तप और संयम का पालन करना;
अहिंसा रखना;
सत्य बोलना;
क्रोध का त्याग करना;
और ईश्वर की पूजा करना।
यह श्लोक बताता है कि धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि
कलियुग में विशेष रूप से यह श्लोक बताता है कि धर्म का मूल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि आंतरिक संयम और करुणा है।
2. यह श्लोक श्रीमद्भागवत पुराण (२.५५.१३) के भाव से जुड़ा हुआ है और राजनीति, शत्रु-नीति तथा धर्म की सूक्ष्म व्याख्या करता है।
अद्रोहसमयं कृत्वा चिच्छेद नमुचेः शिरः ।
शक्रः, साभिमता तस्य रिपौ वृत्तिः सनातनी ॥
इन्द्र ने पहले यह शर्त स्वीकार की कि वह द्रोह नहीं करेंगे, फिर भी उन्होंने नमुचि असुर का सिर काट दिया। शत्रु के प्रति ऐसी नीति को ही इन्द्र के लिए उचित और सनातन माना गया है।
यह श्लोक धर्म की कठोर वास्तविकता दिखाता है—
यहाँ “अद्रोहसमय” का उल्लंघन स्वार्थ के लिए नहीं,
बल्कि अधर्म के विनाश हेतु दिखाया गया है।
यह श्लोक यह नहीं सिखाता कि छल करना धर्म है,
बल्कि यह बताता है कि—
अधर्मी के साथ वही नीति अपनाई जाती है,
जो धर्म की रक्षा कर सके।
इसी भाव को महाभारत में श्रीकृष्ण की नीति में भी देखा जाता है।
श्लोक
3. अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते ॥ १२.१२४.६६
मन, वाणी और कर्म—तीनों से
सभी प्राणियों के प्रति द्रोह न रखना,
उन पर करुणा करना और दानशील होना—
यही श्रेष्ठ और प्रशंसनीय चरित्र है।
शान्ति-पर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को समझाते हैं कि—
यह श्लोक पहले बताए गए श्लोकों से सीधा जुड़ता है:
जो किसी से द्रोह नहीं करता, करुणा रखता है और दानशील है—
वही महाभारत की दृष्टि में आदर्श मनुष्य है।
४ अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः ।
या वृत्तिः स परोधर्मस्तेन जीवामि जाजले ॥ १२.२६२.६
यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.२६२.६) का ही विस्तारात्मक पाठ है और जाजलि–तुलाधार संवाद में आता है। यहाँ वृत्ति (जीविका/आचरण) के आधार पर परम धर्म का निर्णय किया गया है।
हे जाजलि!
जिस जीवन-वृत्ति से मनुष्य
या तो किसी भी प्राणी के प्रति द्रोह किए बिना,
या अत्यल्प और अनिवार्य द्रोह के साथ जीवन यापन करता है—
वही वृत्ति परम धर्म है।
मैं उसी धर्म से जीवन जीता हूँ।
महाभारत यहाँ यथार्थ धर्म सिखाता है:
इसलिए धर्म को अव्यवहारिक कठोरता नहीं,
बल्कि करुणा-प्रधान जीवन-पद्धति माना गया है।
जिस जीविका में द्रोह न्यूनतम हो और करुणा अधिकतम—
वही महाभारत की दृष्टि में परम धर्म है।
५ अधनं दुर्बलं प्राहुर्धनेन बलवान्भवेत् ।
सर्वं धनवता प्राप्यं सर्वं तरति कोशवान् ॥ १२.१३०.४९
यह श्लोक भी महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.१३०.४९) का है और समाज के कठोर यथार्थ को बिना संकोच प्रकट करता है।
लोग निर्धन को निर्बल कहते हैं;
धन के द्वारा मनुष्य बलवान बन जाता है।
धनवान के लिए सब कुछ प्राप्त करना संभव है
और वही सब संकटों को पार कर लेता है।
यह श्लोक धन-पूजा का उपदेश नहीं देता,
बल्कि समाज की वास्तविक मानसिकता उजागर करता है—
इसी शान्ति-पर्व में यह संकेत भी है कि
धन का अर्जन धर्म से हो और उसका उपयोग लोक-कल्याण में।
आप जिन श्लोकों की शृंखला दे रहे हैं,
उनका क्रम बहुत अर्थपूर्ण बन रहा है:
महाभारत दिखाता है कि धर्म, जीविका और धन—तीनों का संतुलन ही जीवन है।
धन स्वयं धर्म नहीं, पर धर्म के आचरण का सशक्त साधन अवश्य है।
६ अधनस्य मृतं श्रेयः ॥ ६.९६.६
निर्धन मनुष्याला मरण श्रेयस्कर !
यह वाक्य सच में कठोर, झकझोर देने वाला है।
महाभारत, कर्ण-पर्व (६.९६.६) का यह अंश उस समय की निर्दय सामाजिक सच्चाई को उजागर करता है—उपदेश नहीं, निदान है।
उस समय के सामाजिक व्यवहार में
निर्धन मनुष्य के लिए
जीवन से अधिक मृत्यु को “श्रेयस्कर” माना जाता था।
(मराठी भावार्थ आपने बिल्कुल ठीक दिया है:
“निर्धन मनुष्याला मरण श्रेयस्कर !”)
महाभारत यहाँ मूल्य-निर्देशन नहीं कर रहा, बल्कि—
इसीलिए शान्ति-पर्व में आगे चलकर—
श्लोक-श्रृंखला बहुत सटीक है:
यही देखकर महाभारत पूछता है—
क्या ऐसा समाज धर्मी कहलाने योग्य है?
उत्तर है—नहीं।
जहाँ निर्धन का जीवन तुच्छ समझा जाए,
वहाँ अधर्म अपने चरम पर होता है।
७ अधनाद्धि निवर्तन्ते ज्ञातयः सुहृदो द्विजाः ।
अपुष्पादफलाद्वृक्षाद्यथा कृष्ण पतत्त्रिणः ॥ ५.७२.२०
यह श्लोक महाभारत, उद्योग-पर्व (५.७२.२०) का है और जिस क्रम में श्लोक रखे हैं, वह समाज की निष्ठुर वास्तविकता को एक-एक परत खोलता जाता है।
जब मनुष्य निर्धन हो जाता है,
तो उसके संबंधी, मित्र और सम्मानित लोग
उससे वैसे ही दूर हो जाते हैं
जैसे बिना फूल-फल वाले वृक्ष को
कौए छोड़ देते हैं।
यह श्लोक मनुष्य की स्वार्थपरक प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य है—
यह उपदेश नहीं,
बल्कि समाज के मुख पर आईना है।
श्लोक-माला अब स्पष्ट रूप से यह कथा कह रही है—
इसी पृष्ठभूमि में महाभारत
राजधर्म, दान और करुणा को अनिवार्य घोषित करता है।
जहाँ धन के बिना संबंध सूख जाएँ,
वहाँ समाज नहीं, केवल सौदे शेष रह जाते हैं।
८ अधनेनार्थकामेन नार्थः शक्यो विधित्सितुम् ।
अर्थैरर्था निबध्यन्ते गजैरिव महागजाः ॥ १२.८.२०
यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.८.२०) का है और यह धन, काम और साधनों के बीच के व्यावहारिक सम्बन्ध को बहुत स्पष्ट शब्दों में रखता है।
जो स्वयं निर्धन है और धन की इच्छा रखता है,
वह बिना साधनों के धन प्राप्त नहीं कर सकता।
धन की प्राप्ति भी धन से ही होती है,
जैसे बड़े हाथी हाथियों से ही बाँधे जाते हैं।
महाभारत यहाँ कह रहा है कि—
यह श्लोक
“धन से धन आता है”
इस कटु सत्य को दर्शाता है—
पर इसका अर्थ यह नहीं कि
अधर्म से धन कमाओ।
अब शृंखला पूर्ण होती दिख रही है:
इसीलिए महाभारत बार-बार कहता है—
धर्मपूर्वक अर्थ का अर्जन अनिवार्य है।
धन का त्याग नहीं,
धर्मयुक्त अर्जन ही जीवन को सम्भव बनाता है।
९ अधर्मः क्षत्रियस्यैष यच्छय्यामरणं भवेत् ॥ १२.९७.२३
यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.९७.२३) का है और यह क्षत्रिय-धर्म को अत्यन्त स्पष्ट और कठोर शब्दों में परिभाषित करता है।
क्षत्रिय के लिए यह अधर्म है
कि वह शय्या पर (युद्ध किए बिना) मरे।
भीष्म पितामह युधिष्ठिर को बताते हैं कि—
यह श्लोक
वीर-मृत्यु बनाम पलायन का स्पष्ट भेद करता है।
महाभारत यह भी स्पष्ट करता है कि—
क्षत्रिय का धर्म है—
अन्याय से लड़ते हुए जीना
और आवश्यकता हो तो रणभूमि में मरना।
१० अधर्मरूपो धर्मो हि कश्चिदस्ति नराधिप ।
धर्मश्चाधर्मरूपोऽस्ति तच्च ज्ञेयं विपश्चिता ॥ १२.३३.३२
यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.३३.३२) का है और यह महाभारत के सबसे गूढ़ धर्म-दर्शन को सीधे शब्दों में रख देता है।
हे राजन्!
कभी-कभी ऐसा धर्म होता है जो बाहर से अधर्म जैसा प्रतीत होता है,
और कभी ऐसा अधर्म भी होता है जो धर्म का रूप धारण कर लेता है।
इस भेद को बुद्धिमान मनुष्य को समझना चाहिए।
यह श्लोक कहता है—
यही कारण है कि
अब पूरी श्लोक-श्रृंखला एक दार्शनिक चाप बनाती है:
जो बाहर से धर्म दिखे, वही धर्म नहीं;
और जो कठोर लगे, वह अधर्म ही हो—यह आवश्यक नहीं।
११ अधर्मो धर्मतां याति स्वामी चेद्धार्मिको भवेत् ।
स्वामिनो गुणदोषाभ्यां भृत्याः स्युर्नात्र संशयः ॥ ११.८.३३
यह श्लोक महाभारत, अनुशासन-पर्व (११.८.३३) का है और यह नेतृत्व, सत्ता और नैतिक उत्तरदायित्व का अत्यन्त सूक्ष्म सिद्धान्त प्रस्तुत करता है।
यदि शासक धर्मात्मा हो,
तो कठोर कर्म भी धर्म का रूप ले लेते हैं।
सेवक और प्रजा
अपने स्वामी के गुणों और दोषों के अनुसार ही बनते हैं—
इसमें कोई संदेह नहीं।
यह श्लोक कहता है कि—
इसी भाव से कहा गया है—
यथा राजा तथा प्रजा
यह श्लोक सीधे जुड़ता है आपके पहले उद्धृत वाक्य से—
अधर्मरूपो धर्मो हि कश्चिदस्ति…
यहाँ उसका व्यावहारिक सूत्र दिया गया है—
निर्णायक तत्व है “स्वामी का धर्म”।
नेतृत्व धर्मी हो, तो कठोर निर्णय भी धर्म बन जाते हैं;
और नेतृत्व अधर्मी हो, तो धर्म भी अधर्म बन जाता है।
१२ अध्रुवा सर्वमर्त्येषु श्रीरुपालक्ष्यते भृशम् ॥ ९.६५.२०
यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (९.६५.२०) में आता है और श्री (लक्ष्मी) के स्वभाव—अस्थिरता—को अत्यन्त मार्मिक रूप में बताता है।
अध्रुवा सर्वमर्त्येषु श्रीरुपालक्ष्यते भृशम् ॥
सभी नश्वर मनुष्यों के जीवन में
लक्ष्मी अत्यन्त अस्थिर दिखाई देती है—
वह कहीं स्थायी नहीं रहती।
यह श्लोक बताता है कि—
यही कारण है कि महाभारत
धन का उपभोग तो स्वीकार करता है,
पर आसक्ति को त्यागने की शिक्षा देता है।
चुने गए श्लोक एक पूर्ण दर्शन रचते हैं:
जो अस्थिर है, उस पर जीवन टिकाना बुद्धिमानी नहीं;
धर्म और शील ही स्थायी पूँजी हैं।
१३ अनन्तं बत मे वित्तं यस्य मे नास्ति किञ्चन ।
मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किञ्चन ॥ १२.१७.१९
यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.१७.१९) का अत्यन्त प्रसिद्ध वाक्य है—
जनक–वैदेह संवाद में आया हुआ, जहाँ वैराग्य और वास्तविक संपदा का अद्भुत उद्घोष है।
मेरी संपत्ति अनन्त है,
क्योंकि मेरा कुछ भी निजी नहीं है।
यदि मिथिला नगरी जल भी जाए,
तो मेरा कुछ भी नष्ट नहीं होता।
यह श्लोक विरक्ति का चरम सूत्र है—
यही कारण है कि उन्हें
राजर्षि कहा गया।
जिन श्लोकों को क्रम से रखा है,
वे जैसे एक यात्रा पूरी करते हैं—
जिसने “मेरा” छोड़ दिया,
उसी ने अनन्त संपदा पा ली।
१४ अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ ६.३३.२२
यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता (९.२२) का है—
महाभारत के भीष्म-परंपरागत पाठों में इसका पर्व/अध्याय क्रम (६.३३.२२) भी मिलता है, इसलिए आपका संदर्भ भी परंपरागत रूप से सही समझा जाता है।
महाभारत जीवन-दर्शन: श्लोक एवं डिजिटल चित्रण 1
जो मनुष्य अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हुए मेरी उपासना करते हैं,
उनके लिए जो आवश्यक है उसे मैं स्वयं उपलब्ध कराता हूँ
और जो उन्हें प्राप्त है, उसकी मैं स्वयं रक्षा करता हूँ।
यह श्लोक कर्म–धन–धर्म–वैराग्य की आपकी पूरी श्लोक-श्रृंखला का
आध्यात्मिक शिखर है।
अर्थात—
भक्त का बोझ ईश्वर स्वयं उठा लेते हैं।
जहाँ चिंता समाप्त होती है,
वहीं से ईश्वर की जिम्मेदारी प्रारम्भ होती है।
१५ अनर्हते यद्ददाति न ददाति यदर्हते ।
अर्हानर्हापरिज्ञानाद्दानधर्मोऽपि दुष्करः ॥ १२.२०.९
यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.२०.९) का है और यह दान-धर्म की सूक्ष्म कठिनाई को बड़ी स्पष्टता से बताता है।
जो व्यक्ति अयोग्य को दान देता है
और योग्य को दान नहीं देता,
उसका कारण योग्यता-अयोग्यता का विवेक न होना है।
इसी कारण दान जैसा पुण्य कर्म भी कठिन हो जाता है।
महाभारत यहाँ बताता है कि—
यह श्लोक
“दान से सब ठीक हो जाता है”
इस सरल धारणा को तोड़ देता है।
अब यह सूत्र स्पष्ट हो जाता है—
विवेक के बिना किया गया दान भी
धर्म नहीं, भार बन सकता है।
१६ अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः ।
द्वावेव सुखमेधते दीर्घसूत्री विनश्यति ॥ १२.१३७.११
यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.१३७.११) का अत्यन्त व्यावहारिक नीति-सूत्र है— जीवन में बुद्धि, समयबोध और कर्म-तत्परता का महत्व बताने वाला।
जो व्यक्ति भविष्य की योजना भी करता है
और वर्तमान में शीघ्र बुद्धि से निर्णय भी लेता है,
वही सुखपूर्वक उन्नति करता है।
काम टालने वाला व्यक्ति अंततः नष्ट हो जाता है।
यह श्लोक कहता है—
और जो व्यक्ति
“कल करेंगे” की आदत में फँसा रहता है,
उसके हाथ से अवसर निकल जाते हैं।
चयनित श्लोक एक पूर्ण जीवन-दर्शन बनाते हैं—
जो आगे भी सोचता है और अभी भी करता है, वही आगे बढ़ता है।
१७ अनायुष्यं दिवा स्वप्नं तथाभ्युदितशायिता ॥ १३.१०४.१३९
यह श्लोक महाभारत, अनुशासन-पर्व (१३.१०४.१३९) का है और यह आयुष्य, संयम और दिनचर्या से जुड़ा हुआ एक सीधा-सा लेकिन बहुत व्यावहारिक उपदेश देता है।
दिन में सोना
और सूर्योदय के बाद तक बिस्तर पर पड़े रहना—
ये दोनों आयु को क्षीण करने वाले माने गए हैं।
महाभारत यहाँ केवल नैतिक उपदेश नहीं दे रहा,
बल्कि स्वास्थ्य-विज्ञान और जीवन-अनुशासन की बात कर रहा है—
आयुर्वेद में भी यही कहा गया है—
ब्रह्ममुहूर्ते उत्तिष्ठेत्…
चुनी हुई श्लोक-माला अब व्यक्ति के आन्तरिक धर्म से निकलकर दैनिक जीवन-अनुशासन तक आ पहुँची है—
जो प्रकृति के समय-चक्र के विरुद्ध जीता है,
वह अपने ही आयुष्य को क्षीण करता है।
१८ अनारम्भात्तु कार्याणां नार्थः सम्पद्यते क्वचित् ॥ १०.२.३४
यह श्लोक महाभारत, सभा-पर्व (१०.२.३४) का एक सीधा-सा लेकिन अत्यन्त शक्तिशाली कर्म-सूत्र है—आलस्य और निष्क्रियता पर कठोर प्रहार।
शब्दार्थ
यदि किसी कार्य का आरम्भ ही न किया जाए,
तो उसका फल कभी भी प्राप्त नहीं होता।
यह श्लोक घोषित करता है—
इसी भाव को गीता कहती है—
कर्मण्येवाधिकारस्ते…
अब शृंखला पूर्ण रूप लेती है—
महाभारत यहाँ स्पष्ट करता है कि
धर्म, धन, दान, भक्ति—
सबका द्वार आरम्भ से ही खुलता है।
जो शुरू नहीं करता,
वह कभी भी नहीं पाता।
१९ अनार्याचरितं तात परस्वस्पृहणं भृशम् ॥ २.५४.६
यह श्लोक महाभारत, आदिपर्व (२.५४.६) का है और यह आर्य–अनार्य आचरण का स्पष्ट भेद बताता है—विशेषकर पराये धन/वस्तु पर लोभ को लेकर।
हे पुत्र!
दूसरों की वस्तु या धन की तीव्र लालसा रखना
अनार्य लोगों का आचरण है।
महाभारत यहाँ “आर्य” को वंश या जाति से नहीं,
बल्कि आचरण से परिभाषित करता है—
इसीलिए महाभारत में बार-बार कहा गया है कि
धर्म का आरम्भ इच्छाओं के संयम से होता है।
पूरी माला एक स्पष्ट संदेश देती है—
जो अपने से संतुष्ट नहीं और दूसरे की वस्तु चाहता है,
वही अनार्य आचरण करता है।
२० अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते ।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥ ५.३३.३६
यह श्लोक महाभारत, उद्योग-पर्व (५.३३.३६) का है और यह अविवेकी, अशिष्ट मनुष्य के लक्षण बहुत तीखे शब्दों में बताता है।
जो व्यक्ति
बिना बुलाए भीतर घुस जाता है,
बिना पूछे अधिक बोलता है,
और अविश्वसनीय लोगों पर भरोसा करता है—
वह मूर्ख बुद्धि वाला और अधम मनुष्य कहलाता है।
यह श्लोक सामाजिक बुद्धि (social intelligence) का सूत्र है—
महाभारत यहाँ साफ कहता है कि
धर्म केवल सत्य–अहिंसा नहीं,
समय, स्थान और पात्र की पहचान भी है।
आपके पहले श्लोकों में
मर्यादा, मौन और विवेक—
इनके बिना मनुष्य बुद्धिमान नहीं कहलाता।
२१ अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसञ्चयः ।
आरोग्यं प्रियसंवासो गृध्येत्तत्र न पण्डितः ॥ १२.३३०.१४
यह श्लोक महाभारत, शान्ति-पर्व (१२.३३०.१४) का है और यह जीवन की अनित्यता पर अत्यन्त स्पष्ट, शान्त और गहन उपदेश देता है।
यौवन, सौंदर्य, जीवन, धन-संग्रह,
स्वास्थ्य और प्रियजनों का साथ—
ये सभी अस्थायी हैं।
इसलिए बुद्धिमान मनुष्य
इनमें अत्यधिक आसक्ति नहीं रखता।
महाभारत यहाँ वैराग्य नहीं,
यथार्थ-बोध सिखाता है—
इसी भाव को गीता कहती है—
अनित्यं असुखं लोकम्…
हमारे द्वारा चुने गए श्लोक अब
एक परिपक्व जीवन-दृष्टि पर आ टिकते हैं—
जो क्षणभंगुर है, उस पर बन्धन नहीं—
यही पण्डित का लक्षण है
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