नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥
१ अकाले कृत्यमारब्धं कर्तुर्नार्थाय कल्पते ।
तदेव काल आरब्धं महतेऽर्थाय कल्पते ॥ १२.१३८.९५
यह श्लोक महाभारत के शांति पर्व से है, जो "समय के महत्व" (Importance of Time) को बहुत ही सटीक तरीके से समझाता है।
अर्थ:
* अकाले कृत्यमारब्धं: जो कार्य गलत समय पर (समय से पहले या बिना सोचे-समझे) शुरू किया जाता है,
* कर्तुर्नार्थाय कल्पते: वह उसे करने वाले के लिए लाभकारी नहीं होता (सिद्ध नहीं होता)।
* तदेव काल आरब्धं: लेकिन वही कार्य जब सही समय आने पर शुरू किया जाता है,
* महतेऽर्थाय कल्पते: तो वह महान फल देने वाला और सफल होता है।
सार: मेहनत के साथ-साथ 'सही समय' का इंतजार करना भी सफलता के लिए अनिवार्य है।
२ अकृत्वा कर्म यो लोके फलं विन्दति धिष्ठितः ।
स तु वक्तव्यतां याति द्वेष्यो भवति भूयशः ॥ १०.२.१७
यह श्लोक महाभारत के सौप्तिक पर्व से है। यह उन लोगों के बारे में एक कड़वा सच बताता है जो बिना मेहनत के फल पाना चाहते हैं।
अर्थ:
* अकृत्वा कर्म यो लोके: इस संसार में जो व्यक्ति बिना कर्म (मेहनत) किए,
* फलं विन्दति धिष्ठितः: फल पाने की इच्छा रखता है या फल प्राप्त कर लेता है,
* स तु वक्तव्यतां याति: वह व्यक्ति उपहास (मज़ाक) का पात्र बनता है,
* द्वेष्यो भवति भूयशः: और समाज में हर जगह नफरत या तिरस्कार का शिकार होता है।
सार: बिना परिश्रम के मिला हुआ फल न तो सम्मान दिलाता है और न ही स्थायी होता है। ऐसे इंसान को लोग "मुफ्तखोर" या "धोखेबाज" समझने लगते हैं।
३ अकृत्वा मानुषं कर्म यो दैवमनुवर्तते ।
वृथा श्राम्यति सम्प्राप्य पतिं क्लीबमिवाङ्गना ॥ १३.६.२०
यह श्लोक महाभारत के अनुशासन पर्व से है, जो बहुत ही तीखे उदाहरण के साथ 'पुरुषार्थ' (मेहनत) की महत्ता बताता है।
अर्थ:
* अकृत्वा मानुषं कर्म: जो मनुष्य अपना मानवीय कर्म (पुरुषार्थ या मेहनत) किए बिना,
* यो दैवमनुवर्तते: केवल 'भाग्य' (Destiny) के भरोसे बैठा रहता है,
* वृथा श्राम्यति सम्प्राप्य: वह उसी प्रकार व्यर्थ कष्ट पाता है,
* पतिं क्लीबमिवाङ्गना: जैसे एक स्त्री किसी नपुंसक (अक्षम) पति को प्राप्त करके व्यर्थ ही जीवन बिताती है (अर्थात उससे संतान या सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती)।
सार: भाग्य भी उन्हीं का साथ देता है जो कर्म करते हैं। बिना कर्म के भाग्य के भरोसे बैठना पूरी तरह निष्फल है।
४ अगोप्तारश्च राजानो बलिषड्भागतस्कराः ।
समर्थाश्चाप्यदातारस्ते वै निरयगामिनः ॥ १३.२३.८०
यह श्लोक महाभारत के अनुशासन पर्व से है, जो राजाओं और सामर्थ्यवान लोगों के नैतिक कर्तव्यों और उनके दुष्कर्मों के परिणाम के बारे में चेतावनी देता है।
अर्थ:
* अगोप्तारश्च राजानो: वे राजा जो अपनी प्रजा की रक्षा (सुरक्षा) नहीं करते,
* बलिषड्भागतस्कराः: लेकिन फिर भी प्रजा से उनकी आय का छठा हिस्सा (कर/Tax) वसूलते हैं, वे चोर (तस्कर) के समान हैं।
* समर्थाश्चाप्यदातारस्ते: और वे लोग जो सामर्थ्यवान (अमीर) होने के बावजूद दान नहीं देते या मदद नहीं करते,
* वै निरयगामिनः: वे निश्चित रूप से नरकगामी होते हैं (अर्थात् पतन को प्राप्त होते हैं)।
सार: शक्ति और धन के साथ जिम्मेदारी भी आती है। बिना जिम्मेदारी निभाए केवल लाभ लेना अधर्म है।
५ अग्निस्तेजो महल्लोके गूढस्तिष्ठति दारुषु ।
न चोपयुङ्क्ते तद्दारु यावन्नोद्दीप्यते परैः ॥ ५.३७.६०
यह श्लोक महाभारत के उद्योग पर्व (विदुर नीति) से है, जो मनुष्य के भीतर छिपी हुई शक्ति और क्रोध के बारे में एक महान सत्य बताता है।
अर्थ:
* अग्निस्तेजो महल्लोके: इस लोक में अग्नि का तेज बहुत महान है,
* गूढस्तिष्ठति दारुषु: लेकिन वह लकड़ियों के भीतर 'छिपी' रहती है।
* न चोपयुङ्क्ते तद्दारु: वह अग्नि उस लकड़ी को तब तक नहीं जलाती,
* यावन्नोद्दीप्यते परैः: जब तक कि दूसरे (बाहरी घर्षण या चिंगारी) उसे प्रज्वलित न कर दें।
सार: जैसे लकड़ी में आग छिपी होती है पर दिखती नहीं, वैसे ही शांत दिखने वाले व्यक्ति के भीतर अपार शक्ति और क्रोध छिपा होता है। उसे तब तक कमज़ोर नहीं समझना चाहिए जब तक वह अपनी शक्ति प्रकट न करे।
६ अग्नौ प्रास्तं तु पुरुषं कर्मान्वेति स्वयं कृतम् ।
तस्मात्तु पुरुषो यत्नाद्धर्मं सञ्चिनुयाच्छनैः ॥ ५.४०.१८
यह श्लोक विदुर नीति (महाभारत, उद्योग पर्व) से लिया गया है, जो मृत्यु के बाद की सच्चाई और धर्म के महत्व को समझाता है।
अर्थ:
* अग्नौ प्रास्तं तु पुरुषं: जब किसी मनुष्य का शरीर अग्नि (दाह संस्कार) के हवाले कर दिया जाता है,
* कर्मान्वेति स्वयं कृतम्: तब केवल उसके द्वारा स्वयं किए गए 'कर्म' ही उसके साथ जाते हैं।
* तस्मात्तु पुरुषो यत्नाद्धर्मं: इसलिए, मनुष्य को बड़े यत्न (प्रयास) के साथ धर्म का आचरण करना चाहिए,
* सञ्चिनुयाच्छनैः: और धीरे-धीरे (निरंतर) पुण्य का संचय करना चाहिए।
सार: मृत्यु के बाद न धन जाता है, न रिश्तेदार। केवल आपका धर्म और आपके कर्म ही आपके साथ अगली यात्रा पर चलते हैं।
७ अग्न्याधानेन यज्ञेन काषायेण जटाजिनैः ।
लोकान्विश्वासयित्वैव ततो लुम्पेद्यथा वृकः ॥ १.१४०.१९
यह श्लोक महाभारत के आदि पर्व से है और बहुत ही गंभीर चेतावनी देता है। यह उन लोगों का वर्णन करता है जो धर्म का दिखावा करके दूसरों को धोखा देते हैं।
अर्थ:
* अग्न्याधानेन यज्ञेन: अग्निहोत्र (यज्ञ) करने का ढोंग करके,
* काषायेण जटाजिनैः: गेरुआ वस्त्र पहनकर, जटाएँ बढ़ाकर और मृगछाला धारण करके,
* लोकान्विश्वासयित्वैव: पहले लोगों का विश्वास जीत लिया जाता है,
* ततो लुम्पेद्यथा वृकः: और फिर मौका मिलते ही वे उसी तरह झपट पड़ते हैं जैसे एक भेड़िया (वृक) अपने शिकार पर झपटता है।
सार: वेशभूषा या धार्मिक आडंबर किसी के सज्जन
८ अङ्कुशं शौचमित्याहुरथानामुपधारणे ।
आनाम्य फलितां शाखां पक्वं पक्वं प्रशातयेत् ॥ १.१४०.२०
यह श्लोक भी महाभारत के आदि पर्व से है, जहाँ राजनीति और कूटनीति का बहुत ही व्यावहारिक पक्ष समझाया गया है। यह "अवसरवादिता" (Opportunism) और "बुद्धिमानी से फल प्राप्त करने" की कला को दर्शाता है।
अर्थ:
* अङ्कुशं शौचमित्याहुरथानामुपधारणे: किसी कार्य की सिद्धि या धन-संपत्ति (अर्थ) को प्राप्त करने के लिए 'अंकुश' और 'चतुराई' को ही शुद्धि (साधन) माना गया है।
* आनाम्य फलितां शाखां: बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह फलों से लदी हुई शाखा को (अपनी चतुराई से) नीचे झुका ले,
* पक्वं पक्वं प्रशातयेत्: और फिर जो-जो फल पक गए हों (अर्थात् जो अवसर तैयार हों), उन्हें एक-एक करके तोड़ ले।
सार: यह श्लोक कूटनीति सिखाता है कि सफलता पाने के लिए धैर्य और सही तकनीक का उपयोग करना चाहिए। फल पाने के लिए पेड़ को काटना नहीं, बल्कि डाल को झुकाकर केवल पके हुए फलों को चुनना बुद्धिमानी है।
९ अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण साधयेत् ।
प्रकृतिभ्यः परं यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥ ६.५.१२
यह श्लोक महाभारत के भीष्म पर्व से है, जो तर्क की सीमाओं और ईश्वर या ब्रह्मांड की अलौकिक शक्तियों के रहस्य को समझाता है।
अर्थ:
* अचिन्त्याः खलु ये भावा: जो विषय अचिन्त्य (कल्पना से परे) हैं,
* न तांस्तर्केण साधयेत्: उन्हें केवल तर्क (Logic) या बहस से सिद्ध नहीं किया जा सकता।
* प्रकृतिभ्यः परं यत्तु: जो प्रकृति के सामान्य नियमों (भौतिक विज्ञान) से परे है,
* तदचिन्त्यस्य लक्षणम्: वही 'अचिन्त्य' का वास्तविक लक्षण है।
सार: विज्ञान और तर्क की अपनी सीमाएं हैं। ब्रह्मांड में ऐसी कई दिव्य और अलौकिक शक्तियां हैं जिन्हें केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि अनुभव और विश्वास से ही समझा जा सकता है।
१० अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ६.२८.४०
यह श्लोक श्रीमदभगवदगीता (अध्याय 4, श्लोक 40) से है, जहाँ भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को 'संशय' (Doubt) के खतरों के बारे में बता रहे हैं।
अर्थ:
* अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च: वह व्यक्ति जो अज्ञानी है और जिसे (गुरु या शास्त्रों पर) श्रद्धा नहीं है,
* संशयात्मा विनश्यति: और जिसके मन में सदा संदेह (Doubt) बना रहता है, उसका विनाश निश्चित है।
* नायं लोकोऽस्ति न परो: ऐसे संशयी व्यक्ति के लिए न यह लोक (वर्तमान जीवन) है और न ही परलोक,
* न सुखं संशयात्मनः: क्योंकि संशय करने वाले को कहीं भी सुख प्राप्त नहीं होता।
सार: संदेह एक ऐसी बीमारी है जो निर्णय लेने की क्षमता को खत्म कर देती है। जिस व्यक्ति को खुद पर, अपने काम पर या ईश्वर पर भरोसा नहीं होता, वह न तो दुनिया में सफल होता है और न ही उसे मानसिक शांति मिलती है।
११ अज्ञानतिमिरान्धस्य लोकस्य तु विचेष्टतः ।
ज्ञानाञ्जनशलाकाभिर्नेत्रोन्मीलनकारकम् ॥ १.१.८४
यह श्लोक महाभारत के आदि पर्व से है, जो ज्ञान की महिमा और अंधकार को मिटाने की उसकी शक्ति का वर्णन करता है। यह अक्सर गुरु की वंदना में भी प्रयोग किया जाता है।
अर्थ:
* अज्ञानतिमिरान्धस्य: यह संसार अज्ञान रूपी गहरे अंधकार (मोतियाबिंद जैसी बीमारी) से अंधा हो चुका है।
* लोकस्य तु विचेष्टतः: और लोग इस अंधकार में भटकते हुए कष्ट पा रहे हैं।
* ज्ञानाञ्जनशलाकाभिः: तब ज्ञान रूपी अंजन (काजल) की सलाई से,
* नेत्रोन्मीलनकारकम्: (यह शास्त्र/गुरु) आंखों को खोलकर सत्य के दर्शन कराता है।
सार: जैसे अंजन आंखों की बीमारी दूर कर दृष्टि साफ करता है, वैसे ही ज्ञान हमारे मन के भ्रम और अंधकार को दूर कर हमें सही रास्ता दिखाता है।
१२ अज्ञानेनावृतो लोकः ॥ ३.३१३.८२
यह सूत्र महाभारत के वन पर्व के प्रसिद्ध 'यक्ष-युधिष्ठिर संवाद' से है। जब यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था कि "यह संसार किससे ढका हुआ है?", तब युधिष्ठिर ने यह उत्तर दिया था।
अर्थ:
* अज्ञानेनावृतो लोकः: यह संसार 'अज्ञान' (Ignorance) के द्वारा ढका हुआ है।
सार: जैसे कोहरा सूरज की रोशनी को ढक देता है, वैसे ही अज्ञान हमारे विवेक को ढक देता है। हम सत्य को नहीं देख पाते क्योंकि हमारा मन मोह, माया और भ्रम के आवरण में लिपटा हुआ है।
१३ अञ्जलिः शपथः सान्त्वं शिरसा पादवन्दनम् ।
आशाकरणमित्येवं कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥ १.१४०.६७
यह श्लोक भी महाभारत के आदि पर्व (कणिक नीति) से है। यह बहुत ही व्यावहारिक, हालांकि थोड़ी कठोर कूटनीति का वर्णन करता है, जो सफलता और ऐश्वर्य चाहने वाले व्यक्ति के लिए बताई गई है।
अर्थ:
* अञ्जलिः शपथः सान्त्वं: हाथ जोड़ना (प्रार्थना), शपथ लेना और मीठे वचन बोलना (सान्त्वना देना),
* शिरसा पादवन्दनम्: सिर झुकाकर चरणों की वंदना करना,
* आशाकरणमित्येवं: और भविष्य के लिए आशाएँ जगाना (वादे करना),
* कर्तव्यं भूतिमिच्छता: ऐश्वर्य और उन्नति चाहने वाले व्यक्ति को ये सब अपनाना चाहिए (चाहे शत्रु ही क्यों न हो, कार्य सिद्ध करने के लिए)।
सार: अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए यदि विनम्रता दिखानी पड़े, झुकना पड़े या मधुर व्यवहार करना पड़े, तो उसमें संकोच नहीं करना चाहिए। यह 'साम' और 'दान' की नीति का हिस्सा है।
१४ अतिक्रान्तं हि यत्कार्यं पश्चाच्चिन्तयते नरः ।
तच्चास्य न भवेत्कार्यं चिन्तया च विनश्यति ॥ ८.३१.२९
यह श्लोक महाभारत के कर्ण पर्व से है, जो हमें "समय के महत्व" और "व्यर्थ की चिंता" के बारे में एक बहुत बड़ी सीख देता है।
अर्थ:
* अतिक्रान्तं हि यत्कार्यं: जो कार्य बीत चुका है (अर्थात् जो समय हाथ से निकल गया है),
* पश्चाच्चिन्तयते नरः: उसके बारे में जो मनुष्य बाद में सोचता या शोक करता रहता है,
* तच्चास्य न भवेत्कार्यं: वह बीता हुआ कार्य वापस नहीं सुधर सकता,
* चिन्तया च विनश्यति: बल्कि ऐसा करने से वह मनुष्य केवल अपनी चिंता बढ़ाता है और स्वयं का ही विनाश (समय और मानसिक शांति की बर्बादी) करता है।
व्याख्या:
यह श्लोक "बीती ताहि बिसारि दे" के सिद्धांत पर आधारित है। अक्सर लोग अतीत की गलतियों या छूटे हुए अवसरों पर पछताते रहते हैं। महाभारत का यह अंश कहता है कि बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता; इसलिए उस पर शोक करना केवल वर्तमान को बर्बाद करना है। बुद्धिमान व्यक्ति अतीत से सीखता है, पर उसमें जीता नहीं है।
१५ अति धर्माद्बलं मन्ये बलाद्धर्मः प्रवर्तते ।
बले प्रतिष्ठितो धर्मो धरण्यामिव जङ्गमम् ॥ १२.१३४.६
यह श्लोक महाभारत के शान्ति पर्व से है, जहाँ भीष्म पितामह युधिष्ठिर को राजधर्म और शक्ति का महत्व समझा रहे हैं। यह श्लोक आदर्शवाद और यथार्थवाद के बीच के संबंध को बहुत गहराई से प्रकट करता है।
अर्थ:
* अति धर्माद्बलं मन्ये: मैं धर्म की अपेक्षा 'बल' (शक्ति) को श्रेष्ठ मानता हूँ।
* बलाद्धर्मः प्रवर्तते: क्योंकि धर्म की स्थापना और उसका पालन 'बल' के कारण ही संभव हो पाता है।
* बले प्रतिष्ठितो धर्मो: धर्म बल पर ही टिका हुआ है,
* धरण्यामिव जङ्गमम्: ठीक उसी प्रकार जैसे इस पृथ्वी पर मौजूद सभी चर-अचर जीव (जङ्गम) भूमि (धरा) के आधार पर टिके हुए हैं।
व्याख्या:
भीष्म यहाँ यह समझा रहे हैं कि बिना शक्ति के धर्म केवल एक विचार बनकर रह जाता है। यदि एक राजा के पास दंड-शक्ति (Force) नहीं होगी, तो अधर्मी लोग धर्म का विनाश कर देंगे। धर्म को सुरक्षित रखने के लिए सामर्थ्य और बल का होना अनिवार्य है। जैसे बिना पृथ्वी के हम खड़े नहीं हो सकते, वैसे ही बिना बल के धर्म का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है।
१६ अतियोगमयोगं च श्रेयसोऽर्थी परित्यजेत् ॥ १२.२८७.२४
यह श्लोक महाभारत के शान्ति पर्व से है, जो जीवन में संतुलन (Balance) के महत्व को रेखांकित करता है। यह मोक्ष या कल्याण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के लिए एक अनिवार्य मार्गदर्शक है।
अर्थ:
* अतियोगमयोगं च: 'अतियोग' (किसी भी चीज़ की अति या बहुत अधिक प्रयास) और 'अयोग' (बिल्कुल प्रयास न करना या उपेक्षा करना),
* श्रेयसोऽर्थी परित्यजेत्: अपने कल्याण और श्रेय (Success/Liberation) की इच्छा रखने वाले मनुष्य को इन दोनों का त्याग कर देना चाहिए।
व्याख्या:
यह श्लोक "मध्यम मार्ग" (Middle Path) का समर्थन करता है।
* अतियोग (Excess): किसी भी कार्य में अपनी क्षमता से बाहर जाकर पागलपन की हद तक लगे रहना तनाव और असफलता का कारण बनता है।
* अयोग (Inaction): आलस्य में पड़े रहना या बिल्कुल प्रयास न करना विकास को रोक देता है।
कल्याण का मार्ग इन दोनों के बीच में है—अर्थात 'सम्यक योग' या संतुलित प्रयास। भगवान कृष्ण ने गीता में भी यही कहा है: "युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु" (दुखों का नाश उसी का होता है जिसका आहार, विहार और चेष्टा संतुलित हो)।
१७ अतीतेष्वनपेक्षा ये प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममाः ।
शौचमेव परं तेषां येषां नोत्पद्यते स्पृहा ॥ १३.१०८.१०
यह श्लोक महाभारत के अनुशासन पर्व से है, जो मानसिक पवित्रता और संतोष के उच्चतम स्तर की व्याख्या करता है।
अर्थ:
* अतीतेष्वनपेक्षा ये: जो बीत चुका है, उसकी जो उपेक्षा करते हैं (अर्थात् अतीत का मोह या शोक नहीं करते),
* प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममाः: और जो कुछ वर्तमान में प्राप्त है, उसमें जिनका 'ममत्व' (Mina-ness/Attachment) नहीं है,
* शौचमेव परं तेषां: वास्तव में उन्हीं की 'शौच' (पवित्रता) परम है,
* येषां नोत्पद्यते स्पृहा: जिनके मन में किसी नई वस्तु की तृष्णा या लालसा (Spruha) उत्पन्न नहीं होती।
व्याख्या:
सच्ची शुद्धि केवल शरीर धोने से नहीं आती। यह श्लोक बताता है कि वास्तविक पवित्रता निर्मोह होने में है।
* अतीत से मुक्ति: पुरानी यादों या पछतावे को पकड़े न रखना।
* वर्तमान में अनासक्ति: जो आपके पास है, उसका उपयोग तो करना पर उसमें डूब न जाना।
* लालसा का अभाव: भविष्य की अंतहीन इच्छाओं से मुक्त होना।
जिस व्यक्ति का मन इन तीन बंधनों से मुक्त है, वही वास्तव में भीतर से शुद्ध और पवित्र है।
१८ अतो हास्यतरं लोके किञ्चिदन्यन्न विद्यते ।
यत्र दुर्जनमित्याहु दुर्जनः सज्जनं स्वयम् ॥ १.७४.९५
यह श्लोक महाभारत के आदि पर्व से है (शकुंतला-दुष्यंत संवाद के दौरान), जो समाज के एक बहुत ही गहरे और विडंबनापूर्ण सच को उजागर करता है।
अर्थ:
* अतो हास्यतरं लोके: इस संसार में इससे अधिक हास्यास्पद (Funny/Ironical) बात,
* किञ्चिदन्यन्न विद्यते: और कोई दूसरी नहीं हो सकती—
* यत्र दुर्जनमित्याहु: कि जहाँ एक दुष्ट व्यक्ति (Evil person),
* दुर्जनः सज्जनं स्वयम्: स्वयं दुर्जन होते हुए भी एक भले और सज्जन व्यक्ति को "दुर्जन" कहता है।
व्याख्या:
यह श्लोक उस विडंबना (Irony) पर प्रहार करता है जहाँ अपराधी खुद न्यायधीश बनने की कोशिश करता है। अक्सर समाज में जो व्यक्ति खुद बुराइयों से भरा होता है, वह अपनी कमियों को छिपाने के लिए दूसरों पर उंगली उठाता है और सज्जनों को बदनाम करने की कोशिश करता है। यह "उल्टा चोर कोतवाल को डांटे" वाली स्थिति का आध्यात्मिक और नैतिक चित्रण है।
१९ अथवा जायमानस्य यच्छीलमनुजायते ।
श्रूयते तन्महाराज नामृतस्यापसर्पति ॥ ३.८.११
यह श्लोक महाभारत के वन पर्व से है, जो मनुष्य के स्वभाव (Nature/Inherited Character) की अटल सच्चाई के बारे में है।
अर्थ:
* अथवा जायमानस्य: अथवा, जन्म लेने वाले प्राणी का,
* यच्छीलमनुजायते: जो स्वभाव उसके जन्म के साथ ही पैदा होता है,
* श्रूयते तन्महाराज: हे महाराज! ऐसा सुना जाता है कि वह स्वभाव,
* नामृतस्यापसर्पति: मनुष्य के मरने तक उसे छोड़कर नहीं जाता (अर्थात् स्वभाव बदलना अत्यंत कठिन है)।
व्याख्या:
यह श्लोक कहता है कि मनुष्य का मूल स्वभाव या 'शील' उसके अस्तित्व का हिस्सा होता है। आप शिक्षा या परिवेश से व्यवहार बदल सकते हैं, लेकिन जो संस्कार और गुण जन्म से भीतर रचे-बसे होते हैं, वे व्यक्ति के साथ अंत तक रहते हैं। यह "प्रकृति" की अपरिवर्तनीय शक्ति को दर्शाता है—जैसे नीम का पेड़ अपनी कड़वाहट कभी नहीं छोड़ता।
२० अथवा वसतो राजन्वने वन्येन जीवतः ।
द्रव्येषु यस्य ममता मृत्योरास्ये स वर्तते ॥ १२.१३.१०
यह श्लोक महाभारत के शान्ति पर्व से है, जहाँ 'ममता' (Attachment) और 'त्याग' के सूक्ष्म अंतर को समझाया गया है।
अर्थ:
* अथवा वसतो राजन्वने: हे राजन! चाहे कोई मनुष्य वन में ही क्यों न रहता हो,
* वन्येन जीवतः: और केवल कंद-मूल या वन की वस्तुओं पर ही जीवित रहता हो,
* द्रव्येषु यस्य ममता: यदि फिर भी उसके मन में उन वस्तुओं के प्रति 'ममता' (लगाव/अधिकार का भाव) है,
* मृत्योरास्ये स वर्तते: तो वह साक्षात् मृत्यु के मुख में ही खड़ा है।
व्याख्या:
यह श्लोक एक बहुत बड़ा सत्य उजागर करता है: संन्यास स्थान बदलने से नहीं, बल्कि मानसिक स्थिति बदलने से आता है। यदि कोई व्यक्ति घर-बार छोड़कर जंगल चला जाए, लेकिन वहाँ भी अपनी कुटिया या अपनी कमंडलु के प्रति मोह रखे, तो वह वास्तव में मुक्त नहीं है। 'ममत्व' (यह मेरा है) ही वह बंधन है जो मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र में फँसाए रखता है। वास्तविक त्याग भौतिक वस्तुओं का नहीं, बल्कि उनके प्रति 'जुड़ाव' का है।
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