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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो



न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्श्म चेत्त्वा। जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥

॥ लिप्यन्तरणम् ॥

na vittena tarpaṇīyo manuṣyo lapsyāmahe vittamadrākśma cettvā | jīviṣyāmo yāvadīśiṣyasi tvaṁ varastu me varaṇīyaḥ sa eva ||

॥ अन्वयः ॥

मनुष्यः वित्तेन न तर्पणीयः। वयं त्वा अद्राक्षाम चेत् वित्तं लप्स्यामहे। तथा यावत् त्वं ईशिष्यति जीविष्यामः। सः तु वरः एव मे वरणीयः ॥

॥ अन्वयलिप्यन्तरणम् ॥

manuṣyaḥ vittena na tarpaṇīyaḥ| ( vayaṁ ) tvā adrākṣāma cet vittaṁ lapsyāmahe| ( tathā ) yāvat tvaṁ īśiṣyati jīviṣyāmaḥ| saḥ tu varaḥ eva me varaṇīyaḥ ||

॥ सुबोधिनीभाष्यम् - गोपालानन्दस्वामिरचितम् ॥

[ नचिकेतसः मुक्तस्वरूपजिज्ञासायां दृढाभिवेश: ]

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत् त्वा ।

जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥२७॥

वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च इत्यत्र प्रतिवदति न वित्तेनेति । को वा जगति वित्तं प्राप्य नः पर्याप्तमेतत् इति तृप्तः । यथा यथा लभ्यते तथा तथा आकाक्षैव वर्धते तन्न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः । किञ्च - लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा - महोदारं त्वां यदा पश्यामः तदा लप्स्यामहे यावदपेक्षितं वित्तम् । भवादृशमहापुरुषदर्शने सति वित्ते का चिन्ता ? इति भाव: । अस्मासु अत्यन्तप्रणयी त्वं यावत्कालम् ईशिष्यसि अस्मिन्याम्ये पदे तावत्तु जीवितं नः सिद्धमेव । तत् चिरजीवितायां वा का चिन्ता ? तस्मात्स एव प्राक् पृष्ट एव वरो वरणीयः ॥२७॥

॥ आङ्गल-अर्थः ॥

“Man is not to be satisfied by riches, and riches we shall have if we have beheld thee and shall live as long as thou shalt be lord of us. This boon and no other is for my choosing.

॥ हिन्दी-अर्थः ॥

''मनुष्य को धन से तृप्त नहीं किया जा सकता और अगर हमने आपके दर्शन कर लिये तो धन हमे मिल ही जाएगा तथा जब तक आपका हम पर१० प्रभुत्व रहेगा तब तक हम जीते भी रहेंगे। मेरे वरण करने योग्य वर तो वही है।

॥ शब्दावली ॥

मनुष्यः - manuṣyaḥ - man

वित्तेन - vittena - by riches

न तर्पणीयः - na tarpaṇīyaḥ - not to be satisfied

त्वा - tvā - thee

अद्राक्षाम चेत् - adrākṣāma cet - if we have beheld

वित्तम् - vittam - riches

लप्स्यामहे - lapsyāmahe - we shall have

यावत् - yāvat - as long as

त्वम् - tvam - thou

ईशिष्यति - īśiṣyati - willest

जीविष्यामः - jīviṣyāmaḥ - shall live

सः एव वरः - this boon and no other - saḥ eva varaḥ

तु - tu - indeed

मे - me - for me

वरणीयः - varaṇīyaḥ - I choose


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