तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत् कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥
॥ लिप्यन्तरणम् ॥
tadabhyadravattamabhyavadat ko'sīti vāyurvā ahamasmītyabravīnmātariśvā vā ahamasmīti ||
॥ अन्वयः ॥
वायुः तत् अभ्यद्रवत्। तम् अभ्यद्रवत् कः असि इति। वायुः वै अहम् अस्मि इति मातरिश्वा वै अहम् अस्मि इति अब्रवीत् ॥
॥ अन्वयलिप्यन्तरणम् ॥
(vāyuḥ) tat abhyadravat | tam abhyadravat kaḥ asi iti | vāyuḥ vai aham asmi iti mātariśvā vai aham asmi iti abravīt ||
॥ सुबोधिनीभाष्यम् - गोपालानन्दस्वामिरचितम् ॥
अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥७॥ इत्यत्र व्याख्यातम् ।
॥ आङ्गल-अर्थः ॥
He rushed upon That; It said to him, “Who art thou?” “I am Vayu,” he said, “and I am he that expands in the Mother of things.”
॥ हिन्दी-अर्थः ॥
वह 'उसके' (यक्ष के) प्रति द्रुतगति से गया; ‘उसने’ (यक्ष ने) वायु से कहा, ''तुम कौन हो? इसने कहा, ''मैं वायु हूँँ, मैं हीं वह तत्त्व हूँ जो वस्तुओं के ‘मातृ-तत्त्व' में विस्तीर्ण होता है(मातरिश्वा हूँ)।
॥ शब्दावली ॥
वायुः - vāyuḥ - the Wind god
तत् - tat - upon That
अभ्यद्रवत् - abhyadravat - rushed
तम् - tam - to him
अभ्यवदत् - abhyavadat - (the Yalsha) said
कः असि - kaḥ asi - who art thou
इति - iti - thus
अहम् - aham - I
वायुः अस्मि - vāyuḥ asmi - am Vayu, the Wind god
इति - iti - thus
मातरिश्वा - mātariśvā - that expands in the Mother of things
व - va - or
अहम् अस्मि - aham asmi - I am
इति - iti - thus
अब्रवीत् - abravīt - said
अहंकार का पतन और ब्रह्म का बोध
केनोपनिषद् की अद्भुत कथा से मिलने वाला आत्मज्ञान का संदेश
संस्कृत मंत्र
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत् कोऽसीति।
वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति॥
— केनोपनिषद् (3.4)
भावार्थ
वह (यक्षरूप ब्रह्म) के समीप गया। यक्ष ने उससे पूछा— "तुम कौन हो?" उसने उत्तर दिया— "मैं वायु हूँ, मैं मातरिश्वा (संपूर्ण आकाश में विचरण करने वाला) हूँ।"
जब शक्ति को अपने ऊपर अभिमान हो जाता है
केनोपनिषद् का यह प्रसंग अत्यंत गहन है।
देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की। विजय के बाद उनके मन में अहंकार उत्पन्न हो गया कि यह सफलता उनकी अपनी शक्ति से मिली है।
तब परमब्रह्म ने उनकी परीक्षा लेने के लिए एक रहस्यमय यक्ष का रूप धारण किया।
देवताओं ने पहले अग्नि को भेजा, फिर वायु को।
वायु बड़े गर्व के साथ यक्ष के सामने पहुँचा।
जब यक्ष ने पूछा—
"कोऽसि?" — "तुम कौन हो?"
तो वायु ने अपने सामर्थ्य का परिचय दिया।
उसे विश्वास था कि उसकी शक्ति के सामने कोई टिक नहीं सकता।
लेकिन यहीं से एक महान शिक्षा प्रारम्भ होती है।
"मैं कौन हूँ?" — जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न
यक्ष का प्रश्न केवल वायु से नहीं था।
यह प्रश्न हम सभी से है।
हम अपने बारे में क्या सोचते हैं?
- मैं धनवान हूँ।
- मैं विद्वान हूँ।
- मैं शक्तिशाली हूँ।
- मैं प्रसिद्ध हूँ।
लेकिन क्या यही हमारी वास्तविक पहचान है?
जब शरीर नहीं रहेगा,
जब पद नहीं रहेगा,
जब धन नहीं रहेगा,
तब "मैं" कौन रहूँगा?
उपनिषद् का सम्पूर्ण दर्शन इसी प्रश्न के उत्तर की खोज है।
वायु का अभिमान
वायु ने कहा—
"वायुर्वा अहमस्मि"
अर्थात् "मैं वायु हूँ।"
उसने अपने सामर्थ्य का परिचय दिया।
वह सोचता था कि वह पर्वतों को हिला सकता है, समुद्रों में तूफान ला सकता है, वृक्षों को उखाड़ सकता है।
किन्तु यक्ष ने उसके सामने एक तिनका रख दिया और कहा—
"यदि तुम इतने शक्तिशाली हो तो इसे उड़ाकर दिखाओ।"
वायु अपनी पूरी शक्ति लगाने के बाद भी उस तिनके को हिला नहीं सका।
ज्ञान से पहले विनम्रता आवश्यक है
यह कथा बताती है कि—
अहंकार ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु है।
जब मनुष्य अपनी उपलब्धियों पर अभिमान करने लगता है, तब उसका विकास रुक जाता है।
विनम्र व्यक्ति सीखता रहता है।
अहंकारी व्यक्ति स्वयं को पूर्ण समझ बैठता है।
इसीलिए भारतीय संस्कृति में कहा गया है—
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
अर्थात् विद्या का पहला फल विनम्रता है।
हमारी सफलताओं का वास्तविक स्रोत
अक्सर हम सोचते हैं—
- मैंने यह सफलता प्राप्त की।
- मैंने यह कार्य किया।
- मैंने यह उपलब्धि हासिल की।
लेकिन क्या वास्तव में सब कुछ केवल हमारी शक्ति से होता है?
यदि प्रकृति का सहयोग न हो,
यदि शरीर स्वस्थ न हो,
यदि बुद्धि कार्य न करे,
यदि अवसर न मिले,
तो क्या हम कुछ कर सकते हैं?
केनोपनिषद् हमें याद दिलाता है कि हमारी प्रत्येक शक्ति के पीछे एक महान सार्वभौमिक शक्ति कार्य कर रही है।
आधुनिक जीवन में इस कथा की प्रासंगिकता
आज विज्ञान, तकनीक और धन के कारण मनुष्य अत्यंत शक्तिशाली बन गया है।
लेकिन उसी के साथ अहंकार भी बढ़ रहा है।
मनुष्य भूलता जा रहा है कि—
- वह प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका भाग है।
- वह सृष्टि का केंद्र नहीं, उसका एक अंश है।
- उसकी शक्ति सीमित है।
जब यह स्मरण बना रहता है, तब विकास के साथ विनम्रता भी बनी रहती है।
इस मंत्र से मिलने वाली पाँच शिक्षाएँ
1. अपनी पहचान को समझो
तुम केवल पद, धन या शरीर नहीं हो।
2. अहंकार से बचो
अभिमान पतन का कारण बनता है।
3. सफलता में विनम्र रहो
हर उपलब्धि के पीछे अनेक अदृश्य सहयोग होते हैं।
4. सीखते रहो
जो स्वयं को पूर्ण समझता है, उसका विकास रुक जाता है।
5. परम शक्ति को पहचानो
व्यक्तिगत शक्ति के पीछे भी एक सार्वभौमिक शक्ति कार्य कर रही है।
निष्कर्ष
केनोपनिषद् का यह छोटा-सा मंत्र मानव जीवन का एक महान सत्य प्रकट करता है।
यक्ष का प्रश्न—
"कोऽसि?" — "तुम कौन हो?"
वास्तव में आत्मज्ञान का द्वार है।
जब तक मनुष्य स्वयं को केवल अपनी शक्तियों, उपलब्धियों और अहंकार से पहचानता है, तब तक वह सत्य से दूर रहता है।
लेकिन जिस दिन वह समझ जाता है कि उसकी प्रत्येक शक्ति का स्रोत परमब्रह्म है, उसी दिन उसके भीतर विनम्रता, ज्ञान और आत्मबोध का उदय होता है।
"अहंकार कहता है— मैं सब कुछ हूँ।"
"ज्ञान कहता है— मैं उस अनंत सत्य का एक अंश हूँ।"
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

0 टिप्पणियाँ
If you have any Misunderstanding Please let me know