चरकसंहिता - सूत्रस्थान - अध्याय ८ (इन्द्रियोपक्रमणीय अध्याय)

चरकसंहिता - सूत्रस्थान - अध्याय ८ (इन्द्रियोपक्रमणीय अध्याय)

अथ श्री चरकसंहिता - सूत्रस्थानम्

अष्टमोऽध्यायः - इन्द्रियोपक्रमणीयोऽध्यायः (इन्द्रियों का अनुशासन)


अथातो इन्द्रियोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः इति ह स्माह भगवानात्रेयः॥ (१-२)
अनुवाद: अब इसके बाद हम इन्द्रियों के अनुशासन और व्यवस्था से संबंधित “इन्द्रिय-उपक्रम” नामक अध्याय का विस्तार से विवेचन करेंगे, जैसा कि पूज्य भगवान आत्रेय ने घोषणा की थी।

१. इन्द्रिय पंच-पंचक (The Five Quintuplets of Senses)

इस अध्याय में अध्यात्म और शरीर विज्ञान के समन्वय को समझाने के लिए इन्द्रियों से संबंधित २५ तत्वों का निरूपण 'पंच-पंचक' के रूप में किया गया है:

इह खलु पञ्चेन्द्रियाणि, पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि, पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि, पञ्चेन्द्रियार्थाः, पञ्चेन्द्रियबुद्धयो भवन्ति; इत्युक्तमिन्द्रियाधिकारे॥ (३)
अनुवाद: इस आयुर्वेद विज्ञान के प्रामाणिक सिद्धांतों के अनुसार, इन्द्रियों के संपूर्ण विषय को पाँच वर्गों में निर्धारित किया गया है, जिन्हें इन्द्रिय पंच-पंचक कहते हैं:
क्रम पंच-पंचक वर्ग संस्कृत नाम घटक (Elements)
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (Five Senses) पञ्चेन्द्रिय चक्षु (दृष्टि), श्रोत्र (श्रवण), घ्राण (गंध), रसन (स्वाद), स्पर्शन (त्वचा/स्पर्श)।
पाँच इन्द्रिय-द्रव्य (Five Material Elements) पञ्चेन्द्रियद्रव्य आकाश, वायु, तेज (अग्नि), जल और पृथ्वी।
पाँच इन्द्रिय-अधिष्ठान (Five Sense Organs) पञ्चेन्द्रियाधिष्ठान अक्षि (आँख), कर्ण (कान), नासिका (नाक), जिह्वा (जीभ) और त्वचा।
पाँच इन्द्रिय-विषय (Five Sense Objects) पञ्चेन्द्रियार्थ शब्द, स्पर्श, रूप (आकार), रस (स्वाद) और गन्ध।
पाँच इन्द्रिय-बुद्धियाँ (Five Perceptions) पञ्चेन्द्रियबुद्धि चक्षु-बुद्धि (दृश्य दर्शन), श्रोत्र-बुद्धि, घ्राण-बुद्धि, रसन-बुद्धि, स्पर्शन-बुद्धि।
एतानि तु इन्द्रियबुद्धयः इन्द्रियार्थेन्द्रियमनआत्मसन्निकर्षजाः, क्षणिका, निश्चयात्मिकाश्च; एष पञ्चपञ्चकः॥ (१२)
अनुवाद: ये पाँचों अनुभूतियाँ (इन्द्रिय-बुद्धियाँ) इन्द्रियों, उनके विषयों (इन्द्रियार्थ), मन और आत्मा के आपसी समन्वय (सन्निकर्ष) का परिणाम हैं। ये स्वभाव से क्षणभंगुर (क्षणिक) होती हैं और किसी वस्तु का निर्णय करने वाली (निश्चयात्मिका) होती हैं। इसी को 'पंच-पंचक' कहा गया है।

२. मन का स्वरूप और उसकी एकाग्रता (Nature and Functions of Mind)

अतीन्द्रियं पुनर्मनः सत्त्वसञ्ज्ञकम्, 'चेतः' इत्याहुरेके; तस्याभिधानमर्थवशात्।
आत्मना सयुक्तस्य इन्द्रियस्य प्रवृत्तिनिवृत्ती मनसोऽधीने॥ (४)
अनुवाद: मन भौतिक इन्द्रियों की पहुँच से परे है, इसलिए इसे अतीन्द्रिय कहा जाता है। इसे "सत्व" या साइके (Psyche) नाम से जाना जाता है और कुछ विद्वान इसे "चेतन" या "चेतः" भी कहते हैं। इसका कार्य मानसिक विषयों और आत्मा की उपस्थिति पर पूरी तरह निर्भर करता है। समस्त इन्द्रियों की किसी विषय में प्रवृत्ति (सक्रिय होना) या निवृत्ति (विमुख होना) पूरी तरह मन के ही अधीन होती है।

एक ही मन में विभिन्न प्रकार की अभिव्यक्तियों का कारण

एकत्वं द्वित्वं वा न मनसः, एककाले अनेकाप्रवृत्तेः; तस्मान्नैककाले सर्वेन्द्रियप्रवृत्तिः।
सत्त्वरजस्तमसां गुणसंयोगाच्च मनसो बहुरूपता प्रकीर्त्यते॥ (५-६)
अनुवाद: मन वास्तव में एक ही है, उसमें कोई बहुलता नहीं है, क्योंकि एक ही मन एक साथ (एक ही काल में) कई इन्द्रिय-विषयों के साथ संपर्क स्थापित नहीं कर सकता। यही कारण है कि हमारी सभी इन्द्रियाँ एक ही समय पर एक साथ काम नहीं करतीं। फिर भी, मानसिक विषयों, आवेगों और इन्द्रिय-विषयों की विविधता के कारण, तथा सत्व, रजस और तमस गुणों के पल-पल बदलने वाले संयोजन के कारण, एक ही व्यक्ति का मन बहुआयामी या अनेक रूपों वाला प्रतीत होता है।
मनःपुरःसराणीन्द्रियाण्यर्थग्रहणसमर्थानि भवन्ति॥ (७)
अनुवाद: जब मन इन्द्रियों को आगे रखकर किसी विषय की ओर निर्देशित करता है, केवल तभी वे इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों (शब्द, रूप आदि) को ग्रहण करने में समर्थ हो पाती हैं, अन्यथा नहीं।

३. इन्द्रियों की भौतिक संरचना और ज्ञान का कारण (Structural Affinity)

पञ्चमहाभूतविकारात्मकान्यपि चक्षुरादीनि; तत्र चक्षुषि तेजो, श्रोत्रे खां, घ्राणे क्षितिः, रसने जलं, स्पर्शने वायुरतिशयेनोपपद्यते।
यद्यदात्मकं चेन्द्रियं तत् तदात्मकमेवार्थं गृह्णाति स्वभावतः सर्वव्यापित्वात्॥ (१४)
अनुवाद: यद्यपि अनुमान और ज्ञान द्वारा पहचानी जाने वाली सभी इन्द्रियाँ सामान्यतः पाँचों महाभूतों के योग से ही बनती हैं, फिर भी उनकी विशिष्ट संरचना में एक-एक महाभूत की प्रधानता होती है। चक्षु (आँख) में **तेज (अग्नि)**, श्रोत्र (कान) में **आकाश (खां)**, घ्राण (नाक) में **पृथ्वी (क्षिति)**, रसन (जीभ) में **जल** तथा स्पर्शन (त्वचा) में **वायु** की प्रधानता पाई जाती है।
अपनी इसी जन्मजात आत्मीयता (Natural Affinity) के कारण, जिस इन्द्रिय में जिस महाभूत की प्रधानता होती है, वह समरूपता के नियम से संसार की उसी महाभूत प्रधान वस्तु या विषय से संपर्क करती है और उसका ज्ञान प्राप्त करती है।

इन्द्रियों की विकृति और साम्यावस्था

अतिहेतुहीनमिथ्यायोगेभ्य इन्द्रियाणि समनस्कानि विकृतिमापद्यन्ते; प्रकृतौ तु सम्यग्योगात्॥ (१५-१६)
अनुवाद: जब इन्द्रियों का अपने-अपने विषयों के साथ अतियोग (अत्यधिक संपर्क), हीपयोग (बिलकुल संपर्क न होना या बहुत कम होना), और मिथ्यायोग (गलत या विकृत संपर्क) होता है, तब वे इन्द्रियाँ मन सहित दूषित होकर बुद्धि व समझ के विनाश का कारण बनती हैं। इसके विपरीत, जब इन्द्रियों का अपने विषयों से 'सम्यग्योग' (उचित और संतुलित संपर्क) होता है, तब वे सामान्य (स्वस्थ) अवस्था को प्राप्त होकर बुद्धि का सही संवर्धन करती हैं।

४. सद्वृत्त और स्वस्थ जीवन के नियम (Code of Right Conduct / Sadbritta)

महर्षि चरक के अनुसार, जो मनुष्य आरोग्य (स्वास्थ्य) और इन्द्रिय-विजय (मन पर नियंत्रण) दोनों को एक साथ प्राप्त करना चाहता है, उसे 'सद्वृत्त' के इन नियमों का श्रद्धापूर्वक पालन करना चाहिए:

क. धार्मिक एवं सामाजिक आचरण (Social and Moral Duties)

देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धसिद्धआचार्यानर्चयेत्, अग्निमुपचरेत्, प्रशस्ता ओषधीर्धारयेत्, द्विः परिमृजीत,
सदा प्रहसितवदनः स्यात्, विपन्नानां कर्ता, भवेत्, पूज्यपूजकः, अतिथिप्रतिपूजकः, पितृपिण्डदः...॥ (१८)
अनुवाद:
  • देवताओं, गायों, ब्राह्मणों, गुरुओं, वृद्धों, सिद्ध पुरुषों और शिक्षकों के प्रति सदैव आदर भाव रखना चाहिए और उनकी सेवा करनी चाहिए।
  • यज्ञाग्नि की पवित्रतापूर्वक देखभाल करनी चाहिए तथा शरीर पर कल्याणकारी, मांगलिक जड़ी-बूटियाँ धारण करनी चाहिए।
  • दिन में दो बार (सुबह-शाम) स्नान या हाथ-पैर-मुँह की सफाई करनी चाहिए। मल-मूत्र के त्याग के बाद अंगों को तुरंत स्वच्छ करना चाहिए।
  • अपने नाखूनों, सिर के बालों और दाढ़ी-मूंछ को एक पखवाड़े (१५ दिन) में कम से कम तीन बार कटवाना और संवारना चाहिए।
  • हमेशा प्रसन्न मुख वाला (प्रहसितवदन) रहना चाहिए। समाज में जो लोग असहाय या संकटग्रस्त हैं, उनकी यथासंभव सहायता करनी चाहिए।
  • अतिथियों का सत्कार करना चाहिए, पितरों को श्रद्धापूर्वक भोजन व पिंड अर्पित करना चाहिए और सार्वजनिक स्थानों पर श्रेष्ठ जनों को नमस्कार करना चाहिए।
  • अपनी वाणी को हमेशा स्वास्थ्यवर्धक, नपी-तुली, मधुर, सत्य और समय के अनुकूल ही बोलना चाहिए। अपनी इन्द्रियों पर पूरा नियंत्रण (आत्म-संयम) रखना चाहिए।
  • दूसरों के अच्छे गुणों से कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, न ही उनके कर्मों के फल से द्वेष करना चाहिए। मन को व्यर्थ की चिंताओं से मुक्त रखना चाहिए।

ख. व्यक्तिगत सुरक्षा और यात्रा के नियम (Personal Safety Regulations)

छत्रदण्डधरो, सोष्णीषः, सोपानत्को, युगमात्रदर्शी च स्यात् पुरस्तात् गच्छन्।
न विषमं प्रपद्येत, न प्रपातं, न द्रुममारोहेत्, न वेगवति उदके स्नायात्...॥ (१८/५-६)
अनुवाद:
  • घर से बाहर निकलते समय हमेशा सिर पर पगड़ी या टोपी, पैरों में जूते (उपानह), हाथ में धूप-वर्षा से रक्षा के लिए छाता और मार्ग की सुरक्षा के लिए लाठी (दण्ड) लेकर चलना चाहिए।
  • चलते समय हमेशा ध्यान एकाग्र रखकर सामने केवल एक जुआ (चार हाथ की दूरी) तक आगे देखते हुए सावधानी से कदम बढ़ाना चाहिए।
  • रास्ते में पड़े हुए चिथड़े, हड्डियाँ, काँटे, बाल, कूड़ा, राख और मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों से बचकर निकलना चाहिए। स्नान और यज्ञ के स्थानों की पवित्रता का ध्यान रखते हुए उनसे उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए।
  • शारीरिक या मानसिक तनाव (थकान) महसूस होने से पहले ही काम को रोककर शरीर को आराम देना चाहिए।
  • अत्यंत ऊंचे पहाड़ों की नुकीली चोटियों पर बिना सुरक्षा के नहीं घूमना चाहिए, ऊंचे पेड़ों पर नहीं चढ़ना चाहिए और नदी के तेज बहते पानी में कभी स्नान नहीं करना चाहिए।
  • किसी जर्जर या ढहने वाले किनारे की छाया में विश्राम नहीं करना चाहिए और न ही भीषण आग के बहुत पास जाना चाहिए।
  • रात के समय किसी निर्जन घर, श्मशान, चौराहों, टोटेम वृक्ष (पूजनीय वृक्ष) के नीचे या घने जंगलों में अकेले प्रवेश नहीं करना चाहिए।

५. अभद्र एवं त्याज्य आचरण पर रोक (Prohibited Habits)

आयुर्वेद के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखने के लिए निम्नलिखित अभद्र चेष्टाओं और बुरे आचरणों का तुरंत त्याग कर देना चाहिए:

न अनृतं ब्रूयात्, न अन्यस्वमादद्यात्, न परस्त्रियं नाभिकाङ्क्षेत्, न वैरं रोचयेत्, न पापं कुर्यात्, न पापेऽपि पापी स्यात्।
न जम्भं, न क्षवथुं, न हास्यं अनावरणमुखः प्रवर्त्तयेत्; न नासिकां कुट्टयेत्, न दन्तान् विघट्टयेत्, न नखान् वादयेत्, न भूमिं लिखेत...॥ (१९)
अनुवाद:
  • नैतिक निषेध: कभी भी असत्य (झूठ) नहीं बोलना चाहिए। किसी दूसरे की संपत्ति या धन पर कुदृष्टि नहीं डालनी चाहिए और न ही किसी पर-स्त्री की अभिलाषा करनी चाहिए। किसी के प्रति प्रतिशोध या दुश्मनी पालने में आनंद नहीं लेना चाहिए। पापी व्यक्ति के प्रति भी स्वयं पापी या क्रूर नहीं बनना चाहिए।
  • शारीरिक चेष्टाओं का निषेध: बहुत ज़ोर से अट्टाहास (लाउड हँसी) नहीं करना चाहिए। जब जम्हाई आए, छींक आए या हँसी आए, तो मुँह को हाथ या कपड़े से ढके बिना ऐसा नहीं करना चाहिए।
  • अपनी नाक को बार-बार नहीं खुजाना चाहिए, दाँतों को आपस में नहीं पीसना चाहिए, और नाखूनों को आपस में टकराकर आवाज़ (कीलें बजाना) नहीं निकालनी चाहिए।
  • व्यर्थ में अपनी हड्डियों को नहीं चटकाना चाहिए, ज़मीन पर उँगलियों या पैरों से लकीरें (खुरचना) नहीं बनानी चाहिए। आलस्य में आकर घास के पत्तों को तोड़ना या मिट्टी के ढेले को गूंथते रहना सर्वथा वर्जित है।
  • तीखे सींग वाले, हिंसक या क्रूर जानवरों के बहुत पास नहीं जाना चाहिए। तीव्र आंधी, कड़कती धूप, अत्यधिक ठंड और तूफानी मौसम के सीधे संपर्क से बचना चाहिए।

६. भोजन ग्रहण करने के कड़े नियम (Dietary Codes and Etiquettes)

नार्धितहस्तोमुखपादः, नाशुचिमुखः, नोदङ्मुखः, न मनाः... भुञ्जीत।
न नक्तं दधि भुञ्जीत; न सक्तून् केवलान् अद्यात्, न निशायां, न भुक्त्वा...॥ (२०)
अनुवाद: भोजन केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि शरीर रूपी मन्दिर की आहुति है, अतः इसके नियम अत्यंत कड़े हैं:
  • बिना हाथ, पैर और मुँह धोए कभी भोजन नहीं करना चाहिए। मन में जब तीव्र क्रोध, शोक या उदासीनता हो, तब भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए।
  • फटे हुए वस्त्र पहनकर, बिना प्रार्थना किए, देवताओं और पितरों को भोग लगाए बिना तथा अपने आश्रितों या अतिथियों को भोजन कराए बिना स्वयं भोजन नहीं करना चाहिए।
  • भीड़भाड़ वाले या अपवित्र स्थानों पर, अनुपयुक्त बर्तनों में और असमय भोजन करना वर्जित है। भोजन पर पहले पवित्र जल का छिड़काव या शास्त्रों के मन्त्रों का पाठ अवश्य करना चाहिए।
  • मांस, हरी सब्जियाँ, सूखे मेवे और फलों को छोड़कर कभी भी बासी या अत्यधिक खट्टा भोजन नहीं करना चाहिए।
  • रात्रि के समय कभी भी दही (दधि) का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • भुने हुए अनाज के आटे (सत्तू) को अकेले सूखा नहीं खाना चाहिए। सत्तू का सेवन रात में, या भरपेट भोजन करने के तुरंत बाद करना सर्वथा वर्जित है।
  • भोजन को बहुत अधिक मात्रा में या बहुत कम मात्रा में नहीं खाना चाहिए। एक बार भोजन पचने से पहले दोबारा भोजन (अध्यशन) नहीं करना चाहिए। भोजन के ठीक बीच में बार-बार भारी मात्रा में पानी नहीं पीना चाहिए। भोजन की वस्तुओं को दाँतों से बेरहमी से फाड़कर नहीं खाना चाहिए।

७. स्त्री-संसर्ग (मैथुन) के शास्त्रोक्त नियम (Sexual Health and Discipline)

न रजस्वलां, न अतुरां, न अशुचिं, न अनिष्टरूपाचारोपचारां... मैथुनं गच्छेत्।
न चैत्यवृक्ष-चतुष्पथ-श्मशान-आयतन-सदन... न सन्ध्याकाल चक्रेषु...॥ (२२)
अनुवाद: काम-ऊर्जा का संयम और सही उपयोग ही ओज की रक्षा करता है। चरकसंहिता के अनुसार निम्नलिखित परिस्थितियों में संभोग (मैथुन) पूरी तरह वर्जित है:
  • जो स्त्री रजस्वला (अशुद्ध दिनों में) हो, गर्भवती हो, बीमार (रोगी) हो, जिसकी इच्छा न हो, या जिसका आचरण और स्वभाव गरिमापूर्ण न हो, उसके साथ संभोग नहीं करना चाहिए।
  • किसी अन्य पुरुष की पत्नी (पर-स्त्री) के साथ या अप्राकृतिक रूप से संभोग करना सर्वथा निषेध है।
  • किसी चैत्यवृक्ष (पूजनीय वृक्ष) के नीचे, सार्वजनिक स्थानों या चौराहों पर, सार्वजनिक पार्कों, श्मशान भूमि, ब्राह्मणों, गुरुओं और देवताओं के मन्दिरों में संभोग की चेष्टा नहीं करनी चाहिए।
  • सुबह और शाम के सन्ध्याकाल के समय, निषिद्ध तिथियों (जैसे पूर्णिमा, अमावस्या), अशुद्ध शारीरिक अवस्था में, कामोद्दीपक औषधियों के सेवन के बिना, या बिना मानसिक तैयारी के संभोग नहीं करना चाहिए।
  • अत्यधिक भरपेट भोजन किए हुए होने की स्थिति में, या इसके विपरीत अत्यधिक भूख व उपवास की स्थिति में, मलमूत्र के वेग को रोके हुए होने पर, और भारी व्यायाम व शारीरिक थकान की अवस्था में मैथुन का सर्वथा त्याग करना चाहिए।

८. अध्ययन (विद्या अर्जन) के नियम और निषेध काल (Rules of Vedic Studies)

न अकालविद्युत्स्तनितप्रदोषेषु, न पर्वसु, न सूर्यचन्द्रोपरागयोः... नाध्यायनं प्रवर्त्तयेत्।
नातिद्रुतम, न हीनस्वरं, न विक्षिपन्, न उच्चैः, नातिनीचैः पठेत्॥ (२४)
अनुवाद: विद्या ग्रहण करते समय और वेदों के अध्ययन के दौरान बौद्धिक क्षमता को बनाए रखने के लिए इन नियमों का पालन आवश्यक है:
  • जब असमय बिजली चमक रही हो, बादलों की भयंकर गर्जना हो रही हो, दिशाओं में आग लगी हो, भूकम्प आया हो, या कोई विशेष पर्व (त्योहार) हो, तब अध्ययन नहीं करना चाहिए।
  • सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण के समय, अमावस्या की तिथि को तथा दोनों ऋतुओं के सन्ध्याकाल के समय पढ़ाई का निषेध किया गया है।
  • गुरु या शिक्षक के निर्देश के बिना अध्ययन का आरम्भ नहीं करना चाहिए।
  • पढ़ते समय अक्षरों को बहुत धीरे-धीरे या उन पर अवांछित ज़ोर देकर नहीं बोलना चाहिए। अत्यंत कर्कश, झूठे, रोते हुए या बिना विराम चिह्नों के नहीं पढ़ना चाहिए।
  • विद्या का पाठ न तो बहुत जल्दबाजी में (अतिद्रुत) करना चाहिए और न ही अत्यंत सुस्ती या निरुत्साह के साथ करना चाहिए। वाणी का स्वर न तो बहरेपन की तरह बहुत ऊँचा होना चाहिए और न ही फुसफुसाहट की तरह बहुत धीमा होना चाहिए।

९. मानसिक संतुलन और जीवन दर्शन (Mental Balance & Resilience)

न च संशयात्मा स्यात्, न च सर्वविशङ्की; न च केवलं सुखपरः स्यात्।
न सिद्धौ उत्सेकं गच्छेत्, न विपत्तौ दैन्यं, सदा प्रकृतिम अनुस्मरेत्...॥ (२६-२७)
अनुवाद: मानसिक विकारों (जैसे डिप्रेशन या एंग्जायटी) से बचने के लिए महर्षि आत्रेय का अद्भुत उपदेश है:
  • मनुष्य को न तो अत्यधिक डरपोक होना चाहिए और न ही व्यर्थ में अहंकारी होना चाहिए। अपने स्वजनों और मित्रों पर कभी अवांछित अविश्वास नहीं करना चाहिए।
  • संसार में केवल अपने ही व्यक्तिगत सुखों के बारे में नहीं सोचते रहना चाहिए। सदाचार, धर्मशास्त्र के नियमों और सामाजिक रीति-रिवाजों को कभी भी अपने ऊपर एक बोझ या कर (Tax) नहीं समझना चाहिए।
  • न तो हर अनजान व्यक्ति पर आँख मूँदकर विश्वास करना चाहिए और न ही हर किसी पर संदेह (सर्वविशङ्की) करना चाहिए। मन को हमेशा गहरे और नकारात्मक विचारों के चक्रव्यूह में फँसाकर नहीं रखना चाहिए।
  • जीवन में किसी बड़े कार्य के सफल होने (सिद्धि) पर अहंकार से फूलना नहीं चाहिए, और पराजय या संकट आने पर अत्यंत हताश व निराश (दैन्य) होकर घुटने नहीं टेकने चाहिए।
  • संसार की सभी भौतिक वस्तुओं की नश्वरता को हमेशा याद रखना चाहिए। किसी भी कार्य को करने से पहले उसके पीछे छिपे कारणों और दूरगामी परिणामों (परिणामवाद) का निश्चय कर लेना चाहिए, और उसके बाद ही लोक-कल्याणकारी कार्यों में पूरी ऊर्जा से लग जाना चाहिए। अपनी छोटी-मोटी उपलब्धियों से कभी आत्मसंतुष्ट होकर बैठना नहीं चाहिए और न ही किसी के द्वारा की गई निन्दा को मन से लगाकर हिम्मत हारनी चाहिए।

१०. उपसंहार और फलश्रुति (Conclusion & Benefits)

यत् सम्यगनुतिष्ठति सद्वृत्तमयथावच्छक्ति।
स समाः शतमारोग्यं प्रहाणाय न गच्छति॥ (३१)
अनुवाद: जो मनुष्य इस अध्याय में विस्तार से बताए गए सदाचार और स्वास्थ्य के इन परम नियमों (सद्वृत्त) का अपनी शक्ति के अनुसार पूरी निष्ठा से पालन करता है, वह इस संसार में सौ वर्ष (१०० वर्ष) की लंबी आयु तक कभी भी उत्तम स्वास्थ्य और मानसिक शांति से वंचित नहीं होता, अर्थात वह पूर्णतः निरोगी और सुखी जीवन जीता है।
सपुण्यकर्मकृल्लोकान् साधून् समधिगच्छति।
तस्माद्व्रतमिदं सर्वैः सदोष्ठेयम् प्रयत्नतः॥ (३३)
अनुवाद: ऐसा सदाचारी पुरुष अपने यश की सुवास से इस सम्पूर्ण चराचर संसार को परिपूर्ण कर देता है। वह जीवन में अर्थ (धन) और पुण्य दोनों को सहज ही प्राप्त कर लेता है और समस्त प्राणियों का सच्चा मित्र बन जाता है। पुण्य कर्मों को करने वाला ऐसा श्रेष्ठ मनुष्य मृत्यु के बाद भी उत्तम कर्म करने वालों के परम दिव्य लोक को प्राप्त होता है। इसलिए, इस जीवन-व्रत का सभी मनुष्यों को सदैव पूरी श्रद्धा और प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिए।

॥ इति अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने इन्द्रियोपक्रमणीयो नाम अष्टमोऽध्यायः समाप्तः ॥


चरकसंहिता हिन्दी अनुबाद 

अध्याय 8 - इन्द्रियों का अनुशासन (इन्द्रिय-उपक्रम)

1. अब हम ‘ इन्द्रिय - उपक्रम ’ नामक अध्याय का विवेचन करेंगे ।

2. इस प्रकार पूज्य आत्रेय ने घोषणा की ।

इन्द्रियों का वर्णन

3. इस विज्ञान के अनुसार, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (पंचेन्द्रिय- पंचेन्द्रिय ), पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (पंचेन्द्रिय- द्रव्य - पंचेन्द्रिय-द्रव्य ), पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (पंचेन्द्रिय- अधिष्ठान - पंचेन्द्रिय- अधिष्ठान ), पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (पंचेन्द्रिय- अर्थ -) पंचेन्द्रिय-अर्थ ) और पांच इन्द्रिय-धारणाएं (पंचेन्द्रिय- बुद्ध - पंचेन्द्रिय-बुद्ध )। इस प्रकार इसे इंद्रियों ( इंद्रिय ) के विषय पर निर्धारित किया गया है ।

मन का संकेत

4. मन जो अति-इंद्रिय है उसे " सत्व " या साइके कहा जाता है और कुछ लोग इसे "चेतना" कहते हैं । इसका कार्य मानसिक वस्तु और आत्मा की उपस्थिति पर निर्भर करता है। यह इंद्रियों की गतिविधि का कारण है।

एक ही मन में विभिन्न प्रकार की अभिव्यक्तियों का कारण

5. मानसिक विषयों, इन्द्रिय-विषयों और आवेगों की बहुलता के कारण, साथ ही रजस , तम और सत्व के गुणों के संयोजन के कारण, एक ही व्यक्ति में मन बहुआयामी प्रतीत होता है। मन की कोई बहुलता नहीं है, क्योंकि एक ही मन एक साथ कई इन्द्रिय-विषयों से संपर्क नहीं कर सकता। इसलिए, सभी इन्द्रियाँ एक ही समय पर काम नहीं करतीं।

सात्विक एवं अन्य स्वभावों का निर्धारण

6. मनुष्य की मानसिक संरचना में जो भी गुण सबसे अधिक बार प्रकट होता है, बुद्धिमान लोग उसे उसी मानसिकता का कहते हैं, क्योंकि उसका उससे प्रमुख संबंध होता है।

केवल मन से जुड़ी इंद्रियों के लिए ही धारणा संभव है

7. जब मन इन्द्रियों को निर्देशित करता है तो वे इन्द्रिय-विषयों से सम्पर्क करने में सक्षम हो जाती हैं।

पांच इंद्रिय-शक्तियां

8. दृष्टि, श्रवण, गंध, स्वाद और स्पर्श पांच इंद्रिय क्षमताएं हैं?

पांच इंद्रिय-पदार्थ

9. पाँच इन्द्रिय-पदार्थ हैं - आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी।

पांच ज्ञानेन्द्रियां

10. पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं - आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा।

पाँच इन्द्रिय-वस्तुएँ

11. पाँच इन्द्रिय-विषय हैं - शब्द, स्पर्श, आकार, स्वाद और गंध।

पाँच धारणाएँ

12. दृश्य-दर्शन आदि पाँच अनुभूतियाँ हैं। ये अनुभूतियाँ इन्द्रियों, इन्द्रिय-विषयों (इन्द्रियार्थ), मन और आत्मा के समन्वय के परिणाम हैं ; वे क्षणभंगुर हैं और निर्णय स्वरूप हैं। ये पाँच पंचतत्व हैं।

आध्यात्मिक तत्वों का समुच्चय

13. मन, मन-विषय, बुद्धि और आत्मा आध्यात्मिक तत्वों और गुणों का समुच्चय हैं। यह समुच्चय अच्छी या बुरी क्रिया या निष्क्रियता का स्रोत है। क्रिया जिसे थेरेप्युसिस भी कहा जाता है, पदार्थ पर निर्भर करती है।

इंद्रियों का उनकी प्रमुख संरचना के आधार पर नामकरण

14. यद्यपि अनुमान द्वारा पहचानी जाने वाली इन्द्रियाँ सामान्यतः पाँचों मूलतत्त्वों का समूह हैं, फिर भी नेत्र में प्रकाश, कान में आकाश, गंध में पृथ्वी, स्वाद में जल तथा स्पर्श में वायु प्रधान पाई जाती है।

14-(1). इनमें से, प्रत्येक इन्द्रिय, जो विशेष रूप से एक तत्व में प्रधान होती है, जन्मजात आत्मीयता और सर्वव्यापकता के कारण, उन वस्तुओं से संपर्क करती है जिनमें उस तत्व की समान प्रधानता होती है।

समझ की कमी और वृद्धि के कारण

15. इन्द्रियों का अपने विषयों से अत्यधिक सम्पर्क, असंपर्क और गलत सम्पर्क होने से इन्द्रियाँ मन सहित विकृत होकर अपने-अपने क्षेत्रों में समझ की कमी का कारण बनती हैं। दूसरी ओर , सही सम्पर्क से सामान्य अवस्था प्राप्त करके समझ में उचित वृद्धि होती है।

मन का उद्देश्य

16. मन का विषय वह है जो विचारणीय है। उचित, अति, अपर्याप्त और गलत धारणाएं क्रमशः मन और समझ की व्यवस्था और अव्यवस्था के कारण हैं।

मन की सामान्यता का संरक्षण

17-(1). इन्द्रियों और मन की सामान्यता बनाये रखने के लिए तथा उन्हें असामान्यता से बचाने के लिए निम्नलिखित तरीकों से प्रयास करना चाहिए।

17-(2). इन्द्रियों और उनके विषयों का स्वस्थ संपर्क, बुद्धिमानी और बार-बार जांच के बाद कार्यों का उचित निष्पादन, और उन एजेंटों का अभ्यस्त उपयोग करना जो जलवायु, मौसम और स्वयं की संरचना के प्रचलित लक्षणों का प्रतिकार करते हैं।

17-(3). अतः अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले सभी लोगों को सदाचार के सभी नियमों को स्मरण रखना चाहिए तथा उनका पालन करना चाहिए।

अच्छे जीवन की वस्तुएँ

18-(1). इन नियमों के पालन से मनुष्य एक साथ ही स्वास्थ्य और इन्द्रियविजय दोनों लक्ष्य प्राप्त कर लेता है ।

18-(2). हे अग्निवेश ! अब हम सम्पूर्ण आचार संहिता का वर्णन करेंगे।

अच्छे जीवन के नियम

18-(3)। इसमें देवताओं, गायों, ब्राह्मणों , गुरु, वृद्धों, सिद्धों और शिक्षकों के प्रति आदर, अनुष्ठानिक अग्नि की देखभाल, पवित्र जड़ी-बूटियाँ धारण करना, दिन में दो बार स्नान करना, मल-मूत्र और पैरों की बार-बार सफाई करना, सिर और दाढ़ी के बाल और नाखूनों को पखवाड़े में तीन बार काटना शामिल है;

18-(4). स्वच्छ और बिना फटे वस्त्र पहनना; प्रसन्नचित्त रहना और इत्र का प्रयोग करना; अच्छे कपड़े पहनना; बालों को अच्छी तरह से संवारना; सिर, कान, नाक और पैरों में प्रतिदिन तेल लगाना; धूम्रपान करना; बातचीत में पहल करना; प्रसन्न मुख वाला होना; संकटग्रस्तों की सहायता करना; होमबलि चढ़ाना; बलि चढ़ाना, दान करना; सार्वजनिक स्थानों पर नमस्कार करना; शांतिबलि चढ़ाना; अतिथियों का सत्कार करना; पितरों को भोजन-पिंड अर्पित करना; स्वास्थ्यवर्धक, नपी-तुली, स्वादिष्ट और समय पर बोली जाने वाली वाणी; आत्म-संयम; धर्मपरायणता; गुणों से ईर्ष्या और गुणों के फल से ईर्ष्या न करना; चिंता से मुक्ति; निर्भयता; शील; बुद्धिमत्ता; उच्च मनोबल; निपुणता; क्षमा; भलाई, विश्वास; शील, बुद्धि, विद्या, जन्म और आयु में अपने से श्रेष्ठ लोगों की सेवा, तथा सिद्धों और गुरुओं की सेवा;

18-(5). छाता और लाठी लेकर चलना, पगड़ी पहनना, जूते पहनना, सावधान होकर चलते समय सामने देखना,

18-(6) शुभ आचरण; चिथड़े, हड्डियाँ, काँटे, बाल, कूड़ा, राख, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े तथा स्नान और यज्ञ के स्थानों से दूर रहना; तनाव महसूस होने से पहले काम से आराम करना;

18-(7). सभी प्राणियों के साथ मित्रता रखना; क्रोधित को जीतना; भयभीत को सांत्वना देना; निराश्रितों से मित्रता करना; सत्यनिष्ठा; शांत स्वभाव; दूसरों के कटु वचनों को सहन करना, अधीरता पर विजय पाना; शांत स्वभाव दिखाना; तथा राग-द्वेष के कारणों को दूर करना।

बुरे आचरण पर रोक

19-(1). झूठ न बोलें; दूसरे की संपत्ति न छीनें; दूसरे की पत्नी या दूसरे के धन का लालच न करें; प्रतिशोध में प्रसन्न न हों; पाप न करें; पापी के विरुद्ध भी पाप न करें; दूसरे की कमियों को उजागर न करें; दूसरों के रहस्यों को न छुएं; उन लोगों की संगति न रखें जो अधार्मिक, राजा के प्रति विश्वासघाती, अभिमानी, दुराचारी, भ्रूणहत्या करने वाले, नीच और दुष्ट हैं;

19-(2). ख़राब सवारी न करें; कठोर और घुटनों तक ऊँची सीट पर न बैठें; खुले, संकरे और ऊबड़-खाबड़ बिस्तर पर न सोएं; पहाड़ों की नुकीली चोटियों पर न घूमें; पेड़ों पर न चढ़ें; तेज़ बहते पानी में न नहाएँ; किनारे की छाया में न आराम करें; आग के आस-पास न घूमें;

19-(3). जोर से न हंसें; तेज आवाज में हवा न छोड़ें; मुंह को ढके बिना जम्हाई न लें, छींकें या हंसें नहीं; नाक न खुजाएं; दांत न पीसें; कीलें न बजाएं; हड्डियों को एक दूसरे से न टकराएं; जमीन न खुरचें; आलस्य में घास के पत्ते न तोड़ें या मिट्टी का ढेला न गूंथें; अनुचित इशारे न करें;

19-(4). प्रकाशमान वस्तुओं या अवांछनीय, अशुद्ध और अशुभ दृश्यों को न देखें: किसी शव का तिरस्कार न करें; किसी संरक्षक वृक्ष, ध्वज, शिक्षक या किसी पूजनीय या अस्वास्थ्यकर वस्तु की छाया को पार न करें; रात में किसी मंदिर, टोटेम वृक्ष, सार्वजनिक हॉल, चौकोर सार्वजनिक पार्क, श्मशान या मचान पर न जाएं; किसी निर्जन घर या जंगल में अकेले प्रवेश न करें;

19-(5). पाप आचरण वाले व्यक्ति को पत्नी, मित्र या नौकर न बनाओ; अपने से बड़े लोगों से झगड़ा न करो; अपने से छोटे लोगों से संगति न करो; कुटिल लोगों की चापलूसी न करो; अनार्य अर्थात अविश्वसनीय व्यक्ति की शरण न लो; आतंक न फैलाओ; जल्दबाजी में कोई काम न करो या अधिक न सोओ, जागें, नहाएँ, पिएँ या खाएँ; घुटनों को ऊपर करके घुटनों के बल देर तक न बैठो;

19-(6). क्रूर, नुकीले या सींग वाले जानवरों के पास न जाएं; तेज हवा, कड़ी धूप, ठंड और तूफान से बचें; झगड़ा न करें;

19-(7). यज्ञाग्नि की असावधानी से या अपवित्र अवस्था में देखभाल न करें; अग्नि जलाकर ताप न लें; थके होने पर या बिना मुँह धोए या नग्न अवस्था में स्नान न करें; स्नान करते समय पहने हुए कपड़े से सिर न पोंछें; बालों को हाथों से न झटकें ; स्नान के बाद वही कपड़े न पहनें;

19. रत्न, हवि , घी , पूजनीय एवं मांगलिक वस्तुएं तथा पुष्पों को स्पर्श किए बिना घर से बाहर न निकलें; पवित्र एवं मांगलिक वस्तुएं अपने बाईं ओर तथा भिन्न प्रकृति की वस्तुएं अपने दाईं ओर रखकर न चलें;

20-(1). हाथ में रत्न पहने बिना, स्नान किये बिना, फटे वस्त्र पहने बिना, प्रार्थना किये बिना, होम-संस्कार किये बिना, गृहदेवता और पितरों को भोग लगाये बिना, बड़ों, अतिथियों और आश्रितों को भोजन कराये बिना, सुगंध रहित, माला पहने बिना, हाथ-पैर और मुख को लपेटे बिना, अशुद्ध मुख से, उत्तर दिशा की ओर मुख किये बिना, उदासीन भाव से, अभक्त, अशिष्ट, अशुद्ध या भूखे सेवक की सेवा में भोजन न करें, अनुपयुक्त बर्तनों में, अनुपयुक्त स्थान पर, अनुपयुक्त समय पर, भीड़ के बीच में, अग्नि को अर्पण किये बिना , पवित्र जल से भोजन छिड़के बिना या उस पर शास्त्रों के मंत्र पढ़े बिना, किसी की निन्दा करते हुए भोजन न करें, दुष्टों द्वारा परोसा गया निकृष्ट प्रकार का भोजन न करें, मांस, साग, सूखी सब्जी और फलों को छोड़कर बासी पदार्थ न खाएं,

20. दही, शहद, नमक, भुने हुए अनाज का आटा और घी को छोड़कर शेष भोजन न करें; रात्रि में दही न खाएं, भुने हुए अनाज का आटा अकेले न खाएं, रात्रि में या भोजन के बाद न खाएं, अधिक मात्रा में न खाएं, दोनों भोजन के साथ न खाएं, बीच-बीच में पानी न पिएं, दांतों से फाड़कर न खाएं।

21.-(1) टेढ़े होकर छींकना, खाना या सोना नहीं चाहिए। स्वाभाविक इच्छाओं के कारण अन्य कामों में व्यस्त न रहें। वायु, अग्नि, जल, चन्द्रमा, सूर्य, ब्राह्मण या बड़े की ओर मुख करके थूकना, मल-मूत्र त्यागना नहीं चाहिए।

21. रास्ते में पानी न बहाएं, भीड़ के बीच में, भोजन करते समय तथा जप , होम, अध्ययन, बलि आदि शुभ कार्यों में लगे समय नाक न साफ ​​करें ।

22.-(1) स्त्री को न तो तुच्छ जानो, न उस पर बहुत अधिक भरोसा करो, न उसे गुप्त बातें बताओ, न उसे किसी प्रकार का अधिकार दो,

22.-(2) किसी ऐसी स्त्री के साथ संभोग न करें जो गर्भवती हो, या रोगी हो, अशुद्ध हो, अयोग्य हो, अवांछनीय रूप, आचरण और स्वभाव वाली हो, अकुशल हो, अनुत्तरदायी हो या पर-पुरुषार्थ की इच्छुक हो; या किसी दूसरे की पत्नी के साथ, या किसी अन्य जाति के पशु की मादा के साथ, या जननांगों में, या संरक्षक वृक्ष के नीचे, सार्वजनिक हॉल में, चौराहे पर, सार्वजनिक पार्क में, श्मशान में, या किसी ब्राह्मण या शिक्षक या भगवान के घर में संभोग न करें; या संध्याकाल या निषिद्ध दिनों के दौरान, अशुद्ध स्थिति में या कामोद्दीपक औषधि लिए बिना, या पहले से अपना मन बनाए बिना, या आवश्यक कामुक इच्छा को प्राप्त किए बिना, या पोषण का सेवन किए बिना, या अधिक खाए हुए हालत में, एक अजीब स्थिति में, या मूत्र और मल की इच्छाओं से दबे हुए या थकान, शारीरिक व्यायाम, उपवास और थकावट से ग्रस्त स्थिति में या ऐसे स्थान पर जहां कोई गोपनीयता नहीं है।

23. अच्छे लोगों और अपने बड़ों की बुराई मत करो; जब तुम अशुद्ध अवस्था में हो, तो भूत-प्रेत का अभ्यास मत करो, कुल वृक्ष, मंदिर और पूज्य वस्तुओं और व्यक्तियों की पूजा मत करो, न ही अध्ययन का अभ्यास करो।

24. असमय बिजली चमकने के समय, जब घर में भयंकर रोशनी हो रही हो, आग लगने की स्थिति हो, भूकंप, त्योहार, उल्कापात, सूर्य और चन्द्र ग्रहण, अमावस्या और दोनों संध्याओं के समय, शिक्षक द्वारा सिखाए बिना, अक्षरों को धीरे-धीरे बोलकर या उन पर अत्यधिक जोर देकर, कर्कश स्वर में या झूठे स्वर में या विराम चिह्न लगाए बिना, बहुत जल्दबाजी में या बहुत आराम से, निरुत्साही ढंग से, बहुत ऊंची आवाज में या बहुत धीमी आवाज में पढ़ाई न करें।

25.-(1) बहुमत के निर्णय का उल्लंघन न करें; नियम न तोड़ें, रात में अनुचित स्थान पर न जाएं; भोजन, अध्ययन, संभोग या नींद का सहारा न लें।

दोनों संध्याओं के समय; बहुत छोटे, बहुत बूढ़े, लोभी, मूर्ख, रोगी और नपुंसक से मित्रता न करें; शराब पीने, जुआ खेलने और वेश्याओं की संगति में रुचि न विकसित करें;

25. गुप्त बातें न बताएं, किसी का तिरस्कार न करें, अहंकारी न बनें, अयोग्य न बनें, बाधा उत्पन्न न करें, दोष न दें, ब्राह्मणों की निन्दा न करें, गाय पर लाठी न उठाएं, बड़ों, गुरुओं, संघों और राजाओं की अवहेलना न करें, अधिक बातें न करें, सम्बन्धियों, मित्रों, विपत्ति में सहायकों और गुप्त बातों को जानने वालों से नाता न तोड़ें।

26. न तो डरपोक बनो और न ही अहंकारी; अपने आश्रितों के प्रति असहिष्णु मत बनो; अपने स्वजनों पर अविश्वास मत करो; केवल अपने सुखों को ही मत समझो; चरित्र-पालन, धर्मशास्त्रों के आदेशों और सामाजिक रीति-रिवाजों को अपने ऊपर कर मत समझो; न तो हर किसी पर विश्वास करो और न ही किसी पर अविश्वास करो; हमेशा चिंतनशील मत रहो।

27.-(1) कार्य करने का उचित समय हाथ से न जाने दें; बिना विचार-विमर्श के कोई कार्य न करें; अपनी इन्द्रिय-तृष्णाओं के गुलाम न बनें; चंचल मन की तृष्णा में न बहें; इन्द्रियों और बुद्धि पर अधिक बोझ न डालें; अधिक टाल-मटोल न करें;

27. क्रोध और हर्ष को अपने में समाहित मत करो; अपने दुःखों को मत पालों; सफलता पर अहंकारी मत बनो और पराजय पर निराश मत होओ; अपने आपको सदैव यह याद दिलाते रहो कि वस्तुएँ व्यर्थ हैं; कारणों और उनके परिणामों के बारे में निश्चय कर लो और फलस्वरूप कल्याणकारी कार्यों में लग जाओ; अपनी उपलब्धियों से आत्मसंतुष्ट मत होओ; हिम्मत मत हारो; निन्दा को याद मत करो।

शुभ जीवन

28. यदि आप आशीर्वाद चाहते हैं तो अशुद्ध अवस्था में यज्ञ अग्नि में घी, जौ, तिल, छोटी बलि और सरसों के बीज की आहुति न डालें।

28.-(1) 'अग्नि मुझे न छोड़े', 'वायु मुझे जीवन दे', ' विष्णु मुझे बल दे ', ' इन्द्र मुझे पुरुषार्थ प्रदान करें', 'जल मेरे अन्दर मंगलमय प्रवेश करे', 'जल ही सुख का स्रोत है' आदि शब्दों से आरम्भ होने वाले शास्त्रों के मन्त्र से स्नान करें तथा होठों पर दो बार जल छिड़ककर तथा पैरों पर जल छिड़ककर मस्तक, हृदय तथा सिर के ऊपर जल का स्पर्श करें।

ब्रह्मचर्य के प्रति समर्पण

29.रांश

पुनरावर्तनीय छंद यहां दिए गए हैं:—

30. इस अध्याय में ‘ इन्द्रिय-उपक्रम ’ नामक पांच पंचमहाभूतों, मन, हेतु चतुर्भुज तथा सदाचार के नियमों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

31. जो व्यक्ति यहां बताए गए स्वास्थ्य के नियमों का ठीक से पालन करेगा, वह सौ वर्ष तक निरोगी रहने से वंचित नहीं रहेगा।

32. सत्पुरुषों द्वारा अनुमोदित मनुष्य अपने यश से इस संसार को परिपूर्ण कर देता है, धन और पुण्य दोनों को प्राप्त कर लेता है और समस्त प्राणियों का मित्र बन जाता है।

33. पुण्य कर्म करने वाला मनुष्य उत्तम कर्म करने वालों के परम लोक को प्राप्त होता है। इसलिए इस व्रत का सभी को सदैव पालन करना चाहिए।

इस विषय पर अत्रेय की राय

34. आत्रेय के मतानुसार, अन्य जो भी अनुष्ठान हैं, जिनकी चर्चा यहां नहीं की गई है, यदि वे अच्छे हों, तो उनका सदैव आदर करना चाहिए।

8. इस प्रकार अग्निवेश द्वारा संकलित तथा चरक द्वारा संशोधित ग्रन्थ के सामान्य सिद्धान्तों वाले भाग में इन्द्रिय-उपक्रम नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

2. इस प्रकार, स्वस्थ जीवन से संबंधित अध्यायों का दूसरा चतुर्थांश पूरा हो गया है।


चरकसंहिता खण्ड 1 अध्याय 7 हिन्दी व्याख्या चरकसंहिता खण्ड 1 अध्याय 9 हिन्‍दी व्याख्या

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