चरकसंहिता - सूत्रस्थानम् (अध्याय १४) : स्वेदविधि अध्यायः
१. स्वेदन प्रक्रिया के मूल सिद्धांत एवं उपमा (The Core Principles)
मूलाधार सूत्र और उपमा:
स्नेहक्लिन्नाः शरीराणि स्वेदैः प्रलापयन्ति च।तद्यथा- जिस प्रकार एक सूखी, निर्जीव और कठोर लकड़ी भी सही तरीके से तेल लगाने (स्नेहन) और आंच दिखाने (स्वेदन) से आसानी से मुड़ जाती है और लचीली हो जाती है, ठीक उसी प्रकार यह स्वेदन चिकित्सा मानव शरीर को वात-कफ के भयंकर विकारों से मुक्त कर लचीला और बलवान बना देती है ॥ (चरक सूत्र १४/४-५)
यदि किसी व्यक्ति के प्रकुपित वात-कफ दोषों को स्नेह विधि के बाद सही तरीके से स्वेदन (पसीना निकालना) करा दिया जाए, तो उसके शरीर के स्रोतों (Channels) में जमा हुआ मल पिघल जाता है और मल, मूत्र, वीर्य आदि अपने प्राकृतिक मार्ग से बिना किसी रुकावट के बाहर निकल जाते हैं।
२. दोष, ऋतु और अंगों के अनुसार स्वेदन के नियम (Clinical Classification)
स्वेदन करते समय चिकित्सक को रोगी के दोष, कोष्ठ और विशिष्ट नाजुक अंगों का कड़ाई से ध्यान रखना चाहिए:
- दोषों के अनुसार संयोजन: वात-कफ मिश्रित विकारों में स्निग्ध-रूक्ष (मिश्रित) स्वेद, केवल वात विकारों में स्निग्ध (तैलीय) स्वेद और केवल कफ विकारों में रूक्ष (सूखा) स्वेद दिया जाता है।
- कोष्ठ की स्थिति: यदि वात आमाशय (Stomach) में स्थित हो, तो शुरुआत रूक्ष स्वेद से करें। यदि कफ पक्वाशय (Large Intestine) में स्थित हो, तो शुरुआत स्निग्ध स्वेद से करें।
- अंगों की संवेदनशीलता (Crucial Guardrails):
- अंडकोष (Vrishana), हृदय (Hridaya), और नेत्र (Eyes): इन अंगों पर स्वेदन या तो बिल्कुल नहीं करना चाहिए, या यदि अत्यंत आवश्यक हो तो बहुत ही मृदु (हल्का) करना चाहिए।
- वंचण (Groin/कमर): यहाँ मध्यम श्रेणी का स्वेद देना चाहिए।
- शेष शरीर: अन्य अंगों पर आवश्यकता और बल के अनुसार उत्तम स्वेद दिया जा सकता है।
३. संवेदनशील अंगों की सुरक्षात्मक विधियाँ (Protective Protocols)
स्वेदन प्रक्रिया के दौरान शरीर के नाजुक अंगों को थर्मल डैमेज (ऊष्मा की हानि) से बचाने के लिए निम्नलिखित सुरक्षात्मक उपाय अनिवार्य हैं:
- नेत्रों की सुरक्षा: रोगी की आँखों को जौ या गेहूँ के आटे की लोई (पट्टी) बनाकर, अथवा ताजे कमल के पत्तों या पलाश के पत्तों से अच्छी तरह ढक देना चाहिए।
- हृदय की सुरक्षा: स्वेदन के समय रोगी के छाती (हृदय क्षेत्र) पर शीतल मोतियों की माला, ठंडे पानी से भीगे वस्त्र, गीले कमल के फूल या परिचारक के ठंडे गीले हाथों को स्पर्श कराते रहना चाहिए ताकि हृदय की धड़कन और तापमान नियंत्रित रहे।
४. सम्यक और अति-स्वेदन के क्लीनिकल लक्षण तथा चिकित्सा
चिकित्सक को स्वेदन तब तक ही करना चाहिए जब तक सम्यक लक्षण दिखाई न दें। अति-स्वेदन होने पर तत्काल आपातकालीन चिकित्सा करनी चाहिए:
| ✔ सम्यक स्वेदन के लक्षण (Optimum Sweating) | ✖ अति-स्वेदन के लक्षण (Over-Sweating) |
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| अति-स्वेदन की चिकित्सा प्रबंधन: यदि अति-स्वेदन के लक्षण दिखाई दें, तो तत्काल स्वेदन रोककर 'ग्रीष्म ऋतुचर्या' में बताए गए उपचार शुरू करें। रोगी को मधुर, स्निग्ध और शीतल द्रव्यों का सेवन कराएं, ठंडे पानी के छींटे मारें और शीतल वातावरण में विश्राम कराएं। | |
५. स्वेदन के लिए अयोग्य और योग्य व्यक्ति (Indications & Contraindications)
चिकित्सा में किसी भी दुर्घटना से बचने के लिए यह वर्गीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है:
- स्वेदन के अयोग्य व्यक्ति (Contraindicated): जो अत्यधिक शराब पीते हों, गर्भवती महिलाएँ, रक्तपित्त (Bleeding disorders), पाण्डु (Anemia), पीलिया (Jaundice), प्रमेह (Diabetic complications), अतिसार (Diarrhea), रूक्ष और क्षीण शरीर वाले, अत्यधिक प्यासे, भूखे, क्रोधी, और उदर रोगों से पीड़ित व्यक्ति।
- स्वेदन के सर्वथा योग्य रोग (Indications): प्रतिश्याय (जुकाम), कास (खांसी), हिचकी, श्वास कष्ट, अर्दित (Facial Paralysis), एकांगवात या सर्वांगवात (Paralysis), आनाह (कब्ज), मूत्रकृच्छ (पेशाब की रुकावट), गृध्रसी (Sciatica), अंडकोश वृद्धि (Hydrocele), अंगों की अकड़न, कँपकँपी (Tremors) और संधिवात (Arthritis)।
६. साग्नि स्वेद के १३ प्रकार (The 13 Thermal Sweating Methods)
अग्नि के सीधे संपर्क या ऊष्मा द्वारा किए जाने वाले स्वेदन को 'साग्नि स्वेद' कहते हैं। महर्षि चरक ने इसके १३ वैज्ञानिक भेदों का वर्णन किया है:
- १. संकर स्वेद (Mixed/Lump Sudation): वात या कफ नाशक द्रव्यों (तिल, उड़द, औषधियाँ, रेत या गोबर) की पोटली या ढेला बनाकर कपड़े में लपेटकर सेंकना।
- २. प्रस्तर स्वेद (Hot-Bed Sudation): बिछौने पर अनाज, वेशवार या खीर बिछाकर, उस पर अरंडी या आक के पत्ते रखकर रोगी को सुलाकर पसीना निकालना।
- ३. नाड़ी स्वेद (Steam-Kettle Sudation): एक बंद केतली में औषधियाँ और पानी उबालकर, हाथी की सूंड के आकार की मुड़ी हुई नली (3 से 6 फीट लंबी) के माध्यम से भाप को रोगी के अंगों पर डालना। नली के घुमावदार होने से भाप की तीव्रता कम हो जाती है जिससे त्वचा जलती नहीं है।
- ४. परिषेक स्वेद (Affusion/Shower Sudation): वातनाशक काढ़े, दूध या तेल को थोड़ा गर्म करके शावर या डौश-कैन द्वारा रोगी के शरीर पर लगातार गिराना।
- ५. अवगाह स्वेद (Immersion Bath): एक बड़े टब में गर्म वातनाशक काढ़ा, तेल या घी भरकर रोगी को उसमें गले तक डुबाकर बैठाना।
- ६. जेन्ताक स्वेद (Hot-House/Sauna Sudation): तालाब के निकट एक विशेष गोलाकार मिट्टी का कमरा (Sauna Room) बनाना, जिसके मध्य में छिद्रों वाला ओवन हो। धुआँ रहित कत्था या साल की लकड़ी जलाकर कमरा गर्म किया जाता है। रोगी चबूतरे पर लेटकर पसीना बहाता है।
- ७. अश्मघन स्वेद (Stone Slab Sudation): मनुष्य के आकार की पत्थर की शिला को लकड़ी की आग से गर्म करके, कोयला हटाकर, गर्म पानी से धोकर उस पर ऊनी कपड़ा बिछाकर रोगी को उस पर सुलाना।
- ८. कर्षू स्वेद (Trench Sudation): रोगी की चारपाई के ठीक नीचे एक गहरी खाई या गड्ढा खोदकर उसमें धुआँ रहित धधकते कोयले भरकर ऊष्मा देना।
- ९. कुटी स्वेद (Cabin Sudation): एक बिना खिड़की वाली मोटी दीवारों की झोपड़ी जिसके अंदर सुगंधित लेप हों, उसके मध्य में अंगीठी रखकर रोगी को स्वेदन कराना।
- १०. भू स्वेद (Ground-Bed Sudation): साफ, समतल भूमि पर कोयले जलाकर भूमि को गर्म करना, फिर कोयले हटाकर पानी छिड़ककर और वस्त्र बिछाकर रोगी को सुलाना।
- ११. कुम्भी स्वेद (Pitcher-Bed Sudation): वातनाशक काढ़े से आधे भरे घड़े को जमीन में गाड़कर, उसमें लोहे या पत्थर के लाल गर्म गोले डालकर निकलने वाली भाप से चारपाई पर लेटे रोगी को स्वेद देना।
- १२. कूप स्वेद (Pit Sudation): चारपाई के आकार का गहरा गड्ढा खोदकर उसमें गाय, घोड़े या हाथी की सूखी लीद को जलाकर धुआँ रहित करना और ऊपर चारपाई रखकर रोगी को सुलाना।
- १३. होलाक स्वेद (Under-Bed Sudation): सूखे गोबर के ढेरों को जलाकर धुआँ रहित अंगार बनाना और उसके ठीक ऊपर चारपाई रखकर रोगी को सुलाकर पसीना निकालना।
७. निरग्नि स्वेद के १० प्रकार (The 10 Non-Thermal Methods)
बिना बाहरी अग्नि या थर्मल उपकरणों के, केवल शारीरिक और प्राकृतिक क्रियाओं द्वारा पसीना निकालने को 'निरग्नि स्वेद' कहते हैं। ये १० प्रकार के हैं:
१. व्यायाम (Exercise), २. उष्ण सदन (गर्म कमरा), ३. गुरु प्रावरण (भारी/ऊनी कपड़े पहनना), ४. क्षुधा (भूख), ५. भूरि पान (अधिक मदिरापान), ६. भय (Fear), ७. क्रोध (Anger), ८. उपनाह (लेप/प्लास्टर), ९. आहव (कुश्ती/युद्ध), और १०. आतप (धूप सेकना/Sunbath)।
ये दसों माध्यम बिना किसी बाह्य अग्नि की सहायता के भी शरीर के भीतर मेटाबॉलिक हीट बढ़ाकर प्राकृतिक रूप से पसीना ला देते हैं।
८. स्वेदन के बाद के कड़े नियम (Post-Sudation Care)
स्वेदन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद रोगी को तुरंत ठंडे पानी को नहीं छूना चाहिए, अन्यथा उसकी आँखों की रोशनी को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है। स्वेदन के बाद:
- एक मुहूर्त (लगभग ४८ मिनट) तक हवा रहित स्थान पर आराम करें।
- इसके बाद सुखोष्ण (हल्के गुनगुने) पानी से स्नान करें।
- भोजन में हल्का, गर्म और सुपाच्य अन्न ग्रहण करें। उस पूरे दिन किसी भी प्रकार के व्यायाम या भारी शारीरिक श्रम से पूर्णतः दूर रहें।
॥ इस प्रकार अग्निवेश द्वारा संकलित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत सूत्रस्थान का "स्वेदविधि" नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥
तथा इसी के साथ "शोधन चतुष्क" के प्रथम दो अंग (स्नेहन-स्वेदन) संपन्न हुए।
चरकसंहिता हिन्दी अनुबाद
अध्याय 14 - स्वेद (sveda)
1. अब हम “ स्वेद ” नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे ।
2. इस प्रकार पूज्य आत्रेय ने घोषणा की ।
स्वेदन प्रक्रिया के गुण
3. अब हम विभिन्न श्वास-प्रश्वास प्रक्रियाओं ( स्वेद ) का वर्णन करेंगे, जिन्हें यदि उचित रूप से किया जाए तो वे वात और कफ के ऐसे रोगों को दूर कर देते हैं , जो श्वास-प्रश्वास चिकित्सा के योग्य हैं।
4. यदि किसी पुरुष के रुग्ण वात को तेलेएशन प्रक्रिया द्वारा ठीक कर दिया जाए, तो उसका मूत्र, वीर्य और मल विकृत नहीं होते।
5. सूखी निर्जीव छड़ियाँ भी, तेल लगाने और पसीना बहाने से नरम और लचीली हो जाती हैं। यही सिद्धांत "मानव शरीर को और भी अधिक बल देने" के साथ लागू होता है।
स्वेदन की प्रभावी विधि
6. वह स्वेद प्रभावकारी माना जाता है, जो अच्छी तरह से तैयार किया गया हो, अच्छी तरह से औषधीय हो और जो न तो अधिक गर्म हो और न ही अधिक हल्का हो, तथा रोगी के रोग, ऋतु और जीवन शक्ति को ध्यान में रखते हुए उचित क्षेत्र पर लगाया गया हो।
खुराक रुग्णता की स्थिति आदि पर निर्भर करती है।
7. जहां रोगी की जीवन शक्ति और रुग्णता की स्थिति बहुत अधिक हो तथा ऋतु बहुत पुरानी हो, वहां अधिकतम मात्रा में औषधि देनी चाहिए। जहां ये स्थितियां कम हों, वहां न्यूनतम मात्रा देनी चाहिए; जहां ये स्थितियां मध्यम हों, वहां मध्यम मात्रा देनी चाहिए
8. स्वेद वात-सह-कफ या वात या कफ के विकारों में संकेतित है। इसे उपरोक्त स्थितियों में क्रमशः चिकनाईयुक्त-सह-शुष्क, चिकनाईयुक्त और शुष्क निर्धारित किया जाना चाहिए ।
9. जब वात पेट में स्थित हो और कफ बृहदांत्र में जमा हो, तो पहले मामले में पसीना निकालने की प्रक्रिया शुष्क प्रकार से शुरू करनी चाहिए और दूसरे मामले में चिकनाई युक्त प्रकार से।
10. अंडकोष, हृदय और आंखों में हल्का पसीना आना चाहिए या बिल्कुल भी नहीं आना चाहिए। कमर में मध्यम और शरीर के बाकी हिस्सों में आवश्यकतानुसार पसीना आना चाहिए।
हृदय क्षेत्र की सुरक्षात्मक विधियाँ आदि।
11. पसीना आने पर व्यक्ति को अपनी आंखों को गेहूं के आटे के साफ टुकड़े से या कमल या बंगाल की पत्तियों से ढकना चाहिए ।
12. पसीना आने वाले व्यक्ति के हृदय क्षेत्र पर शीतल मोतियों की माला, शीतल पात्र, गीले कमल या गीले हाथ लगाने चाहिए।
सफल स्वेदन के लक्षण
13. जब सर्दी और पेट दर्द समाप्त हो जाए, शरीर की जकड़न और भारीपन गायब हो जाए तथा कोमलता और पसीना आना शुरू हो जाए, तब पसीना देने की प्रक्रिया बंद करने की सलाह दी जाती है।
अति-सूडेशन के संकेत
14. अधिक पसीना आने के लक्षण हैं पित्त का उत्तेजित होना , बेहोशी, शरीर का कमजोर होना, प्यास, जलन, आवाज और अंगों में कमजोरी।
अत्यधिक पसीना आने की बुराइयों का उपचार
15. ग्रीष्म ऋतु की अधिक गर्मी के कारण होने वाले विकारों के लिए ऋतुजन्य आहार-विहार अध्याय में बताई गई सभी चिकित्साएं, जैसे मीठी, चिकनी और शीतल औषधियां, अधिक पसीना आने की स्थिति में दी जानी चाहिए।
16-19. चिकित्सक को कसैले मदिरा के व्यसनी, गर्भवती, रक्ताल्पता से पीड़ित, पित्त-निरोधक दस्त से पीड़ित, जिनके शरीर में द्रव्य कम हो गया हो, मूत्रमेह से पीड़ित, मलद्वार के बाहर निकले हुए या मलद्वार के बाहर निकले हुए, विष-रोग या मद्यपान से पीड़ित, थके हुए या बेहोश या मोटे, पित्त के कारण मूत्र-विकृति से पीड़ित , प्यास, भूख, क्रोध, शोक और पीलिया से पीड़ित, तथा उदर रोग, श्वास कष्ट, आमवात, दुर्बलता, अत्यधिक निर्जलीकरण, शक्ति क्षीणता या बेहोशी से पीड़ित को पेय नहीं देना चाहिए।
श्वास चिकित्सा ( स्वेद ) से उपचार योग्य रोग
20-24. स्वेद को जुकाम , खांसी, हिचकी, श्वास कष्ट, शरीर का भारीपन, कान, गर्दन और सिर में दर्द, कर्कश स्वर, गले में ऐंठन, चेहरे का पक्षाघात, एक अंग या पूरे शरीर का पक्षाघात या अर्धांगघात या शरीर के लचीलेपन में, पेट में सूजन, कब्ज और पेशाब का रुक जाना, लम्बवत् लचक, बगल, शरीर, पीठ, कमर और पेट में अकड़न, साइटिका, मूत्रकृच्छ, अंडकोश की थैली का बढ़ना, शरीर में दर्द, पैरों में दर्द और अकड़न, घुटने, जांघ और पिंडलियों में सूजन, ऊपरी और निचले अंगों के स्नायुशूल, काइम के विकार, ठंड लगना, कम्पन, आर्थो-आर्थराइटिस, संकुचन या फैलाव, शूल, अकड़न, भारीपन, सुन्नपन और पूरे शरीर को प्रभावित करने वाले रोगों में लाभकारी माना जाता है।
लम्प और हॉट बेड सूडेशन में इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुएं
25-27. स्वेद के लिए ढेले तिल, चना, अम्लीय पदार्थ, घी , तेल, मांस और पके हुए चावल, दूध की खीर, केडगेरी या मांस से बनाए जाने चाहिए; या वे गाय, गधे, ऊँट, सूअर और घोड़े के मलमूत्र या बिना छिलके वाले जौ, रेत, मिट्टी, पत्थर, सूखे गोबर और लोहे के चूर्ण से भी बनाए जा सकते हैं। पहला समूह वात प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जबकि दूसरा कफ प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों के लिए। गर्म बिस्तर पर ढेले के लिए भी आवश्यकतानुसार उन्हीं वस्तुओं का उपयोग करने की सलाह दी जाती है।
तहखाने और गर्म घर में पसीना निकालने में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं
28. स्नान-कक्ष में, स्नान-कक्ष में, गर्म बंद केन्द्रीय कक्षों में, अच्छी तरह से स्नान करने वाले व्यक्ति को, जलते हुए अंगारों की धूमरहित गर्मी से आसानी से पसीना आएगा।
29-30. पालतू, दलदली और जलीय पशुओं का मांस, दूध, बकरी का सिर, धड़, सूअर का पित्त और रक्त, चिकनाईयुक्त पदार्थ, तिल और चावल - इन सबका उपयोग बुद्धिमान चिकित्सक को, जो जलवायु और ऋतु की प्रकृति से परिचित है, केतली में अच्छी तरह से उबालकर, उचित रीति से करना चाहिए।
31-32. तीन पत्ती वाला केपर, गुडूब, अरण्डी, सहजन, मूली, तोरिया, वासा के पत्ते, बांस, बीच, आक के पत्ते, सहजन के बीज, पीली कील, अरबी चमेली, तुलसी, झाड़ीदार तुलसी को पानी में उबालकर केतली में भिगोकर स्नान करना चाहिए ।
33. केतली में पसीना लाने के लिए बिस्पस वीड, पेंटा-रेडिस, मट्ठा, मूत्र, खट्टी दवाएं और चिकनी चीजों का इस्तेमाल करना चाहिए।
विसर्जन और अभिसरण में प्रयुक्त सामग्री
34. इन तीनों काढ़ों का उपयोग टब-स्नान तैयार करने में किया जा सकता है। घी, दूध या तेल का उपयोग टब में भी किया जा सकता है।
पोल्टिस में प्रयुक्त एंटीकल्स
35. पुल्टिस पोटैशियम में टूटे हुए गेहूं, जौ के आटे में खट्टी औषधियां, तैलीय पदार्थ, खमीर और नमक मिलाकर लगाने की सलाह दी जाती है।
36. सुगंधित पदार्थ, सुरा -यीस्ट, कॉर्क स्वैलो वॉर्ट, डिल बीज, अलसी और कोस्टस को तेल के साथ मिलाकर पुल्टिस सडेशन में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
पोल्टिस सडेशन में इस्तेमाल की जाने वाली पट्टियाँ
37. पुल्टिस को चमड़े से ढका होना चाहिए, जिसमें बाल हों, दुर्गंध न हो और गर्म तासीर का हो। यदि ऐसा उपलब्ध न हो तो रेशमी या ऊनी कपड़े का उपयोग किया जा सकता है।
पुल्टिस लगाने और हटाने की प्रक्रिया
38. यदि रात में पुल्टिस लगाई जाए तो उसे अगले दिन हटा देना चाहिए, और यदि दिन में लगाई जाए तो त्वचा की जलन को रोकने के लिए उसी रात हटा देना चाहिए। ठंड के मौसम में पुल्टिस लगाने की अवधि बढ़ाई जा सकती है।
स्वेद द्वारा स्वेदन प्रक्रिया के तेरह तरीके
39 40. मिश्रित सेंक, हॉटबेड सेंक, स्टीम-केटल सेंक, एफ्यूज़न-सेंक, बाथ-सेंक, जेन्टाका या हॉट हाउस सेंक, स्टोन बेड सेंक, ट्रेंच सेंक, केबिन सेंक, ग्राउंड-बेड सेंक, पिचर-बेड सेंक, पिट-सेंक और अंडर-बेड सेंक - ये सेंक प्रक्रिया की तेरह किस्में हैं। मैं इन सभी का विस्तार से वर्णन क्रम से करूँगा।
मिश्रित सूडेशन की तैयारी
41. इसे मिश्रित (शुष्क-सह-चिपचिपा) स्थानीय झाग कहा जाना चाहिए जो ऊपर वर्णित वस्तुओं से तैयार किए गए ढेले के साथ किया जाता है, या तो कपड़े में लपेटा जाता है या खोला जाता है।
हॉट-बेड सडेशन की तैयारी
42. बिस्तर पर मक्का, दाल और पुलक अनाज या वेशवरा खीर, दूध की खीर, केडगेरी और पैनकेक बिछाकर रेशमी या ऊनी कपड़े या अरंडी के पत्ते या लाल अरंडी के पौधे और आक के पत्तों से ढक देना चाहिए। व्यक्ति के पूरे शरीर पर अच्छी तरह से अभिषेक करके उसे ऐसे बिस्तर पर लिटाकर दिया जाने वाला स्नान, गर्म बिस्तर पर स्नान कहलाता है।
स्टीम-केटल सडेशन की तैयारी
43. वनस्पति समूह की जड़, फल, पत्ते, कलियाँ आदि अथवा उष्ण तासीर वाले पक्षियों और पशुओं अथवा पशु समूह के तराशे हुए मांस और सिर को, जैसे कि भाप बनाने में बताई गई वस्तुओं को लें और उन्हें आवश्यकतानुसार खट्टे, नमकीन और चिकने पदार्थों के साथ अथवा मूत्र, दूध और इसी प्रकार की अन्य वस्तुओं के साथ मिलाकर एक बर्तन में उबाल लें और ढक्कन को कसकर बंद कर दें ताकि भाप बाहर न निकल सके। बांस या भारतीय बीच या आक के पत्तों से हाथी की सूंड के आकार की एक नली बनाएं। इसकी लंबाई एक व्याम (6 फीट) या आधा व्याम (3 फीट) होनी चाहिए। समीपस्थ सिरे पर इसकी परिधि व्याम का एक चौथाई भाग और दूरस्थ सिरे पर व्याम का आठवां भाग होनी चाहिए; और पूरी लंबाई में इसे वात-निवारक गुणों वाले पत्तों से ढकना चाहिए। नली में दो या तीन मोड़ होने चाहिए। रोगी को वात को ठीक करने वाली चीजों से बने लेप से खुद को अभिषेक करने के बाद इस यंत्र से भाप लेनी चाहिए। भाप, घुमावदार रास्ते से होकर गुजरती है, जिससे उसकी तीव्रता कम हो जाती है और त्वचा को जलन नहीं होती, यह रोगी को आसानी से पसीना देती है। इस साँस को स्टीम केटल सडेशन कहा जाता है।
अफोशन सूडेशन की तैयारी
44. उपर्युक्त औषधियाँ, जो वात को ठीक करती हैं तथा वात प्रधान अवस्था में लाभदायक हैं, उन्हें गर्म करके किसी बर्तन या शावर या डौश-कैन में भरकर, उचित औषधियुक्त चिकनाई लगे व्यक्ति के ऊपर डालना चाहिए तथा कपड़े से ढक देना चाहिए। इसे अभिमंत्रित सेवन कहते हैं।
विसर्जन स्नान की तैयारी
45. वातनाशक द्रव्यों, दूध, तेल, घी, मांस-रस और गर्म जल के काढ़े में डुबाने को टब-स्नान कहते हैं।
हॉट-हाउस सडेशन की तैयारी
46-(1). यदि कोई व्यक्ति गर्म-घर में पानी डालना चाहता है, तो उसे अच्छी तरह से जगह चुननी चाहिए, या तो पूर्व दिशा में या उत्तर दिशा में। काली, मीठी मिट्टी या सुनहरे रंग की मिट्टी वाला एक सुखद और उपजाऊ मैदान चुनना चाहिए। यह किसी तालाब, टैंक या जलाशय के किनारे पर होना चाहिए, जिसके पास दक्षिण या पश्चिम दिशा में सीढ़ियाँ हों। एक समतल और अच्छी तरह से बिछाई गई जगह पर एक गोल कक्ष बनाया जाना चाहिए, जिसका मुख पूर्वी या उत्तरी दिशा में हो, पानी की ओर हो और लगभग सात या आठ हाथ की दूरी हो। इसकी ऊँचाई अधिकतम सोलह हाथ होनी चाहिए और व्यास भी उतना ही होना चाहिए। यह गोलाकार होना चाहिए। दीवारें और छत मिट्टी की होनी चाहिए और उन्हें अच्छी तरह से प्लास्टर किया जाना चाहिए, जिससे हवा के लिए कई छेद हो जाएँ।
46-(2). इस कक्ष के अन्दर, प्रवेश द्वार को छोड़कर, चारों ओर एक हाथ ऊँचा और एक हाथ चौड़ा चबूतरा बनाया जाना चाहिए। इस कक्ष में, मिट्टी से, चार हाथ चौड़ा और एक आदमी की ऊँचाई का एक ओवन बनाया जाना चाहिए, जिसमें कई छोटे छेद हों और उसके ऊपर एक ढक्कन हो। फिर इसे कत्था, साल और इसी तरह की अन्य लकड़ियों से भरकर आग लगानी चाहिए।
46-(3). जब यह ज्ञात हो जाए कि लकड़ी पूरी तरह जल गई है, धुआँ चला गया है और तप्तगृह को स्वेदन के लिए आवश्यक उचित तापमान तक गर्म कर दिया गया है , तब व्यक्ति को वातनाशक द्रव्यों से अभिषेक करके तथा कपड़े से ढककर तप्तगृह में प्रवेश कराना चाहिए।
46-(4) जब वह प्रवेश करे, तो उससे कहा जाए, "हे सज्जन, कल्याण और स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए प्रवेश करो। प्रवेश करने और मंच पर चढ़ने के बाद, अपने लिए सुविधाजनक तरीके से दाईं या बाईं ओर लेट जाओ। भले ही तुम पसीने और बेहोशी से ग्रस्त हो, लेकिन तुम्हें मंच नहीं छोड़ना चाहिए। जब तक तुम्हारे अंदर प्राण हैं, तुम्हें मंच से चिपके रहना चाहिए। यदि तुम एक बार मंच को छोड़ दोगे, तो पसीने और बेहोशी के कारण तुम द्वार नहीं खोज पाओगे और तुरंत अपनी जान गंवा दोगे। इसलिए तुम्हें मंच को किसी भी हालत में नहीं छोड़ना चाहिए।
46-(5). जब तुम अपने आपको अशुद्धियों से मुक्त अनुभव करो, चिपचिपा पसीना अच्छी तरह से निकल गया हो, खूब पसीना आया हो, और तुम्हारी शरीर की नाड़ियाँ अच्छी तरह से फैल गई हों और तुम हलके हो गए हो, और तुम जान गए हो कि सारी रुकावटें, जकड़न, सुन्नपन, दर्द और भारीपन तुमसे दूर हो गए हैं, तब तुम्हें मंच का अनुसरण करते हुए प्रवेश द्वार पर पहुँचना चाहिए।
46. बाहर आने के बाद, ठंडे पानी को छूने के लिए जल्दी मत करो, क्योंकि यह आपकी आँखों को नुकसान पहुँचाएगा। जब आप गर्मी और थकान से उबर जाएँ, एक मुहूर्त (¾ घंटा) बीत जाने के बाद, आपको हल्के गर्म पानी से स्नान करना चाहिए और फिर भोजन करना चाहिए। गर्म घर में स्नान करते समय यही प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
स्टोन स्लैब स्टेशन की तैयारी
47-48. एक मोटे पत्थर के स्लैब को, जो पलंग के बराबर हो, वातनाशक लकड़ी की आग पर अच्छी तरह गर्म कर लें। फिर, सभी अंगारों को हटाकर, गर्म पानी से स्लैब को साफ करके, उस पर रेशमी या ऊनी कपड़ा लपेट दें।
49. फिर उस व्यक्ति के पूरे शरीर पर अभिषेक करके उसे सूती कपड़े, मृगचर्म, रेशमी कपड़े या कम्बल आदि से ढक देना चाहिए और उस पर लिटा देना चाहिए। इससे उसे खुशी से पसीना आएगा। इसे पत्थर-बिस्तर स्नान कहते हैं।
ट्रेंच सडेशन की तैयारी
50-51. अब खाई खोदने की क्रिया का वर्णन किया जाएगा। भूमि के वर्गीकरण में पारंगत व्यक्ति को चारपाई के नीचे एक खाई खोदकर उसमें धुआँ रहित कोयला भर देना चाहिए। इस चारपाई पर लेटने वाले व्यक्ति को खूब पसीना आता है। इसे खाई खोदना कहते हैं।
सेल सडेशन की तैयारी
52. एक मोटी दीवार वाली झोपड़ी बनाएं जो बहुत बड़ी न हो, जो आकार में गोलाकार हो और जिसमें कोई छेद या खिड़कियां न हों, और उसकी भीतरी दीवारों को इत्र और सुगंधित वस्तुओं से लिप दें।
53. इस कुटिया के मध्य में वैद्य को सूती या रेशमी चादर, मृगचर्म या ऊनी गलीचा तथा टाट से बिछौना बिछाना चाहिए।
ग्राउंड-बेड सडेशन की तैयारी
54. फिर, जीवित और धूम्ररहित कोयले से भरे स्टोव को बिस्तर के चारों ओर स्थापित करना चाहिए और रोगी को अच्छी तरह से अभिमंत्रित करके स्वेद देना चाहिए ।
55. ग्राउंड-बेड सडेशन भी स्टोन-बेड सडेशन के लिए निर्धारित तरीके से किया जाना चाहिए। यह सलाह दी जाती है कि साइट साफ, समतल और ड्राफ्ट से मुक्त होनी चाहिए।
घड़े के सूप की तैयारी
56-56½. वातनाशक काढ़े से भरा घड़ा, एक तिहाई या आधा भाग जमीन में गाड़ दें। उस पर बहुत मोटा आसन या बिस्तर न बिछाएं।
57-58. फिर, लोहे या पत्थर के लाल गर्म गोले को बर्तन में डालना चाहिए और उससे निकलने वाली गर्मी से, वातनाशक चिकनाई से अच्छी तरह से लिपटा हुआ और अच्छी तरह से ढका हुआ व्यक्ति इस बिस्तर पर आराम से लेटकर पसीना बहाता है।
59. एक गड्ढा, जो क्यारी के आकार का तथा उसकी दुगुनी गहराई का हो, हवा रहित तथा सुखद स्थान पर खोदा जाना चाहिए तथा उसके अन्दर का भाग अच्छी तरह साफ किया जाना चाहिए।
60. हाथी, घोड़ा, गाय, गधा और ऊँट की सूखी लीद को इसमें जलाना चाहिए; और रोगी को अच्छी तरह से भिगोकर और अच्छी तरह से ओढ़कर इस स्वेद विधि से स्नान कराने पर उसे आराम से पसीना आता है।
होलाका सुदेशन की तैयारी
61-61½. ऊपर वर्णित पशुओं के गोबर के ढेर को, जो कि बिछौने के आकार का हो, आग लगा दें और जब ढेर जलकर धुआँ रहित हो जाए, तो उसके ऊपर चारपाई रख दें।
62-63. फिर, व्यक्ति को अच्छी तरह से तेल लगाया जाता है और अच्छी तरह से ओढ़ाया जाता है और उस पर लिटाया जाता है, तो वह खुशी से पसीना बहाता है। इसे महान ऋषि द्वारा सुखी " होलाका " या सुखी बिस्तर के नीचे स्नान कहा जाता है। इस प्रकार तापीय विधियों का वर्णन किया गया है।
गैर-थर्मल सूडेशन
64-64½. व्यायाम, गर्म कमरे, भारी कपड़े, भूख, अत्यधिक शराब पीना, भय, क्रोध, प्लास्टर, युद्ध और धूप - ये दस चीजें बाहरी अग्नि की सहायता के बिना भी मनुष्य में पसीना लाती हैं।
स्वेद स्नान के बाद का आहार
65 66. इस प्रकार दो प्रकार के वेदों का वर्णन किया गया है , एक तापीय और दूसरा अतापीय। वेदों में स्थानीय या सामान्य, आर्द्र या शुष्क, इस प्रकार तीनों द्वय का पूर्ण रूप से वर्णन किया गया है।
67. जिस व्यक्ति को प्रारंभिक तेल लगाने के बाद स्वेद दिया गया है और उसका पसीना अच्छी तरह निकला है, उसे आहार संबंधी नियमों का पालन करना चाहिए। जिस व्यक्ति को स्नान कराया गया है, उसे उस दिन व्यायाम से दूर रहना चाहिए।
सारांश
पुनरावर्तनीय छंद यहां दिए गए हैं:—
68-69. स्वेद कैसे प्रभावकारी होता है, किसके लिए और किस प्रकार से होता है, कौन से भागों की रक्षा की जानी चाहिए और सफल शमन और अति-शमन के लक्षण कैसे होते हैं, अति-शमन के लिए औषधियाँ; वे लोग जिनमें शमन संकेतित नहीं है; वे लोग जिनमें यह संकेतित है; शमन में प्रयुक्त औषधियाँ और उनका संयोजन।
70. ऊष्मीय तापीय उष्मा के तेरह प्रकार और अतापीय उष्मा के दस प्रकार तथा संक्षेप में उष्मा के छः समूह, इन सभी का वर्णन उष्मा अध्याय ( स्वेद ) में किया गया है।
71. स्नान कराने के विषय में जो कुछ कहा जाना चाहिए, वह महर्षि ने कहा है। शिष्यों के लिए यह अभ्यास योग्य है, क्योंकि इसका गुरु कोई और नहीं, स्वयं पुनर्वसु है।
14. इस प्रकार, अगुइवेशा द्वारा संकलित और चरक द्वारा संशोधित ग्रंथ में, सामान्य सिद्धांतों पर अनुभाग में , "सूजन प्रक्रिया ( स्वेद )" नामक चौदहवां अध्याय पूरा हो गया है।

