महर्षि चरक कृत: चरक संहिता (सूत्रस्थान)
1. अध्याय प्रतिज्ञा एवं मूलभूत सांख्यिकीय वर्गीकरण
इह खलु षट् शतानि विरेचनानां भवन्ति, षड्विरेचनाश्रयाः, पञ्च कषाययोनयः, पञ्चविधं कषायकल्पनान्तरम्, पञ्चाशन्महाकषायाः, पञ्च कषायशतानीति; तदुपलक्षणार्थमुच्यते॥
इस अध्याय में भेषज-कल्पना के छह बुनियादी स्तंभों का सांख्यिकीय सूत्र दिया गया है:
- ६०० विरेचन योग: (संशोधन/शरीर शुद्धि हेतु ६०० औषध कल्प)
- ६ विरेचन आश्रय: जिन अंगों से औषधियां ली जाती हैं (क्षीर, मूल, त्वक, पत्र, पुष्प, फल)
- ५ कषाय योनियाँ: (मधुर, अम्ल, कटु, तिक्त, कषाय रस। लवण रस को छोड़कर)
- ५ कषाय कल्पनाएँ: औषध बनाने की ५ विधियाँ (स्वरस, कल्क, श्रृत/क्वाथ, शीत, फाण्ट)
- ५० महाकषाय: कर्म के आधार पर मुख्य ५० औषध समूह
- ५०० कषाय: प्रत्येक महाकषाय में १० द्रव्य होने से कुल संख्या ५०० होती है।
2. ६०० विरेचन कल्पों का विभाजन (६ संशोधन द्रव्य)
महर्षि चरक ने ६ मुख्य द्रव्यों से ६०० शोधन योगों का विभाजन कल्पस्थान के अनुसार संक्षेप में यहाँ बताया है:
| औषधि का नाम | योगों की संख्या | मुख्य कर्म |
|---|---|---|
| १. मदनफल (Emletic Nut) | १३३ कल्प | प्रधान वमन द्रव्य (उल्टी कराने हेतु) |
| २. जीमूतक (कंटीली तोरई) | ३९ कल्प | वमन एवं विरेचन |
| ३. इक्ष्वाकु (कड़वी लौकी) | ४५ कल्प | कफज विकारों में वमन |
| ४. धामार्गव (स्पंज लौकी) | ६० कल्प | वमन कारक |
| ५. कुटज (वत्सक छाल) | १८ कल्प | पित्त-कफ शोधक वमन |
| ६. कृतवेधन (कड़वी तोरई) | ६० कल्प | तीव्र शोधक वमन |
| ७. त्रिवृत (काला और श्वेत टरपेथ) | ११० कल्प | प्रधान विरेचन द्रव्य (दस्त कराने हेतु) |
| ८. आरग्वध (अमलतास) | १२ कल्प | मृदु विरेचन (बच्चों/वृद्धों हेतु) |
| ९. तिल्वक (लोध) | १६ कल्प | विरेचन द्रव्य |
| १०. स्नुही क्षीर (सेहुंड का दूध) | २० कल्प | तीक्ष्ण विरेचन द्रव्य |
| ११. सप्तला और शंखिनी | ३९ कल्प | विरेचन कल्प |
| १२. दन्ती और द्रवन्ती | ५८ कल्प | तीक्ष्ण विरेचन |
| कुल योग = | ६०० कल्प | |
3. ५ विध कषाय कल्पना (Pharmaceutical Forms)
तेषां यथापूर्वं बलाधिक्यं, तस्मात् कषायशरणमभिसमीक्ष्य आतुरं च रोगं च कल्पयेत्; न त्वेव सर्वं सर्वत्रोपयोज्यम्॥
औषध निर्माण की ५ श्रेणियाँ:
- स्वरस (Expressed Juice): ताजी जड़ी-बूटी को कूटकर निकाला गया रस। (यह सबसे शक्तिशाली होता है)
- कल्क (Paste): जड़ी-बूटी को सिल पर पीसकर बनाया गया गीला गोला।
- श्रृत / क्वाथ (Decoction): औषधि को पानी में आग पर तब तक उबालना जब तक वह एक-चौथाई (1/4) न रह जाए।
- शीत (Cold Infusion): कूटकर रात भर ठंडे पानी में भिगोकर सुबह छाना गया जल।
- फाण्ट (Hot Infusion): गर्म पानी में कुचली दवा डालकर तुरंत छानना (जैसे चाय)।
4. ५० महाकषायों का रोगानुसार एवं कर्मानुसार शुद्ध वर्गीकरण
पाठ में प्रयुक्त जटिल पाश्चात्य शब्दों को हटाकर यहाँ उनके शुद्ध प्रामाणिक नाम और कर्म दिए जा रहे हैं। प्रत्येक महाकषाय में १०-१० प्रधान जड़ी-बूटियाँ होती हैं:
| वर्ग | महाकषाय का शुद्ध आयुर्वेदिक नाम | वास्तविक चिकित्सीय कर्म (Action) |
|---|---|---|
| I. पोषण एवं पाचन वर्ग | १ जीवनीय महाकषाय | प्राण शक्ति और कोशिकाओं की आयु बढ़ाने वाले द्रव्य (जीवक, ऋषभक, मेद, महामेद आदि) |
| २ बृहणीय महाकषाय | मांसपेशियों का वजन बढ़ाने वाले और धातु-पोषक द्रव्य (क्षीरविदारी, अश्वगंधा) | |
| ३ लेखनीय महाकषाय | मोटापा (अतिरिक्त मेद) और चर्बी को खुरचकर बाहर निकालने वाले द्रव्य (मुस्ता, कुष्ठ) | |
| ४ भेदनीय महाकषाय | कठोर मलों को तोड़कर बाहर निकालने वाले द्रव्य (त्रिवृत, अरण्डी) | |
| ५ सन्धानीय महाकषाय | टूटी हुई हड्डियों और घावों को आपस में जोड़ने वाले हीलर द्रव्य (मुलेठी, गिलोय) | |
| ६ दीपनीय महाकषाय | पेट की पाचक अग्नि (भूख) को तीव्र करने वाले कल्प (पिप्पली, मरिच, सोंठ, हींग) | |
| II. इन्द्रिय एवं बल प्रसादन | ७ बल्य महाकषाय | शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) और शारीरिक ताकत बढ़ाने वाले द्रव्य |
| ८ वर्ण्य महाकषाय | त्वचा की कांति, रंगत (Melanin Balance) को सुधारने वाले द्रव्य (चन्दन, मँजीठ) | |
| ९ कण्ठ्य महाकषाय | गले की आवाज को सुरीला और कण्ठ के रोगों को दूर करने वाले कल्प (मुलेठी, द्राक्षा) | |
| १० हृद्य महाकषाय | हृदय की मांसपेशियों को बल देने वाले और मन को प्रिय कल्प (आम्र, आम्रातक, अनार) | |
| III. रोग एवं उदर विकार नाशक | ११ तृप्तिघ्न महाकषाय | कफ के कारण पेट भरा-भरा महसूस होने (अरुचि) को नष्ट करने वाले द्रव्य (सोंठ, चव्य) |
| १२ अर्शोघ्न महाकषाय | बवासीर (Piles) के मस्सों और दर्द को समूल नष्ट करने वाले द्रव्य (कुटज, चित्रक) | |
| १३ कुष्ठघ्न महाकषाय | सभी प्रकार के सोरायसिस, एक्जिमा और त्वचा विकारों के नाशक (खदिर, हरड़, नीम) | |
| १४ कण्डूघ्न महाकषाय | त्वचा की तीव्र एलर्जी और खुजली (Pruritus) को शांत करने वाले द्रव्य (चन्दन, उशीर) | |
| १५ कृमिघ्न महाकषाय | पेट के कीड़ों और हानिकारक पैरासाइट्स का नाश करने वाले कल्प (विडंग, शिग्रु/सहजन) | |
| १६ विषघ्न महाकषाय | शरीर के टॉक्सिन्स और धीमे विषों (Antidote) का असर खत्म करने वाले द्रव्य (शीरिष) | |
| IV. जननेन्द्रिय एवं दुग्ध विकार | १७ स्तन्यजनन महाकषाय | प्रसूता माताओं में दूध (Galactagogue) की मात्रा बढ़ाने वाले तृण-मूल द्रव्य |
| १८ स्तन्यशोधन महाकषाय | माता के स्तनों के दूध को दोषमुक्त और शुद्ध करने वाले द्रव्य (पाठा, देवदारु) | |
| १९ शुक्रजनन महाकषाय | वीर्य और शुक्राणुओं (Spermatogenesis) की गुणवत्ता व संख्या बढ़ाने वाले द्रव्य | |
| २० शुक्रशोधन महाकषाय | वीर्य के दोषों को दूर कर उसे गर्भाधान के योग्य बनाने वाले द्रव्य (कुष्ठ, कदम्ब) | |
| V. पंचकर्म बाह्य उपक्रम | २१ स्नेहोपग महाकषाय | शरीर में चिकनाई (Oliation Therapy) बढ़ाने में मुख्य स्नेहों की मदद करने वाले द्रव्य |
| २२ स्वेदोपग महाकषाय | स्टीम थेरेपी में पसीना (Sudorific) लाने की प्रक्रिया को तीव्र करने वाले द्रव्य (अरण्डी) | |
| २३ वमनोपग महाकषाय | उल्टी (Emesis) कराने के दौरान मदनफल की सहायता करने वाले कल्प (मधु, मुलेठी) | |
| २४ विरेचनोपग महाकषाय | दस्त (Purgation) की प्रक्रिया को सुगम बनाने वाले सहायक द्रव्य (द्राक्षा, कश्मरी) | |
| २५ आस्थापनोपग महाकषाय | काढ़े की बस्ति (एनीमा) के प्रभाव को सुरक्षित और तीव्र करने वाले द्रव्य | |
| २६ अनुवासनोपग महाकषाय | तेल की बस्ति (Nutritional Enema) क्रिया में वात शामक सहयोग देने वाले द्रव्य | |
| २७ शिरोविरेचनोपग महाकषाय | सिर के दोषों को नस्य द्वारा बाहर निकालने में सहायक बीज (मरिच, अपामार्ग) | |
| VI. वेग एवं उबकाई नियंत्रण | २८ छर्दिनिग्रहण महाकषाय | उल्टी की इच्छा और मतली (Anti-emetic) को तुरंत रोकने वाले कल्प (लाजा/खील, द्राक्षा) |
| २९ तृष्णानिग्रहण महाकषाय | बार-बार लगने वाली अत्यधिक प्यास को तृप्त करने वाले द्रव्य (शुण्ठी, मुस्ता) | |
| ३० हिक्कानिग्रहण महाकषाय | हिचकी (Hiccup) के वेग को नियंत्रित करने वाले अद्भुत द्रव्य (बृहती, पुष्करमूल) | |
| VII. मलोत्सर्ग एवं मूत्र विज्ञान | ३१ पुरीषसंग्रहणीय महाकषाय | अतिसार या दस्त को रोककर मलों को बांधने वाले द्रव्य (लोध, मोचरस, प्रियंगु) |
| ३२ पुरीषविरजनीय महाकषाय | मल के स्वाभाविक रंग को स्थिर करने वाले द्रव्य (जामुन, शालमली) | |
| ३३ मूत्रसंग्रहणीय महाकषाय | बहुमूत्रता (Diabetes/बार-बार पेशाब आना) को नियंत्रित करने वाले द्रव्य (वट, प्लक्ष) | |
| ३४ मूत्रविरजनीय महाकषाय | मूत्र के रंग को साफ और प्राकृत करने वाले शीतल कल्प (पद्म, उत्पल, मुलेठी) | |
| ३५ मूत्रविरेचनीय महाकषाय | पेशाब की रुकावट खोलकर उसे खुलकर लाने वाले द्रव्य (गोक्षुर, पुनर्नवा - Diuretics) | |
| VIII. श्वसन एवं ज्वर चिकित्सा | ३६ कासहर महाकषाय | सूखी और गीली खांसी (Antitussive) को समूल नष्ट करने वाले द्रव्य (द्राक्षा, दुरालभा) |
| ३७ श्वासहर महाकषाय | दमा, अस्थमा और सांस फूलने की तकलीफ (Bronchodilators) के शामक द्रव्य (पुष्करमूल) | |
| ३८ शोषहर महाकषाय | सूजन, आंतरिक अंगों की टूट-फूट और इंफ्लेमेशन को दूर करने वाले द्रव्य (दशमूल) | |
| ३९ ज्वरहर महाकषाय | शरीर का बढ़ा हुआ तापमान (बुखार/Antipyretic) उतारने वाले सर्वश्रेष्ठ द्रव्य (गिलोय, पाठा) | |
| ४० श्रमहर महाकषाय | शारीरिक और मानसिक थकावट को मिटाकर नई ऊर्जा भरने वाले द्रव्य (खजूर, इक्षु) | |
| IX. दाह, वेदना एवं स्थापन | ४१ दाहप्रशमन महाकषाय | शरीर, हथेलियों या पेट के भीतर की जलन को शांत करने वाले द्रव्य (चन्दन, उशीर, शर्करा) |
| ४२ शीतप्रशमन महाकषाय | कंपकंपी और अत्यधिक ठंड के अहसास को दूर कर ऊष्मा देने वाले द्रव्य (अगुरु, सोंठ, पिप्पली) | |
| ४३ उदर्दप्रशमन महाकषाय | शीतपित्त (Urticaria/पित्ती उछलना) और चकत्तों को मिटाने वाले द्रव्य (अर्जुन, असन) | |
| ४४ अङ्गमर्दप्रशमन महाकषाय | बदन दर्द, टूटन और मस्कुलर पेन (Analgesic) को दूर करने वाले द्रव्य (बला, चन्दन) | |
| ४५ शूलप्रशमन महाकषाय | पेट के मरोड़, वात के तीखे दर्द (Anti-spasmodic) को शांत करने वाले द्रव्य (अजमोदा, जीरक) | |
| X. रक्त, जीवन एवं पुनरुद्धार | ४६ शोणितस्थापन महाकषाय | रक्तस्राव (Bleeding) को तुरंत रोककर रक्त शुद्धि करने वाले द्रव्य (मधु, केसर, लोध) |
| ४७ वेदनाव्यस्थापन महाकषाय | चेतना तंत्र को स्थिर कर दर्द की अनुभूति को सामान्य करने वाले द्रव्य (अशोक, कदम्ब) | |
| ४८ संज्ञास्थापन महाकषाय | मूर्च्छा या कोमा से बाहर लाकर मस्तिष्क को सचेत (Revival) करने वाले द्रव्य (हींग, वचा, ब्राह्मी) | |
| ४९ प्रजास्थापन महाकषाय | गर्भधारण की क्षमता को पुष्ट करने वाले और गर्भपात रोकने वाले दिव्य द्रव्य (ब्राह्मी, दूर्वा) | |
| ५० वयःस्थापन महाकषाय | एंटी-एजिंग (Anti-Aging/रसायन) जो बुढ़ापे की गति धीमी करते हैं (गिलोय, आँवला, हरड़) |
5. पुनरुक्ति शंका समाधान (पुनर्वसु आत्रेय का वैज्ञानिक दृष्टिकोण)
जब शिष्य अग्निवेश ने शंका की कि इन ५०० महाकषायों में कुछ औषधियां बार-बार दोहराई गई हैं (जैसे गिलोय, मुलेठी, हरड़ कई समूहों में हैं), तो गुरु आत्रेय ने उत्तर दिया:
एकस्यापि द्रव्यस्य तेन तेन विशेषेणार्थक्रियाकराणि नामानि भवन्ति।
तद्यथा- एक एव मनुष्यः कार्यसामर्थ्याद् बहुनामानि लभते...॥
वैज्ञानिक समाधान: बुद्धिमान मनुष्यों को वस्तुओं को केवल सतह से नहीं देखना चाहिए। जैसे एक ही व्यक्ति अपनी कार्यक्षमता के आधार पर अलग-अलग समय पर 'पाचक', 'लेखक' या 'पिता' कहलाता है, ठीक वैसे ही एक जड़ी-बूटी अपने बहुआयामी गुणों (Multi-targeted actions) के कारण अलग-अलग महाकषायों में स्थान पाती है। यदि संसार में कोई एक ही ऐसी औषधि होती जो सब काम अकेले कर देती, तो हमें इतना बड़ा आयुर्वेद शास्त्र लिखने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
6. अध्याय उपसंहार
संयोगं च वियोगं च युक्तिं च संप्रयोजयेत्।
अभ्यन्तरं बाह्यं च स वैद्यः श्रेष्ठ उच्यते॥
निष्कर्ष: जो चिकित्सक इन ५०० औषधियों के आंतरिक और बाहरी प्रयोग की कला जानता है, और द्रव्यों के **संयोग (Combination)** और **वियोग (Separation)** की 'युक्ति' (Logic) में पारंगत है, वही वास्तव में चिकित्सा संसार का सर्वश्रेष्ठ वैद्य है।
॥ इति अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृति सूत्रस्थाने षड्विरेचनाशताशितीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ॥
चरकसंहिता हिन्दी अनुबाद
अध्याय 4 - छह सौ विरेचन-आश्रय
1. अब हम ' छह सौ विरेचन - आश्रय ' नामक अध्याय का विस्तारपूर्वक वर्णन करेंगे ।
2. इस प्रकार पूज्य आत्रेय ने घोषणा की ।
3. छः सौ विरेचन-आश्रय हैं; छः वनस्पति भाग विरेचन-औषधियों के स्रोत हैं; पाँच स्वाद-वर्ग विरेचन-औषधियों के मूल हैं; पाँच विरेचन-औषधियों के बनाने के तरीके हैं; पचास विरेचन-समूह हैं और विरेचन-औषधियों की संख्या पाँच सौ है। संक्षेप में यही विषय है।
4.-1. हम यहां उक्त छह सौ विरेचक तैयारियों का संक्षेप में वर्णन करेंगे, तथा भेषज-विज्ञान अनुभाग में उनका विस्तृत विवरण देंगे।
4.-2. इन विरेचक तैयारियों में से 133 तैयारियाँ उबकाई लाने वाले मेवे से बनाई जाती हैं; 39 तैयारियाँ कंटीली तोरई से; 45 लौकी से;
4.-3. 60 स्पंज लौकी से तैयारियाँ; 18 कुरची की छाल से, 60 कड़वी तोरई से;
4.-4.100 काले टरपेथ और टरपेथ के साथ 10 अतिरिक्त तैयारी से;
4.-5. 12 शुद्ध करने वाले कैसिया से तैयारियां; 16 लोध से, 20 कांटेदार दूध-हेज से;
4.-6. 39 साबुन की फली, और क्लेनोलेपिस से और 58 लाल भौतिक अखरोट और भौतिक अखरोट से; ये छह सौ रेचक तैयारियां हैं।
उनके छह स्रोत
5. विरेचन-आश्रय के छह स्रोत हैं, अर्थात् दूध, जड़, छाल, पत्ते, फूल और पौधों के फल।
डिकोक्टिव्स के पांच उपस्तर
6. इस पाठ में वर्णित स्वाद की पांच श्रेणियों के काढ़े के आधार, मीठे, खट्टे, कड़वे, तीखे और कसैले स्वाद की श्रेणियों से संबंधित काढ़े हैं। (नमकीन स्वाद को छोड़ दिया गया है।)
उनकी तैयारी के पांच तरीके
7.-(1) इन काढ़ों की औषधीय तैयारी के पांच तरीके हैं, अर्थात, व्यक्त रस, पेस्ट, काढ़ा, ठंडा जलसेक और गर्म जलसेक।
7.-(2) किसी जड़ी-बूटी से यांत्रिक दबाव द्वारा निकाला गया ताजा रस 'व्यक्त रस' कहलाता है। औषधि को उसके रस के साथ रगड़कर तैयार किया गया मुलायम द्रव्य पेस्ट कहलाता है। चिकित्सक उस द्रव्य को 'काढ़ा' कहते हैं जो आग पर उबालकर प्राप्त किया जाता है।
7.-(3) उसे ठंडा आसव कहते हैं जो औषधि को कुचलकर तथा उसे उबले हुए पानी में रात भर रखकर प्राप्त किया जाता है; और उसे गर्म आसव कहते हैं जो कुचली हुई औषधि पर गर्म पानी डालकर प्राप्त किया जाता है।
7.-(4) इन पाँचों औषधियों में से प्रत्येक की शक्ति उसके बाद वाली औषधि से बेहतर है, अर्थात, प्रत्येक पूर्ववर्ती औषधि उसके बाद वाली औषधि से अधिक शक्तिशाली है। इसलिए औषधि को इस प्रकार बनाया जाना चाहिए कि वह रोग की शक्ति के साथ-साथ रोगी की शक्ति के अनुरूप हो। इसलिए, किसी भी और हर औषधि का किसी भी मामले में अंधाधुंध उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
पाँच सौ प्रमुख कपटपूर्ण बातों का संक्षिप्त विवरण
8.-(1) अब हम ऊपर वर्णित पचास काढ़े समूहों की व्याख्या और वर्णन करेंगे।
8.-(2) वे जीवनवर्धक, बलवर्धक, प्रतिकारक, रेचक, संश्लेषण करने वाले और पाचन-उत्तेजक हैं; - यह षट्विभाजक काढ़े का एक समूह बनाता है।
8.-(3) शक्तिवर्धक, रंगवर्धक, स्वरवर्धक और मधुर;—यह चतुर्भुज काढ़े का एक समूह बनाता है।
8.-(4) भूख बढ़ाने वाले, बवासीर रोधी , त्वचा रोग के उपचारक, खुजली रोधी, कृमिनाशक और जहर के मारक;—यह षट्भुज काढ़े का एक समूह बनाता है।
8.-(5) गैलेक्टागॉग्स, गैलेक्टो-डिप्यूरेंट्स, स्पर्मेटो-पोएटिक्स और स्पर्मेटो-डिप्यूरेंट्स;—यह टेट्राड एक समूह का डिकोक्टिव्स बनाता है।
8.-(6) मलहम में सहायक, पसीना निकालने में सहायक, वमन में सहायक, विरेचन में सहायक, सुधारात्मक एनीमा में सहायक, चिकनाईयुक्त एनीमा में सहायक तथा मूत्रकृच्छ में सहायक;—यह सप्तक काढ़े का एक समूह बनाता है।
8.-(7) उल्टी-रोधी, वसा-वर्धक और हिचकी दूर करने वाली औषधियाँ:—यह त्रिक काढ़े का एक समूह बनाता है।
8. (8) आंतों के कसैले, मल वर्णक पुनर्स्थापक, इस्चुरेटिक्स, मूत्र वर्णक पुनर्स्थापक और मूत्रवर्धक: - यह पंचकोश का एक समूह बनाता है।
8.-(9) बेकीज़, एंटीडिस्पेनिक्स एंटी-फ़्लोजिस्टिक्स, एंटीफ़ेब्राइल्स और एकोपिक्स: - यह पेंटाड काढ़े का एक समूह बनाता है।
8.-(10) शीतलक, तापवर्धक, मूत्रवर्धक, पीड़ानाशक और दर्दनाशक:—यह पंचकोश का एक समूह बनाता है।
8.(11) रक्त स्थैतिक, पीड़ानाशक, पुनर्जीवन, प्रजनन और कायाकल्प:—यह पंचक काढ़े का एक समूह बनाता है।
8.-(12) यह उन पचास प्रमुख काव्य समूहों का विवरण है जो उनके कार्यों को स्पष्ट करने के लिए दिए गए हैं।
वही विस्तार से समझाया गया
8.-(13) अब हम इन मुख्य श्रुतलेख समूहों में से प्रत्येक के दस घटक श्रुतलेखों की गणना करेंगे, जिससे कुल मिलाकर पाँच सौ श्रुतलेख बनेंगे।
जीवन-प्रवर्तकों का दशक
9. - (1) जीवक , ऋषभक , मेद , महामेद , काकोली , क्षरीय काकोली, जंगली मूंग, जंगली काला चना, काग निगल वॉर्ट और मुलेठी:—ये दस जीवनवर्धक हैं।
रोबोरॉट्स का दशक
9.-(2) दूधिया रतालू, अस्थमा घास, शीतकालीन चेरी, काकोली, क्षीरा काकोली , देशी मैलो, हार्ट-लीव्ड सीडा , डेविल्स कॉटन , सफेद रतालू, और हाथी लता: - ये दस रोबोरेंट हैं।
विद्रोहियों का दशक
9.-3 नट-ग्रास, कोस्टस, हल्दी, भारतीय बेरबेरी, स्वीट फ्लैग, अतीस, कुरोआ, सफेद फूल वाला लीडवॉर्ट, जंगल कॉर्क-ट्री और सफेद स्वीट फ्लैग:—ये दस घृणित हैं। (3)
जुलाब का दशक
9.-(4) टरपेथ, आक, अरण्डी, ग्लोरी लिली, लाल फिजीक नट, सफेद फूल वाला लीड वॉर्ट, जंगल कॉर्क ट्री, क्लेनोलेपिस, कुरोआ और हर्टिज़:—ये दस रेचक हैं।
सिंथेसाइजर का दशक
9.-(5) मुलेठी, गुडुच, पेंटेड लीव्ड यूरिया, फाल्स पैरेरा ब्रावा, सेंसिटिव प्लांट, सिल्क कॉटन ट्री का राल, फुलसी फूल, लोध, सुगंधित चेरी और बॉक्स मर्टल:—ये दस सिंथेसाइज़र हैं।
पाचन-उत्तेजक दवाओं का दशक
9.-(6) पिप्पली, पिप्पली मूल, पिप्पली चबा , श्वेत पुष्पी शिश, सोंठ, आंवला , काली मिर्च, अजवाइन, अडूसा और हींग:—ये दस पाचन-उत्तेजक हैं।
इस प्रकार काढ़े के छह समूह पूरे हो गए।
शक्ति-प्रवर्तकों का दशक
10. ऐन्द्री , काऊवेज, चढ़ाई वाला शतावरी, जंगली काला चना, सफेद रतालू, शीतकालीन चेरी, टिक्ट्रेफोइल, रोहन, हार्टलीव्ड सिडा और देशी मैलो: ये दस शक्तिवर्धक हैं।
रंग-रूप संवर्द्धकों का दशक
10.-(2) चंदन, सुगंधित पून, हिमालयन चेरी, खस, मुलेठी, मजीठ, भारतीय सारसपरिला, सफेद रतालू तथा सफेद और काली स्कच घास:—ये दस रंग निखारने वाले हैं।(8)
वॉयस-प्रमोटर्स का दशक
10.-(3) भारतीय सारसपैरिला, गन्ने की जड़, मुलेठी, पीपल, अंगूर, सफेद रतालू, करी पत्ता, कुंवारी बाल, भारतीय नाइट-शेड और पीले-बेरी नाइट-शेड:—ये दस स्वर-वर्धक हैं। (9)
कॉर्डियल्स का दशक
10.-(4) आम, भारतीय बेर, लकूच, बंगाल करंट, कोकम बटर, आंवला, बेर, भारतीय बेर, बड़ा बेर, अनार और पोमेलो: - ये दस कोर्डियल हैं। (10) इस प्रकार काढ़े के चार समूह पूरे हो गए हैं।
ऐपेटाइज़र का दशक
11.-(1) सोंठ, पिपर चाबा, श्वेत पुष्पीय सीसा, एम्बेलिया, त्रि-खण्डीय वर्जिन बोवर, गुडुच, स्वीट फ्लैग, नट-ग्रास, पिप्पली और जंगली सर्पगंधा:—ये दस क्षुधावर्धक हैं। (11)
एंटी-बवासीर दवाओं का दशक
11.-(2) कुरची, बेल, श्वेत पुष्पीय सीसा, सोंठ, अतीस, च्युबलिक हरड़, क्रेटन कांटेदार तिपतिया, भारतीय बेरबेरी, स्वीट फ्लैग और पिपर चाबा:—ये दस बवासीर नाशक हैं (12)
डर्मेटोसिस का दशकीय उपचार
11.-(3) कैटेचू, चेबुलिक मायरोबालन, एम्ब्लिक मायरोबालन, हल्दी, मार्किंग नट, डिटा छाल, पर्जिंग कैसिया, भारतीय ओलियंडर, एम्बेलिया और स्पेनिश चमेली के अंकुर :—ये दस चर्मरोग के उपचारक हैं। (13)।
एंटी-प्रुरिटिक्स का दशक
11.-(4) चंदन, नार्डस, पपीता, भारतीय बीच, नीम , कुर्ची, रेपसीड, मुलेठी, भारतीय बेरबेरी और अखरोट घास:—ये दस एंटीप्रुरिटिक हैं। (14)
कृमिनाशकों का दशक
11.(5) सहजन के बीज, काली मिर्च, केबुका , एम्बेलिया, चैस्ट ट्री, सफेद शिरीष, लघु कंद, वृषपर्णिका और वृक्कपत्र, इपोमिया:—ये दस कृमिनाशक हैं।(15)
ज़हर के प्रतिकारकों का दशक
11.(6) हल्दी, मजीठ, तुरई, छोटी इलायची, काली तुरई, चंदन, सुपारी, शिरीष, शुद्ध वृक्ष और असीरियन बेर:—ये दस विषनाशक हैं।(16) इस प्रकार काढ़े के छह समूह पूरे हो गए।
गैलेक्टोगोजस का दशक
12. कुसकस घास, शालि चावल, षष्ठी चावल, इक्षुवालिका , बलि घास, छोटी बलि घास, छप्पर घास, हाथी घास, इटकटा और अदरक घास की जड़ें: - ये दस गैलेक्टोगॉग हैं (17)।
गैलेक्टो-डिपुरेंट्स का दशक
12.-(2) पाठा , सोंठ, देवदार, अखरोट-घास, त्रिलोबड वर्जिन बोवर, गुडुच, कुर्ची के फल, चिरेटा, कुर्रोआ और भारतीय सरसापैरिला: - ये दस गैलेक्टो-डिप्यूरेंट हैं। (18).
शुक्राणु-पोयटिक्स का दशक
12.-(3) जीवक, ऋषभक, क्षीराकाकोली , जंगली मूंग, जंगली काला चना, मेदा, चढ़ाई शतावरी, नारदस और ब्लेफेरिस: - ये दस शुक्राणु-पोएटिक्स हैं। (19)
शुक्राणुनाशकों का दशक
(12).-(4) कोस्टस चेरी वृक्ष, बॉक्समर्टल, मछली की हड्डी, कदम्ब , राल, गन्ना, बड़ा गन्ना, लॉन्गलीव्ड बारलेरिया, हॉग वीड और कस्कस घास:—ये दस शुक्राणु-अपचयकारी हैं। (20)
इस प्रकार काढ़े के चार समूह पूरे हो गए।
ओलीएशन में सहायक पदार्थों का दशक
13.-(एल) अंगूर, मुलेठी, गुडुच, मक्का, सफेद रतालू, काकोली, क्षीरा काकोली; जिवाका, कॉर्कस्वैलो वॉर्ट और टिक्ट्रेफ़ोइल: - ये दस स्नेहक में सहायक हैं। (21)।
पसीना निकालने में सहायक तत्वों का दशक
13.-(2) सहजन, अरण्डी का पौधा आक, श्वेत सूकर, सूकर, जौ, तिल, कुल्थी और बड़ा बेर:—ये दस श्वास में सहायक हैं।(22)
वमन में सहायक औषधियों का दशक
13.-(3) शहद, मुलेठी, विविध प्रकार का पहाड़ी आबनूस, सफेद पहाड़ी आबनूस, कदम्ब, हिज्जल, लाल लौकी, सन , आक और खुरदरी भूसी:—ये दस वमन में सहायक हैं। (23)
विरेचन में सहायक औषधियों का दशक
13.- (5) अंगूर, सफेद सागवान, मीठा फालसा, च्युबलिक हरड़, एम्ब्लिक हरड़, बेलेरिक हरड़; बड़ा बेर, बेर, जंगली बेर और भारतीय दंत मंजन:—ये दस विरेचन में सहायक हैं। (24)
सुधारात्मक एनीमा में सहायक पदार्थों का दशक
13.-(5) तुरई; बेल, पीपल, कोस्टस, रेपसीड, वाशर, कुर्ची फल, डिल, मुलेठी और उबकाई लाने वाली सुपारी;—ये दस सुधारात्मक एनीमा में सहायक हैं। (25)
स्नेहक एनिमा में सहायक पदार्थों का दशक
13.(6) भारतीय ग्राउंडसेल, देवदार, बेल, इमेटिक नट, डिल, सफेद हॉग वीड, हॉग वीड, छोटे कैल्ट्रॉप, विंड किलर और भारतीय कैलोसेन्थेस: - ये दस चिकनाई वाले एनीमाटा में सहायक हैं। (26)
एराइन्स में सहायक औषधियों का दशक
13.-(7) स्टाफ प्लांट, स्नीज़वॉर्ट, काली मिर्च, एम्बेलिया, ड्रमस्टिक, रेप सीड्स, रफ चैफ सीड्स, व्हाइट मसल-शेल क्रीपर और व्हाइट शिरीष:—ये दस एरिनेस में सहायक हैं। (27)
इस प्रकार काढ़े के सात समूह पूरे हो गए।
एंटी-इमेटिक्स का दशक
14.4 जामुन और आम के पत्ते, चकोतरा, बेर, अनार, जौ, मुलेठी, खस, मिट्टी और भुना हुआ धान - ये दस वमननाशक हैं। (28)
एडिप्सस एजेंटों का दशक
14. (2) सूखी अदरक, क्रेटन कांटेदार तिपतिया घास, अखरोट घास, अनुगामी रूंगिया, चंदन की लकड़ी, चिरेट्टा, गुडुच, सुगंधित चिपचिपा मैलो, धनिया और सांप लौकी: - ये दस वसायुक्त एजेंट हैं। (29)।
हिचकी-निवारक दवाओं का दशक
14.-(3) लॉन्ग ज़ेडोरी, ओरिस रूट, बड़े बेर के बीज, पीले बेरी वाले नाइट शेड, इंडियन नाइट शेड, वांडा आर्किड, चेबुलिक मायरोबालन, लॉन्ग पेपर, क्रेटन प्रिकली क्लोवर और गॉल्स:—ये दस हिचकी के उपचारक हैं (30)।
इस प्रकार काढ़े के तीन समूह पूरे हो गए।
आंत्र कसैले पदार्थों का दशक
15.-(1) सुगंधित चेरी, भारतीय सारसपैरिला, आम की गिरी, भारतीय कैलोसेन्थेस, लोध, रेशम-कपास के पेड़ का गोंद, संवेदनशील पौधा, फुलसी-फूल, बीटल किलर और कमल तंतु:—ये दस आंतों के कसैले हैं। (31)।
मल वर्णक पुनर्स्थापकों का दशक
15.-(2) जामुन, भारतीय ओलीबानम छाल, काऊवेज, मोहवा, रेशम-कपास वृक्ष, देवदार राल, पकी हुई मिट्टी, सफेद रतालू, नीला जल-लिली और तिल के बीज:—ये दस मल वर्णक पुनर्स्थापक हैं। (32)।
इस्चुरेटिक्स का दशक
(15).-(3) जामुन, आम, पीली छाल वाला गूलर, बरगद, पुष्पीय पीपल , गूलर का गूलर, पवित्र गूलर, अखरोट, आम पहाड़ी आबनूस और कत्था:—ये दस तृष्णानाशक हैं। (33).
मूत्र वर्णक पुनर्स्थापकों का दशक
15. (4) लाल कमल, नीला जल-कमल, नलिन कमल, रात्रि-फूल कमल, सुगंधित सफेद कमल, सफेद कमल, शतावरी कमल, मुलेठी, सुगंधित चेरी और फुलसी के फूल:—ये दस मूत्र वर्णक को बहाल करने वाले हैं। (34)
मूत्रवर्धक दवाओं का दशक
15.-(5) वांडा आर्किड, छोटे कैल्ट्रॉप्स, हॉग वीड, रफ-चैफ, इंडियन रॉकफॉइल, बलि घास, छोटी बलि घास, थैच घास, हाथी घास, कांटेदार इटकाटा जड़ें:—ये दस मूत्रवर्धक हैं। (35)।
इस प्रकार पांच समूह या काढ़े पूरे हो गए।
बेचिक्स का दशक
16.-(1) अंगूर, चेबुलिक हरड़, एम्ब्लिक हरड़, लंबी मिर्च, क्रेटन कांटेदार तिपतिया घास, गॉल्स, पीले बेरीड नाइट-शेड, सफेद हॉग-वीड, हॉग वीड और फेदरफॉइल:—ये दस बेचिक हैं। (36)
एंटी-डिस्पेनिक्स का दशक
16.-(2) लॉन्ग ज़ोडोरी, ओरिस रूट अम्लावेटासा, इलायची, हींग, ईगल वुड, पवित्र तुलसी, पंख पन्नी, कॉर्क निगल वोर्ट और एंजेलिका: - ये दस एंटी-डिस्पेनिक हैं। (37;
एंटी-फ्लॉजिस्टिक्स का दशक
16.-(3) ट्रम्पेट फूल, पवन नाशक, भारतीय कैलोसेन्थेस, बेल, सफेद सागौन, पीले बेर वाले नाइट-शेड, भारतीय नाइट-शेड, टिक्ट्रेफोइल, पेंटेड-लीव्ड यूरिया और छोटे कैल्ट्रॉप्स:—ये दस एंटी-फ्लॉजिस्टिक्स हैं। (33)
ज्वररोधी औषधियों का दशक
16.(4) भारतीय सारसपैरिला, चीनी, पाठा, मजीठ, अंगूर, दंत-ब्रश वृक्ष, मीठा फालसा, च्युबलिक हरड़, एम्ब्लिक हरड़ और बेलेरिक हरड़:—ये दस ज्वर-रोधी हैं।(39)
एकोपिक्स का दशक
16.-(5) अंगूर, खजूर, बुकानन का नांगो, बड़ा बेर, अनार, आम अंजीर, मीठा फालसा, गन्ना, पार्ले और शष्टिका चावल:—ये दस आइकोपिक हैं। (49)
इस प्रकार काढ़े के पांच समूह पूरे हो गए।
रेफ्रिजरेंट्स का दशक
17.-(1) तला हुआ धान, चंदन, सफेद सागवान के फल, मोहवा, चीनी, नीला जल-कमल, खसखस घास, भारतीय सारसपरिला, गुडुच और सुगंधित चिपचिपा मैलो: - ये स्थायी शीतलक हैं। (41)
कैलेफेशियेंट्स का दशक
17.-(3) भारतीय वेलेरियन, ईगल वुड, धनिया, सूखी अदरक, बिशप वीड, स्वीट फ्लैग, येलो-बेरीड नाइट-शेड, विंड किलर, भारतीय कैलोसेन्थेस और लॉन्ग पेपर:—ये दस कैलीफेशिएंट हैं।(42)
एंटी-अर्टिकेरियल्स का दशक
17.-(3) झूठा मैंगोस्टीन, बुकानन का आम, बड़ा बेर, कत्था, गोंद अरबी, दिता की छाल, आम साल, अर्जुन, स्पिनस कीनो और सफेद बबूल:—ये दस पित्त नाशक हैं। (43)
एनोडाइन्स का दशक
17.-(4) टिक्ट्रेफोइल, पेंटेड-लीव्ड यूरिया, इंडियन नाइट-शेड, येलो बेरीड नाइटशेड, कैस्टर-ऑयल प्लांट, काकोलिस , चंदन, कस्कस घास, इलायची और मुलेठी:—ये दस एनोडिनो हैं। (44)
दर्दनाशक दवाओं का दशक
17.-(5) पिप्पली, कालीमिर्च की जड़, पीपर चाबा, सफेद फूल वाली लेडवॉर्ट, सूखी अदरक, काली मिर्च, अजवाइन, जंगली गाजर, जीरा और कांटेदार दूधिया झाड़ी:—ये दस दर्दनाशक हैं।(45)
इस प्रकार काढ़े के पांच समूह पूरे हो गए।
हेमोस्टेटिक्स का दशक
18.-(1) शहद, मुलेठी, केसर, रेशमी गोंद, मिट्टी के टूटे बर्तन, लोध, लाल खड़िया, सुगंधित चेरी, चीनी और तली हुई खीर:—ये दस रक्तवर्धक हैं। (46)
शामक औषधियों का दशक
18.-(2) आम साल, बॉक्स मर्टल, कदम्ब, हिमालयन चेरी, भारतीय दंतचर्म, रेशमी कपास का गोंद, शिरीष देशी विलो, चेरी वृक्ष और अशोक :—ये दस शामक हैं। (47)
पुनर्जीवन का दशक
18.-(3) हींग, करी नीम, सफेद बबूल, स्वीट फ्लैग, एंजेलिका, ब्राह्मी , भुतकेशी [भूतकेशी], नारदस, गोंद गुग्गुल [ गुग्गुला ] और कुर्रोआ:- ये दस पुनर्जीवनवर्धक हैं। (48)
प्रोक्रीएंट्स का दशक
18.(4) ऐन्द्री, ब्राह्मी और श्वेत स्कच घास, हरड़, गुडुच, च्युबलिक हरड़, कुरुआ, देशी मैलो और प्रीफ्यूम्ड चेरी:—ये दस प्रजननकारी हैं।(49)
कायाकल्प का दशक
18.-(5) गुडुच, चेबुलिक मायरोबालन, एम्ब्लिक मायरोबालन, इंडियन ग्राउंडसेल, व्हाइट मसल-शेल क्रीपर, कॉर्क स्वैलो वॉर्ट, क्लाइम्बिंग एस्पैरेगस, इंडियन पेनीवॉर्ट, टिक्ट्रेफोइल और हॉग वीड:—ये दस कायाकल्प करने वाले हैं। (50)
इस प्रकार काढ़े के पांच समूह पूरे हो गए।
संभावित कपटों की असंख्यता और प्रदर्शन का मध्यम पाठ्यक्रम
19. यह पाँच सौ काव्यात्मक कहानियों का विवरण है, जिन्हें पचास मुख्य काव्यात्मक समूहों में वर्गीकृत किया गया है, ताकि उनकी गतिविधियों को स्पष्ट किया जा सके।
20.-(l) यद्यपि संभावित सक्रियताओं की संख्या की कोई सीमा नहीं है, तथापि बहुत संक्षिप्त गणना सीमित बुद्धि वाले चिकित्सक के लिए सहायक नहीं होगी; इसलिए हमने एक ऐसी गणना दी है जो न तो बहुत संक्षिप्त है और न ही बहुत विस्तृत है।
20-(2) यह उपचार के व्यावहारिक उद्देश्य के लिए सामान्य लोगों के लिए काफी पर्याप्त है; और उन अत्यंत बुद्धिमान लोगों के लिए जो जन्मजात गुणों से अनुमान लगाने की कला में निपुण हैं, यह यहां वर्णित नहीं की गई औषधियों के व्यापक ज्ञान के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में काम करेगा।
कुल पाँच सौ कपटपूर्ण कहानियाँ
21. इस प्रकार कहने वाले पूज्य आत्रेय से अग्निवेश ने कहा, "हे प्रभो! इन पाँच सौ काढ़ों में पाँच सौ औषधियाँ नहीं हैं, क्योंकि इन मुख्य समूहों में कुछ सामान्य घटक काढ़े बार-बार आते रहते हैं।
22. पूज्य अत्रेय ने उनसे कहा, "हे अग्निवेश! बुद्धिमानों को वस्तुओं को इस दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। एक ही वस्तु होने पर भी, उसके विविध कार्यों के कारण उसके अनेक नाम हो सकते हैं।
22.-(2) इस प्रकार एक व्यक्ति विभिन्न कार्य करने में सक्षम होता है। उसे वह विशेष उपाधि दी जाती है जो उसके द्वारा किए जाने वाले कार्यों की विशेषता होती है, चाहे वह एजेंट, साधन या कर्ता के रूप में हो। यही बात नशीली दवाओं के मामले में भी देखी जाती है।
22.-(3) यदि हम वास्तव में कोई एक औषधि खोज पाएं जो सभी गुणों से युक्त हो, तथा सभी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम हो, तो फिर कौन किसी अन्य औषधि के नाम और गुणों को याद करने या अपने शिष्यों को बताने का कष्ट उठाएगा?
सारांश
23. पुनरावृति छंद यहां दिए गए हैं-
यहां 600 विरेचक औषधियों, औषधियों के नाम, उनमें से प्रत्येक औषधि की संख्या तथा इन औषधियों के छह स्रोतों का संक्षेप में वर्णन किया गया है।
24. नमक को छोड़कर सभी स्वादों की वस्तुओं से बने काढ़े को काढ़ा कहते हैं; इसलिए काढ़े के मूल पदार्थ पांच प्रकार के कहे गए हैं।
25. इसी प्रकार, इनके निर्माण की विधि पाँच प्रकार की बताई गई है; काढ़े के पचास प्रमुख समूह भी गिनाए गए हैं।
26. उदाहरण के लिए पाँच सौ काव्य-कथनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है; विषय के विस्तार की कोई सीमा नहीं है।
27-28. अति संक्षिप्तता पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यह सामान्य लोगों के लिए उपयोगी नहीं होगी; इसलिए न तो अति संक्षिप्त और न ही अति विस्तृत वर्णन दिया गया है; और यह सामान्य लोगों के लिए व्यावहारिक उपयोग होगा और प्रतिभाशाली लोगों के ज्ञान को बढ़ाने में सहायक होगा; इस प्रकार काढ़े का पचास गुना वर्गीकरण वर्णित किया गया है।
29. वह सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक है, जो संयोजन की कला के साथ-साथ इन तैयारियों को आंतरिक और बाह्य दोनों तरह से व्यवस्थित रूप से प्रशासित करने की कला जानता है।
30. इस प्रकार अग्निवेश द्वारा संकलित और चरक द्वारा संशोधित ग्रन्थ के सामान्य सिद्धान्तों वाले भाग में , छह सौ विरेचन-आश्रय (विरेचन -आश्रय ) नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ।
इस प्रकार नशीली दवाओं पर अध्यायों की श्रृंखला समाप्त होती है।

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