पञ्चमोऽध्यायः - मात्राशितीयोऽध्यायः (भोजन में माप)

चरकसंहिता - सूत्रस्थान - अध्याय ५ (मात्राशितीय अध्याय)

अथ श्री चरकसंहिता - सूत्रस्थानम्

पञ्चमोऽध्यायः - मात्राशितीयोऽध्यायः (भोजन में माप)


अथातो मात्राशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः इति ह स्माह भगवानात्रेयः॥ (१-२)
अनुवाद: अब इसके बाद हम “खाने में माप (मात्राशितिया या मातृशिता)” नामक अध्याय का विस्तार से वर्णन करेंगे, जैसा कि पूज्य भगवान आत्रेय ने घोषणा की थी।

१. जठराग्नि और आहार की मात्रा (Dietary Measurement & Gastric Fire)

मात्राशी स्यात्। आहारमात्रा पुनरग्निबलापेक्षिणी॥ (३)
अनुवाद: मनुष्य को हमेशा मात्रा के अनुसार (मात्राशिन) ही भोजन करना चाहिए। भोजन की वह उचित मात्रा व्यक्ति की जठराग्नि (पाचन शक्ति) के बल पर निर्भर करती है।
यावद्धि जस्यानुपहत्य प्रकृतिं यथाकालं जरं गच्छति तावदस्य मात्राप्रमाणं वेदितव्यं भवति॥ (४)
अनुवाद: भोजन का सही और उचित माप वही जानना चाहिए, जो ग्रहण करने पर शरीर की धातुओं या स्वास्थ्य को बिना किसी हानि पहुंचाए अपने सही समय पर पच जाता है।

२. लघु और गुरु पदार्थों का वर्गीकरण (Heavy and Light Food Items)

तत्र शालिषष्टिमूगलावतित्तिरिकरभमृगशशशरभशम्बरादय आहाराः प्रकृत्या लघवोऽपि मात्रापेक्ष्या भवन्ति।
तथा पिष्टेक्षुविकृतिक्षीरतिलमाषानूपौदकमृत्युप्रभृतय आहाराः प्रकृत्या गुरवोऽपि मात्रापेक्ष्या एव॥ (५)
अनुवाद:
५-(१): इसे देखते हुए, शाली चावल, शष्टिका (सांठी) चावल, मूंग, सामान्य बटेर (लाव), ग्रे पार्ट्रिज (तीतर), मृग, खरगोश, वापिटी, भारतीय सांभर और ऐसे अन्य खाद्य पदार्थ, हालांकि अपनी प्रकृति से स्वभाव से हल्के (लघु) हैं, फिर भी उन्हें मात्रा के अनुसार ही लेने की आवश्यकता होती है।
५-(२): इसी प्रकार पेस्ट्री (पिष्टान्न), गन्ने का रस व उसके विकार, दूध, तिल, उड़द (माष), जलीय तथा आर्द्रभूमि (आनूप) के प्राणियों का मांस तथा अन्य इसी प्रकार के खाद्य पदार्थ, यद्यपि स्वभाव से भारी (गुरु) होते हैं, उन्हें भी कड़े माप में ही लिया जाना चाहिए।

महाभूतों की प्रधानता और जठराग्नि पर प्रभाव

न च नावकारणमुच्यते द्रव्येषु गुरुत्वं लघुत्वं वा।
तत्र लघूनि द्रव्याणि वाय्वग्निगुणबहुलानि भवन्ति, प्रकृत्या चैवाग्नेयानि, तानि स्वगुणादग्निमुधुक्षयन्ति अल्पदोषाणि च प्रकृत्या॥ (६/१-२)
अनुवाद: उपर्युक्त वर्गीकरण से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि खाद्य पदार्थ में भारीपन या हल्कापन बिना किसी कारण के (अकारण) बताया गया है। हल्की वस्तुओं में वायु और अग्नि के गुणों की प्रधानता होती है। परिणामस्वरूप, ये हल्की वस्तुएँ अपने स्वाभाविक आग्नेय गुण के कारण जठराग्नि को उत्तेजित करती हैं और उन्हें अधिक मात्रा में खाने पर भी वे कम हानिकारक मानी जाती हैं।
गुरूंणि पुनर्भूमितोयगुणबहुलानि भवन्ति, तानि प्रकृत्या नाग्निमुधुक्षयन्ति;
तस्मात्तानि अतिमात्रं कल्यानकरान्युपयुज्यन्ते, अन्यथा तु न, यावदग्निकर्मणो न व्यायामेनोपचितस्य॥ (६/३-४)
अनुवाद: दूसरी ओर, अन्य भारी (गुरु) वस्तुओं में पृथ्वी (भूमि) और जल (तोय) के गुण अधिक होते हैं। अपनी इस भिन्न प्रकृति के कारण वे स्वभावतः जठराग्नि को उत्तेजित नहीं करती हैं। अतः इनका अधिक मात्रा में सेवन बहुत हानिकारक है, जब तक कि कठिन शारीरिक व्यायाम द्वारा जठराग्नि के बल को बहुत बढ़ा न लिया गया हो। इस प्रकार भोजन की मात्रा पूर्णतः जठराग्नि की प्रबलता पर निर्भर करती है।
न च नापेक्ष्यं भवति द्रव्यं मात्रा।
तत्र गुरुणामर्धसौहित्यं सार्धं वा सर्वशः, लघूनामपि नातिसौहित्यं प्रकृत्यग्निसमीक्षया॥ (७)
अनुवाद: ऐसा नहीं है कि किसी पदार्थ की मात्रा का कोई महत्व नहीं है। मात्रा की दृष्टि से यह नियम निर्धारित है कि भारी पदार्थों को अपनी कुल तृप्ति या भूख का एक तिहाई (1/3) या आधा (1/2) ही लेना चाहिए, जबकि हल्की वस्तुओं को भी अत्यंत अधिक मात्रा (अतिसौहित्य) में नहीं खाना चाहिए, बल्कि अपनी जठराग्नि की शक्ति के अनुरूप ही ग्रहण करना चाहिए।
मात्रावद्ध्यनुकम्पते केवलं बलवर्णसुखायुषा।
न च हिनस्त्युदरं जनयति च बलम्॥ (८)
अनुवाद: संतुलित और मात्रा अनुसार लिया गया आहार न केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि सकारात्मक रूप से व्यक्ति के बल, त्वचा के रंग, स्वास्थ्य (सुख) और लंबी आयु को बढ़ावा देता है।

३. अपथ्य और पथ्य आहार नियम (Dietary Rules: Do's & Don'ts)

तस्मात् पिष्टमयंान्नं भुक्तोपरि न संभजेत्।
मात्रावानपि च क्षुद्वान् गुर्वन्नं वर्जयेत् सदा॥ (९)
अनुवाद: अतः भोजन करने के ऊपर कभी भी भारी चीजें जैसे कि हलवाई की बनी पेस्ट्री या मैदे की रोटी (पिष्टान्न) आदि नहीं खानी चाहिए। तीव्र भूख लगने पर भी ऐसी भारी चीजें हमेशा सही और नियंत्रित मात्रा में ही खानी चाहिए।

नित्य सेवन के लिए वर्जित खाद्य पदार्थ (वर्जयेत् - आदतन न खाएं)

वल्लूरं शुष्कशाकानि शालूकानि बिसानि च।
मत्स्यान् गव्याविमाषांश्च यवकांश्च न शीलयेत्॥ (१०-११)
अनुवाद: सूखा मांस (वल्लूर), सूखी सब्जियां, कमल के प्रकंद (शालूक) और कमल का डंठल (बिस) भारी होने के कारण इनका सेवन आदतन नियमित नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही, दुर्बल पशु का मांस, जमा हुआ दूध (कूर्चिका), क्रीम चीज़, सूअर का मांस, गाय और भैंस का मांस (गव्य-महिष मांस), मछली, दही, काले चने (उड़द/माष) और जंगली जौ का सेवन दैनिक आदत में नहीं लाना चाहिए।

नित्य सेवन करने योग्य उत्तम आहार (शीलयेत् - नियमित खाएं)

षष्टिकाञ्छालिमूगांश्च सैन्धवं चामलके यवान्।
आन्तरिक्षं पयः सर्पिर्जाङ्गलं मक्षिकां तथा।
नित्यं संशीलयेच्चैव यच्च स्वास्थ्यकरं भवेत्॥ (१२-१३)
अनुवाद: षष्ठी (सांठी) चावल, शालि चावल, मूंग, सेंधा नमक, आंवला, जौ, अंतरिक्ष (वर्षा) का जल, दूध, घी, जंगली पशुओं का मांस (जांगल मांस) और शहद का सेवन नियमित रूप से दैनिक आहार में किया जा सकता है। इसे दैनिक आहार का हिस्सा बनाना चाहिए, जो न केवल वर्तमान स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करता है, बल्कि आने वाली बीमारियों के खिलाफ एक सुरक्षा कवच (रोगनिरोधी) के रूप में कार्य करता है।

४. अंजन विधि और नेत्रों की सुरक्षा (Collyrium Application)

सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्ष्णोस्ततो भजेत्।
पञ्चरात्रेऽष्टरात्रे वा स्रावणार्थं रसाञ्जनम्॥ (१४-१५)
अनुवाद: नेत्रों के लिए अत्यंत लाभदायक सौवीर-अंजन (Antimony-Collyrium) का प्रयोग प्रतिदिन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, नेत्रों से दूषित कफ को बाहर निकालने और जलन दूर करने के लिए 'रसांजन' (आंवले/दारुहल्दी का अर्क) का प्रयोग प्रत्येक पांचवीं या आठवीं रात्रि में एक बार करना चाहिए।
चक्षुस्तेजोमयं तस्य विशेषात् कफ्जं भयम्।
तत्र कफहरं कर्म हितं दृष्टिप्रसादनम्॥ (१६)
अनुवाद: चक्षु (आँख) अग्नि या प्रकाश तत्व की प्रधानता वाली होती है। इसलिए, इस पर कफ यानी जलीय तत्व का प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना सबसे अधिक होती है। अतः कफ को ठीक करने वाले ये उपाय दृष्टि को बिल्कुल स्पष्ट और निर्मल रखने में लाभकारी होते हैं।
न तु दिवा प्रयोगः स्यात् तीक्ष्णस्याञ्जनस्य च।
विरेकदुर्बला दृष्टिरादित्यं प्राप्य सीदति।
तस्मात्स्राव्यं निशायमेव तीक्ष्णमञ्जनमिष्यते॥ (१६½-१७½)
अनुवाद: दिन के समय आँखों पर कभी भी तेज़ (तीक्ष्ण) अंजन नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि औषधीय स्राव या जल निकासी से कमज़ोर हुई आँखों की दृष्टि तीव्र धूप या सूर्य के संपर्क में आने पर मन्द हो सकती है। इसलिए, तीक्ष्ण अंजन द्वारा जल निकासी का विधान केवल रात में ही किया गया है।
यथा हि कनकं धौतं मणयः स्फटिकादयः।
निर्मला भवन्ति विमले नभसीव शशधरः॥ (१८-१९½)
अनुवाद: जिस प्रकार उचित तेल, कपड़ा, कुशा आदि से मांजने और धोने पर अनेक प्रकार के मलिन स्वर्णाभूषण और स्फटिक मणियाँ स्वच्छ हो जाती हैं, उसी प्रकार नेत्रों में उचित नेत्र-मलहम, नेत्र-द्रव्य (अंजन) डालने से मनुष्यों की दृष्टि स्वच्छ आकाश में चमकने वाले चन्द्रमा के समान दीप्तिमान हो जाती है।

५. आयुर्वेदिक धूम्रपान विधि (Medicinal Smoking / Cigarette Preparation)

सिगार (धूमवर्ती) तैयार करने की प्रामाणिक विधि

हरेणुकैलाप्रियङ्गुत्वक्चोचपत्रपालङ्कृतैः।
चन्दनोत्पलपद्मकैः... शर्करा मधुकं तथा॥ (२०-२४½)
अनुवाद: सुगंधित मुरली, सुगंधित चेरी, बड़ी इलायची, सुगंधित पून, शंख, सुगंधित चिपचिपा मैलो, चंदन, दालचीनी का पत्ता, दालचीनी की छाल, इलायची, खसखस घास, हिमालयन चेरी, अदरक घास, मुलेठी, नार्डस, गुग्गुल, अगर (चील की लकड़ी), चीनी, बरगद, गूलर, पीपल के पेड़ों की छाल और लोध्र की छाल—इन सभी को चिकित्सक द्वारा पीसकर महीन पेस्ट बनाना चाहिए।
फिर इसे एक ईख (रीड) के टुकड़े पर लपेटकर जौ के दाने के आकार का रूप (धूमवर्ती/सिगार) देना चाहिए, जो अंगूठे की मोटाई और आठ अंगुल की लंबाई का होना चाहिए। जब यह पूरी तरह सूख जाए, तो बीच की सींक या रीड को बाहर निकाल लेना चाहिए। इस सिगार को धूम्रपान पाइप (धूमनेत्र) में डालकर स्नेह या घी लगाकर आदतन आराम से धूम्रपान करना चाहिए।

धूम्रपान के तीन मुख्य प्रकार

धूम्रपान का प्रकार मुख्य सामग्री पाइप (धूमनेत्र) की लंबाई दैनिक आवृत्ति
प्रायोगिक (Habitual) सुगंधित औषधियां, जड़ी-बूटियां ३६ अंगुल दिन में २ बार
स्नेहन (Unctuous/Lubricating) पशु वसा, घी, मोम, मधुर औषधियां ३२ अंगुल दिन में १ बार
वैरेचनिक (Errhine/Purgative) तीक्ष्ण औषधियां, मैनशिल, हरताल २४ अंगुल दिन में ३ से ४ बार

धूम्रपान के लाभ (Benefits of Medicinal Smoking)

शिरोगौरवशूलघ्नं पीनसार्धावभेदकाः।
कर्णाक्षिशूलकासादि... धूमपानप्रभाग्जयात्॥ (२७-३२½)
अनुवाद: सिर में भारीपन, आधासीसी (माइग्रेन/अर्धावभेदक), पीनस (नासिकाशोथ), कान का दर्द, आँख का दर्द, खाँसी, हिचकी, दमा, स्वर बैठना, दाँतों की कमज़ोरी, मुँह की दुर्गंध, जबड़े और गर्दन की जकड़न, गंजापन, बालों का असमय सफेद होना या गिरना—ये सभी रोग उचित औषधीय धूम्रपान से पूरी तरह दूर हो जाते हैं। इससे सिर की हड्डियों, इन्द्रियों, बालों और आवाज की शक्ति बहुत बढ़ती है। जो लोग इसका सही सेवन करते हैं, उन्हें जत्रु के ऊपरी भाग (सुप्रा क्लैविक्युलर भाग) में तीव्र वात और कफ के विकार नहीं सताते।

धूम्रपान की सही तकनीक और निषेध

नासया धूममादद्याद्वक्त्रेण विसृजेत्ततः।
मुखेन धूमाददानो नासया न विसृजेत्।
प्रतिलोमगतो धूमो ह्युक्ष्णी हिंस्यात् क्षिप्रमेव च॥ (४६½-४७½)
अनुवाद: सिर, नाक और आँख के रोगों में धुआँ नाक से खींचना चाहिए और गले के रोगों में मुँह से खींचना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि **जब धुआँ अंदर लिया जाए, तो उसे हमेशा मुँह से ही बाहर छोड़ना चाहिए।** मुँह से साँस या धुआँ खींचते समय उसे भूलकर भी नाक से बाहर नहीं निकालना चाहिए, क्योंकि विपरीत दिशा में ऊपर जाने वाला धुआँ आँखों की रोशनी को तुरंत और गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है।

६. अणु तेल नस्य विधि और लाभ (Anu Oil Nasal Drops)

नस्यकर्म च कालेषु यथाशास्त्रं समाचरेत्।
प्रावृट्शरद्वसन्तेषु धने व्यभ्रे च नभस्तले॥ (५६-५६½)
अनुवाद: प्रत्येक वर्ष, मुख्य रूप से तीन ऋतुओं—प्रावृट् (पहली वर्षा), शरद और बसंत ऋतु के दौरान, उस समय का चयन करते हुए जब आकाश बादलों से पूरी तरह मुक्त और साफ हो, शास्त्रोक्त विधि से 'अणु तेल' का नस्य कोर्स (नाक में तेल डालना) करना चाहिए।

अणु तेल के नियमित उपयोग के अद्भुत गुण

न च स्युः गद्रदाः स्वराः।
मुखां प्रसन्नं भवति स्वरः स्निग्धः स्थिरो महान्।
सर्वेन्द्रियाणि शुद्धांनि बलं चासाभिवर्धते॥ (५७-६२½)
अनुवाद: जो व्यक्ति नियमित रूप से अणु तेल से नाक की शुद्धि (नस्य) करता है, उसकी दृष्टि, सूँघने की शक्ति (घ्राण) और श्रवण शक्ति कभी कमज़ोर नहीं होती। उसकी दाढ़ी और सिर के बाल कभी सफेद या पीले नहीं होते; बाल गिरना बंद होकर घने होते हैं। चेहरे का पक्षाघात (Facial Paralysis), सिरदर्द, अर्धावभेदक और सिर का कंपन शांत होता है। उसकी खोपड़ी की रक्त वाहिकाएँ, जोड़ और कण्डराएँ पुष्ट होती हैं। चेहरा प्रसन्न, भरा हुआ और आभायुक्त हो जाता है; आवाज मधुर, दृढ़ और भारी हो जाती है तथा बुढ़ापे के प्रभाव बहुत मंद हो जाते हैं।

७. मुख, दंत और जिह्वा शुद्धि (Oral and Dental Hygiene)

दंतधावन (दातून करने की विधि)

करञ्जवीरंार्कजातीनां करवीरार्जुनासनम्।
कषायं कटुकं तिक्तं भक्षयेद्दन्तधावनम्॥ (७१-७३½)
अनुवाद: एक हरी दंत-टहनी (दातून) जो आगे या समीपस्थ सिरे पर कुचली हुई (ब्रश के समान) हो और कसैली, तीखी या कड़वी स्वाद वाली हो, उसका उपयोग करना चाहिए। इसके लिए करंज, मदार (अर्क), चमेली (जाती), कनेर (करवीर), अर्जुन और विजयसार (असन) जैसे वृक्षों की टहनियाँ उत्तम हैं। मसूड़ों को चोट पहुँचाए बिना दिन में दो बार दातून करने से मुँह की दुर्गंध, स्वादहीनता और अशुद्धियाँ दूर होती हैं तथा भूख तुरंत खुलती है।

जिह्वा निर्लेखन (जीभ खुरचना)

सुवर्णरूप्यताम्राणि त्रपुरीतकमयानि च।
जिह्वानिर्लेखनानि स्युः मृदूनि अतीक्ष्णानि च॥ (७४-७५½)
अनुवाद: जीभ खुरचनी (Tongue Scraper) बिना किसी धार वाली, किनारों से चिकनी, थोड़ी घुमावदार और सोने, चाँदी, ताँबे, टिन या पीतल की बनी होनी चाहिए। जीभ की जड़ पर जमने वाली मैल की परत श्वास मार्ग को बाधित कर दुर्गंध (फ़ेटर ओरिस) पैदा करती है, अतः जीभ को नियमित खुरचना आवश्यक है।

गंडूष धारण (तेल से गरारे करने के लाभ)

हनुबलं स्वरबलं मुखपुष्टिः रसोत्तमः।
नास्य कण्ठशोषः स्यान्न ओष्ठयोः स्फुटनं भयम्॥ (७७½-८०)
अनुवाद: तिल के तेल से नियमित कुल्ला या गरारे (गंडूष) करने से जबड़े और आवाज मजबूत होती है, चेहरे पर चमक (मुखपुष्टि) आती है और स्वाद का उत्तम ज्ञान होता है। इससे गले में कभी सूखापन नहीं आता, होंठ फटने का डर नहीं रहता, दाँत मजबूत होकर कभी दर्द नहीं करते और व्यक्ति सख्त से सख्त भोजन को भी आसानी से चबा सकता है।

८. बाह्य शरीर की मालिश और स्नान के लाभ (Abhyanga & Body Care)

शिरोअभ्यंग (सिर पर तेल लगाना)

न शिरःशूलं न खालित्यं न पालित्यं न कचाः क्षयाः।
दृढमूलाश्च दीर्घाश्च कृष्णाः केशा भवन्ति च॥ (८०½-८३)
अनुवाद: जो व्यक्ति प्रतिदिन अपने सिर की तेल से अच्छी तरह मालिश करता है, उसे कभी सिरदर्द, गंजापन (खालित्य) और बालों का सफेद होना (पालित्य) जैसी समस्याएँ नहीं सतातीं। उसके बालों की जड़ें बहुत मजबूत, लंबी, लहराती और गहरी काली हो जाती हैं। इससे ज्ञानेन्द्रियाँ पुष्ट होती हैं, चेहरे पर प्रसन्नता आती है और गहरी व अच्छी नींद आती है।

कर्णपूरण (कान में तेल डालना)

न कर्णरोगा वातोत्था न मन्याहनुसङ्ग्रहः।
न उच्चैःश्रुतिर्न बाधिर्यं स्यान्नित्यं कर्णपूरणात्॥ (८३½-८४)
अनुवाद: कान में नियमित रूप से शुद्ध तेल की कुछ बूँदें भरने से वात दोष के कारण होने वाले कान के रोग नहीं होते। गर्दन (मन्या) या जबड़े में अकड़न नहीं होती, ऊँचा सुनने की समस्या और बहरापन (बाधिर्य) हमेशा के लिए दूर रहता है।

शरीर अभ्यंग (तेल मालिश)

स्नेहाभ्यङ्गाद्यथा कुम्भः चर्म स्नेहविमर्दनात्।
भवत्युपाङ्गाद्दृढश्चाक्षो दृढं शरीरं तथा॥ (८४½-८६)
अनुवाद: जिस प्रकार तेल लगाने से मिट्टी का घड़ा मजबूत हो जाता है, सूखे चमड़े को तेल में भिगोकर मथने से वह कोमल और सुदृढ़ हो जाता है, तथा गाड़ी की धुरी तेल लगाने से सुचारू रूप से चलती है; ठीक उसी प्रकार रोज़ तेल मालिश (अभ्यंग) करने से मनुष्य का शरीर सुदृढ़, त्वचा अत्यंत कोमल व सुंदर होती है, वात दोष शांत होता है और शरीर कठिन परिश्रम व आघात को आसानी से सहन कर लेता है।

पादअभ्यंग (पैरों की मालिश)

खरत्वं स्तब्धता रौक्ष्यं श्रमः सुप्तिश्च पादयोः।
पादभ्यङ्गेन शाम्यन्ति... चक्षुषोः प्रसादमभिवर्धते॥ (९०-९२)
अनुवाद: पैरों का खुरदुरापन, जकड़न, सूखापन, सुन्न होना और थकावट पैरों की मालिश (पादअभ्यंग) से तुरंत दूर हो जाती है। इससे पैरों में सुंदरता, बल और स्थिरता आती है। सबसे विशेष बात यह है कि **पैरों की मालिश करने से नेत्रों की ज्योति (चमक) बढ़ती है** और साइटिका (गृध्रसी) तथा तलवों के फटने जैसे रोगों से बचाव होता है।

स्नान के महागुण

पवित्रं वृष्यमायुष्यं श्रमस्वेदमलापहम्।
शरीरबलसन्धानं स्नानमोजस्करं परम्॥ (९४)
अनुवाद: प्रतिदिन विधिपूर्वक स्नान करने से शरीर परम पवित्र होता है। यह पुरुषत्व और आयु को बढ़ाने वाला, शारीरिक थकान, पसीना और मैल को समूल नष्ट करने वाला है। स्नान शरीर में ओज (इम्यूनिटी) और अत्यधिक मानसिक स्फूर्ति का संचार करता है।

९. सदाचार और व्यक्तिगत सुरक्षा (Lifestyle & Protective Measures)

अध्याय के अंत में महर्षि चरक जीवन को गरिमापूर्ण और सुरक्षित बनाने वाले दैनिक आचरणों के लाभ बताते हैं:

  • स्वच्छ वस्त्र धारण करना (९५): यह समाज में यश, कीर्ति और सम्मान दिलाता है, दुर्भाग्य को दूर करता है और मन को सदा प्रसन्न रखता है।
  • सुगंध (इत्र) और माला का उपयोग (९६): यह काम्य (आकर्षक), शरीर को पुष्ट करने वाला और सौभाग्य को जगाने वाला होता है।
  • रत्न और आभूषण पहनना (९७): यह ओज और समृद्धि लाता है तथा मन की चिंताओं को दूर कर उत्साह जगाता है।
  • जूते पहनना (पादत्राण - १००): यह पैरों को कंकड़-पत्थरों से बचाता है, चलने में अत्यंत आरामदायक है और नेत्रों के स्वास्थ्य के लिए उत्तम माना गया है।
  • छाता धारण करना (छत्र - १०१): यह अप्रत्याशित विपत्तियों को टालता है, और तेज धूप, आंधी, धूल व वर्षा से शरीर की रक्षा करता है।
  • लाठी पकड़ना (दण्ड - १०२): मार्ग में पैर फिसलने या ठोकर लगने से बचाता है, शत्रुओं या हिंसक पशुओं से रक्षा कर भय को दूर करता है।

१०. जीवन रक्षा का परम सिद्धांत (Conclusion)

नगरी नगरस्येव रथस्येव रथी यथा।
स्वशरीरस्य मेधावी कृत्येष्ववहितो भवेत्॥ (१०३)
अनुवाद: जिस प्रकार एक सजग राजा या नगर का स्वामी अपने नगर की रक्षा के कार्यों में दिन-रात सतर्क रहता है, और जैसे एक कुशल सारथी अपने रथ की सुरक्षा व सुचारू संचालन के लिए सदैव सावधान रहता है; ठीक उसी प्रकार बुद्धिमान और मेधावी मनुष्य को भी **अपने शरीर की रक्षा और स्वास्थ्य के नियमों के पालन में हमेशा अत्यंत सतर्क रहना चाहिए।**
वृत्त्युपायान् सम्भजेत ये स्युर्धर्मविरोधिनः।
शममथ्ययनं चैव सुखमेवं समश्नुते॥ (१०४)
अनुवाद: मनुष्य को हमेशा समाज में अपनी आजीविका चलाने के लिए ऐसे साधनों या व्यापार को अपनाना चाहिए जो धर्म के विरुद्ध न हों। इसके साथ ही, मन को शांत (शम) रखते हुए ज्ञान के अर्जन व स्वाध्याय में लीन रहना चाहिए। इस प्रकार मर्यादापूर्वक जीवन जीने से ही मनुष्य को इस लोक में परम सुख और शांति की प्राप्ति होती है।

॥ इति अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने मात्राशितीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ॥

          

चरकसंहिता हिन्दी अनुबाद 

अध्याय 5 - भोजन में माप (मात्रशिता)

1. अब हम “खाने में माप ( मात्रशितिया या मातृशिता- मात्राशितिया या मातृशिता )” नामक अध्याय का विस्तार से वर्णन करेंगे ।

2. इस प्रकार पूज्य आत्रेय ने घोषणा की ।

गैस्ट्रिक अग्नि से संबंधित माप

3. व्यक्ति को मात्रा अनुसार भोजन करना चाहिए (मात्राशिन- मात्रशिन ) और भोजन की मात्रा व्यक्ति की जठर अग्नि की शक्ति से निर्धारित होती है।

भोजन का माप

4. भोजन का उचित माप वही जानना चाहिए जो ग्रहण करने पर स्वास्थ्य को हानि पहुंचाए बिना समय पर पच जाए।

भारी और हल्की वस्तुओं के माप

5.-(1) इसे देखते हुए, शाली चावल, शष्टिका चावल, मूंग, सामान्य बटेर, ग्रे पार्ट्रिज, मृग, खरगोश, वापिटी, भारतीय सांभर और ऐसे अन्य खाद्य पदार्थ, हालांकि स्वभाव से हल्के हैं, उन्हें मात्रा में लेने की आवश्यकता है।

5.-(2) इसी प्रकार पेस्ट्री, गन्ने का रस, दूध, तिल, उड़द, जलीय तथा आर्द्रभूमि के प्राणियों का मांस तथा अन्य इसी प्रकार के खाद्य पदार्थ, यद्यपि स्वभाव से भारी होते हैं, उन्हें भी माप में लिया जाना चाहिए।

6.-(1) फिर भी, उपर्युक्त वर्गीकरण से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि खाद्य पदार्थ में भारीपन या हल्कापन अकारण बताया गया है। हल्की वस्तुओं में वायु और अग्नि के गुणों की प्रधानता होती है।

6.-(2) अन्य भारी वस्तुओं में मिट्टी और पानी के गुण अधिक होते हैं। परिणामस्वरूप, हल्की वस्तुएँ अपने स्वाभाविक गुण के कारण जठराग्नि को उत्तेजित करती हैं और उन्हें अधिक मात्रा में खाने पर भी कम हानिकारक माना जाता है।

6.-(3) दूसरी ओर , भारी वस्तुएं अपनी भिन्न प्रकृति के कारण स्वभावतः जठर अग्नि को उत्तेजित नहीं करती हैं।

6.-(4) इनका अधिक मात्रा में सेवन बहुत हानिकारक है, जब तक कि कठिन व्यायाम द्वारा जठर अग्नि को न बढ़ाया जाए।

6.-(5) इस प्रकार भोजन की मात्रा जठराग्नि की प्रबलता पर निर्भर करती है।

7. ऐसा नहीं है कि किसी पदार्थ की मात्रा मायने नहीं रखती। मात्रा की दृष्टि से यह निर्धारित है कि भारी पदार्थ पूरी मात्रा का एक तिहाई या आधा ही लेना चाहिए, जबकि हल्की वस्तुएं भी अधिक मात्रा में नहीं लेनी चाहिए तथा जठराग्नि की शक्ति के अनुरूप ही लेनी चाहिए।

संतुलित आहार के गुण

8. संतुलित आहार न केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचाता बल्कि सकारात्मक रूप से व्यक्ति की ताकत, रंग, स्वास्थ्य और जीवन को बढ़ावा देता है।

पेस्ट्री के सामान का माप

यहाँ पुनः श्लोक हैं-

9. अतः भोजन के ऊपर कभी भी भारी चीजें जैसे कि हलवाई की रोटी आदि नहीं खानी चाहिए। भूख लगने पर भी ऐसी चीजें सही मात्रा में खानी चाहिए।

परहेज़ करने योग्य आहार के बारे में जानकारी

10. सूखा मांस, सूखी सब्जियां, कमल के प्रकंद और कमल का डंठल भारी होने के कारण इनका सेवन आदतन नहीं करना चाहिए, न ही किसी दुर्बल पशु का मांस प्रयोग करना चाहिए।

11. जमा हुआ दूध, क्रीम चीज़, सूअर का मांस, गाय और भैंस का मांस, मछली, दही, काले चने और जंगली जौ का सेवन आदतन नहीं करना चाहिए।

आहार के नियमों का पालन करें

12. षष्ठी चावल, शालि चावल, मूंग, सेंधा नमक, जौ, वर्षा का जल, दूध, घी , जंगली पशुओं का मांस और शहद का सेवन नियमित रूप से किया जा सकता है।

स्वच्छता संक्षेप में

13. इसे दैनिक आहार का हिस्सा बनाना चाहिए, जो न केवल वर्तमान स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करता है, बल्कि आने वाली बीमारियों के खिलाफ रोगनिरोधी के रूप में भी काम करता है।

कोलीरियम का उपयोग

14. अब से, स्वस्थ जीवन जीने की कला को ध्यान में रखते हुए, हम व्यक्तिगत दिनचर्या की व्याख्या करेंगे, जिसमें नेत्रों पर नेत्र-मलहम लगाने जैसे अनुष्ठान शामिल हैं, तथा इसके लाभों का भी उल्लेख करेंगे।

15. नेत्रों के लिए लाभदायक एन्टीमनी-कोलियरियम का प्रयोग प्रतिदिन करना चाहिए तथा नेत्रों की जलन दूर करने के लिए आंवले का अर्क प्रत्येक पांचवी या आठवीं रात्रि में एक बार प्रयोग करना चाहिए।

16. आँख प्रकाश तत्व की होती है। इसलिए, इस पर कफ यानि जलीय तत्व का प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना अधिक होती है। इसलिए कफ को ठीक करने वाले उपाय दृष्टि को स्पष्ट रखने में लाभकारी होते हैं।

16½-17½. दिन के समय आँखों पर तेज़ कोलियरियम नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि जल निकासी से कमज़ोर हुई आँखों की दृष्टि धूप के संपर्क में आने पर कमज़ोर हो जाती है। इसलिए, कोलियरियम द्वारा जल निकासी का संकेत केवल रात में दिया जाता है।

18-19½. जैसे तेल, कपड़ा, कुशा आदि से धोने पर अनेक प्रकार के मलिन स्वर्णाभूषण आदि स्वच्छ हो जाते हैं, उसी प्रकार नेत्रों में नेत्र-मलहम, नेत्र-द्रव्य आदि डालने से मनुष्यों की दृष्टि स्वच्छ आकाश में चन्द्रमा के समान चमकने लगती है।

स्मोकिंग बुगी में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं और सिगार तैयार करने की विधि

20-24½. सुगंधित मुरली, सुगंधित चेरी, बड़ी इलायची, सुगंधित पून, शंख, सुगंधित चिपचिपा मैलो, चंदन, दालचीनी का पत्ता , दालचीनी की छाल, इलायची, खसखस ​​घास, हिमालयन चेरी, अदरक घास, मुलेठी, नार्डस। गोंद गुग्गुल [ गुग्गुल ], चील की लकड़ी, चीनी, बरगद, गूलर अंजीर और पवित्र अंजीर के पेड़ों की छाल, और पीली छाल वाले अंजीर के पेड़ और लोध के पेड़ की छाल, रशनट सरजा साल, साल राल, अखरोट घास, लाइकेन, कमल, नीला पानी लिली , पाइन राल, ओलिबानम और एंजेलिका: - इन सभी को चिकित्सक द्वारा पीसकर पेस्ट बनाया जाना चाहिए। फिर इसे ईख के टुकड़े पर चिपकाया जाना चाहिए और जौ के दाने के आकार जैसा सिगार का आकार दिया जाना चाहिए, और अंगूठे की मोटाई और आठ अंगुल की चौड़ाई का होना चाहिए। जब यह सूख जाए, तो बीच की रीड को बाहर निकाल देना चाहिए, और सिगार को धूम्रपान पाइप में डालकर चिकना पदार्थ लगा देना चाहिए। फिर इसे जलाकर आदतन धूम्रपान के तौर पर आराम से धूम्रपान करना चाहिए।

अनक्टुअस सिगार में प्रयुक्त सामग्री

25-25⅛. पशु की चर्बी, घी और मोम से ऐसगर तैयार करके, मधुर समूह की सर्वोत्तम औषधियों के साथ कुशलता से मिलाकर, इसका उपयोग चिकनाईयुक्त धूम्रपान के लिए करना चाहिए।

एराइन-स्मोक में प्रयुक्त वस्तुएँ

26-23½. सफेद मसल शैल लता, स्टाफ प्लांट, पीला आर्सेनिक, लाल आर्सेनिक, ईगल-वुड, दालचीनी पत्ती और अन्य सुगंधित पदार्थों का धुआं, एर्रिन के रूप में कार्य करता है।

धूम्रपान के गुण

27-31½ सिर में भारीपन, सिर दर्द, नासिकाशोथ, अर्धकपाल, कान दर्द, आंख दर्द, खांसी, हिचकी, श्वास कष्ट, गले में ऐंठन, दांतों की कमजोरी, कान, नाक और आंख से रोग के कारण स्राव, नाक और मुंह की दुर्गंध, दांतों का दर्द, भूख न लगना, जबड़े और गर्दन का कड़ा होना, खुजली, कृमि, चेहरे का पीलापन, मुंह से श्लेष्मा स्राव, कर्कश ध्वनि, गलाशुण्डि, अपजीविका , गंजापन, सफेद बाल, बालों का गिरना, स्वरभंग, अत्यधिक सुस्ती, मन की मूर्च्छा और अत्यधिक निद्रा - ये सब धूम्रपान से दूर होते हैं, तथा बालों, सिर की हड्डियों, इन्द्रियों और आवाज की शक्ति बढ़ती है।

32-32½. जो लोग मौखिक धूम्रपान का सहारा लेते हैं, उन्हें तीव्र वात और कफ, या शरीर के सुप्रा क्लैविक्युलर भाग या सिर को प्रभावित करने वाले विकारों से भी परेशानी नहीं होगी ।

धूम्रपान के आठ उचित समय

33-33½. आदतन धूम्रपान के लिए आठ निर्दिष्ट समय निर्धारित किए गए हैं, क्योंकि इन अवधियों के दौरान वात और कफ की वृद्धि देखी जाती है।

34-34½. अर्थात् स्नान करने के बाद, जीभ साफ करने के बाद, छींकने के बाद, दांत साफ करने के बाद, नाक से शौच करने के बाद, नेत्रों में मलहम लगाने के बाद तथा नींद पूरी होने के बाद संयमी पुरुष को धूम्रपान करना चाहिए।

35-35½. इससे शरीर के ऊपरी सुप्राक्लेविकुलर भागों को प्रभावित करने वाले वात और कफ जनित रोग उसे पीड़ित नहीं करते हैं। धूम्रपान तीन बार, हर बार तीन कश में करना चाहिए,

36-36. बुद्धिमान व्यक्ति को दिन में दो बार धूम्रपान करने की आदत डालनी चाहिए। चिकनाई वाला धूम्रपान दिन में एक बार और इरिने वाला धूम्रपान दिन में तीन या चार बार करना चाहिए।

उचित रूप से धूम्रपान करने के संकेत

37-37½. मन, कंठ और इन्द्रियों का शुद्ध होना, सिर का हल्का होना, तथा उत्तेजित द्रव्यों का शमन होना, ये सफल धूम्रपान के लक्षण हैं।

अनुचित धूम्रपान के नुकसान

38-38½. बहरापन, अंधापन, गूंगापन, हीमोथर्मिया और चक्कर आना असामयिक या अत्यधिक धूम्रपान से उत्पन्न होने वाली जटिलताएं हैं।

उनके उपाय

39-40. ऐसी स्थितियों में, घी की औषधि, नाक की दवा और आंखों के लिए लेप तथा मृदु पेय पदार्थ आमतौर पर संकेतित होते हैं। यदि पित्त -उत्तेजना के परिणामस्वरूप वात की उत्तेजना होती है, तो इन्हें चिकनाई वाली दवा के साथ मिलाना चाहिए; और यदि रक्तस्राव होता है, तो ठंडी दवा के साथ; और यदि कफ और पित्त दोनों उत्तेजित होते हैं, तो निर्जलीकरण वाली दवा के साथ।

धूम्रपान के निषेध संकेत और उचित तकनीक

41-44. अब मैं उन व्यक्तियों का वर्णन करूँगा जिन्हें धूम्रपान वर्जित है। निम्नलिखित व्यक्तियों को धूम्रपान नहीं करना चाहिए - जो शुद्धि से गुजरा हो, जिसने एनीमा लिया हो, जो रक्त-ताप से पीड़ित हो, जो विष से पीड़ित हो, जो शोकग्रस्त हो, जो गर्भवती हो, जो थका हुआ हो या नशे में हो, जो कफ या पित्त के विकार से पीड़ित हो और जो रात भर जागता रहा हो, जो बेहोशी, चक्कर, प्यास, क्षीणता और वक्षस्थल के घावों से पीड़ित हो, जिसने अभी-अभी शराब, दूध, चिकनाई, शहद या दही का सेवन किया हो और जो निर्जलीकरण, क्रोध, तालू का सूखापन, बेहोशी, सिर में चोट, शंख, रोहिणी , मूत्र-स्राव की विसंगति और मद्यपान से पीड़ित हो।

45-45½. यदि कोई व्यक्ति इन निषिद्ध परिस्थितियों में अनियंत्रित रूप से धूम्रपान करता है, तो धुएं के गलत उपयोग से उसकी शिकायतें भयंकर रूप से बढ़ जाती हैं।

46-46½. जिस व्यक्ति को धूम्रपान करने की सलाह दी गई है, उसे सिर, नाक और आंख के रोगों में नाक से धूम्रपान करना चाहिए; और गले के रोगों में मुंह से धूम्रपान करना चाहिए।

पाइप बनाने की विधि

47-47½. जब वह नाक से साँस ले तो उसे मुँह से ही साँस छोड़नी चाहिए। मुँह से साँस लेते समय उसे नाक से साँस नहीं छोड़नी चाहिए, क्योंकि विपरीत दिशा में जाने वाला धुआँ आँखों को जल्दी से नुकसान पहुँचा सकता है।

48-48½. आत्मस्थ पुरुष को चाहिए कि वह शरीर और नेत्रों को सीधा रखते हुए, एकाग्रचित्त होकर, सुखपूर्वक बैठकर एक नासिका को बंद करके, दूसरी नासिका से तीन बार धूम्रपान करे।

49-49½. इरिन-स्मोक के लिए धूम्रपान पाइप की लंबाई चौबीस अंगुल की चौड़ाई होनी चाहिए, जिसे व्यक्ति की अपनी अंगुलियों से मापा गया हो; चिकनाई वाले धूम्रपान के लिए यह बत्तीस अंगुल की चौड़ाई होनी चाहिए, और अभ्यस्त धूम्रपान के लिए यह पहले से आधी लंबी होनी चाहिए, अर्थात छत्तीस अंगुल की चौड़ाई।

50-50½. वह धूम्रपान पाइप अनुशंसित है, जो सीधा हो, तीन उभारों से बाधित हो और जिसका समीपस्थ कैलिबर बेर के आकार का हो और जो एनीमा पाइप के समान सामग्री से बना हो।

51-51½. जो धुआँ दूर से आता है और जोड़ों द्वारा बाधित होता है तथा पतली नली से गुजरने पर कम हो जाता है, तथा जिसे मात्रा और समय का उचित ध्यान रखते हुए लिया जाता है, उससे इन्द्रियाँ क्षीण नहीं होतीं।

उचित तरीके से धूम्रपान करने के संकेत

52-52½. जब छाती, गला और सिर हल्का महसूस हो और कफ तरल हो जाए, तो इसे सफल धूम्रपान समझें।

अधपके धूम्रपान के संकेत

53-53½. अगर आवाज साफ न हो और गला कफ से भर जाए और सिर अकड़ जाए तो इसे असफल धूम्रपान समझिए.

अत्यधिक धूम्रपान के संकेत

54-55½. जब तालु, सिर और गला सब जगह सूखकर गरम हो जाए, प्यास लगे, मूर्च्छा हो जाए, बहुत खून बहे, सिर में बहुत चक्कर आए, बेहोशी छाने लगे, इन्द्रियाँ उत्तेजित हो जाएँ, तो समझना चाहिए कि अधिक धूम्रपान किया गया है।

'अनु' तेल के उपयोग का समय

56-56½ प्रत्येक वर्ष, पहली वर्षा, शरद और बसंत ऋतु के दौरान, उस समय का चयन करते हुए, जब आकाश बादलों से मुक्त हो, अनु तेल का एक कोर्स करना चाहिए।

'अणु' तेल के उपयोग के गुण

57-59½. जो व्यक्ति नियमित रूप से नाक से शौच का अभ्यास करता है, उसकी दृष्टि, गंध और श्रवण शक्ति में कोई कमी नहीं आएगी। उसकी दाढ़ी और बाल सफेद या पीले नहीं होंगे; उसके बाल नहीं झड़ेंगे, बल्कि खूब बढ़ेंगे। गर्दन की जकड़न, सिरदर्द, चेहरे का पक्षाघात, त्रिशूल, नासिकाशोथ, अर्धचंद्राकार और सिर का कंपन दूर हो जाएगा।

60-60½. नाक से शौच करने से उसकी खोपड़ी की रक्त वाहिकाएँ, जोड़, स्नायु और कंडराएँ अच्छी तरह पोषित होकर बहुत ताकत प्राप्त कर लेंगी।

61-61½. चेहरा प्रसन्न और भरा हुआ हो जाएगा, आवाज मधुर, दृढ़ और भारी हो जाएगी; सभी ज्ञानेन्द्रियाँ स्पष्ट और बहुत मजबूत हो जाएंगी।

62-62½. शरीर के ऊपरी सुप्रा-क्लैविक्युलर भागों में रोग का अचानक आक्रमण नहीं होगा, और यद्यपि व्यक्ति बूढ़ा हो रहा है, लेकिन बुढ़ापे के प्रभाव मंद हो जाएंगे।

'अणु' तेल तैयार करने की विधि

63-65½. चंदन की लकड़ी, चील की लकड़ी, दालचीनी का पत्ता, भारतीय बेरबेरी की छाल, मुलेठी, हृदय-पत्ती वाली सीडा , कमल के प्रकंद, छोटी इलायची, एम्बेलिया, बेल, नीली लिली, सुगंधित चिपचिपा मैलो, कस्कस-घास, रशनट, दालचीनी की छाल, अखरोट-घास, भारतीय सरसापैरिला, टिक्ट्रेफोइल, कॉर्क निगल वॉर्ट, चित्रित पत्ती वाला यूरिया, देवदार, चढ़ाई वाला शतावरी, सुगंधित पिपर, भारतीय नाइट शेड, पीले बेरी वाले नाइट-शेड भारतीय ग्राउंडसेल और कमल के तंतु: इन सभी को साफ बारिश के पानी में उबालना चाहिए जो कि तैयार किए जाने वाले अनु तेल की मात्रा का सौ गुना होना चाहिए।

66-66½. जब काढ़ा उबलकर तेल की मात्रा से दस गुना रह जाए तो उसे आग से उतार लेना चाहिए. इस काढ़े का दसवां हिस्सा लेकर बराबर मात्रा में तेल मिलाकर तब तक उबालें जब तक कि केवल तेल ही शेष न रह जाए.

67-67½. इसी तेल का इस्तेमाल करते हुए इस प्रक्रिया को दस बार दोहराएँ. दसवीं बार उबाल आने पर, बराबर मात्रा में बकरी का दूध मिलाएँ. नाक से शौच के लिए अनु तेल तैयार करने की यह स्वीकृत विधि है.

68-69. इस तेल का प्रयोग दो तोले की मात्रा में करना चाहिए । सिर पर तेल लगाने और उसका भाप लेने के बाद नाक में रूई की सहायता से तेल डालकर नाक से शौच करना चाहिए । ऐसा हर दूसरे दिन तीन बार और ऐसे सात दिनों तक करना चाहिए।

69½-70½. रोगी को गर्म और हवा रहित स्थान पर रहना चाहिए, पौष्टिक भोजन करना चाहिए और संयमित रहना चाहिए। यह तेल त्रिदोषनाशक और इन्द्रियों को बल देने वाला है। जो व्यक्ति इसका सही समय पर प्रयोग करता है, उसे नाक से शौच के वे सभी लाभ प्राप्त होते हैं, जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है।

दांत साफ करने की विधि और उसके गुण

71-71½. एक हरी दंत-टहनी जो समीपस्थ सिरे पर कुचली हुई हो और कसैली, तीखी या कड़वी स्वाद वाली हो, उसे मसूड़ों को चोट पहुंचाए बिना दिन में दो बार इस्तेमाल करना चाहिए।

72-72½. दांत साफ करने से मुंह की दुर्गंध और अपच दूर होती है, जीभ, दांत और मुंह की अशुद्धियां दूर होती हैं और भूख तुरंत लगती है।

वे पौधे जिनसे टूथब्रश बनाया जा सकता है

73-73½. भारतीय बीच, भारतीय ओलियंडर, मुदर, अरेबियन चमेली , अर्जुन, स्पाइनस किनो वृक्ष और ऐसे अन्य वृक्षों से तोड़ी गई टहनियों को दांतों की सफाई में उपयोग के लिए अनुशंसित किया जाता है।

जीभ खुरचने वाला

74-74½. जीभ खुरचनी बिना किसी तेज धार वाली, घुमावदार और सोने, चांदी, तांबे, टिन या पीतल से बनी होनी चाहिए।

जीभ खुरचने के गुण

75-75½. जीभ की जड़ पर जमने वाली परत जो सांस के रास्ते को रोकती है, वह फ़ेटर ओरिस का कारण बनती है। इसलिए जीभ को ठीक से खुरचना चाहिए।

मुँह साफ करने के लिए उपयोग की जाने वाली वस्तुएँ

76-77 श्वास की शुद्धता, स्वाद और सुगंध की इच्छा रखने वाले को जायफल, कस्तूरी, सुपारी, लौंग, कालीमिर्च, ताजा पान, कपूर और छोटी इलायची मुंह में रखनी चाहिए।

तेल से गरारे करने के फायदे

77½-80 तेल से गरारे करने से जबड़े और आवाज मजबूत होती है, चेहरा सुंदर बनता है, तालू में कोमलता आती है और भूख भी अच्छी लगती है। इन गरारे करने से गले में सूखापन नहीं आता और न ही होठों के फटने का डर रहता है। दांत मजबूत होते हैं और दर्द नहीं होता और एसिडिटी से दांत खराब नहीं होते, बल्कि सख्त से सख्त खाने को भी चबाया जा सकता है।

सिर पर तेल लगाने के लाभ

80½-83. जो व्यक्ति प्रतिदिन अपने सिर की अच्छी तरह से मालिश करता है, उसे सिर दर्द, गंजापन और सफेद बाल नहीं होते और न ही उसके बाल झड़ते हैं। उसकी खोपड़ी की हड्डियों की ताकत बहुत बढ़ जाती है और उसके बाल मजबूती से जड़ पकड़ लेते हैं, लहराते हैं और बहुत काले हो जाते हैं। सिर पर तेल लगाने से इंद्रियाँ पुष्ट होती हैं और चेहरे की त्वचा सुंदर बनती है, व्यक्ति को अच्छी नींद आती है और वह प्रसन्न रहता है।

कान में तेल भरने के लाभ

83½-84. प्रतिदिन कान में तेल भरने से वातजन्य कान के रोग नहीं होते, गर्दन या जबड़े में अकड़न नहीं होती, सुनने में कठिनाई नहीं होती और बहरापन भी नहीं होता।

शरीर-आधान के गुण

84½-86. जैसे घड़े को तेल लगाकर, चमड़े को तेल में भिगोकर, धुरी को चिकना करके शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार प्रतिदिन अभिषेक करने से शरीर दृढ़ होता है, त्वचा सुन्दर होती है, वात-दोष शान्त होता है, कष्ट और शारीरिक परिश्रम के प्रति सहनशीलता आती है।

87. स्पर्श की इंद्रिय में वात प्रमुख तत्व है; और स्पर्श की इंद्रिय त्वचा में रहती है। वात सबसे बड़ा त्वचीय टॉनिक है; इसलिए, एक व्यक्ति को इसका प्रतिदिन अभ्यास करना चाहिए।

88. किसी व्यक्ति के दैनिक मालिश के आदी अंग, बाहरी आघात या हिंसक परिश्रम के कारण चोट लगने से गंभीर रूप से प्रभावित नहीं होते हैं।

89. प्रतिदिन स्नान करने से मनुष्य के अंग चिकने, पुष्ट, बलवान, सुन्दर बनते हैं तथा उम्र के प्रभाव से मुक्ति मिलती है।

पेडल इंजेक्शन के फायदे

90. पैरों का खुरदुरापन, अकड़न, सूखापन, थकान और सुन्नपन पैडल इंडक्शन से जल्द ही दूर हो जाता है।

91. इससे सुन्दरता, बल, पैरों की दृढ़ता और नेत्रों की चमक प्राप्त होती है, तथा वात-विकार शांत होता है।

92. यह वात के कारण होने वाले साइटिका, पैरों में दरारें और पैरों की वाहिकाओं और मांसपेशियों के निष्कर्षण को भी रोकता है।

मालिश के लाभ

93. शरीर की मालिश करने से शरीर की दुर्गन्ध, भारीपन, सुस्ती, खुजली, गंदगी, भूख न लगना और बदबूदार पसीना दूर होता है।

स्नान के गुण

94. स्नान करने से शरीर शुद्ध होता है, पुरुषत्व और आयु बढ़ती है, थकान, पसीना और मैल दूर होता है, शरीर में शक्ति बढ़ती है और यह अत्यंत स्फूर्तिदायक है।

स्वच्छ कपड़ों के लाभ

95. स्वच्छ वस्त्र पहनना शोभायमान, कीर्तिवर्धक, दीर्घायुवर्धक, दुर्भाग्य दूर करने वाला, प्रसन्नतादायक, शोभादायक, समाज में सम्मान देने वाला तथा प्रशंसनीय है।

इत्र और फूलों की माला के उपयोग के लाभ

96. सुगंधित वस्तुओं और मालाओं का प्रयोग पुरुषत्व बढ़ाने वाला, सुगंध फैलाने वाला, दीर्घायु बढ़ाने वाला, आकर्षक, पुष्टता और बल देने वाला, प्रसन्नता बढ़ाने वाला और दुर्भाग्य को दूर करने वाला होता है।

आभूषण और आभूषण पहनने के गुण

97. रत्न और आभूषण पहनने से समृद्धि आती है और यह शुभ, दीर्घायु को बढ़ाने वाला, सजावटी, चिंताओं को दूर करने वाला, उत्साहवर्धक, आकर्षक और शक्तिवर्धक होता है।

पैर साफ करने के गुण

98. पैरों और मल-मूत्र को बार-बार धोने से बुद्धि बढ़ती है, शरीर शुद्ध होता है, आयु बढ़ती है, दुर्भाग्य और पाप नष्ट होते हैं।

बालों को सजाने के गुण

99. बाल, दाढ़ी, नाखून आदि को साफ-सुथरा रखना, मोटापन, पौरुष, दीर्घायु बढ़ाने वाला, स्वच्छ रहने वाला तथा सुन्दरता बढ़ाने वाला होता है।

जूते पहनने के गुण

100. जूते पहनना आंखों के लिए स्वास्थ्यवर्धक, चलने में सुखद, पैरों की तकलीफ दूर करने वाला, शक्तिवर्धक, चलने में सहज और पुरुषार्थ को बढ़ाने वाला होता है।

छाता थामने के गुण

101. छाता धारण करने से विपत्ति टलती है, शक्ति बढ़ती है, सुरक्षा, आच्छादन और आराम मिलता है तथा यह धूप, हवा, धूल और वर्षा से रक्षा करता है।

लाठी पकड़ने के गुण

102. लाठी को धारण करने से ठोकर लगने से बचाव होता है, शत्रुओं का नाश होता है, तथा यह दीर्घायु प्रदान करने वाली तथा भय दूर करने वाली होती है।

103 जैसे नगर का स्वामी अपने नगर के कार्यों में तथा सारथी अपने रथ की देखभाल में सदैव सतर्क रहता है, वैसे ही बुद्धिमान पुरुष को अपने शरीर की देखभाल में सदैव सतर्क रहना चाहिए।

यहाँ पुनः एक श्लोक है:—

104. मनुष्य को ऐसे जीविका-साधनों का प्रयोग करना चाहिए जो धर्म के विरुद्ध न हों, तथा शांति और अध्ययन में लीन रहना चाहिए। इस प्रकार रहने से मनुष्य को सुख की प्राप्ति होती है।

सारांश

पुनरावर्तनीय छंद यहां दिए गए हैं:—

105. खाद्य पदार्थों में माप का प्रश्न; खाद्य पदार्थ; भारी और हल्की वस्तुओं के संदर्भ में माप का निर्धारण, जिनका अभ्यस्त उपयोग अनुशंसित है;

106. नेत्र-मलहम, सिगार, सिगार की तीन किस्में, धूम्रपान से होने वाले लाभ, धूम्रपान के समय और इसके अलग-अलग रूप;

107. धूम्रपान की जटिलताओं के लक्षण और उनके उपचार; वे व्यक्ति जिनमें धूम्रपान वर्जित है; धूम्रपान की विधि, वह सामग्री जिससे धूम्रपान पाइप बनाया जाना चाहिए, धूम्रपान की प्रत्येक किस्म में उसका आकार और आकृति;

108. नासिका औषधियों के लाभ; उनकी विधि, किस प्रकार का नासिका शौच, कैसे और कब करना चाहिए; दांत साफ करने वाली टहनी का उपयोग कैसे करना चाहिए; विभिन्न प्रकार की दांत साफ करने वाली टहनियों के विभिन्न गुण;

109. कौन सी वस्तुएँ मुँह में रखनी चाहिए और क्यों; तेल से कुल्ला करने के क्या लाभ हैं तथा सिर पर तेल लगाने से क्या लाभ बताए गए हैं;

110. कानों में तेल डालना, अभिषेक करना, पैरों का अभिषेक करना, शरीर की मालिश करना, स्नान करना, स्वच्छ वस्त्र, इत्र और आभूषण पहनना;

111. वज़ू करना, बाल काटना और संवारना, जूते पहनना, छाता और लाठी ले जाना: - यह सब, इस अध्याय में "बेटिंग में माप" में वर्णित किया गया है।

5. इस प्रकार अग्निवेश द्वारा संकलित और चरक द्वारा संशोधित ग्रंथ के सामान्य सिद्धांत अनुभाग में , “खाने में माप (मात्राशितिया या मातृशिता- मातृशितिया या मातृशिता )” नामक पांचवां अध्याय पूरा हुआ।



चतुर्थोऽध्यायः - षड्विरेचनाशताशितीय अध्याय (५० महाकषाय विज्ञान चरकसंहिता खण्ड 1 अध्याय 6 हिन्दी व्याख्या

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