अध्याय I, खंड I, अधिकरण III

 


अध्याय I, खंड I, अधिकरण III

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अधिकरण सारांश: ब्रह्म केवल शास्त्रों के माध्यम से ही पहचाना जा सकता है

ब्रह्म-सूत्र 1.1.3:।

शास्त्रयोनित्वत् ॥ 3 ॥

शास्त्रयोनित्वात् - शास्त्र सम्यक ज्ञान का साधन है।

3. शास्त्र ही सम्यक ज्ञान के साधन हैं ( ब्रह्म के सम्बन्ध में, सूत्र 2 में रखी गई बात पुष्ट होती है)।

यह सूत्र सूत्र 2 में व्यक्त विचार को अधिक स्पष्ट करता है। यदि इस बात में कोई संदेह रह गया हो कि ब्रह्म ही सृष्टि का मूल आदि है, तो यह सूत्र सूत्र 2 में व्यक्त विचार को अधिक स्पष्ट करता है।यह जगत् शास्त्र के प्रमाण से स्थापित है, अनुमान आदि से नहीं। इससे स्वतंत्र होकर भी यह सूत्र स्पष्ट करता है कि केवल श्रुति ही ब्रह्म के विषय में प्रमाण है।

आपत्ति: ब्रह्म एक घड़े के समान पहले से ही विद्यमान वस्तु है, अतः उसे शास्त्रों से स्वतंत्र रूप से सम्यक् ज्ञान के अन्य साधनों द्वारा जाना जा सकता है।

उत्तर: ब्रह्म का कोई रूप आदि नहीं है, इसलिए उसे प्रत्यक्ष अनुभूति से नहीं जाना जा सकता। फिर अविभाज्य लक्षणों के अभाव में, जैसे धुआं अग्नि का है, उसे अनुमान या सादृश्य ( उपमान ) से स्थापित नहीं किया जा सकता। इसलिए, उसे केवल शास्त्रों के माध्यम से ही जाना जा सकता है। शास्त्र स्वयं कहते हैं, "जो शास्त्रों से अनभिज्ञ है, वह उस ब्रह्म को नहीं जान सकता"। इसमें कोई संदेह नहीं है, जैसा कि पिछले सूत्र में पहले ही उल्लेख किया गया है, सही ज्ञान के इन साधनों का भी एक दायरा है, लेकिन यह केवल तब है जब ब्रह्म को शास्त्रों द्वारा स्थापित किया जाता है - उनके पूरक के रूप में और उनसे स्वतंत्र नहीं।


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