अध्याय III, खंड III, अधिकरण IX
अधिकरण सारांश: प्राण विद्या में कुल्ला करने का आदेश नहीं है, अपितु जल को प्राण का वस्त्र समझना ही अधिकरण है।
ब्रह्म-सूत्र 3.3.18:
कार्याख्यानादपूर्वम् ॥ आठ ॥
कार्याख्यानात् - किसी कार्य का पुनः कथन होने के कारण (जो स्मृति द्वारा पहले ही आदेशित है ); अपूर्वम् - जो अन्यत्र आदेशित नहीं है।
18. ( प्राण विद्या में वर्णित जल से मुख को धोना) एक कार्य का पुनः कथन होने के कारण (जो स्मृति द्वारा पहले ही आदेशित है), जो अन्यत्र आदेशित नहीं है (वह यहां श्रुति द्वारा आदेशित है )।
छांदोग्य 5. 2. 2. और बृहदारण्यक 6. 1. 14 में हम भोजन से पहले और बाद में मुंह को पानी से धोने का संदर्भ पाते हैं, यह सोचकर कि ऐसा करने से प्राण का वस्त्र धारण होता है। सवाल यह है कि क्या श्रुति दोनों का आदेश देती है या केवल बाद वाले का। सूत्र में कहा गया है कि चूंकि पहला, यानी कुल्ला करने का कार्य, स्मृति द्वारा पहले से ही सभी को आदेशित किया गया है, इसलिए पानी को प्राण का वस्त्र मानने का दूसरा कार्य ही श्रुति द्वारा आदेशित किया गया है।
100 Questions based on Rigveda Samhita
0 टिप्पणियाँ