अध्याय III, खंड III, अधिकरण XIX

 


अध्याय III, खंड III, अधिकरण XIX

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सारांश : सिद्ध आत्माएं किसी दिव्य मिशन की पूर्ति के लिए पुनर्जन्म ले सकती हैं

ब्रह्म-सूत्र 3.3.32: 

यावदधिकर्मवस्थितिराधिकारिकाणाम् ॥ 32 ॥

यावत्-अधिकारम् - जब तक कार्य पूरा नहीं होता; अवस्थितिः - (भौतिक) अस्तित्व है; अधिकारिकाणाम् - जिनका कार्य पूरा करना है।

32. जिन लोगों को कोई कार्य पूरा करना है, उनका भौतिक अस्तित्व तब तक है जब तक वह कार्य पूरा नहीं हो जाता।

ऋषि अपान्तरतम ने व्यास के रूप में पुनः जन्म लिया । सनत्कुमार ने स्कंद के रूप में जन्म लिया । इसी प्रकार वसिष्ठ और नारद जैसे अन्य ऋषियों ने भी पुनः जन्म लिया। अब इन ऋषियों ने ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया था , फिर भी उन्हें पुनर्जन्म लेना पड़ा। यदि ऐसा है, तो ऐसे ब्रह्मज्ञान की क्या उपयोगिता है? - विरोधी कहते हैं। यह सूत्र इसका खंडन करता है और कहता है कि सामान्यतः ज्ञान प्राप्त करने के बाद व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता। लेकिन जिन लोगों को कोई दिव्य उद्देश्य पूरा करना होता है, उनका मामला अलग होता है। उन सिद्ध ऋषियों का एक या अधिक जन्म होता है, जब तक उनका उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता, उसके बाद उनका दोबारा जन्म नहीं होता। लेकिन तब वे कभी अज्ञान के प्रभाव में नहीं आते, यद्यपि उनका पुनर्जन्म हो सकता है। उनका मामला जीवन्मुक्त के समान है, जो ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी प्रारब्ध कर्म रहने तक अपना भौतिक अस्तित्व जारी रखता है । इन लोगों का दिव्य उद्देश्य प्रारब्ध कर्म के समतुल्य है ।


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