ब्रह्माण्ड में मानव का वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और वेदांत विश्लेषण। राग‑द्वेष, कर्म और चेतना का आधुनिक विज्ञान और उपनिषदों के दृष्टिकोण से विवेचन।
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और संरचना मानव जीवन की समझ के लिए महत्वपूर्ण है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार ब्रह्माण्ड का आरंभ Big Bang से हुआ, जिसमें ऊर्जा और पदार्थ का प्रारंभिक विस्फोट हुआ। विज्ञान कहता है कि सभी पदार्थ और ऊर्जा एक मूल स्रोत से उत्पन्न हुए हैं और लगातार बदलते रहते हैं।
भारतीय वेद और उपनिषद भी ब्रह्माण्ड के आद्य स्रोत “ब्रह्म” के अस्तित्व की बात करते हैं। यजुर्वेद और ऋग्वेद में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और जीवन के मूल तत्वों का वर्णन मिलता है। उपनिषदों में बताया गया है कि “सृष्टि का आधार चेतना और ऊर्जा है”, जो आधुनिक विज्ञान के quantum field और ऊर्जा सिद्धांत से समानांतर है।
मनुष्य को ब्रह्माण्ड की संरचना का एक सूक्ष्म अंश माना गया है। मानव और ब्रह्माण्ड के बीच microcosm-macrocosm का संबंध स्थापित किया गया है। यह विचार वैज्ञानिक दृष्टि से भी सही प्रतीत होता है क्योंकि मानव शरीर में उपस्थित ऊर्जा और पदार्थ ब्रह्माण्डीय नियमों के अनुसार कार्य करते हैं।
इस पोस्ट में हम मानव चेतना, कर्म, राग‑द्वेष और सुख-दुःख का वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और वेदांत आधारित विश्लेषण प्रस्तुत करेंगे।
मानव शरीर जैविक दृष्टि से अत्यंत जटिल है। मस्तिष्क में cerebral cortex, limbic system और brainstem जैसे प्रमुख हिस्से हैं, जो सोचने, भावनाएँ उत्पन्न करने और शरीर की क्रियाओं को नियंत्रित करने का कार्य करते हैं।
चेतना (Consciousness) का अध्ययन Neuroscience में सबसे चुनौतीपूर्ण माना गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से चेतना का अर्थ है brain states + neuronal interactions, जबकि उपनिषद और वेद कहते हैं कि चेतना का मूल स्वरूप आत्मा है, जो स्थायी और अजेय है।
उपनिषदों में चेतना का स्वरूप ब्रह्म‑चेतना कहा गया है। यह विचार आधुनिक quantum theory के observer effect और consciousness studies से मेल खाता है। जैसे observer effect में कहा गया है कि ब्रह्माण्ड की वास्तविकता observer (चेतना) पर निर्भर करती है।
मानव चेतना और ब्रह्मांडीय चेतना के बीच यह वैज्ञानिक और वैदिक correlation मनुष्य की कर्म, ज्ञान और मोक्ष की दिशा निर्धारित करता है।
मनुष्य के अनुभवों का केंद्र मन है। आधुनिक neuroscience में कहा गया है कि amygdala और limbic system भावनाओं, सुख और दुःख को उत्पन्न करते हैं।
ये भावनाएँ कर्म और निर्णयों को प्रभावित करती हैं। वेद और उपनिषद कहते हैं कि जब मन राग‑द्वेष से मुक्त होता है, तो व्यक्ति निष्काम कर्म में लीन हो जाता है। यह वैज्ञानिक दृष्टि से उस अवस्था के समान है, जब brain की prefrontal cortex activity संतुलित होती है, और व्यक्ति stress-free होता है।
कर्म और मनोविज्ञान का संबंध इस प्रकार है कि मनुष्य के मानसिक state के अनुसार ही उसके actions उत्पन्न होते हैं।
कर्म का अर्थ केवल शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि cause-effect relation है। Neuroscience में कहा गया है कि हर action neural pathways को सक्रिय करता है और मानसिक state पर प्रभाव डालता है।
निष्काम कर्म: कर्म फल की इच्छा से रहित।
सकाम कर्म: फल की आशा से किया गया कर्म।
इस प्रकार, कर्म और neuroscience, psychology और Vedanta के सिद्धांत आपस में मेल खाते हैं।
Pleasure-Pain System: Dopamine, serotonin, endorphins
Mind-body connection: मानसिक स्थिति शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
Vedic correlation:
इसलिए, सुख और दुःख का वैज्ञानिक आधार और Vedantic दृष्टि दोनों आपस में मेल खाते हैं।
Quantum Physics vs Upanishadic Brahman:
“Tat Tvam Asi” – You are That
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