कणाद - वैशेषिक दर्शन 3.1
कणाद - वैशेषिक दर्शन 3.1 (14 सूत्र)
प्रसिद्धा इन्द्रियार्थाः
अर्थ : जो इन्द्रिय और अर्थों के लिए प्रसिद्ध हैं, वही वस्तुएँ ज्ञात होती हैं।
इन्द्रियार्थप्रसिद्धिरिन्द्रियार्थेभ्योऽर्थान्तरत्वे हेतुः
अर्थ : किसी वस्तु का ज्ञात होना इसलिए है क्योंकि वह इन्द्रिय और उसके अर्थ से संबंधित अन्य वस्तुओं से भिन्न है।
सोऽनपदेशः
अर्थ : वह किसी निर्दिष्ट आदेश या नियम से नहीं आता।
कारणाज्ञानात्
अर्थ : ज्ञात होने में अज्ञान कारण बनता है।
कार्याज्ञानात्
अर्थ : किसी कार्य के न जाने से अज्ञान उत्पन्न होता है।
अज्ञानाच्च
अर्थ : अज्ञान के कारण ही ज्ञान की कमी होती है।
अन्य एव हेतुरित्यनपदेशः
अर्थ : अन्य ही कारण है और इसे निर्दिष्ट आदेश के रूप में नहीं लिया जाता।
संयोगि समवाय्येकार्थसमवायि विरोधि च...
अर्थ : वस्तुओं और गुणों के संबंध, कार्य और कारण, विरोध और भूत आदि के भेद को समझना।
प्रसिद्धपूर्वकत्वादपदेशस्य
अर्थ : पहले से ज्ञात होने के कारण कोई आदेश स्पष्ट होता है।
अप्रसिद्धोऽनपदेशः
अर्थ : यदि कोई वस्तु पहले से ज्ञात न हो, तो उसका आदेश भी अप्रसिद्ध होता है।
असन्सन्दिग्धश्चानपदेशः
अर्थ : बिना संशय के ज्ञात आदेश या निर्दिष्ट वस्तु।
विषाणी तस्मादश्वो विषाणी तस्माद्गौरिति च
अर्थ : विशिष्ट उदाहरणों द्वारा वस्तु की पहचान।
आत्मेन्द्रियमनोऽर्थसन्निकर्षाद्यन्निष्पद्यते तदन्यत्
अर्थ : इन्द्रिय और मन के मिलन से किसी वस्तु का ज्ञान होता है, अन्यथा नहीं।
प्रवृत्तिनिवृत्ती च प्रत्यगात्मनि दृष्टे परत्र लिङ्गम्
अर्थ : क्रिया और निष्क्रिया का ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से आत्मा में और अन्यत्र लक्षणों से होता है।
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