कणाद - वैशेषिक दर्शन 5.1
कणाद - वैशेषिक दर्शन 5.1 (18 सूत्र)
आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्यां हस्ते कर्म
अर्थ : हस्त में कर्म करने के लिए आत्म-संयोग और प्रयत्न आवश्यक हैं।
तथा मुसलकर्म हस्तसंयोगाच्च
अर्थ : मुसल के कर्म में भी हस्त-संयोग आवश्यक है।
अभिघातजे मुसलकर्मणि व्यतिरेकादकारणं हस्तसंयोगः
अर्थ : मुसल के अभिघात कर्म में हस्त-संयोग का कारण व्यतिरेक है।
तथात्मसंयोगो हस्तमुसलकर्मणि
अर्थ : हस्त-मुसल कर्म में तदात्म संयोग भी शामिल है।
मुसलाभिघातात्तु मुसलसंयोगाद्धस्ते कर्म
अर्थ : मुसल के अभिघात से हस्त के कर्म में मुसल-संयोग भी आता है।
तथात्मकर्म हस्तसंयोगाच्च
अर्थ : तदात्मकर्म भी हस्त-संयोग से होता है।
संयोगाभावे गुरुत्वात्पतनम्
अर्थ : यदि संयोग न हो तो गुरुत्व के कारण पतन होता है।
नोदनविशेषाभावाद्नोर्ध्वं न तिर्यग्गमनम्
अर्थ : नोदन (ऊर्ध्व या तिर्यक गमन) के विशेष न होने पर वह संभव नहीं है।
प्रयत्नविशेषान्नोदनविशेषः
अर्थ : प्रयत्न के विशेष न होने पर नोदन संभव नहीं है।
नोदनविशेषादुदसनविशेषः
अर्थ : नोदन के विशेष से उदसन के विशेष की पहचान होती है।
हस्तकर्मणा दारककर्म व्याख्यातम्
अर्थ : हस्तकर्म से दारक (दैनिक) कर्म व्याख्यायित होते हैं।
तथा दग्धस्य विस्फोटनम्
अर्थ : दग्ध होने पर विस्फोटन कर्म होता है।
प्रयत्नाभावे गुरुत्वात्सुप्तस्य पतनम्
अर्थ : प्रयत्न न होने पर गुरुत्व के कारण सोए हुए का पतन होता है।
तृणकर्म वायुसंयोगात्
अर्थ : तृणकर्म वायु के संयोग से होता है।
मणिगमनं सूच्यभिसर्पणं इत्यदृष्टकारितानि
अर्थ : मणि का आना और सूच्य का सरपण दृष्टि से किया जाता है।
इषावयुगपत्संयोगविशेषाः कर्मान्यत्वे हेतुः
अर्थ : ईषु और आयुध के संयोग से कर्म के अन्यत्व का कारण होता है।
नोदनादाद्यं इषोः कर्म कर्मकारिताच्च संस्कारादुत्तरं तथोत्तरं उत्तरं च
अर्थ : नोदन आदि से ईषु कर्म का करण और संस्कार के कारण उत्तर कर्म होता है।
संस्काराभावे गुरुत्वात्पतनम्
अर्थ : संस्कार के अभाव में गुरुत्व के कारण पतन होता है।
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