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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

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AtharvaVeda kand 3 Sukta 27

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प्राची दिक् = पूर्व दिशा अग्निः = अग्नि देव अधिपतिः = अधिपति (स्वामी) असितः = काला / गम्भीर स्वरूप रक्षिताः = रक्षक आदित्याः = आदित्य देवगण इषवः = बाण तेभ्यः = उन सबको नमः = नमस्कार अधिपतिभ्यः = अधिपतियों को रक्षितृभ्यः = रक्षकों को इषुभ्यः = बाणों को एभ्यः = इन सबको अस्तु = हो यः = जो अस्मान् = हमसे द्वेष्टि = द्वेष करता है यं = जिसे वयम् = हम द्विष्मः = द्वेष करते हैं तम् = उसे वः = तुम्हारे जम्भे = जबड़े / संहारशक्ति में दध्मः = डालते हैं / समर्पित करते हैं

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र पूर्व दिशा की अधिष्ठात्री शक्तियों का आह्वान करता है। “प्राची दिक्” अर्थात पूर्व दिशा—जो सूर्य के उदय की दिशा है। यह दिशा आरम्भ, प्रकाश, जागरण और नवजीवन का प्रतीक है। इस दिशा के अधिपति “अग्नि” बताए गए हैं। अग्नि केवल भौतिक अग्नि नहीं, बल्कि चेतना की अग्नि, यज्ञ की अग्नि और ज्ञान की ज्वाला है। अग्नि देवताओं और मनुष्यों के बीच सेतु माने जाते हैं। अतः पूर्व दिशा में अग्नि का अधिपति होना अत्यंत सार्थक है। “असितो रक्षिताः आदित्या इषवः”—यहाँ आदित्य देवताओं को रक्षक और उनके अस्त्रों को बाण कहा गया है। आदित्य सामान्यतः सूर्य के बारह रूपों के रूप में माने जाते हैं, जो धर्म, सत्य और ऋत (कॉस्मिक ऑर्डर) की रक्षा करते हैं। मन्त्र में बार-बार “नमः” का उच्चारण है—अधिपतियों को नमस्कार, रक्षकों को नमस्कार, बाणों को नमस्कार। यह दर्शाता है कि साधक केवल देवता को ही नहीं, बल्कि उनकी शक्ति, उनकी व्यवस्था और उनके संरक्षण के साधनों को भी प्रणाम करता है। अंतिम पंक्ति अत्यंत अर्थपूर्ण है— “योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः तं वो जम्भे दध्मः।” अर्थात जो हमसे द्वेष करता है, या जिसे हम द्वेष करते हैं, उसे हम आपकी ‘जम्भ’ (संहारशक्ति) में सौंपते हैं। यहाँ गूढ़ अर्थ यह है कि साधक प्रतिशोध नहीं चाहता, बल्कि अपने और दूसरों के बीच के द्वेष को दैवी न्याय के हवाले करता है। वह स्वयं हिंसा नहीं करता, बल्कि दैवी व्यवस्था पर विश्वास रखता है। दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र प्रकाश और धर्म की ओर समर्पण का प्रतीक है। पूर्व दिशा ज्ञान का उदय है; अग्नि विवेक का प्रतीक है; आदित्य धर्म के रक्षक हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से “द्वेष” आंतरिक शत्रु है। जब हम द्वेष को दैवी चेतना में समर्पित करते हैं, तो वह शुद्ध हो जाता है। अग्नि उसे जला देती है। आध्यात्मिक रूप से यह मन्त्र कहता है कि जो भी नकारात्मक भाव—क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या—हमें पीड़ित करते हैं, उन्हें दैवी अग्नि में अर्पित कर देना चाहिए। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: प्रकाश और विवेक ही सच्चे रक्षक हैं।
  • विज्ञान: नकारात्मक भावों को दमन नहीं, रूपांतरण की आवश्यकता है।
  • ब्रह्मज्ञान: जब सब कुछ दैवी व्यवस्था को समर्पित होता है, तब मन शुद्ध और मुक्त होता है।

English Explanation

This mantra invokes the eastern direction, ruled by Agni. The Adityas are described as protectors and their arrows as instruments of divine order. The repeated salutations express surrender to divine authority and protection. The final line symbolically offers all hatred into the jaws of divine justice. Spiritually, it teaches that instead of nurturing hatred, one should surrender negativity into the transforming fire of divine consciousness. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Light and awareness protect us.
  • Science: Negative emotions must be transformed, not suppressed.
  • Brahma-Gyan: Surrendering to divine order purifies the soul.

Word by Word

दक्षिणा दिक् = दक्षिण दिशा इन्द्रः = इन्द्र देव अधिपतिः = अधिपति, स्वामी तिरश्चिराजी = व्यापक तेज वाला / सर्वत्र विचरने वाला रक्षिताः = रक्षक पितरः = पितृगण (पूर्वज) इषवः = बाण तेभ्यः = उन सबको नमः = नमस्कार अधिपतिभ्यः = अधिपतियों को रक्षितृभ्यः = रक्षकों को इषुभ्यः = बाणों को एभ्यः = इन सबको अस्तु = हो यः = जो अस्मान् = हमसे द्वेष्टि = द्वेष करता है यं = जिसे वयम् = हम द्विष्मः = द्वेष करते हैं तम् = उसे वः = तुम्हारे जम्भे = संहारशक्ति / दैवी नियंत्रण में दध्मः = सौंपते हैं

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र दक्षिण दिशा की अधिष्ठात्री शक्तियों का आह्वान करता है। दक्षिण दिशा वैदिक परंपरा में कर्म, उत्तरदायित्व और पितृलोक से जुड़ी मानी जाती है। यहाँ दक्षिण दिशा के अधिपति “इन्द्र” बताए गए हैं। इन्द्र शक्ति, साहस और दैवी पराक्रम के प्रतीक हैं। वे दानव-विनाशक और देवताओं के नेता हैं। अतः दक्षिण दिशा में उनका अधिपति होना कर्मशक्ति और रक्षण का संकेत देता है। “तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः”—यहाँ पितृगण (पूर्वज) रक्षक माने गए हैं और वे ही बाण हैं। यह अत्यंत गहन भाव है। पितृ हमारे संस्कार, परंपरा और नैतिक आधार के प्रतीक हैं। वे अदृश्य रूप से हमारी रक्षा करते हैं—अपने दिए हुए मूल्यों और संस्कारों के माध्यम से। मन्त्र में पुनः नमस्कार की आवृत्ति है—अधिपति को, रक्षक को, और उनके अस्त्रों को। यह सम्पूर्ण व्यवस्था के प्रति श्रद्धा प्रकट करता है। अंतिम पंक्ति—“योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः तं वो जम्भे दध्मः”—यहाँ भी वही भाव है कि जो द्वेष उत्पन्न हो, उसे दैवी शक्ति को समर्पित कर दिया जाए। दार्शनिक रूप से यह मन्त्र बताता है कि हमारे जीवन की दिशा केवल वर्तमान से नहीं, बल्कि पूर्वजों की परंपरा से भी निर्धारित होती है। पितृ केवल जैविक पूर्वज नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो व्यक्ति का चरित्र उसके पारिवारिक संस्कारों से निर्मित होता है। ये संस्कार ही संकट में उसकी रक्षा करते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से दक्षिण दिशा पितृलोक का प्रतीक है—जहाँ से आशीर्वाद और मार्गदर्शन प्राप्त होता है। इन्द्र का अधिपति होना दर्शाता है कि शक्ति और साहस के साथ ही परंपरा का सम्मान आवश्यक है। इस प्रकार यह मन्त्र दक्षिण दिशा में स्थित शक्ति (इन्द्र) और परंपरा (पितर) के संतुलन का आह्वान है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: शक्ति और परंपरा दोनों जीवन की रक्षा करते हैं।
  • विज्ञान: व्यक्ति का व्यवहार उसके पारिवारिक और सांस्कृतिक संस्कारों से प्रभावित होता है।
  • ब्रह्मज्ञान: जब हम शक्ति और परंपरा को दैवी व्यवस्था में समर्पित करते हैं, तब जीवन संतुलित होता है।

English Explanation

This mantra invokes the southern direction ruled by Indra. The ancestors (Pitṛs) are described as protectors and even as the arrows themselves. Symbolically, it teaches that strength (Indra) and ancestral wisdom (Pitṛs) guard life. All hostility is surrendered into divine justice rather than acted upon personally. Spiritually, it reflects trust in divine order and respect for tradition as protective forces. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Strength and heritage safeguard life.
  • Science: Cultural and familial influences shape human behavior.
  • Brahma-Gyan: Surrendering conflict into divine order brings inner balance.

Word by Word

प्रतीची दिक् = पश्चिम दिशा वरुणः = वरुण देव अधिपतिः = अधिपति, स्वामी पृदाकू = व्यापक दृष्टि वाला / सर्वज्ञ रक्षिताः = रक्षक अन्नम् = अन्न इषवः = बाण तेभ्यः = उन सबको नमः = नमस्कार अधिपतिभ्यः = अधिपतियों को रक्षितृभ्यः = रक्षकों को इषुभ्यः = बाणों को एभ्यः = इन सबको अस्तु = हो यः = जो अस्मान् = हमसे द्वेष्टि = द्वेष करता है यं = जिसे वयम् = हम द्विष्मः = द्वेष करते हैं तम् = उसे वः = तुम्हारे जम्भे = संहारशक्ति / दैवी न्याय में दध्मः = सौंपते हैं

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र पश्चिम दिशा की अधिष्ठात्री शक्तियों का आह्वान करता है। “प्रतीची दिक्” अर्थात पश्चिम दिशा—जो सूर्यास्त की दिशा है। यह अंतर्मुखता, आत्मचिंतन और कर्मफल के विचार का प्रतीक है। इस दिशा के अधिपति “वरुण” बताए गए हैं। वरुण ऋत (कॉस्मिक ऑर्डर), सत्य और नैतिक अनुशासन के देवता हैं। वे जल और गहनता से जुड़े हैं। वरुण का स्वभाव गंभीर, न्यायप्रिय और सर्वज्ञ माना गया है। “पृदाकू रक्षिताः अन्नम् इषवः”—यहाँ ‘अन्न’ को बाण कहा गया है। अन्न जीवन का आधार है। अन्न ही शरीर को पोषण देता है और जीवन को बनाए रखता है। यहाँ अन्न को बाण कहना यह दर्शाता है कि जीवन-रक्षा का सबसे बड़ा साधन पोषण है। वरुण की दृष्टि सब पर है। वे सत्य के रक्षक हैं। अतः पश्चिम दिशा में उनका अधिपति होना कर्मों के परिणाम और नैतिक उत्तरदायित्व का संकेत है। मन्त्र में पुनः अधिपति, रक्षक और उनके अस्त्रों को नमस्कार किया गया है। यह दैवी व्यवस्था के प्रति श्रद्धा का भाव है। अंतिम पंक्ति में वही भाव दोहराया गया है—जो हमसे द्वेष करता है या जिसे हम द्वेष करते हैं, उसे हम आपकी ‘जम्भ’ (दैवी नियंत्रण) में सौंपते हैं। दार्शनिक दृष्टि से पश्चिम दिशा कर्मफल की दिशा है। दिन के अंत में मनुष्य अपने कर्मों का मूल्यांकन करता है। वरुण न्याय और सत्य के प्रतीक हैं, इसलिए यहाँ द्वेष और विरोध को उनके न्याय पर छोड़ने की भावना व्यक्त की गई है। मनोवैज्ञानिक रूप से अन्न सुरक्षा और स्थिरता का प्रतीक है। जब जीवन में पोषण और संतुलन होता है, तब द्वेष कम होता है। आध्यात्मिक रूप से यह मन्त्र कहता है कि सत्य और नैतिकता ही जीवन की रक्षा करते हैं। इस प्रकार यह मन्त्र पश्चिम दिशा में स्थित वरुण की सत्यनिष्ठ, न्यायप्रिय और पोषणकारी शक्ति का आह्वान है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: सत्य और नैतिकता जीवन के रक्षक हैं।
  • विज्ञान: अन्न जीवन का आधार है और स्वास्थ्य का मूल है।
  • ब्रह्मज्ञान: जब सब कुछ दैवी न्याय को समर्पित होता है, तब मन शांति पाता है।

English Explanation

This mantra invokes the western direction ruled by Varuṇa, guardian of cosmic order. Food (anna) is described as the arrow—symbolizing nourishment as protection. The repeated salutations express reverence for divine authority and justice. All hostility is surrendered to divine order rather than handled through personal revenge. Spiritually, it emphasizes truth, nourishment, and moral responsibility as protective forces. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Truth and nourishment sustain life.
  • Science: Food is essential for survival and health.
  • Brahma-Gyan: Trust in divine justice brings inner peace.

Word by Word

उदीची दिक् = उत्तर दिशा सोमः = सोम देव अधिपतिः = अधिपति, स्वामी स्वजः = स्वयं उत्पन्न / स्वबलयुक्त रक्षिताः = रक्षक अशनिः = वज्र, बिजली इषवः = बाण तेभ्यः = उन सबको नमः = नमस्कार अधिपतिभ्यः = अधिपतियों को रक्षितृभ्यः = रक्षकों को इषुभ्यः = बाणों को एभ्यः = इन सबको अस्तु = हो यः = जो अस्मान् = हमसे द्वेष्टि = द्वेष करता है यं = जिसे वयम् = हम द्विष्मः = द्वेष करते हैं तम् = उसे वः = तुम्हारे जम्भे = संहारशक्ति / दैवी नियंत्रण दध्मः = सौंपते हैं

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र उत्तर दिशा की अधिष्ठात्री शक्तियों का आह्वान करता है। “उदीची दिक्” अर्थात उत्तर दिशा—जो आध्यात्मिक उन्नति, हिमालय, तप और ज्ञान की दिशा मानी जाती है। इस दिशा के अधिपति “सोम” बताए गए हैं। सोम अमृत, शीतलता, प्रेरणा और आनंद के प्रतीक हैं। वे मन और भावनाओं को संतुलित करने वाले देवता हैं। “स्वजो रक्षिताः अशनिः इषवः”—यहाँ अशनिः (वज्र या बिजली) को बाण कहा गया है। यह प्रतीक अत्यंत रोचक है। सोम शीतल और सौम्य हैं, परंतु उनके अस्त्र वज्र हैं—जो अत्यंत तीव्र और शक्तिशाली है। यह संयोजन दर्शाता है कि सौम्यता और शक्ति दोनों साथ-साथ चलती हैं। जीवन में करुणा आवश्यक है, परंतु अन्याय के विरुद्ध दृढ़ता भी आवश्यक है। मन्त्र में अधिपति, रक्षक और उनके अस्त्रों को नमस्कार किया गया है। यह सम्पूर्ण दैवी व्यवस्था के प्रति सम्मान का भाव है। अंतिम पंक्ति पुनः कहती है—जो हमसे द्वेष करता है या जिसे हम द्वेष करते हैं, उसे हम आपकी दैवी शक्ति में समर्पित करते हैं। यह प्रतिशोध नहीं, बल्कि दैवी न्याय में विश्वास है। दार्शनिक दृष्टि से सोम मन का प्रतीक है। जब मन शीतल और संतुलित होता है, तब निर्णय सही होते हैं। अशनिः (बिजली) चेतना की तीव्रता का प्रतीक है—जो अज्ञान को तत्काल भेद सकती है। मनोवैज्ञानिक रूप से यह मन्त्र बताता है कि व्यक्ति को भीतर से शांत और बाहर से सजग होना चाहिए। आध्यात्मिक अर्थ में उत्तर दिशा उन्नति की दिशा है। सोम का अधिपति होना दर्शाता है कि आध्यात्मिक उन्नति आनंद और संतुलन से प्राप्त होती है। इस प्रकार यह मन्त्र उत्तर दिशा की सौम्य किन्तु शक्तिशाली दैवी शक्ति का आह्वान है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: शांति और शक्ति दोनों जीवन में आवश्यक हैं।
  • विज्ञान: संतुलित मन ही स्वस्थ निर्णय ले सकता है।
  • ब्रह्मज्ञान: जब मन शांत और चेतना प्रखर होती है, तब आत्मोन्नति संभव है।

English Explanation

This mantra invokes the northern direction ruled by Soma. Though Soma symbolizes coolness and delight, lightning (aśani) is described as the arrow—signifying sudden, powerful force. It teaches the harmony of gentleness and strength. All hostility is surrendered into divine justice. Spiritually, it reflects that inner calm combined with awakened awareness leads to higher ascent. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Peace and strength must coexist.
  • Science: Emotional balance supports wise action.
  • Brahma-Gyan: A calm yet awakened mind leads to spiritual growth.

Word by Word

ध्रुवा दिक् = ध्रुव (स्थिर/ऊर्ध्व) दिशा विष्णुः = विष्णु देव अधिपतिः = अधिपति, स्वामी कल्माषग्रीवः = श्याम/विशिष्ट कंठ वाला (विशेषण) रक्षिताः = रक्षक वीरुधः = वनस्पतियाँ, लताएँ, पौधे इषवः = बाण तेभ्यः = उन सबको नमः = नमस्कार अधिपतिभ्यः = अधिपतियों को रक्षितृभ्यः = रक्षकों को इषुभ्यः = बाणों को एभ्यः = इन सबको अस्तु = हो यः = जो अस्मान् = हमसे द्वेष्टि = द्वेष करता है यं = जिसे वयम् = हम द्विष्मः = द्वेष करते हैं तम् = उसे वः = तुम्हारे जम्भे = दैवी संहारशक्ति / नियंत्रण दध्मः = सौंपते हैं

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र “ध्रुव दिशा” का आह्वान करता है, जो स्थिरता, नित्यत्व और ब्रह्मांडीय धुरी का प्रतीक है। इस दिशा के अधिपति “विष्णु” बताए गए हैं। विष्णु व्यापकता, पालन और संतुलन के देवता हैं। वे समस्त सृष्टि में व्याप्त हैं—“विष्णु” शब्द का अर्थ ही है ‘व्यापक’। “कल्माषग्रीवो रक्षिता”—यह विशेषण विष्णु के विशिष्ट स्वरूप का द्योतक है। इसका अर्थ शाब्दिक रूप से “श्याम कंठ वाला” या विशिष्ट चिह्नयुक्त हो सकता है, जो उनके विराट और बहुरंगी स्वरूप को दर्शाता है। “वीरुध इषवः”—यहाँ ‘वीरुध’ अर्थात वनस्पतियाँ और लताएँ बाण कही गई हैं। यह अत्यंत सुंदर प्रतीक है। सामान्यतः बाण विनाश का साधन होते हैं, पर यहाँ जीवनदायी वनस्पतियाँ ही अस्त्र हैं। वनस्पतियाँ जीवन को पोषण देती हैं, वायु को शुद्ध करती हैं और पर्यावरण को संतुलित रखती हैं। यहाँ उनका बाण होना यह संकेत देता है कि संरक्षण और जीवन-पालन ही सच्ची शक्ति है। मन्त्र में अधिपति, रक्षक और उनके अस्त्रों को नमस्कार किया गया है। यह सम्पूर्ण सृष्टि-व्यवस्था के प्रति श्रद्धा है। अंतिम पंक्ति—“योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः तं वो जम्भे दध्मः”—द्वेष को दैवी शक्ति के हवाले करने की भावना है। दार्शनिक दृष्टि से विष्णु संतुलन और पालन के प्रतीक हैं। ध्रुव दिशा स्थिरता की दिशा है—अर्थात जीवन में संतुलन और स्थिरता आवश्यक है। वनस्पतियाँ प्रकृति के पोषण और निरंतरता का प्रतीक हैं। वे बिना किसी शोर के जीवन का आधार बनती हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से यह मन्त्र बताता है कि जीवन में स्थिरता और धैर्य से ही संतुलन बना रहता है। आध्यात्मिक दृष्टि से विष्णु का व्यापक स्वरूप दर्शाता है कि परम सत्ता सर्वत्र व्याप्त है। इस प्रकार यह मन्त्र ध्रुव दिशा में स्थित विष्णु की पालनकारी और संतुलनकारी शक्ति का आह्वान है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: संरक्षण और संतुलन ही सच्ची शक्ति है।
  • विज्ञान: वनस्पतियाँ जीवन और पर्यावरण का आधार हैं।
  • ब्रह्मज्ञान: परम सत्ता सर्वव्यापक है; उससे जुड़ने पर जीवन में स्थिरता आती है।

English Explanation

This mantra invokes the fixed direction ruled by Vishnu, the all-pervading sustainer. Plants and vegetation are described as the arrows—symbolizing nourishment and preservation as protective power. It reflects the idea that true strength lies in sustenance and balance. All hostility is surrendered to divine order. Spiritually, it emphasizes stability, preservation, and alignment with the all-pervading reality. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Sustenance and balance protect life.
  • Science: Vegetation is essential for ecological harmony.
  • Brahma-Gyan: Realizing the all-pervading Divine brings inner stability.

Word by Word

तेभ्यः = उन सबको नमः = नमस्कार अधिपतिभ्यः = अधिपतियों को नमः = नमस्कार रक्षितृभ्यः = रक्षकों को नमः = नमस्कार इषुभ्यः = बाणों (अस्त्रों) को नमः = नमस्कार एभ्यः = इन सबको अस्तु = हो यः = जो अस्मान् = हमसे द्वेष्टि = द्वेष करता है यं = जिसे वयम् = हम द्विष्मः = द्वेष करते हैं तम् = उसे वः = तुम्हारे जम्भे = दैवी नियंत्रण / संहारशक्ति दध्मः = सौंपते हैं

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र पूर्ववर्ती मन्त्रों का सार और निष्कर्ष है। यहाँ किसी विशेष दिशा या देवता का उल्लेख नहीं है, बल्कि समस्त अधिपतियों, रक्षकों और उनके अस्त्रों को सामूहिक रूप से प्रणाम किया गया है। “तेभ्यो नमः”—उन सबको नमस्कार। “अधिपतिभ्यः नमः”—जो अधिपति हैं, अर्थात जो शासन और व्यवस्था के नियंता हैं। “रक्षितृभ्यः नमः”—जो रक्षक हैं, अर्थात जो संरक्षण करते हैं। “इषुभ्यः नमः”—जो उनके अस्त्र हैं, अर्थात वे साधन जिनसे दैवी व्यवस्था कार्य करती है। यहाँ नमस्कार की आवृत्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल औपचारिक प्रणाम नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय व्यवस्था के प्रति समर्पण का भाव है। साधक यह स्वीकार करता है कि विश्व एक दैवी नियम और संरक्षण के अधीन है। दूसरी पंक्ति पुनः कहती है— “योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः तं वो जम्भे दध्मः।” यहाँ द्वेष को दैवी शक्ति में समर्पित करने का भाव है। साधक स्वयं प्रतिशोध नहीं लेता, बल्कि न्याय को दैवी व्यवस्था पर छोड़ देता है। दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र अहंकार-त्याग का प्रतीक है। जब व्यक्ति यह मान लेता है कि वह स्वयं सब कुछ नियंत्रित नहीं कर सकता, तब वह दैवी व्यवस्था को स्वीकार करता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से द्वेष एक आंतरिक विष है। यदि उसे मन में रखा जाए, तो वह अशांति और पीड़ा उत्पन्न करता है। उसे दैवी चेतना में समर्पित कर देने से मन हल्का होता है। आध्यात्मिक रूप से यह मन्त्र पूर्ण समर्पण और शरणागति का प्रतीक है। यह केवल बाहरी शत्रुओं की बात नहीं करता, बल्कि आंतरिक शत्रुओं—क्रोध, ईर्ष्या, लोभ—की ओर भी संकेत करता है। जब ये नकारात्मक भाव दैवी अग्नि या दैवी न्याय में समर्पित होते हैं, तब आत्मा शुद्ध और शांत होती है। इस प्रकार यह मन्त्र सम्पूर्ण सूक्त का समाहार है—सभी दिशाओं, सभी देवताओं और सभी शक्तियों को प्रणाम करते हुए, समस्त द्वेष को दैवी व्यवस्था में अर्पित करना। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: दैवी व्यवस्था के प्रति समर्पण से मन शांत होता है।
  • विज्ञान: नकारात्मक भावों का रूपांतरण मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
  • ब्रह्मज्ञान: पूर्ण शरणागति से आत्मा बंधनों से मुक्त होती है।

English Explanation

This concluding mantra offers salutations to all rulers, protectors, and their instruments. It expresses complete surrender to divine order. All hatred—whether from others or within oneself—is symbolically placed into divine justice rather than handled through personal retaliation. Spiritually, it represents humility, surrender, and purification of inner negativity. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Surrender to higher order brings peace.
  • Science: Transforming negative emotions improves mental well-being.
  • Brahma-Gyan: True liberation arises from complete surrender.

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