दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
सहृदयम् = एक हृदय वाले / परस्पर प्रेमयुक्त
सामनस्यम् = एक मन वाले / मानसिक एकता
अविद्वेषम् = बिना द्वेष के
कृणोमि = मैं करता हूँ / स्थापित करता हूँ
वः = तुम सबके लिए
अन्यः अन्यं = एक दूसरे को
अभि हर्यत = स्नेह करो / अपनाओ
वत्सम् = बछड़ा
जातम् = नवजात
इव = जैसे
अघ्न्या = गाय (जिसे मारना वर्जित है)
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
यह मन्त्र सामाजिक एकता, प्रेम और पारस्परिक सद्भाव का अत्यंत सुंदर वैदिक उद्घोष है।
“सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः”—
मैं तुम सबको एक हृदय, एक मन और द्वेष-रहित बनाता हूँ।
यह केवल आशीर्वचन नहीं, बल्कि सामाजिक आदर्श है।
सहृदयता का अर्थ है—
दूसरे के सुख-दुख को अपना समझना।
सामनस्य का अर्थ है—
विचारों और उद्देश्यों में सामंजस्य।
अविद्वेष का अर्थ है—
ईर्ष्या, घृणा और वैर का अभाव।
जब ये तीनों गुण मिलते हैं, तब समाज स्थिर और समृद्ध होता है।
दूसरी पंक्ति अत्यंत भावपूर्ण उपमा देती है—
“अन्यो अन्यमभि हर्यत”—
तुम एक-दूसरे से प्रेम करो।
“वत्सं जातमिव अघ्न्या”—
जैसे गाय अपने नवजात बछड़े से करती है।
यह उपमा अत्यंत मार्मिक है।
गाय अपने नवजात बछड़े को पूर्ण स्नेह, संरक्षण और अपनत्व से देखती है।
उसमें कोई शर्त, कोई स्वार्थ नहीं होता।
वैदिक समाज में “अघ्न्या” (गाय) करुणा और पोषण का प्रतीक है।
इस प्रकार यह मन्त्र कहता है—
परस्पर प्रेम ऐसा हो जो स्वाभाविक, निष्कपट और रक्षक हो।
दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र अद्वैत की सामाजिक अभिव्यक्ति है।
जब सबमें एक ही आत्मा है, तो द्वेष का स्थान कहाँ?
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह सामूहिक चेतना की रचना का सूत्र है।
समाज में तनाव, संघर्ष और विभाजन का कारण द्वेष और असामंजस्य है।
यदि सहृदयता और सामनस्य स्थापित हो जाए,
तो परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति स्थायी हो सकती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह मन्त्र प्रेम को धर्म का आधार बताता है।
यह केवल नैतिक शिक्षा नहीं—
बल्कि सामाजिक संगठन का वैज्ञानिक सिद्धांत है।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: प्रेम और एकता से समाज सुदृढ़ होता है।
विज्ञान: सामूहिक सहयोग मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान: सबमें एक ही चेतना को देखने से द्वेष मिटता है।
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English Explanation
This mantra invokes unity of heart, unity of mind, and freedom from hatred.
It urges people to love one another like a cow loves her newborn calf — naturally, protectively, and without selfishness.
It teaches that social harmony rests on empathy, shared intention, and absence of jealousy.
True spiritual realization expresses itself as compassion and collective unity.
Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
Knowledge: Love and unity create strong communities.
Science: Cooperative societies enjoy greater stability and well-being.
Brahma-Gyan: Realizing oneness removes hatred and division.
शब्दार्थ
अनुव्रतः = आज्ञाकारी / अनुसरण करने वाला
पितुः = पिता का
पुत्रः = पुत्र
मात्रा = माता के साथ
भवतु = हो
संमनाः = एक मन वाला / समान भावना वाला
जाया = पत्नी
पत्ये = पति के प्रति
मधुमतीम् = मधुर / मधु के समान मीठी
वाचम् = वाणी
वदतु = बोले
शन्तिवाम् = शान्ति देने वाली
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
यह मन्त्र पारिवारिक समरसता और सौहार्द का अत्यंत सुंदर विधान प्रस्तुत करता है।
“अनुव्रतः पितुः पुत्रः”—
पुत्र पिता का अनुव्रत (आज्ञाकारी, सदाचारी अनुयायी) हो।
यहाँ “अनुव्रत” का अर्थ केवल अंध-आज्ञाकारिता नहीं, बल्कि पिता के धर्म, सदाचार और कर्तव्य के मार्ग का अनुकरण करना है।
पिता परिवार का मार्गदर्शक है।
यदि पुत्र उसके श्रेष्ठ आदर्शों का अनुसरण करता है, तो परंपरा और संस्कार सुरक्षित रहते हैं।
“मात्रा भवतु संमनाः”—
माता के साथ उसका मन एक हो।
माता स्नेह, करुणा और पोषण की प्रतीक है।
पुत्र यदि माता के प्रति सहृदय और भावनात्मक रूप से जुड़ा रहता है, तो परिवार में प्रेम का प्रवाह बना रहता है।
इस प्रकार मन्त्र माता-पिता के प्रति श्रद्धा और भावनात्मक सामंजस्य का संदेश देता है।
दूसरी पंक्ति दाम्पत्य जीवन पर केंद्रित है—
“जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम्”—
पत्नी पति के प्रति मधुर और शांति देने वाली वाणी बोले।
यहाँ “मधुमती वाणी” का अर्थ है—
ऐसी वाणी जो प्रेमपूर्ण, सम्मानजनक और प्रेरणादायक हो।
“शन्तिवाम्” — जो शांति प्रदान करे।
घर का वातावरण वाणी से बनता और बिगड़ता है।
कटु वचन परिवार में तनाव और कलह का कारण बनते हैं।
मधुर वाणी प्रेम और सौहार्द को स्थिर करती है।
यह मन्त्र किसी एक पक्ष को नहीं, बल्कि पूरे परिवार को संतुलन और मर्यादा का संदेश देता है।
दार्शनिक दृष्टि से परिवार समाज की पहली इकाई है।
यदि परिवार में सामंजस्य है, तो समाज में शांति संभव है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से—
सम्मान, संवाद और मधुर व्यवहार मानसिक स्वास्थ्य का आधार हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से—
परिवार प्रेम, सेवा और त्याग का प्रथम विद्यालय है।
इस मन्त्र में चार मूल तत्व हैं:
1. पिता के प्रति अनुकरण
2. माता के प्रति भावनात्मक एकता
3. दाम्पत्य में मधुर संवाद
4. शांति की स्थापना
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: परिवार की एकता से समाज सुदृढ़ होता है।
विज्ञान: सकारात्मक संवाद मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान: प्रेमपूर्ण व्यवहार से ही आत्मा की शुद्धि और शांति संभव है।
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English Explanation
This mantra teaches harmony within the family.
The son should follow the righteous path of the father and remain emotionally united with the mother.
The wife should speak sweet and peace-giving words to her husband.
It emphasizes respect, emotional unity, and gentle communication as the foundation of family stability.
Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
Knowledge: Family harmony builds a stable society.
Science: Positive communication improves emotional well-being.
Brahma-Gyan: Loving speech purifies consciousness and establishes inner peace.
शब्दार्थ
मा = न
भ्राता = भाई
भ्रातरम् = भाई को
द्विक्षन् = द्वेष करे
मा = न
स्वसारम् = बहन को
उत = और
स्वसा = बहन
सम्यञ्चः = एक दिशा में / एकमत होकर
सव्रताः = समान व्रत वाले / समान आचरण वाले
भूत्वा = होकर
वाचम् = वाणी
वदत = बोलो
भद्रया = शुभ / मंगलमयी
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
यह मन्त्र पारिवारिक प्रेम और सौहार्द का अत्यंत मार्मिक उपदेश देता है।
“मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्”—
भाई भाई से द्वेष न करे।
“मा स्वसारम् उत स्वसा”—
बहन बहन से द्वेष न करे।
यहाँ “द्विक्षन्” शब्द द्वेष, ईर्ष्या और विरोध का संकेत देता है।
मन्त्र स्पष्ट रूप से कहता है कि परिवार के सदस्यों के बीच वैमनस्य नहीं होना चाहिए।
भाई-बहन का संबंध स्नेह, सहयोग और सुरक्षा का प्रतीक है।
यदि इस संबंध में ईर्ष्या, स्पर्धा या कटुता प्रवेश कर जाए, तो परिवार की शांति भंग हो जाती है।
इसके बाद मन्त्र सकारात्मक मार्ग बताता है—
“सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा”—
एकमत होकर, समान आचरण वाले बनकर।
अर्थात् केवल द्वेष का अभाव ही पर्याप्त नहीं,
बल्कि एक-दूसरे के साथ समन्वय, समान उद्देश्य और समान मूल्यों का पालन भी आवश्यक है।
“वाचं वदत भद्रया”—
मंगलमयी, शुभ वाणी बोलो।
वाणी ही संबंधों की धुरी है।
कठोर शब्द रिश्तों को तोड़ सकते हैं,
और मधुर शब्द टूटे मन को भी जोड़ सकते हैं।
यह मन्त्र हमें सिखाता है कि—
परिवार में प्रेम बनाए रखने के लिए
1. द्वेष का त्याग
2. समान भावना
3. संयमित और शुभ वाणी
तीनों आवश्यक हैं।
सामाजिक दृष्टि से—
परिवार समाज की आधारशिला है।
यदि भाई-बहन में प्रेम है, तो समाज में एकता बनी रहती है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से—
भाई-बहन का स्वस्थ संबंध आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना देता है।
ईर्ष्या और तुलना मानसिक तनाव का कारण बनती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से—
द्वेष आत्मा को अशांत करता है।
मंगलमयी वाणी और समान भाव आत्मशुद्धि का मार्ग हैं।
इस मन्त्र का संदेश केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं,
बल्कि समस्त मानव समाज के लिए है।
“सम्यञ्चः”—
समान दिशा में चलना।
यदि समाज के लोग एक-दूसरे के विरोध में नहीं,
बल्कि सहयोग में चलें, तो उन्नति सुनिश्चित है।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: पारिवारिक एकता समाज की शक्ति है।
विज्ञान: सकारात्मक संवाद और सहयोग मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करते हैं।
ब्रह्मज्ञान: द्वेष का त्याग और शुभ वाणी आत्मा को शांति प्रदान करती है।
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English Explanation
This mantra teaches that a brother should not hate a brother, nor a sister hate a sister.
It emphasizes unity of mind, shared values, and speaking auspicious, gentle words.
Harmony within siblings strengthens the family and, ultimately, society.
Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
Brahma-Gyan: Freedom from hatred and kind speech bring inner peace.
शब्दार्थ
येन = जिससे / जिस कारण
देवाः = देवता
न वियन्ति = अलग नहीं होते / विभक्त नहीं होते
न च = और नहीं
विद्विषते = द्वेष करते हैं
मिथः = परस्पर
तत् = वही
कृण्मः = हम करते हैं / स्थापित करते हैं
ब्रह्म = पवित्र मंत्र / ज्ञान / आध्यात्मिक शक्ति
वः = तुम्हारे लिए
गृहे = घर में
संज्ञानम् = परस्पर समझ / एकता की चेतना
पुरुषेभ्यः = लोगों के लिए
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
यह मन्त्र सामाजिक और आध्यात्मिक एकता का अत्यंत उच्च आदर्श प्रस्तुत करता है।
“येन देवा न वियन्ति”—
जिस तत्व से देवता भी अलग नहीं होते।
“नो च विद्विषते मिथः”—
और परस्पर द्वेष नहीं करते।
देवता यहाँ दिव्य शक्तियों के प्रतीक हैं—
प्रकाश, वायु, जल, अग्नि आदि।
ये सभी भिन्न होते हुए भी समन्वय में कार्य करते हैं।
सूर्य चन्द्र से द्वेष नहीं करता,
वायु अग्नि से विरोध नहीं करती।
यह ब्रह्मांडीय सामंजस्य का सिद्धांत है।
मन्त्र कहता है—
जिस सिद्धांत से देवता भी एकजुट रहते हैं,
उसी सिद्धांत को हम अपने घर में स्थापित करें।
“तत् कृण्मो ब्रह्म वः गृहे”—
हम वही ब्रह्म (पवित्र ज्ञान/मंत्र/सिद्धांत) तुम्हारे घर में स्थापित करते हैं।
“संज्ञानं पुरुषेभ्यः”—
मनुष्यों के लिए पारस्परिक समझ और एकता।
संज्ञान का अर्थ है—
साझी चेतना, साझा समझ, परस्पर विश्वास।
यह मन्त्र बताता है कि घर में केवल शारीरिक उपस्थिति पर्याप्त नहीं।
वहाँ भावनात्मक और बौद्धिक एकता भी होनी चाहिए।
दार्शनिक दृष्टि से—
ब्रह्मांड एक नियम से संचालित है—संतुलन और सहयोग।
उसी नियम को परिवार और समाज में लागू करना ही धर्म है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से—
संज्ञान (mutual understanding) स्वस्थ संबंधों की नींव है।
गलतफहमी ही अधिकांश विवादों का कारण होती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से—
ब्रह्म का अर्थ है वह व्यापक चेतना जो सबको जोड़ती है।
जब वही चेतना घर में जागृत होती है,
तो परिवार देवताओं के समान समन्वित हो जाता है।
यह मन्त्र केवल प्रार्थना नहीं,
बल्कि सामाजिक संगठन का आध्यात्मिक सूत्र है।
देवों की भाँति—
विभिन्न होते हुए भी एक।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: एकता और समझ से ही स्थायी शांति मिलती है।
विज्ञान: सहयोगात्मक प्रणाली अधिक प्रभावी और स्थिर होती है।
ब्रह्मज्ञान: ब्रह्म की चेतना सबको जोड़ने वाली एकता है।
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English Explanation
This mantra invokes the principle by which even the gods do not separate or hate one another.
It prays that such sacred knowledge (Brahma) be established in the household, creating mutual understanding among people.
Just as cosmic forces function in harmony, families and societies should cultivate shared awareness and unity.
Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
Knowledge: Unity and understanding create lasting peace.
Science: Cooperative systems are more stable and efficient.
Brahma-Gyan: The universal consciousness binds all in harmony.
शब्दार्थ
ज्यायस्वन्तः = बड़े और छोटे (श्रेष्ठ–कनिष्ठ)
चित्तिनः = बुद्धिमान / सजग चित्त वाले
मा वि यौष्ट = अलग न हों / विच्छिन्न न हों
संराधयन्तः = मिलकर सफल बनाते हुए / समृद्ध करते हुए
सधुराः = समान मार्ग वाले
चरन्तः = आचरण करते हुए
अन्यः अन्यस्मै = एक दूसरे से
वल्गु = मधुर / प्रिय
वदन्तः = बोलते हुए
एत = इस प्रकार
सध्रीचीनान् = एक दिशा में चलने वाले
वः = तुम सबको
संमनसः कृणोमि = एक मन वाला बनाता हूँ
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 650 शब्द)
यह मन्त्र सामाजिक समन्वय और सामूहिक चेतना की उच्चतम अभिव्यक्ति है।
“ज्यायस्वन्तः चित्तिनः”—
बड़े और छोटे, सभी बुद्धिमान और सजग रहें।
यहाँ “ज्यायस्वन्तः” का अर्थ है आयु, अनुभव या पद में बड़े लोग।
“चित्तिनः” का अर्थ है विवेकशील, समझदार।
मन्त्र कहता है—
बड़े और छोटे मिलकर रहें, अलग न हों।
“मा वि यौष्ट”—
तुम अलग न पड़ो, विभाजित न हो जाओ।
विभाजन समाज की सबसे बड़ी कमजोरी है।
“संराधयन्तः सधुराः चरन्तः”—
मिलकर कार्य को सफल बनाते हुए, समान मार्ग पर चलते हुए।
यह सामूहिक प्रयास (collective effort) का सिद्धांत है।
जब सब एक दिशा में चलते हैं, तभी प्रगति होती है।
“अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्तः”—
एक-दूसरे से मधुर वचन बोलते हुए।
वाणी सामाजिक संबंधों का सेतु है।
कटु शब्द विभाजन लाते हैं,
मधुर शब्द एकता स्थापित करते हैं।
अंतिम पंक्ति—
“सध्रीचीनान् वः संमनसः कृणोमि”—
मैं तुम सबको एक दिशा में चलने वाला, एक मन वाला बनाता हूँ।
“सध्रीचीन” का अर्थ है—
एक ही लक्ष्य की ओर उन्मुख।
यह मन्त्र केवल परिवार नहीं,
समाज और राष्ट्र के लिए भी मार्गदर्शन है।
दार्शनिक दृष्टि से—
विविधता में एकता ही सृष्टि का नियम है।
प्रकृति में भिन्न तत्व हैं,
परंतु वे एक नियम से संचालित होते हैं।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से—
टीमवर्क और सकारात्मक संवाद सफलता की कुंजी हैं।
जहाँ परस्पर सम्मान और सहयोग है,
वहाँ संघर्ष कम और विकास अधिक होता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से—
जब सबका मन एक दिशा में होता है,
तो सामूहिक चेतना शक्तिशाली हो जाती है।
यह मन्त्र हमें सिखाता है—
1. बड़े-छोटे में विभाजन न हो।
2. सब समान मार्ग पर चलें।
3. परस्पर मधुर वाणी रखें।
4. सामूहिक लक्ष्य को प्राथमिकता दें।
यह एक प्रकार का वैदिक “सामाजिक संविधान” है।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: एकता और सहयोग से ही उन्नति संभव है।
विज्ञान: सामूहिक प्रयास (team coordination) सफलता की संभावना बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान: जब सबका मन एक लक्ष्य में स्थित हो, तो वह ब्रह्मचेतना का प्रतिबिंब बनता है।
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English Explanation
This mantra calls for unity among elders and youth, asking them not to be divided.
It urges people to walk the same path, work together for success, and speak sweet words to one another.
It establishes the principle of collective harmony and shared purpose as the foundation of social strength.
Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
Knowledge: Unity and cooperation lead to progress.
Science: Team coordination and positive communication enhance outcomes.
Brahma-Gyan: When minds align in one direction, collective consciousness becomes powerful.
शब्दार्थ
समानी = समान / एक जैसी
प्रपा = जलस्रोत / पीने का स्थान
सह वः = तुम सबके लिए साथ
अन्नभागः = अन्न का भाग
समाने = समान
योक्त्रे = जुए (बंधन / साधन) में
सह वः युनज्मि = मैं तुम सबको साथ जोड़ता हूँ
सम्यञ्चः = एक दिशा में
अग्निम् = अग्नि (यज्ञाग्नि / ऊर्जा / केंद्र)
सपर्यतारा = उपासना करो / सेवा करो
नाभिम् इव = नाभि की तरह
अभितः = चारों ओर से
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 650 शब्द)
यह मन्त्र वैदिक एकता-दर्शन का अत्यंत सुंदर और गहन प्रतिपादन है।
“समानी प्रपा”—
तुम सबके लिए जलस्रोत समान हो।
जल जीवन का आधार है।
इसका समान होना समान अवसर और समान अधिकार का प्रतीक है।
“सह वः अन्नभागः”—
तुम सबका अन्न-भाग भी समान हो।
अर्थात् संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण।
कोई भूखा न रहे, कोई वंचित न हो।
“समाने योक्त्रे सह वः युनज्मि”—
मैं तुम्हें एक ही जुए में जोड़ता हूँ।
यहाँ “योक्त्र” का अर्थ है वह साधन जिससे बैलों को जोड़ा जाता है।
यह प्रतीक है—
सामूहिक श्रम, साझा जिम्मेदारी और एक दिशा में प्रयत्न।
अर्थात् तुम सब एक उद्देश्य में बंधे रहो।
दूसरी पंक्ति—
“सम्यञ्चः अग्निं सपर्यतारा”—
तुम सब एक दिशा में होकर अग्नि की उपासना करो।
अग्नि यहाँ ऊर्जा, प्रेरणा और केंद्र का प्रतीक है।
यज्ञ में अग्नि केंद्र में होती है और सब उसके चारों ओर बैठते हैं।
“नाभिम् इव अभितः”—
जैसे नाभि के चारों ओर अंग जुड़े होते हैं।
नाभि शरीर का केंद्र है।
सब अंग उसी से जुड़े हैं और उसी से पोषण पाते हैं।
इसी प्रकार समाज में भी एक केंद्र (धर्म, सत्य, साझा उद्देश्य) होना चाहिए,
जिसके चारों ओर सब एकजुट हों।
दार्शनिक दृष्टि से—
यह मन्त्र सामाजिक समता और सामूहिक चेतना का घोष है।
जल और अन्न की समानता—
आर्थिक न्याय का संकेत है।
साझा योक्त्र—
सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है।
अग्नि की परिक्रमा—
साझे आदर्श और मूल्य का प्रतीक है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से—
जब लोगों को समान अवसर और साझा लक्ष्य मिलते हैं,
तो उनमें असुरक्षा और ईर्ष्या कम होती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से—
अग्नि ब्रह्मचेतना का प्रतीक है।
उसके चारों ओर एकत्र होना,
आत्मिक एकता की अनुभूति है।
यह मन्त्र समाज को एक परिवार के रूप में देखता है—
जहाँ संसाधन साझा हों,
लक्ष्य साझा हो,
और केंद्र में धर्म या सत्य की अग्नि हो।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: समान संसाधन और साझा लक्ष्य से समाज स्थिर होता है।
विज्ञान: न्यायपूर्ण वितरण और सामूहिक सहयोग सामाजिक संतुलन बनाए रखते हैं।
ब्रह्मज्ञान: जब सब एक दिव्य केंद्र के चारों ओर एकत्र होते हैं, तो वह ब्रह्म की एकता का अनुभव है।
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English Explanation
This mantra calls for shared water, shared food, and shared responsibility.
It urges people to unite in one harness and worship the central fire together, just as spokes are joined around the hub of a wheel.
It symbolizes equality, cooperation, and alignment around a common spiritual center.
Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
Knowledge: Shared resources and common goals create stability.
Science: Fair distribution and cooperation sustain social harmony.
Brahma-Gyan: Gathering around one divine center reflects cosmic unity.
शब्दार्थ
सध्रीचीनान् = एक दिशा में चलने वाले / समान लक्ष्य वाले
वः = तुम सबको
संमनसः कृणोमि = एक मन वाला बनाता हूँ
एकश्नुष्टीन् = एक साथ भोजन करने वाले / समान उपभोग वाले
संवननेन = संगठित करने वाली शक्ति से / एकत्र करने के साधन से
सर्वान् = सबको
देवाः इव = देवताओं की भाँति
अमृतम् = अमरत्व / दिव्य तत्व
रक्षमाणाः = रक्षा करते हुए
सायं = संध्या समय
प्रातः = प्रातःकाल
सौमनसः = प्रसन्न मन / शुभ भावना
वः अस्तु = तुम सबका हो
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हिन्दी व्याख्या (लगभग 650 शब्द)
यह मन्त्र वैदिक एकता-दर्शन का चरम और समापन स्वर है।
“सध्रीचीनान् वः संमनसः कृणोमि”—
मैं तुम सबको एक दिशा में चलने वाला, एक मन वाला बनाता हूँ।
यहाँ “सध्रीचीन” का अर्थ है—
जो एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर हों।
“संमनस” — जिनका मन परस्पर सामंजस्य में हो।
केवल शारीरिक साथ पर्याप्त नहीं;
विचार और भावना की एकता भी आवश्यक है।
“एकश्नुष्टीन्”—
जो एक साथ भोजन करते हैं।
यह प्रतीक है समानता और सहभागिता का।
साथ भोजन करना वैदिक संस्कृति में बंधुत्व और समता का संकेत है।
“संवननेन सर्वान्”—
संगठन की शक्ति से सबको एकत्र करता हूँ।
यह सामाजिक संगठन और सहयोग का सिद्धांत है।
दूसरी पंक्ति अत्यंत सुंदर है—
“देवा इव अमृतं रक्षमाणाः”—
जैसे देवता अमृत की रक्षा करते हैं।
अमृत यहाँ जीवन, सत्य, धर्म या दिव्य मूल्य का प्रतीक है।
देवता मिलकर अमृत की रक्षा करते हैं,
क्योंकि वही उनकी शक्ति और अमरत्व का स्रोत है।
उसी प्रकार समाज को भी अपने मूल्यों और सत्य की रक्षा करनी चाहिए।
“सायं प्रातः सौमनसः वः अस्तु”—
संध्या और प्रातः, तुम्हारा मन प्रसन्न और शांत रहे।
अर्थात दिन के आरंभ और अंत दोनों में मानसिक शांति बनी रहे।
यह निरंतर शांति और सकारात्मक चेतना की कामना है।
दार्शनिक दृष्टि से—
यह मन्त्र सामाजिक एकता को आध्यात्मिक ऊँचाई देता है।
साझा भोजन = सामाजिक समता
साझा लक्ष्य = सामूहिक प्रगति
साझा मूल्य = आध्यात्मिक सुरक्षा
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से—
जब लोग एक साथ खाते, काम करते और संवाद करते हैं,
तो उनमें विश्वास और सहयोग की भावना बढ़ती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से—
देवों की भाँति अमृत (सत्य/धर्म) की रक्षा करना
मानव जीवन का उच्चतम कर्तव्य है।
यह मन्त्र हमें सिखाता है—
1. मन की एकता
2. समान भागीदारी
3. मूल्यों की रक्षा
4. निरंतर प्रसन्नता
यह वैदिक समाज का आदर्श चित्र है—
जहाँ सब एक मन, एक लक्ष्य और एक धर्म में स्थित हों।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: एकता और साझा मूल्य समाज को सुदृढ़ बनाते हैं।
विज्ञान: सामूहिक सहभागिता और सामाजिक बंधन मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाते हैं।
ब्रह्मज्ञान: जब मन एक हो और सत्य की रक्षा हो, तब दिव्य चेतना प्रकट होती है।
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English Explanation
This mantra prays for unity of mind and shared participation.
It encourages people to gather, share food, and protect their core values like the gods protect immortality.
It concludes with a blessing that morning and evening may be filled with mental peace and harmony.
Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
Knowledge: Shared values and unity strengthen society.
Science: Social bonding and cooperation enhance psychological well-being.
Brahma-Gyan: Protecting truth and unity reflects divine consciousness.
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