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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

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AtharvaVeda kand 3 Sukta 31

शब्दार्थ

वि = दूर / अलग देवाः = देवगण जरसा = जरा (बुढ़ापा) से आवृतन् = घेरने वाले (से मुक्त करें) वि = दूर त्वम् = तुम अग्ने = हे अग्नि अरात्या = शत्रुता / विपत्ति से वि अहम् = मैं दूर हो जाऊँ सर्वेण = समस्त पाप्मना = पाप / दोष से वि = अलग यक्ष्मेण = रोग (विशेषतः क्षय रोग) से सम् आयुषा = पूर्ण आयु के साथ ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 650 शब्द)

यह मन्त्र स्वास्थ्य, दीर्घायु और शुद्ध जीवन की प्रार्थना है। “वि देवा जरसा आवृतन्”— हे देवगण! मुझे जरा (अकाल बुढ़ापा या क्षीणता) से दूर रखें। यहाँ “जरा” केवल शारीरिक वृद्धावस्था नहीं, बल्कि समय से पहले आने वाली दुर्बलता और जीवनशक्ति की कमी का प्रतीक है। “वि त्वम् अग्ने अरात्या”— हे अग्नि! तुम मुझे शत्रुता और विपत्ति से दूर रखो। अग्नि वैदिक परंपरा में शुद्धि और ऊर्जा का प्रतीक है। वह नकारात्मकता को जलाकर नष्ट करती है। यहाँ प्रार्थना है कि जीवन में बाहरी शत्रुता और आंतरिक दुर्बलता दोनों से रक्षा हो। “व्यहं सर्वेण पाप्मना”— मैं समस्त पाप या दोष से दूर हो जाऊँ। “पाप्मन्” का अर्थ है— अशुद्ध कर्म, मानसिक दोष, नकारात्मक प्रवृत्तियाँ। यह केवल धार्मिक अर्थ में पाप नहीं, बल्कि जीवन को क्षीण करने वाले व्यवहार भी हैं। “वि यक्ष्मेण सम आयुषा”— मैं रोग से दूर होकर पूर्ण आयु प्राप्त करूँ। “यक्ष्मा” विशेषतः क्षय या दीर्घकालिक रोग का प्रतीक है। यह शरीर को धीरे-धीरे दुर्बल करता है। इस प्रकार यह मन्त्र तीन स्तरों पर रक्षा की प्रार्थना करता है— 1. जरा (अकाल दुर्बलता) 2. अराति (विपत्ति/शत्रुता) 3. पाप और रोग और लक्ष्य है— “सम आयुषा”— पूर्ण आयु। दार्शनिक दृष्टि से— जीवन केवल दीर्घ नहीं, बल्कि शुद्ध और संतुलित होना चाहिए। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से— नकारात्मक विचार और दोष मानसिक रोगों का कारण बनते हैं। सकारात्मक ऊर्जा और संयमित जीवन दीर्घायु देते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से— अग्नि आंतरिक तप और आत्मशुद्धि का प्रतीक है। जब भीतर की अग्नि जागृत रहती है, तो पाप और रोग दूर रहते हैं। यह मन्त्र हमें सिखाता है— - शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान - मानसिक शुद्धि - नकारात्मकता से दूरी - संतुलित और दीर्घ जीवन की कामना यह एक समग्र (holistic) स्वास्थ्य-दर्शन है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: दीर्घायु के लिए शरीर और मन दोनों की शुद्धि आवश्यक है।
  • विज्ञान: संतुलित जीवनशैली रोगों से रक्षा करती है।
  • ब्रह्मज्ञान: आंतरिक अग्नि (चेतना) की जागृति से आत्मशुद्धि और ऊर्जा बनी रहती है।
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English Explanation

This mantra prays for protection from premature decay, hostility, sin, and disease. It invokes Agni to remove negativity and asks for a full and healthy lifespan. It reflects a holistic vision of health — physical, mental, and spiritual well-being. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Longevity requires purity of body and mind.
  • Science: Balanced living protects against disease.
  • Brahma-Gyan: Inner spiritual fire purifies and sustains life-force.

शब्दार्थ

वि = दूर / अलग आर्त्या = पीड़ा / कष्ट से पवमानः = शुद्ध करने वाला (सोम/वायु/पवित्र प्रवाह) वि = दूर करे शक्रः = शक्तिशाली देव (इन्द्र) पापकृत्यया = पापकर्म से वि अहम् = मैं दूर हो जाऊँ सर्वेण = समस्त पाप्मना = पाप / दोष से वि = अलग यक्ष्मेण = रोग से सम् आयुषा = पूर्ण आयु के साथ ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 650 शब्द)

यह मन्त्र पिछले मन्त्र की भावना को आगे बढ़ाता है और शुद्धि तथा आरोग्य की व्यापक प्रार्थना करता है। “व्यार्त्या पवमानः”— पवमान (शुद्ध करने वाली शक्ति) मुझे पीड़ा से दूर करे। “पवमान” का अर्थ है— जो पवित्र करता है, शुद्ध करता है। यह सोम, वायु या दिव्य प्रवाह का प्रतीक है। पीड़ा (आर्ति) केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक भी हो सकती है। “वि शक्रः पापकृत्यया”— शक्र (इन्द्र) पापकर्म से दूर करे। इन्द्र शक्ति और साहस के प्रतीक हैं। अर्थात् जीवन में ऐसी शक्ति आए जो हमें गलत कर्म से बचाए। यह केवल दंड से बचने की प्रार्थना नहीं, बल्कि स्वयं में इतनी विवेकशक्ति उत्पन्न करने की इच्छा है कि हम पापकर्म से दूर रहें। फिर वही वाक्य— “व्यहं सर्वेण पाप्मना”— मैं समस्त दोष से मुक्त हो जाऊँ। “वि यक्ष्मेण सम आयुषा”— रोग से दूर रहकर पूर्ण आयु प्राप्त करूँ। यहाँ पाप और रोग को एक साथ रखा गया है। वैदिक दृष्टि में नैतिक और शारीरिक स्वास्थ्य परस्पर जुड़े हैं। अशुद्ध जीवनशैली रोग को जन्म देती है। असंतुलित मन पापकर्म की ओर ले जाता है। दार्शनिक दृष्टि से— यह मन्त्र जीवन के तीन आयामों को संतुलित करता है: 1. शारीरिक शुद्धि 2. नैतिक शुद्धि 3. मानसिक शांति मनोवैज्ञानिक दृष्टि से— आंतरिक अपराधबोध और नकारात्मकता मानसिक रोग का कारण बनते हैं। सकारात्मक शुद्ध भावना मानसिक शक्ति बढ़ाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से— पवमान चेतना की शुद्ध धारा है। इन्द्र आंतरिक साहस है। जब शुद्धता और शक्ति दोनों साथ हों, तो व्यक्ति रोग और पाप से दूर रहता है। यह मन्त्र समग्र आरोग्य का सूत्र है— - शुद्ध विचार - सही कर्म - संतुलित जीवन - दीर्घ आयु ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: शुद्ध जीवन और सही कर्म दीर्घायु देते हैं।
  • विज्ञान: मानसिक और नैतिक संतुलन स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
  • ब्रह्मज्ञान: जब चेतना शुद्ध और साहसी होती है, तब जीवन पूर्ण और दिव्य बनता है।
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English Explanation

This mantra prays that the purifying force (Pavamana) remove suffering and that Indra remove sinful actions. It seeks freedom from all faults and diseases, leading to a complete lifespan. It presents a holistic understanding of health — purity of thought, strength of character, and physical well-being. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Pure conduct supports long life.
  • Science: Mental and moral balance positively affect health.
  • Brahma-Gyan: Purified and courageous consciousness leads to complete living.

शब्दार्थ

वि = दूर / अलग ग्राम्याः = गाँव के / घरेलू पशवः = पशु आरण्यैः = वन्य (जंगली पशुओं) से वि = अलग आपः = जल तृष्णया = प्यास के कारण असरन् = चले गए / अलग हो गए वि अहम् = मैं दूर हो जाऊँ सर्वेण = समस्त पाप्मना = पाप / दोष से वि = अलग यक्ष्मेण = रोग से सम् आयुषा = पूर्ण आयु के साथ ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 650 शब्द)

यह मन्त्र प्राकृतिक उपमाओं के माध्यम से शुद्धि और संरक्षण की कामना करता है। “वि ग्राम्याः पशवः आरण्यैः”— जैसे ग्राम के पशु वन्य पशुओं से अलग रहते हैं। यहाँ “ग्राम्य” का अर्थ है— पालित, संयमित, सामाजिक जीवन में रहने वाले। “आरण्य” का अर्थ है— वन्य, असंयमित, उग्र। अर्थात् सभ्य और असभ्य प्रवृत्तियाँ भिन्न हैं। सामाजिक जीवन अनुशासन और मर्यादा पर आधारित है। “व्यापः तृष्णया असरन्”— जैसे जल प्यास के कारण अलग होकर बह जाता है। यह उपमा बताती है कि प्रकृति में भी अलगाव और संतुलन के नियम हैं। इन उपमाओं के बाद वही प्रार्थना— “व्यहं सर्वेण पाप्मना”— मैं समस्त दोष से दूर हो जाऊँ। “वि यक्ष्मेण सम आयुषा”— रोग से दूर होकर पूर्ण आयु प्राप्त करूँ। यहाँ अर्थ है— जैसे ग्राम्य पशु वन्य पशुओं से अलग रहते हैं, वैसे ही मैं बुरी प्रवृत्तियों से दूर रहूँ। जैसे जल अपनी गति से बहकर अशुद्ध स्थानों को छोड़ देता है, वैसे ही मैं दोषों को त्याग दूँ। दार्शनिक दृष्टि से— यह मन्त्र विवेक का संदेश देता है। जीवन में हमें यह पहचानना चाहिए कि कौन-सी प्रवृत्ति ग्राम्य (संयमित) है और कौन-सी आरण्य (उग्र, अनियंत्रित)। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से— असंयमित इच्छाएँ (तृष्णा) व्यक्ति को भटका देती हैं। संयम और विवेक मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से— पाप और रोग दोनों असंतुलन के परिणाम हैं। जब व्यक्ति अनुशासित और संतुलित जीवन जीता है, तो रोग और दोष उससे दूर रहते हैं। यह मन्त्र प्रकृति के उदाहरण देकर सिखाता है— 1. अनुशासन आवश्यक है। 2. असंयमित प्रवृत्तियों से दूरी रखो। 3. दोषों को त्यागो। 4. पूर्ण आयु और स्वास्थ्य की कामना करो। यह एक आंतरिक शुद्धि की प्रार्थना है— जैसे पशु और जल अपने स्वभाव के अनुसार अलग रहते हैं, वैसे ही जीवन में शुद्ध और अशुद्ध के बीच भेद करो। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: विवेक से ही दोषों से दूरी संभव है।
  • विज्ञान: संयमित जीवनशैली स्वास्थ्य की रक्षा करती है।
  • ब्रह्मज्ञान: जब आत्मा संतुलन में रहती है, तब पाप और रोग दूर हो जाते हैं।
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English Explanation

This mantra uses natural imagery: just as domestic animals remain separate from wild ones, and waters flow away driven by thirst, so may the individual remain separated from sin and disease. It teaches discernment, discipline, and purification for attaining a full lifespan. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Discernment protects from harmful tendencies.
  • Science: A disciplined lifestyle preserves health.
  • Brahma-Gyan: Inner balance keeps sin and disease away.

शब्दार्थ

वि = अलग / दूर / विस्तृत मे = मेरे लिए द्यावा-पृथिवी = आकाश और पृथ्वी इतः = यहाँ से वि = चारों ओर पन्थानः = मार्ग दिशं दिशम् = प्रत्येक दिशा में वि अहम् = मैं दूर हो जाऊँ सर्वेण = समस्त पाप्मना = पाप / दोष से वि = अलग यक्ष्मेण = रोग से सम् आयुषा = पूर्ण आयु के साथ ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 650 शब्द)

यह मन्त्र व्यापकता, स्वतंत्रता और शुद्ध जीवन की कामना का सुंदर उदाहरण है। “वी मे द्यावापृथिवी”— मेरे लिए आकाश और पृथ्वी विस्तृत हों। यहाँ “द्यावा-पृथिवी” का अर्थ है सम्पूर्ण ब्रह्मांड का ऊपरी और निचला क्षेत्र। अर्थात् जीवन में संकुचन न हो, विचार और कर्म दोनों में विस्तार हो। “इतो वि पन्थानो दिशं दिशम्”— यहाँ से प्रत्येक दिशा में मेरे लिए मार्ग खुलें। यह केवल भौतिक मार्ग नहीं, बल्कि अवसर, संभावना और प्रगति के मार्ग हैं। जीवन में जब दोष और रोग होते हैं, तो मार्ग संकुचित हो जाते हैं। इसलिए आगे कहा— “व्यहं सर्वेण पाप्मना”— मैं समस्त पाप से दूर हो जाऊँ। “वि यक्ष्मेण सम आयुषा”— रोग से दूर होकर पूर्ण आयु प्राप्त करूँ। यहाँ गहरा संबंध है— जब व्यक्ति पाप और रोग से मुक्त होता है, तभी उसके लिए दिशाएँ खुलती हैं। दार्शनिक दृष्टि से— आकाश विस्तार का प्रतीक है, पृथ्वी स्थिरता का। जब जीवन में स्थिरता और विस्तार दोनों संतुलित हों, तभी संपूर्ण विकास संभव है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से— संकुचित सोच जीवन के मार्ग रोक देती है। शुद्ध मन और स्वस्थ शरीर नए अवसरों को देखने की क्षमता देते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से— “द्यावा-पृथिवी” चेतना के ऊर्ध्व और अधो आयाम हैं। जब चेतना शुद्ध होती है, तो आत्मा को अनंत दिशा का अनुभव होता है। यह मन्त्र हमें सिखाता है— 1. जीवन में विस्तार की भावना रखो। 2. अवसरों को पहचानो। 3. दोष और रोग से दूरी रखो। 4. दीर्घ और संतुलित आयु की कामना करो। यह एक सकारात्मक जीवन-दर्शन है— जहाँ व्यक्ति सीमाओं को तोड़कर चारों दिशाओं में उन्नति करे। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: शुद्ध और स्वस्थ जीवन से अवसर बढ़ते हैं।
  • विज्ञान: मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से क्षमता और संभावनाएँ विकसित होती हैं।
  • ब्रह्मज्ञान: शुद्ध चेतना को अनंत दिशाओं का अनुभव होता है।
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English Explanation

This mantra prays that heaven and earth open wide, and that paths extend in every direction. It seeks freedom from sin and disease to attain full lifespan and limitless opportunity. It symbolizes expansion of life, clarity of mind, and holistic well-being. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Purity opens life’s pathways.
  • Science: Good health enhances opportunities.
  • Brahma-Gyan: Pure consciousness experiences boundless expansion.

शब्दार्थ

त्वष्टा = सर्जक / रचयिता दुहित्रे = दुहिता (उत्पन्न करने वाली शक्ति) वहतुं = संचालित करने दे युनक्तीतीदं = यह जोड़ा / संयुक्त विश्वं भुवनं = सम्पूर्ण ब्रह्मांड वि याति = फैलाए / संचालित करे वि अहम् = मैं दूर हो जाऊँ सर्वेण = समस्त पाप्मना = पाप / दोष से वि = अलग यक्ष्मेण = रोग से सम् आयुषा = पूर्ण आयु के साथ ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 650 शब्द)

यह मन्त्र रचना, संरक्षण और समग्र जीवनशक्ति की प्रार्थना करता है। “त्वष्टा दुहित्रे वहतुं”— त्वष्टा, जो सर्जक और संरक्षक हैं, दुहित्र (सृजनशक्ति) के माध्यम से संचालित करें। यह शक्ति न केवल जीवनदायिनी है, बल्कि समस्त ब्रह्मांड के विकास और पालन का प्रतीक है। “युनक्तीतीदं विश्वं भुवनं वि याति”— जैसे यह शक्ति पूरे विश्व और भुवन में व्याप्त हो। यह केवल भौतिक दुनिया की सुरक्षा नहीं, बल्कि नैतिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी सुरक्षा है। फिर वही प्रार्थना— “व्यहं सर्वेण पाप्मना”— मैं समस्त दोष से दूर हो जाऊँ। “वि यक्ष्मेण सम आयुषा”— रोग से दूर होकर पूर्ण आयु प्राप्त करूँ। यहाँ मन्त्र बताता है कि सृजनशक्ति, जीवनशक्ति और स्वास्थ्य परस्पर जुड़े हैं। यदि जीवनशक्ति और चेतना शुद्ध और जाग्रत है, तो व्यक्ति दोष और रोग से सुरक्षित रहता है। दार्शनिक दृष्टि से— विश्व का प्रत्येक तत्व सृजन और पालन के नियम से जुड़ा है। इस मन्त्र में यह नियम हमारे जीवन में भी लागू किया गया है— शुद्ध विचार, शुद्ध कर्म और स्वास्थ्य। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से— जब जीवन शक्ति और मानसिक ऊर्जा संतुलित रहती है, तो भय, दोष और रोग दूर रहते हैं। इसलिए यह मन्त्र मानसिक स्वास्थ्य और सकारात्मक चेतना का प्रतीक है। आध्यात्मिक दृष्टि से— त्वष्टा का उल्लेख चेतना की उच्च शक्ति को दर्शाता है। दुहित्रा सृजन और विकास का प्रतीक है। जब चेतना जागृत और सृजनशील होती है, तो जीवन में निरंतर विकास और सुरक्षा होती है। यह मन्त्र हमें यह सिखाता है— 1. जीवन में सृजन और विकास की भावना रखो। 2. शुद्ध कर्म और स्वास्थ्य बनाए रखो। 3. दोष और रोग से दूरी बनाए रखो। 4. संपूर्ण और संतुलित आयु की कामना करो। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: जीवनशक्ति और चेतना शुद्ध हो तो दोष दूर रहते हैं।
  • विज्ञान: सृजनशील और संतुलित जीवन स्वास्थ्य और दीर्घायु देता है।
  • ब्रह्मज्ञान: चेतना की उच्च शक्ति ब्रह्मांडीय नियमों के अनुसार जीवन को संरक्षित करती है।
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English Explanation

This mantra invokes Tvasta (the creative and sustaining power) to let her generative force flow throughout the universe, supporting all worlds. It prays for freedom from sin and disease to attain full lifespan. It symbolizes creation, protection, and holistic vitality. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Purity and conscious vitality protect from faults.
  • Science: Creative and balanced life sustains health and longevity.
  • Brahma-Gyan: Higher consciousness aligns life with universal laws for protection.

शब्दार्थ

अग्निः = अग्नि / जीवन ऊर्जा का प्रतीक प्राणान्त्सं = प्राणों के अंत तक / सम्पूर्ण जीवन शक्ति चन्द्रः = चंद्रमा / शीतलता, संतुलन का प्रतीक प्राणेन संहितः = प्राण के साथ संयोजित / संतुलित वि अहम् = मैं दूर हो जाऊँ सर्वेण = समस्त पाप्मना = पाप / दोष से वि = अलग यक्ष्मेण = रोग से सम् आयुषा = पूर्ण आयु के साथ ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500-600 शब्द)

यह मन्त्र जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा की प्रार्थना करता है। “अग्निः प्राणान्त्सं दधाति”— जैसे अग्नि हमारे प्राणों को ऊर्जा देती है। अग्नि यहाँ जीवन शक्ति, आंतरिक ऊर्जा और चेतना का प्रतीक है। यह स्वास्थ्य, ताप और सक्रियता का स्रोत है। “चन्द्रः प्राणेन संहितः”— चंद्रमा जीवन शक्ति के साथ संतुलन और शीतलता प्रदान करता है। चंद्रमा यहाँ मानसिक शांति, भावनात्मक स्थिरता और मानसिक संतुलन का प्रतीक है। इस प्रकार यह मन्त्र संतुलन की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है— ऊर्जा और शांति, सक्रियता और स्थिरता। फिर वही प्रार्थना— “व्यहं सर्वेण पाप्मना”— मैं समस्त दोषों से मुक्त हो जाऊँ। “वि यक्ष्मेण सम आयुषा”— रोग और दुर्बलता से दूर रहकर पूर्ण आयु प्राप्त करूँ। दार्शनिक दृष्टि से— जीवन में ऊर्जा और शांति का संतुलन आवश्यक है। यदि केवल ऊर्जा है लेकिन संतुलन नहीं, तो जीवन असंतुलित और हानिकारक बन जाता है। यदि केवल शांति है लेकिन सक्रियता नहीं, तो जीवन निष्क्रिय और कमजोर बन जाता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से— अग्नि जीवन में उत्साह और साहस का प्रतीक है। चंद्रमा मानसिक स्थिरता और भावनात्मक शांति का प्रतीक है। इन दोनों के संयोजन से व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहता है। आध्यात्मिक दृष्टि से— अग्नि और चंद्रमा का संयोजन चेतना में सृजनात्मक शक्ति और संतुलन उत्पन्न करता है। यह प्रार्थना आत्मा को पाप और रोग से मुक्त करने की दिशा में है। इस मन्त्र से यह शिक्षा मिलती है— 1. जीवन ऊर्जा और मानसिक शांति का संतुलन बनाए रखो। 2. आंतरिक शक्ति का सदुपयोग करो। 3. पाप और रोग से दूरी बनाए रखो। 4. पूर्ण और स्वस्थ आयु की कामना करो। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: जीवन में संतुलन, ऊर्जा और शांति से ही स्वास्थ्य संभव है।
  • विज्ञान: मानसिक और शारीरिक संतुलन रोगों को रोकता है।
  • ब्रह्मज्ञान: जब चेतना ऊर्जा और शांति के साथ संतुलित होती है, तो व्यक्ति ब्रह्मांडीय नियमों के अनुसार जीवन को सुरक्षित रखता है।
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English Explanation

This mantra prays for the combination of Agni (vital energy) and Chandra (moon, balance) to sustain life. It seeks freedom from sin and disease to attain full lifespan. Agni represents vitality and active energy; Chandra represents calmness and mental balance. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Balanced energy and mental calmness maintain health.
  • Science: Proper balance prevents disease and fatigue.
  • Brahma-Gyan: Consciousness balanced with energy and serenity aligns life with cosmic laws.

शब्दार्थ

प्राणेन = प्राण शक्ति के द्वारा विश्वतः = सम्पूर्णतः / चारों ओर वीर्यं = शक्ति, सामर्थ्य, ऊर्जा देवाः = देवता सूर्यं = सूर्य समैरयन् = संयुक्त / संचालित कर रहे हैं वि अहम् = मैं दूर हो जाऊँ सर्वेण = समस्त पाप्मना = पाप / दोष से वि = अलग यक्ष्मेण = रोग से सम् आयुषा = पूर्ण आयु के साथ ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 600-650 शब्द)

यह मन्त्र ब्रह्मांडीय शक्ति, ऊर्जा और जीवन संरक्षण की प्रार्थना है। “प्राणेन विश्वतो वीर्यं”— संपूर्ण प्राण शक्ति के साथ। यह बताता है कि जीवन शक्ति समस्त दिशाओं में फैली हुई है। प्राण ऊर्जा न केवल हमारे शरीर में, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। “देवाः सूर्यं समैरयन्”— जैसे देवता सूर्य को चारों दिशाओं में समान रूप से संचालित करते हैं। सूर्य का प्रकाश, ऊर्जा और शक्ति सम्पूर्ण पृथ्वी और जीवन के लिए समान रूप से वितरित होती है। यह देवताओं द्वारा किए गए ब्रह्मांडीय संतुलन का प्रतीक है। इस प्रकार यह मन्त्र हमें जीवन और प्रकृति में ऊर्जा के संतुलन का संदेश देता है। फिर वही प्रार्थना— “व्यहं सर्वेण पाप्मना”— मैं समस्त दोषों से दूर हो जाऊँ। “वि यक्ष्मेण सम आयुषा”— रोग और दुर्बलता से मुक्त होकर पूर्ण आयु प्राप्त करूँ। दार्शनिक दृष्टि से— यह मन्त्र बताता है कि जीवन शक्ति का संतुलन बाहरी और आंतरिक दोनों स्तरों पर आवश्यक है। जैसे सूर्य का प्रकाश और ऊर्जा सभी प्राणियों के लिए समान है, वैसे ही जीवन में सृजन, शक्ति और स्वास्थ्य सभी के लिए समान रूप से सुनिश्चित होना चाहिए। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से— जब व्यक्ति जीवन शक्ति (प्राण) को पहचानता है और उसे संतुलित रूप से संचालित करता है, तो न केवल वह रोग और तनाव से बचता है, बल्कि मानसिक स्थिरता और साहस भी प्राप्त करता है। आध्यात्मिक दृष्टि से— देवता और सूर्य का उल्लेख चेतना और प्रकाश का प्रतीक है। यह मन्त्र चेतना के संतुलन, स्वास्थ्य और नैतिक शक्ति की प्रार्थना करता है। व्यक्ति यदि प्राण शक्ति और चेतना के संतुलन में रहता है, तो वह न केवल रोग और दोष से मुक्त रहता है, बल्कि जीवन में सफलता और दीर्घायु भी पाता है। इस मन्त्र से शिक्षा मिलती है— 1. जीवन में प्राण शक्ति का संतुलन बनाए रखो। 2. आंतरिक और बाहरी ऊर्जा का संतुलन आवश्यक है। 3. पाप और रोग से दूरी बनाए रखो। 4. पूर्ण और स्वस्थ जीवन की कामना करो। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: जीवन में प्राण ऊर्जा और स्वास्थ्य का संतुलन आवश्यक है।
  • विज्ञान: संतुलित ऊर्जा और सही जीवनशैली से रोग दूर रहते हैं।
  • ब्रह्मज्ञान: जब चेतना प्राण और ऊर्जा के संतुलन में होती है, तो व्यक्ति ब्रह्मांडीय नियमों के अनुसार सुरक्षित और सफल जीवन प्राप्त करता है।
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English Explanation

This mantra invokes the universal prana (life energy) and the Sun’s force, spread equally by the gods across all directions. It prays for freedom from sin and disease to achieve full lifespan. Prana symbolizes vitality and energy; the Sun symbolizes universal balance and light. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Balanced prana ensures health and resilience.
  • Science: Harmonious energy sustains physical and mental well-being.
  • Brahma-Gyan: Consciousness aligned with universal forces protects life and promotes longevity.

शब्दार्थ

आयुष्मताम् = लंबी आयु वाले / आयुष्कृतों के लिए आयुष्कृतां = जिन्होंने आयु दी / जिनका जीवन लंबा हो प्राणेन = जीवन शक्ति / प्राण के द्वारा जीव = जीवित रहूँ / जीवित बनाए रखो मा मृथाः = मैं न मरूँ / मृत्यु से बचाऊँ वि अहम् = मैं दूर हो जाऊँ सर्वेण = समस्त पाप्मना = पाप / दोष से वि = अलग यक्ष्मेण = रोग से सम् आयुषा = पूर्ण आयु के साथ ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500-600 शब्द)

यह मन्त्र जीवन की सुरक्षा, आयु की लंबाई और स्वास्थ्य की कामना का प्रतिपादक है। “आयुष्मतामायुष्कृतां”— यह प्रार्थना उन प्राणियों और व्यक्तियों के लिए है जो लंबी और समृद्ध आयु के अधिकारी हैं। यह आयु केवल भौतिक जीवन ही नहीं, बल्कि मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आयु को भी संदर्भित करती है। “प्राणेन जीव मा मृथाः”— प्राण के माध्यम से जीवित रहूँ, मृत्यु और दुर्बलता से दूर रहूँ। प्राण जीवन का आधार है। जब प्राण शक्तिशाली और संतुलित होता है, तो जीवन में लंबाई, स्वास्थ्य और सफलता बनी रहती है। फिर वही प्रार्थना— “व्यहं सर्वेण पाप्मना”— मैं समस्त दोष और नकारात्मकता से मुक्त हो जाऊँ। “वि यक्ष्मेण सम आयुषा”— रोग और दुर्बलता से दूर रहकर पूर्ण और लंबी आयु प्राप्त करूँ। दार्शनिक दृष्टि से— यह मन्त्र बताता है कि आयु केवल काल का माप नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, शक्ति और मानसिक संतुलन का परिणाम भी है। जो व्यक्ति अपने प्राण और कर्मों का संरक्षण करता है, वह न केवल लंबी आयु पाता है, बल्कि समग्र जीवन में फलित और समृद्ध भी रहता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से— यह प्रार्थना मन को स्थिर और जीवन शक्ति को जागृत करती है। जो व्यक्ति जीवन में सतत सावधान और सकारात्मक रहता है, वह रोग और विपत्तियों से सुरक्षित रहता है। आध्यात्मिक दृष्टि से— प्राण और चेतना का संरक्षण ब्रह्मांडीय नियमों के अनुसार जीवन को सुरक्षित बनाता है। यह मन्त्र हमें चेतावनी देता है कि जीवन शक्ति और आयु की रक्षा स्वयं हमारे कर्मों और विचारों पर निर्भर करती है। इस मन्त्र से शिक्षा मिलती है— 1. अपने प्राण और जीवन शक्ति का संरक्षण करो। 2. जीवन में स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन बनाए रखो। 3. पाप और रोग से दूरी बनाए रखो। 4. पूर्ण और लंबी आयु की कामना करो। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: जीवन शक्ति और स्वास्थ्य का संरक्षण जीवन की लंबाई सुनिश्चित करता है।
  • विज्ञान: मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य रोगों और दुर्बलता से बचाता है।
  • ब्रह्मज्ञान: चेतना और प्राण की रक्षा ब्रह्मांडीय नियमों के अनुसार जीवन को दीर्घ और सुरक्षित बनाती है।
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English Explanation

This mantra prays for long life, protection of vital energy, and freedom from sin and disease. It seeks that one lives with prana, away from death and weakness, attaining full lifespan. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Preserving life energy ensures longevity.
  • Science: Balanced physical and mental health protects from illness.
  • Brahma-Gyan: Protecting prana in alignment with universal laws leads to long and safe life.

शब्दार्थ

प्राणेन = प्राण शक्ति द्वारा प्राणतां = प्राण का सर्वोच्च / प्राणीय प्राणेहैव = प्राण में ही / जीवन शक्ति में भव = रहो / बनाए रखो मा मृथाः = मृत्यु से दूर रहो / मैं न मरूँ वि अहम् = मैं अलग हो जाऊँ सर्वेण = समस्त पाप्मना = पाप / दोष से वि = अलग यक्ष्मेण = रोग से सम आयुषा = पूर्ण आयु के साथ ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500-600 शब्द)

यह मन्त्र जीवन की सर्वोच्च प्राण शक्ति और आयु की रक्षा की प्रार्थना है। “प्राणेन प्राणतां”— प्राण के माध्यम से, जीवन की सर्वोच्च शक्ति को बनाए रखो। यह प्राण केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक प्राण का प्रतीक है। “प्राणेहैव भव”— मेरा जीवन प्राण में ही स्थित है। यदि प्राण सुरक्षित है, तो जीवन, स्वास्थ्य और चेतना भी सुरक्षित हैं। इसमें जीवन के प्रत्येक पहलू—शरीर, मन, चेतना, और आत्मा—का संरक्षण शामिल है। फिर वही प्रार्थना— “मा मृथाः”— मुझे मृत्यु और दुर्बलता से बचाओ। “व्यहं सर्वेण पाप्मना”— मैं समस्त पाप और दोष से मुक्त रहूँ। “वि यक्ष्मेण सम आयुषा”— रोग और दुर्बलता से मुक्त होकर पूर्ण और लंबी आयु प्राप्त करूँ। दार्शनिक दृष्टि से— यह मन्त्र हमें बताता है कि जीवन का मूल आधार प्राण है। प्राण के संरक्षण के बिना स्वास्थ्य, शक्ति और दीर्घायु संभव नहीं है। प्राण की रक्षा करने वाले व्यक्ति का जीवन संतुलित, सुरक्षित और फलदायी होता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से— जब व्यक्ति अपने प्राण और ऊर्जा का ध्यान रखता है, तो मन, भावनाएँ और शरीर सामंजस्य में रहते हैं। यह मानसिक स्थिरता, सकारात्मकता और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है। आध्यात्मिक दृष्टि से— प्राण और चेतना का संरक्षण ब्रह्मांडीय नियमों के अनुरूप जीवन को सुरक्षित करता है। यह मन्त्र चेतना के उच्चतम स्तर पर प्राण शक्ति का संरक्षण करने की प्रार्थना है। इस मन्त्र से शिक्षा मिलती है— 1. प्राण शक्ति और जीवन ऊर्जा का संरक्षण सर्वोपरि है। 2. जीवन में स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और ऊर्जा का ध्यान रखो। 3. पाप और रोग से दूर रहकर दीर्घायु प्राप्त करो। 4. जीवन के हर पहलू में प्राण और चेतना को बनाए रखो। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: जीवन का मूल आधार प्राण है, इसका संरक्षण जीवन और स्वास्थ्य को बनाए रखता है।
  • विज्ञान: संतुलित प्राण ऊर्जा रोगों और दुर्बलता से सुरक्षा देती है।
  • ब्रह्मज्ञान: चेतना और प्राण का संरक्षण ब्रह्मांडीय नियमों के अनुसार जीवन को दीर्घ और सुरक्षित बनाता है।
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English Explanation

This mantra prays for the preservation of the supreme vital energy (prana) in life. It seeks protection from sin, disease, and death, aiming for full lifespan. Prana represents not just physical vitality but also mental, emotional, and spiritual energy. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: The foundation of life is prana; preserving it ensures health and longevity.
  • Science: Balanced prana energy strengthens immunity and mental stability.
  • Brahma-Gyan: Protecting consciousness and prana aligns life with cosmic laws for safety and longevity.

शब्दार्थ

उदायुषा = दीर्घायु से / आयु के साथ समायुषा = संतुलित आयु / पूर्ण जीवन उदोषधीनां = दोषों और रोगों से प्रभावित रसेन = रस, जीवन शक्ति या पोषण के माध्यम से व्यहं = मैं दूर हो जाऊँ / मुक्त रहूँ सर्वेण = समस्त पाप्मना = पाप / दोष से वि = अलग यक्ष्मेण = रोग से सम आयुषा = पूर्ण और दीर्घ आयु के साथ ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500-600 शब्द)

यह मन्त्र जीवन की रक्षा, दीर्घायु और दोष-मुक्त स्वास्थ्य की प्रार्थना है। “उदायुषा समायुषोदोषधीनां रसेन”— यह प्रार्थना उन सभी दोषों और रोगों से मुक्त जीवन की है, जो आयु और स्वास्थ्य में बाधा डालते हैं। ‘रसेन’ का अर्थ है जीवन शक्ति, पोषण या आंतरिक ऊर्जा। इसका तात्पर्य यह है कि आयु और स्वास्थ्य का आधार जीवन शक्ति में है। यदि जीवन शक्ति मजबूत और संतुलित हो, तो व्यक्ति रोग, दुर्बलता और नकारात्मक प्रभावों से बचा रहता है। फिर वही प्रार्थना— “व्यहं सर्वेण पाप्मना”— मैं समस्त पाप और दोष से मुक्त रहूँ। “वि यक्ष्मेण सम आयुषा”— रोग, दुर्बलता और हानि से दूर होकर पूर्ण और दीर्घ आयु प्राप्त करूँ। दार्शनिक दृष्टि से— यह मन्त्र हमें बताता है कि जीवन शक्ति और आंतरिक ऊर्जा का संरक्षण आयु और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। जो व्यक्ति अपने जीवन में दोषों और रोगों से मुक्त रहता है, वह दीर्घ और फलदायी जीवन जीता है। यह केवल शारीरिक आयु ही नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को भी संदर्भित करता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से— इस मन्त्र का उच्चारण और ध्यान मन को स्थिर करता है। यह मानसिक तनाव, नकारात्मकता और रोग प्रतिरोधक क्षमता को नियंत्रित करता है। मन और शरीर में संतुलन बनाए रखना दीर्घायु का रहस्य है। आध्यात्मिक दृष्टि से— प्राण और चेतना का संरक्षण ब्रह्मांडीय नियमों के अनुरूप जीवन को सुरक्षित बनाता है। इस मन्त्र के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को पवित्र, स्वस्थ और दोष-मुक्त बनाता है। यह हमें यह सिखाता है कि जीवन की रक्षा स्वयं हमारे कर्मों, आचार और ऊर्जा पर निर्भर करती है। इस मन्त्र से शिक्षा मिलती है— 1. जीवन शक्ति और आंतरिक ऊर्जा का संरक्षण सर्वोपरि है। 2. दोष और रोग से बचकर दीर्घायु प्राप्त करें। 3. जीवन में मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखें। 4. पूर्ण और सुरक्षित आयु की प्रार्थना करें। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: जीवन शक्ति और दोष-मुक्त स्वास्थ्य जीवन की लंबाई सुनिश्चित करते हैं।
  • विज्ञान: संतुलित जीवन शक्ति और पोषण रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • ब्रह्मज्ञान: चेतना और प्राण की सुरक्षा ब्रह्मांडीय नियमों के अनुसार जीवन को दीर्घ और सुरक्षित बनाती है।
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English Explanation

This mantra prays for long life, vitality, and freedom from diseases or faults affecting health. It seeks liberation from sin and disease, ensuring a full and balanced lifespan. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Vitality and health free from defects ensure longevity.
  • Science: Balanced life force and nourishment protect from disease and weakness.
  • Brahma-Gyan: Protecting consciousness and prana aligns life with universal laws, ensuring long and safe existence.

शब्दार्थ

आ = ओ / हे पर्जन्यस्य = पर्जन्य, वर्षा और जलदायक देवता वृष्ट्योदस्थाम् = वर्षा, अमृत जैसे जीवनदायिनी आ मृता = अमृत, जीवनदायिनी वयम् = हम / मुझे व्यहं = मैं दूर हो जाऊँ / मुक्त रहूँ सर्वेण = समस्त पाप्मना = पाप / दोष से वि = अलग यक्ष्मेण = रोग से सम आयुषा = पूर्ण और दीर्घ आयु के साथ ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500-600 शब्द)

यह मन्त्र प्रकृति, वर्षा और जीवनदायिनी शक्ति की प्रार्थना है। “आ पर्जन्यस्य वृष्ट्योदस्थामामृता वयम्”— यह पर्जन्य (वर्षा) की वर्षा, अमृत जैसे जीवनदायिनी तत्व के लिए प्रार्थना है। पर्जन्य केवल पानी ही नहीं है, बल्कि यह जीवन, पोषण और उर्वरता का प्रतीक है। जैसे वर्षा के बिना जीवन संभव नहीं, वैसे ही प्राण और स्वास्थ्य के लिए जीवन शक्ति का संरक्षण आवश्यक है। फिर वही प्रार्थना— “व्यहं सर्वेण पाप्मना”— मैं समस्त पाप और दोष से मुक्त रहूँ। “वि यक्ष्मेण सम आयुषा”— रोग और दुर्बलता से दूर होकर पूर्ण और दीर्घ आयु प्राप्त करूँ। दार्शनिक दृष्टि से— यह मन्त्र बताता है कि मानव और प्रकृति का जीवन गहरे रूप से जुड़ा है। पर्जन्य (वर्षा) जैसे जीवनदायिनी तत्व हमारे शरीर और प्राण शक्ति को संतुलित रखते हैं। जब प्राण और प्राकृतिक संतुलन सुरक्षित रहता है, तो रोग और मृत्यु से सुरक्षा मिलती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से— प्राकृतिक और जीवनदायिनी शक्तियों का स्मरण मन को स्थिर और सकारात्मक बनाता है। यह ध्यान और प्रार्थना मानसिक संतुलन और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से— पर्जन्य, वर्षा और अमृत का उल्लेख ब्रह्मांडीय जीवन शक्ति का प्रतीक है। यह मन्त्र जीवन में समग्र स्वास्थ्य, दीर्घायु और पवित्रता की प्रार्थना है। जो व्यक्ति प्रकृति की जीवनदायिनी शक्तियों के साथ संतुलन में रहता है, वह दीर्घ और सुरक्षित जीवन प्राप्त करता है। इस मन्त्र से शिक्षा मिलती है— 1. जीवन में प्राण शक्ति और प्राकृतिक संतुलन का संरक्षण आवश्यक है। 2. पाप और रोग से बचकर दीर्घायु प्राप्त करें। 3. प्राकृतिक और जीवनदायिनी शक्तियों का सम्मान करें। 4. पूर्ण और स्वस्थ जीवन की प्रार्थना करें। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: जीवन शक्ति और प्राकृतिक संतुलन से दीर्घायु और स्वास्थ्य सुनिश्चित होता है।
  • विज्ञान: प्राकृतिक तत्व और पोषण रोग और दुर्बलता से रक्षा करते हैं।
  • ब्रह्मज्ञान: चेतना और प्राण का संरक्षण ब्रह्मांडीय नियमों के अनुसार जीवन को सुरक्षित बनाता है।
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English Explanation

This mantra invokes the life-giving power of Parjanya (rain), equated with amrita (immortality), for nourishment and vitality. It prays for freedom from sin and disease, aiming for full and balanced lifespan. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Life force and natural balance ensure longevity and health.
  • Science: Natural elements and nourishment protect from disease and weakness.
  • Brahma-Gyan: Aligning consciousness and prana with universal forces secures long and healthy life.

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