दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
याम् = जिस (औषधि को)
त्वा = तुझे
गन्धर्वः = गन्धर्व ने
अखनत् = खोदा / निकाला
वरुणाय = वरुण के लिए
मृतभ्रजे = मृतभ्रज (एक विशेष प्रयोजन हेतु)
ताम् = उसी को
त्वा = तुझे
वयम् = हम
खनामसि = खोदते हैं
ओषधिम् = औषधि
शेपहर्षणीम् = शिश्न को हर्षित/उत्तेजित करने वाली
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सरल हिन्दी अर्थ
जिस औषधि को गन्धर्व ने
वरुण के लिए खोदा था,
उसी औषधि को हम भी खोदते हैं—
जो उत्तेजना और शक्ति देने वाली है।
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भावार्थ
यह मंत्र एक विशेष औषधि के उत्खनन का है।
वेदकाल में औषधियाँ केवल भौतिक उपचार नहीं,
बल्कि दिव्य ऊर्जा से युक्त मानी जाती थीं।
यहाँ औषधि—
✔ जीवनशक्ति
✔ प्रजनन-शक्ति
✔ उत्साह
को जागृत करने वाली मानी गई है।
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दैविक संकेत
गन्धर्व = सूक्ष्म शक्तियों के ज्ञाता
वरुण = जल और ऋत (सत्य) के देव
इससे संकेत मिलता है कि
यह औषधि पवित्र, विधिपूर्वक और
दैवी प्रयोजन से ग्रहण की जाती थी।
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आध्यात्मिक दृष्टि
“शेपहर्षणी” केवल शारीरिक अर्थ तक सीमित नहीं है।
यह जीवन में आनंद, उत्साह और सृजन-शक्ति का भी प्रतीक है।
औषधि = प्रकृति की छिपी हुई ऊर्जा
खनन = साधना द्वारा उसे प्राप्त करना
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अनुष्ठानिक प्रयोग
यह सूक्त—
✔ वाजीकरण (ऊर्जा-वर्धन)
✔ औषधि-संस्कार
✔ वैदिक चिकित्सा अनुष्ठान
में प्रयुक्त होता था।
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English Explanation
The herb which the Gandharva once dug for Varuṇa,
that same herb we now dig —
the invigorating, life-stirring plant.
It symbolizes the sacred extraction of natural vitality and creative force from nature.
शब्दार्थ
उद् = ऊपर / उदित हो
उषाः = उषा (प्रभात)
उदु = उदित हो
सूर्यः = सूर्य
उद् इदं = ऊपर उठे यह
मामकं = मेरा
वचः = वचन / संकल्प
उदेजतु = ऊपर उठाए / जागृत करे
प्रजापतिः = प्रजापति
वृषा = वृषभ समान शक्तिशाली
शुष्मेण = बल / ऊर्जा से
वाजिना = सामर्थ्य / तेज से युक्त
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सरल हिन्दी अर्थ
उषा उदित हो, सूर्य उदित हो,
और मेरा यह वचन (संकल्प) भी उदित हो।
प्रजापति अपने वृषभ समान बल और ऊर्जा से
इसे जागृत और समर्थ करें।
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विस्तृत व्याख्या (600 शब्द)
यह मंत्र जागरण, उत्थान और जीवन-ऊर्जा के उत्कर्ष का अद्भुत वैदिक उद्घोष है। यहाँ साधक केवल सूर्य के उदय की प्रार्थना नहीं करता, बल्कि अपने “वचन” अर्थात् संकल्प, इच्छा और जीवन-शक्ति के उदय की भी कामना करता है।
वेदों में “उषा” केवल भोर नहीं है; वह चेतना का प्रथम प्रकाश है। जब उषा आती है, तो अंधकार हटता है, दिशाएँ स्पष्ट होती हैं और जीवन गति प्राप्त करता है। उसी प्रकार साधक चाहता है कि उसके भीतर भी एक नई उषा प्रकट हो—नया उत्साह, नई प्रेरणा, नई जागृति।
“उदु सूर्य” का आह्वान बाह्य सूर्य के साथ-साथ आंतरिक सूर्य का भी प्रतीक है। बाहरी सूर्य पृथ्वी को प्रकाश देता है, परन्तु आंतरिक सूर्य आत्मा को प्रकाश देता है। यह आत्मप्रकाश ही मनुष्य को निर्भय, समर्थ और सृजनशील बनाता है।
मंत्र का अत्यंत गूढ़ भाग है—“उदिदं मामकं वचः”। यहाँ “वचः” केवल बोले गए शब्द नहीं हैं। यह संकल्प, प्रतिज्ञा और जीवन-दृष्टि का प्रतीक है। वैदिक दृष्टि में वाणी सृजन-शक्ति है। जो कहा जाता है, वह ऊर्जा के रूप में ब्रह्मांड में प्रवाहित होता है। इसलिए साधक चाहता है कि उसका वचन भी सूर्य के समान तेजस्वी और प्रभावी हो।
इसके बाद “उदेजतु प्रजापतिः” आता है। प्रजापति सृष्टि के नियंता, सृजन के अधिष्ठाता हैं। उनसे प्रार्थना की जाती है कि वे इस संकल्प को ऊर्ध्वगामी बनाएं। यह केवल व्यक्तिगत इच्छा नहीं, बल्कि सृष्टि-सम्मत, धर्म-सम्मत और जीवन-पोषक संकल्प हो।
“वृषा शुष्मेण वाजिना” — यहाँ वृषभ (बैल) शक्ति, पुरुषार्थ और प्रजनन-ऊर्जा का प्रतीक है। शुष्म बल और आंतरिक ऊर्जा का बोध कराता है, जबकि वाज सामर्थ्य और विजय का। अर्थात यह केवल कोमल प्रार्थना नहीं, बल्कि शक्तिशाली जागरण का मंत्र है।
दार्शनिक रूप से यह मंत्र बताता है कि प्रकृति का प्रत्येक उदय हमारे भीतर भी उदय ला सकता है। जब हम सूर्य को उगते देखते हैं, तो वह केवल आकाशीय घटना नहीं है; वह आत्मा के लिए संकेत है कि “उठो, जागो और अपने संकल्प को प्रकाश दो।”
आधुनिक जीवन में यह मंत्र अत्यंत प्रेरणादायक है। जब व्यक्ति निराशा, आलस्य या भय से घिर जाता है, तो उसे बाहरी सूर्य की भाँति भीतर का सूर्य जगाना होता है। अपने शब्दों को सकारात्मक बनाना, अपने संकल्प को ऊर्जावान बनाना और अपनी चेतना को ऊर्ध्वगामी करना—यही इस मंत्र का व्यावहारिक संदेश है।
यह मंत्र जीवन-शक्ति, पुरुषार्थ और सृजन-ऊर्जा का आह्वान है। यह बताता है कि जैसे सूर्य प्रतिदिन उदित होता है, वैसे ही मनुष्य को भी प्रतिदिन अपने संकल्प का पुनर्जन्म करना चाहिए।
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आध्यात्मिक संकेत
उषा = चेतना की भोर
सूर्य = आत्मप्रकाश
वचः = संकल्प
प्रजापति = सृजन-नियंता
वृष = शक्ति और पुरुषार्थ
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English Insight
May Dawn rise, may the Sun rise, and may my word rise with them.
May Prajāpati uplift it with the strength and vigor of a mighty bull.
This verse is an invocation of awakening — aligning personal intention with cosmic energy and creative power.
शब्दार्थ
यथा = जैसे
स्म = निश्चय ही / वास्तव में
ते = तेरा
विरोहतः = उगते हुए / अंकुरित होते हुए
अभितप्तम् इव = तप्त (उष्ण) के समान
अनति = झुकता है / मुड़ता है
ततः = उसी प्रकार
ते = तुझे
शुष्मवत्तरम् = अधिक बलवान / अधिक ऊर्जावान
इयम् = यह
कृणोतु = करे / बना दे
ओषधिः = औषधि
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सरल हिन्दी अर्थ
जैसे अंकुरित होता हुआ (वनस्पति)
तप्त होने पर झुकता है,
उसी प्रकार यह औषधि
तुझे अधिक शक्तिशाली और ऊर्जावान बना दे।
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विस्तृत व्याख्या
यह मंत्र औषधि की बलवर्धक शक्ति का वर्णन करता है। वैदिक काल में औषधि केवल शरीर के रोग निवारण का साधन नहीं थी, बल्कि जीवन-ऊर्जा को जागृत करने वाली दिव्य शक्ति मानी जाती थी।
“विरोहतो” शब्द अंकुरण का बोध कराता है। जब बीज अंकुरित होता है, तो वह भीतर की सुप्त शक्ति को प्रकट करता है। यह प्रक्रिया जीवन की मूल रचना का प्रतीक है—छिपी हुई ऊर्जा का प्रकट होना।
“अभितप्तमिवानति” — जब अंकुर सूर्य की उष्णता से प्रभावित होता है, तो वह झुकता है, परंतु नष्ट नहीं होता। वह लचीला होता है, टूटता नहीं। यहाँ यह संकेत है कि जीवन में ताप (संघर्ष, परीक्षा, श्रम) आवश्यक है। ताप से शक्ति क्षीण नहीं होती, बल्कि परिपक्व होती है।
इसके बाद मंत्र कहता है—“ततस्ते शुष्मवत्तरम्” — यह औषधि तुझे और भी अधिक शक्तिशाली बना दे। शुष्म का अर्थ केवल शारीरिक बल नहीं, बल्कि आंतरिक ओज, तेज और उत्साह है।
इस मंत्र का भाव यह है कि जैसे बीज ताप सहकर वृक्ष बनता है, वैसे ही मनुष्य भी जीवन की चुनौतियों को सहकर अधिक शक्तिशाली बन सकता है। औषधि यहाँ उस सहायक ऊर्जा का प्रतीक है जो प्रकृति प्रदान करती है।
दार्शनिक रूप से यह मंत्र विकास और सहनशीलता का सिद्धांत प्रस्तुत करता है। वृद्धि (Growth) बिना ताप के नहीं होती। कठिनाइयाँ ही व्यक्ति को परिष्कृत करती हैं। औषधि इस प्रक्रिया में पोषण और संरक्षण देती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से “औषधि” साधना का प्रतीक भी है। साधना व्यक्ति को भीतर से दृढ़ बनाती है। जैसे वनस्पति पृथ्वी से रस लेकर विकसित होती है, वैसे ही साधक दिव्य चेतना से शक्ति ग्रहण करता है।
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आधुनिक सन्दर्भ
आज के जीवन में तनाव, प्रतिस्पर्धा और संघर्ष सामान्य हैं। यह मंत्र हमें स्मरण कराता है कि ताप (Stress) विनाशकारी नहीं होना चाहिए; उसे शक्ति में रूपांतरित किया जा सकता है। उचित आहार, औषधि, अनुशासन और सकारात्मक संकल्प व्यक्ति को अधिक सशक्त बनाते हैं।
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आध्यात्मिक संकेत
विरोह = विकास
ताप = परीक्षा
औषधि = पोषणकारी शक्ति
शुष्म = आंतरिक ओज
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English Insight
As a sprouting plant bends under heat yet continues to grow,
so may this herb make you even more vigorous and powerful.
The verse symbolizes resilience — strength that increases through endurance and nourishment.
शब्दार्थ
उच्छुष्म = उत्कट ऊष्मा / प्रबल ऊर्जा
औषधीनाम् = औषधियों का
सारः = सार, श्रेष्ठ तत्त्व
ऋषभाणाम् = वृषभों (बैल) का, शक्तिशाली जनों का
सं = एकत्र / संपूर्ण रूप से
पुंसाम् = पुरुषों का / मनुष्यों का
इन्द्र = हे इन्द्र
वृष्ण्यम् = वीर्य, पुरुषत्व-शक्ति
अस्मिन् = इसमें (इस व्यक्ति में)
धेहि = स्थापित करो
तनूवशिन् = शरीर में वास करने वाले / देह को नियंत्रित करने वाले
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सरल हिन्दी अर्थ
हे इन्द्र!
औषधियों की प्रबल ऊष्मा और सार,
वृषभों की शक्ति का सार—
उसे इस पुरुष में स्थापित करो,
उसके शरीर में वीर्य और बल प्रदान करो।
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विस्तृत व्याख्या
यह मंत्र शक्ति, ओज और जीवन-ऊर्जा के समन्वय का आह्वान है। यहाँ तीन स्रोतों का उल्लेख है—
1. औषधियों का सार
2. वृषभ (ऋषभ) की शक्ति
3. इन्द्र की दिव्य ऊर्जा
“उच्छुष्म” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल ऊष्मा नहीं, बल्कि सक्रिय जीवन-ऊर्जा, जैविक ताप और आंतरिक शक्ति का संकेत देता है। वैदिक दृष्टि में स्वास्थ्य का आधार संतुलित ऊष्मा है—अत्यधिक नहीं, न्यून नहीं।
“औषधीनां सारा” का अर्थ है औषधियों का श्रेष्ठ तत्व। वनस्पतियों में निहित वह जीवनदायी शक्ति जो शरीर को पुष्ट करती है। वेदों में औषधियाँ पृथ्वी की संचित चेतना मानी गई हैं। उनका “सार” ग्रहण करना प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करना है।
“ऋषभाणाम्” — वृषभ शक्ति, स्थैर्य और प्रजनन-ऊर्जा का प्रतीक है। बैल केवल शारीरिक बल नहीं, बल्कि धैर्य, सहनशीलता और निरंतरता का भी प्रतीक है। यहाँ उस शक्ति के सार को मनुष्य में स्थापित करने की प्रार्थना है।
इसके बाद इन्द्र का आह्वान आता है। इन्द्र वैदिक साहित्य में पराक्रम, उत्साह और विजयी चेतना के देवता हैं। जब औषधि का सार और वृषभ की शक्ति इन्द्र की ऊर्जा से संयुक्त होती है, तब मनुष्य में पूर्ण जीवन-शक्ति का संचार होता है।
“वृष्ण्यम्” का अर्थ वीर्य, पुरुषत्व, सृजन-शक्ति और प्रजनन-बल है। यह केवल जैविक अर्थ तक सीमित नहीं है; यह रचनात्मक क्षमता, साहस और नेतृत्व का भी प्रतीक है।
“तनूवशिन्” का तात्पर्य है—जो देह में स्थित है, जो शरीर का स्वामी है। यहाँ संकेत है कि यह शक्ति शरीर में संतुलित रूप से स्थित हो, अनियंत्रित न हो।
दार्शनिक रूप से यह मंत्र बताता है कि मनुष्य की शक्ति तीन स्तरों पर आती है—
✔ प्रकृति से (औषधि)
✔ पशुबल और प्रवृत्ति से (वृषभ)
✔ दैवी चेतना से (इन्द्र)
जब ये तीनों समन्वित होते हैं, तब जीवन में पूर्णता आती है।
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आधुनिक संदर्भ
आज के संदर्भ में यह मंत्र स्वास्थ्य, पोषण और मानसिक शक्ति का संदेश देता है।
✔ संतुलित आहार (औषधि का सार)
✔ शारीरिक अभ्यास और धैर्य (वृषभ-बल)
✔ आत्मविश्वास और सकारात्मक मानसिकता (इन्द्र-शक्ति)
इनके संयोजन से व्यक्ति सशक्त और ऊर्जावान बनता है।
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आध्यात्मिक संकेत
औषधि = प्रकृति का पोषण
वृषभ = स्थिर शक्ति
इन्द्र = विजयी चेतना
वृष्ण्य = सृजन-ऊर्जा
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English Insight
O Indra, place within this person the potent essence of herbs and the strength of the bull; establish virility and vigor in his body.
The verse symbolizes the harmonizing of natural vitality, animal strength, and divine courage to awaken complete life-force.
शब्दार्थ
अपाम् = जलों का
रसः = सार, जीवन-रस
प्रथमजः = प्रथम उत्पन्न / आद्य तत्व
अथो = और भी
वनस्पतीनाम् = वनस्पतियों का
उत = तथा
सोमस्य = सोम का
भ्राता = भाई
असि = तू है
उत = और भी
अर्षम् = ऊर्जस्वी / गतिशील सार
असि = तू है
वृष्ण्यम् = वीर्य-शक्ति / पुरुषत्व-बल
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सरल हिन्दी अर्थ
तू जलों का प्रथम उत्पन्न रस है,
और वनस्पतियों का भी सार है।
तू सोम का भाई है,
और तू ऊर्जस्वी वीर्य-शक्ति है।
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विस्तृत व्याख्या
यह मंत्र जीवन-रस की महिमा का अत्यंत काव्यात्मक और दार्शनिक वर्णन करता है। यहाँ जिस तत्त्व का स्तवन किया जा रहा है, वह केवल कोई भौतिक औषधि नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त जीवन-ऊर्जा का सार है।
“अपां रसः” — जलों का रस। वेदों में जल को जीवन का मूल आधार माना गया है। जल ही बीज को अंकुरित करता है, पृथ्वी को पोषित करता है और प्राणियों के जीवन को बनाए रखता है। “रस” का अर्थ केवल द्रव नहीं, बल्कि जीवन का सारतत्त्व है। अतः यह तत्त्व जीवन की मूल शक्ति है।
“प्रथमजः” — प्रथम उत्पन्न। इसका अर्थ है कि यह जीवन-रस सृष्टि के आदिकाल से विद्यमान है। जल से ही जीवन की उत्पत्ति मानी गई है। आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है कि जीवन का प्रारंभ जल से हुआ। वेद इस सत्य को प्रतीकात्मक भाषा में व्यक्त करते हैं।
“वनस्पतीनाम्” — वनस्पतियों का सार। वनस्पतियाँ पृथ्वी की जीवंत चेतना का रूप हैं। वे सूर्य, जल और पृथ्वी के संयोग से विकसित होती हैं। इस मंत्र में कहा गया है कि यह जीवन-तत्त्व वनस्पतियों में भी विद्यमान है—अर्थात यह सर्वत्र व्याप्त ऊर्जा है।
“सोमस्य भ्राता” — सोम का भाई। सोम वेदों में अमृत, आनंद और दिव्य चेतना का प्रतीक है। यदि यह तत्त्व सोम का भाई है, तो इसका अर्थ है कि यह भी आनंद, ओज और अमृतत्व से जुड़ा हुआ है। यहाँ औषधि केवल शारीरिक शक्ति नहीं देती, बल्कि मानसिक प्रसन्नता और आध्यात्मिक उत्साह भी प्रदान करती है।
“अर्षम्” शब्द गति, प्रवाह और ऊर्जा का बोध कराता है। यह स्थिर शक्ति नहीं, बल्कि गतिशील जीवन-ऊर्जा है।
अंत में “वृष्ण्यम्” — वीर्य-शक्ति। यहाँ वीर्य केवल जैविक अर्थ में नहीं, बल्कि सृजन-क्षमता, उत्साह, नेतृत्व और जीवन-प्रेरणा का प्रतीक है।
दार्शनिक रूप से यह मंत्र बताता है कि मनुष्य में जो शक्ति है, वह अलग नहीं है; वह जल, वनस्पति और सोम से जुड़ी हुई उसी सार्वभौमिक ऊर्जा का अंश है। जब व्यक्ति प्रकृति के साथ संतुलन में रहता है, तो वही जीवन-रस उसके भीतर प्रबल होता है।
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आधुनिक दृष्टि
आज के समय में यह मंत्र हमें तीन मूल स्रोतों की ओर संकेत करता है—
✔ जल का महत्व (Hydration और जीवन-आधार)
✔ पौधों से प्राप्त पोषण
✔ मानसिक आनंद और सकारात्मकता
इन तीनों के संतुलन से शरीर और मन में वास्तविक शक्ति उत्पन्न होती है।
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आध्यात्मिक संकेत
जल = जीवन का आधार
वनस्पति = पोषण और विकास
सोम = आनंद और अमृत
वृष्ण्य = सृजन-ऊर्जा
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English Insight
You are the primal essence of the waters, the sap of plants;
you are the brother of Soma, the flowing, vital virility.
This verse celebrates the universal life-essence that flows through water, plants, joy, and creative power.
शब्दार्थ
अद्य = आज, अभी
अग्ने = हे अग्नि
अद्य = आज
सवितः = हे सविता देव
अद्य = आज
देवि सरस्वति = हे देवी सरस्वती
अद्य = आज
अस्य = इसके (इस पुरुष के)
ब्रह्मणस्पते = हे ब्रह्मणस्पति
धनुः इव = धनुष के समान
आ तानय = खींच दो, तान दो
पसः = शक्ति, बल, तेज
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सरल हिन्दी अर्थ
हे अग्नि! आज,
हे सविता! आज,
हे देवी सरस्वती! आज,
हे ब्रह्मणस्पति!
इसकी शक्ति को धनुष के समान तान दो।
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विस्तृत व्याख्या
यह मंत्र दिव्य शक्तियों का सामूहिक आह्वान है। यहाँ चार प्रमुख देवताओं को पुकारा गया है—
1. अग्नि
2. सविता
3. सरस्वती
4. ब्रह्मणस्पति
“अद्य” शब्द की पुनरावृत्ति विशेष ध्यान देने योग्य है। इसका अर्थ है—अभी, इसी क्षण। यह विलंब नहीं चाहता; यह तात्कालिक ऊर्जा का आह्वान है।
अग्नि वैदिक परंपरा में जीवन-ऊर्जा, उत्साह और शुद्धि के प्रतीक हैं। अग्नि प्रेरणा का आरंभिक स्रोत है।
सविता सूर्य की प्रेरक शक्ति है—जो जागृति और कर्म-प्रेरणा देती है।
सरस्वती ज्ञान, वाणी और प्रवाह की देवी हैं। शक्ति केवल शारीरिक न हो; वह बुद्धि और वाणी में भी प्रकट हो।
ब्रह्मणस्पति मंत्र-शक्ति और वाणी के अधिपति हैं। वे संकल्प को साकार करने वाली शक्ति हैं।
इन चारों शक्तियों का संयुक्त आह्वान दर्शाता है कि पूर्ण सामर्थ्य केवल शरीर में नहीं, बल्कि—
✔ ऊर्जा (अग्नि)
✔ प्रेरणा (सविता)
✔ ज्ञान (सरस्वती)
✔ संकल्प-शक्ति (ब्रह्मणस्पति)
—के समन्वय से उत्पन्न होता है।
“धनुरिवा तानया पसः” — धनुष के समान तान दो। धनुष जब तना होता है तभी उसमें बल संचित होता है। शिथिल धनुष से बाण नहीं चलता।
यहाँ “तानना” का अर्थ है—
✔ शक्ति को जागृत करना
✔ क्षमता को केंद्रित करना
✔ ऊर्जा को दिशा देना
धनुष तानने की क्रिया अनुशासन और एकाग्रता का प्रतीक है।
दार्शनिक दृष्टि से यह मंत्र कहता है कि मनुष्य में निहित शक्ति सुप्त रहती है। उसे जागृत करने के लिए ऊर्जा, प्रेरणा, ज्ञान और मंत्र-बल की आवश्यकता है।
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आधुनिक सन्दर्भ
आज के जीवन में यह मंत्र आत्म-सक्रियता का संदेश देता है।
✔ प्रेरित रहो
✔ ज्ञान अर्जित करो
✔ अपनी ऊर्जा को लक्ष्य की ओर केंद्रित करो
जब मन, बुद्धि और शरीर एक दिशा में तने हों—तभी सफलता संभव है।
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आध्यात्मिक संकेत
अग्नि = आंतरिक ऊर्जा
सविता = जागरण
सरस्वती = ज्ञान प्रवाह
ब्रह्मणस्पति = संकल्प-शक्ति
धनुष = केंद्रित सामर्थ्य
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English Insight
O Agni, O Savitar, O Divine Sarasvati,
O Brahmanaspati—today stretch his power like a bow.
The verse symbolizes the awakening and focusing of energy, knowledge, and will into directed strength.
शब्दार्थ
अहम् = मैं
तनोमि = फैलाता हूँ / तानता हूँ
ते = तेरी
पसः = शक्ति, बल
अधि = ऊपर, पर
ज्याम् इव = प्रत्यंचा (धनुष की डोरी) के समान
धन्वनि = धनुष पर
क्रमस्व = आगे बढ़ो, क्रम से चलो
अर्शः इव = तीव्र गति वाले के समान
रोहितम् = लाल अश्व / तेजस्वी घोड़ा
अनवग्लायता = बिना थके, बिना शिथिल हुए
सदा = सदा
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सरल हिन्दी अर्थ
मैं तेरी शक्ति को
धनुष पर चढ़ी प्रत्यंचा की तरह तानता हूँ।
तू लाल अश्व के समान
सदा आगे बढ़, बिना थके।
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विस्तृत व्याख्या
यह मंत्र पिछले मंत्र (धनुष-उपमा) का ही विस्तार है। यहाँ साधक स्वयं कहता है—“अहम् तनोमि” — मैं तेरी शक्ति को तानता हूँ।
यहाँ दो प्रमुख प्रतीक हैं—
✔ धनुष की प्रत्यंचा
✔ रोहित (लाल) अश्व
“ज्यामिव धन्वनि” — जैसे धनुष पर डोरी तनी होती है, वैसे ही शक्ति को केंद्रित और नियंत्रित किया जाता है। ढीली डोरी से बाण लक्ष्य तक नहीं पहुँचता। यह संकेत देता है कि जीवन में अनुशासन और एकाग्रता आवश्यक है।
“रोहितम्” — लाल अश्व। वैदिक साहित्य में लाल रंग ऊर्जा, उत्साह और जीवन-तेज का प्रतीक है। अश्व गति और सामर्थ्य का प्रतीक है।
“अनवग्लायता सदा” — कभी शिथिल न हो, कभी निराश न हो।
यह मंत्र केवल शारीरिक बल का नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता का भी आह्वान है।
दार्शनिक रूप से देखें तो—
धनुष = शरीर
प्रत्यंचा = मन
बाण = संकल्प
लक्ष्य = जीवन का उद्देश्य
जब मन संयमित और तना हुआ हो, तभी संकल्प लक्ष्य तक पहुँचता है।
“क्रमस्व” — क्रम से चलो। यह अराजक गति नहीं, बल्कि अनुशासित प्रगति है।
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आधुनिक सन्दर्भ
आज के समय में यह मंत्र हमें सिखाता है—
✔ अपनी ऊर्जा को व्यर्थ न जाने दें
✔ लक्ष्य स्पष्ट रखें
✔ निरंतरता बनाए रखें
✔ थकान और निराशा से ऊपर उठें
जीवन एक लंबी दौड़ है। इसमें शक्ति का सही उपयोग ही सफलता दिलाता है।
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I stretch your strength like a bowstring upon the bow.
Move forward like a red steed, never growing weary.
The verse inspires disciplined energy, focused will, and tireless progress toward one's goal.
शब्दार्थ
अश्वस्य = घोड़े का
अश्वतरस्य = खच्चर / अश्वतुल्य पशु का
अजस्य = बकरे का
पेत्वस्य = मेढ़े (भेड़े) का
अथ = और
ऋषभस्य = बैल / श्रेष्ठ वृषभ का
ये = जो
वाजाः = बल, ऊर्जा, वीर्य, पोषण-शक्ति
तान् = उन सबको
अस्मिन् = इसमें (इस पुरुष में)
धेहि = स्थापित करो
तनूवशिन् = शरीर के स्वामी / देह में स्थित बलदाता
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सरल हिन्दी अर्थ
घोड़े का बल,
अश्वतर (खच्चर) का बल,
बकरे और मेढ़े का बल,
और वृषभ का जो पराक्रम है—
हे तनूवशिन्! वह सब इस शरीर में स्थापित कर दो।
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विस्तृत व्याख्या
यह मंत्र विभिन्न पशुओं की शक्तियों का आह्वान करता है। वैदिक चिंतन में प्रत्येक पशु किसी विशेष गुण का प्रतीक है। यहाँ शारीरिक, मानसिक और प्राणशक्ति के समन्वय की कामना की गई है।
अश्व – गति, तेज, उत्साह और युद्ध-शक्ति का प्रतीक।
अश्वतर – धैर्य और सहनशीलता का प्रतीक (भार वहन करने वाला)।
अज (बकरा) – चपलता और जीवन्तता का प्रतीक।
पेत्व (मेढ़ा) – जुझारूपन और साहस का प्रतीक।
ऋषभ (वृषभ) – स्थिरता, वीर्य और श्रेष्ठता का प्रतीक।
“वाज” शब्द केवल भोजन या शक्ति नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन-ऊर्जा, विजय-शक्ति और पोषण का द्योतक है।
यहाँ साधक इन सब गुणों को अपने भीतर स्थापित करने की प्रार्थना करता है।
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दार्शनिक संकेत
यह मंत्र हमें बताता है कि पूर्णता एक ही गुण से नहीं आती।
✔ गति भी चाहिए (अश्व)
✔ धैर्य भी चाहिए (अश्वतर)
✔ चपलता भी चाहिए (अज)
✔ साहस भी चाहिए (मेढ़ा)
✔ स्थिर शक्ति भी चाहिए (ऋषभ)
जब ये सभी गुण संतुलित रूप से व्यक्ति में स्थापित होते हैं, तभी वह “पूर्ण पुरुषार्थ” को प्राप्त करता है।
“तनूवशिन्” — जो शरीर का स्वामी है, अर्थात् आत्मा या प्राणशक्ति। यही वास्तविक नियंत्रक है।
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आधुनिक सन्दर्भ
आज के जीवन में सफलता के लिए—
✔ गति (तेज़ निर्णय)
✔ सहनशीलता (कठिनाइयों में धैर्य)
✔ साहस (जोखिम उठाने की क्षमता)
✔ स्थिरता (दीर्घकालिक दृष्टि)
—इन सबका संतुलन आवश्यक है।
यह मंत्र समग्र विकास (Holistic Power) का संदेश देता है।
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English Insight
May the vigor of the horse, the mule, the goat, the ram,
and the mighty strength of the bull
be established in this body.
The verse symbolizes the integration of speed, endurance, courage, vitality, and stability into one harmonious power.
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