दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
सहस्र-शृङ्गः = हजार सींगों वाला
वृषभः = बलवान बैल / महाशक्ति का प्रतीक
यः = जो
समुद्रात् = समुद्र से
उदाचरत् = ऊपर उठा / प्रकट हुआ
तेन = उसी से
सहस्येन = महान शक्ति द्वारा
वयम् = हम
नि = नीचे / शान्त
जनान् = लोगों को
स्वापयामसि = सुलाते हैं / शान्त करते हैं
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सरल हिन्दी अर्थ
जो सहस्रशृंग वाला वृषभ
समुद्र से प्रकट हुआ,
उस महान शक्ति के द्वारा
हम लोगों को शान्त (निद्रित) करते हैं।
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विस्तृत व्याख्या
यह मंत्र अत्यंत प्रतीकात्मक है।
“सहस्रशृङ्गो वृषभः” — हजार सींगों वाला वृषभ।
यह कोई सामान्य पशु नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय शक्ति का प्रतीक है।
सहस्र (हजार) = अनंत शक्तियाँ
शृंग (सींग) = सामर्थ्य, प्रहार-शक्ति
वृषभ = वीर्य, स्थिरता, महाबल
“समुद्र” यहाँ केवल जलराशि नहीं, बल्कि सृष्टि के आदिम स्रोत का प्रतीक है। वैदिक दर्शन में समुद्र = अनंत चेतना, ब्रह्म का गर्भ।
अर्थात् यह वृषभ उस आदिम चेतना से प्रकट हुई ब्रह्मांडीय शक्ति है।
“तेना सहस्येन” — उसी महान सामर्थ्य से।
यह सूक्त विशेष रूप से “स्वापन” (शत्रुओं या विघ्नों को शान्त/निष्क्रिय करने) के संदर्भ में प्रयोग होता था।
यहाँ “स्वापयामसि” का अर्थ केवल नींद नहीं, बल्कि—
✔ अशांति को शान्त करना
✔ विरोध को निष्क्रिय करना
✔ भय को स्थिर करना
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दार्शनिक संकेत
समुद्र = चेतना का मूल स्रोत
वृषभ = प्रकट शक्ति
सहस्रशृंग = अनंत संभावनाएँ
यह मंत्र सिखाता है कि जब मनुष्य उस मूल चेतना से जुड़ता है, तब उसमें अनंत शक्ति प्रकट होती है।
वह शक्ति बाहरी संघर्ष को शांत करने में सक्षम होती है।
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आधुनिक सन्दर्भ
आज के जीवन में यह मंत्र हमें बताता है—
✔ अपनी ऊर्जा का स्रोत भीतर खोजो
✔ बाहरी शोर को शांत करो
✔ आंतरिक बल से परिस्थिति को नियंत्रित करो
जब मन स्थिर और शक्तिशाली होता है, तब विघ्न स्वयं शांत हो जाते हैं।
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आध्यात्मिक दृष्टि
यह वृषभ ब्रह्मांडीय पुरुष की शक्ति है।
यह वही चेतना है जो सृष्टि के समुद्र से प्रकट हुई।
उस शक्ति का स्मरण करके साधक अपने जीवन में स्थिरता और प्रभाव स्थापित करता है।
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English Insight
The thousand-horned Bull who arose from the cosmic ocean—
by that mighty power we bring beings into rest.
This verse symbolizes drawing upon primordial cosmic strength to pacify disturbances and restore harmony.
शब्दार्थ
न = न
भूमिम् = पृथ्वी को
वातः = वायु
अति वाति = अधिक न बहे
न = न
अति पश्यति = स्पष्ट न देखे
कश्चन = कोई भी
स्त्रियः च = और स्त्रियाँ भी
सर्वाः = सब
स्वापय = सुला दे, शान्त कर दे
शुनः च = और कुत्तों को भी
इन्द्रसखा = इन्द्र का मित्र
चरन् = विचरते हुए / कार्य करते हुए
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सरल हिन्दी अर्थ
न वायु अधिक बहे,
न कोई कुछ देख पाए।
सब स्त्रियाँ सो जाएँ,
और कुत्ते भी —
हे इन्द्र के मित्र! उन्हें शान्त कर दे।
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विस्तृत व्याख्या
यह मंत्र “स्वापन” सूक्त का भाग है। इसका उद्देश्य बाहरी गतिविधियों और विघ्नों को शान्त करना है।
“न भूमिं वातो अति वाति” — वायु भी तीव्र न बहे।
यह पूर्ण स्थिरता की स्थिति का संकेत है।
“नाति पश्यति कश्चन” — कोई भी जागरूक न रहे, कोई बाधा न बने।
यहाँ “स्त्रियः” और “शुनः” (कुत्ते) का उल्लेख प्रतीकात्मक है। प्राचीन समाज में रात के समय जागने वाले या शोर करने वाले तत्वों का द्योतक।
“इन्द्रसखा” — यह अग्नि या अन्य देवशक्ति का विशेषण है, जो इन्द्र का सहयोगी है। अर्थात् वह दिव्य शक्ति जो विघ्नों को शांत कर सके।
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दार्शनिक संकेत
यह मंत्र केवल बाहरी लोगों को सुलाने का नहीं है, बल्कि—
✔ इन्द्रिय-वृत्तियों को शान्त करने का
✔ मन के विक्षेपों को रोकने का
✔ चित्त को स्थिर करने का
वायु = चंचल मन
देखना = जिज्ञासा और बाह्य आकर्षण
कुत्ते = इन्द्रियों की सतर्कता
साधना में गहन ध्यान के लिए आवश्यक है कि—
✔ मन का वायु-तत्त्व शांत हो
✔ इन्द्रियाँ स्थिर हों
✔ बाहरी संसार से विच्छेद हो
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आधुनिक सन्दर्भ
आज के समय में यह मंत्र हमें सिखाता है—
✔ ध्यान करते समय मोबाइल, शोर और विक्षेप बंद रखें
✔ मानसिक अशांति को शांत करें
✔ भीतर की शांति को प्राथमिकता दें
यह “डिजिटल डिटॉक्स” का वैदिक रूप भी कहा जा सकता है।
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आध्यात्मिक दृष्टि
जब वायु (प्राण) स्थिर होता है,
जब इन्द्रियाँ शांत होती हैं,
तब आत्मा की अनुभूति संभव होती है।
यह मंत्र उस मौन की स्थापना का आह्वान है,
जिसमें आत्मबोध प्रकट होता है।
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English Insight
Let not the wind blow fiercely;
let no one see.
Let all be lulled to rest—
even the watchful ones.
The verse symbolizes the establishment of total stillness—externally and internally—for higher purpose and concentration.
शब्दार्थ
एजत्-एजत् = जो भी गतिमान है, जो हिलता-डुलता है
अजग्रभम् = मैंने पकड़ लिया / वश में कर लिया
चक्षुः = नेत्र, दृष्टि
प्राणम् = प्राण, जीवन-शक्ति
अजग्रभम् = पकड़ लिया
अङ्गानि = अंग-प्रत्यंग
अजग्रभम् = वश में किया
सर्वाः = सब
रात्रीणाम् = रात्रियों की
अतिशर्वरे = गहन अंधकार में / अति-निशा में
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सरल हिन्दी अर्थ
जो भी चलायमान था, उसे मैंने पकड़ लिया।
नेत्रों को पकड़ा, प्राण को पकड़ा।
सभी अंगों को वश में किया—
गहन रात्रि के अंधकार में।
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विस्तृत व्याख्या
यह मंत्र स्वापन-सूक्त का अत्यंत गूढ़ भाग है। यहाँ साधक कहता है—
“अजग्रभम्” — मैंने पकड़ लिया, वश में कर लिया।
यह बाहरी लोगों को सुलाने की क्रिया से आगे बढ़कर,
स्वयं की इन्द्रियों और प्राण को नियंत्रित करने का संकेत देता है।
“एजदेजत्” — जो भी हिलता है।
यह केवल बाहरी गति नहीं, बल्कि—
✔ चंचल मन
✔ इन्द्रियों की दौड़
✔ प्राण की गति
सबको पकड़कर स्थिर करना।
“रात्रीणाम् अतिशर्वरे” — गहन रात्रि।
रात्रि यहाँ अज्ञान या ध्यान की गहराई का प्रतीक भी है।
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दार्शनिक संकेत
यह मंत्र योग-दर्शन की गूढ़ अवस्था का वर्णन करता है।
✔ चक्षु = ज्ञानेंद्रिय
✔ प्राण = जीवन-ऊर्जा
✔ अङ्गानि = कर्मेंद्रिय
जब ये सब “अजग्रभम्” — नियंत्रण में आ जाते हैं,
तब साधक ध्यान की उच्च अवस्था में प्रवेश करता है।
यह पतंजलि के “प्रत्याहार” की स्थिति से मिलता-जुलता भाव है —
जहाँ इन्द्रियाँ भीतर खिंच जाती हैं।
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आध्यात्मिक दृष्टि
रात्रि = मौन
अंधकार = बाहरी जगत से विमुखता
जब साधक गहन मौन में प्रवेश करता है—
✔ दृष्टि शांत
✔ प्राण स्थिर
✔ शरीर निष्क्रिय
तब आत्मचेतना प्रकट होती है।
यह मंत्र बताता है कि वास्तविक नियंत्रण बाहरी नहीं,
आंतरिक है।
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आधुनिक सन्दर्भ
आज की भागदौड़ में—
✔ आँखें स्क्रीन पर लगी हैं
✔ प्राण तनाव से व्याकुल हैं
✔ शरीर थका हुआ है
यह मंत्र सिखाता है—
थोड़ी देर सब कुछ रोक दो।
मन, दृष्टि, श्वास—सबको शांत करो।
यही मानसिक पुनर्स्थापन (mental reset) है।
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English Insight
Whatever was moving, I have seized.
I have seized the sight, the breath.
I have taken hold of all the limbs
in the deep stillness of night.
The verse symbolizes mastery over senses and life-force,
entering profound inner silence.
शब्दार्थ
यः = जो
आस्ते = बैठा है
यः = जो
चरति = चलता है
यः = जो
तिष्ठन् = खड़ा है
विपश्यति = देखता है / जागरूक है
तेषाम् = उन सबके
सं दध्मः = हम बंद करते हैं / स्थिर कर देते हैं
अक्षीणि = नेत्र
यथा = जैसे
इदम् = यह
हर्म्यम् = भवन / महल
तथा = वैसे ही
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सरल हिन्दी अर्थ
जो बैठा है,
जो चलता है,
जो खड़ा होकर देख रहा है—
उन सबकी आँखें हम बंद कर देते हैं,
जैसे यह भवन (हर्म्य) पूर्णतः स्थिर और बंद है।
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विस्तृत व्याख्या (600+ शब्द)
यह मंत्र स्वापन-सूक्त का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। यहाँ साधक बाहरी गतिविधियों को पूर्णतः स्थिर करने की घोषणा करता है।
“य आस्ते” — जो बैठा है।
“यश्चरति” — जो चल रहा है।
“यश्च तिष्ठन् विपश्यति” — जो खड़ा होकर देख रहा है।
इन तीन अवस्थाओं का उल्लेख अत्यंत अर्थपूर्ण है। वैदिक भाषा में ये केवल शारीरिक मुद्राएँ नहीं हैं, बल्कि चेतना की अवस्थाएँ भी हैं।
बैठा हुआ व्यक्ति — निष्क्रिय प्रतीत होता है, परंतु जागरूक हो सकता है।
चलने वाला — सक्रिय कर्म में संलग्न है।
खड़ा होकर देखने वाला — निरीक्षक है, साक्षी है।
अर्थात् कोई भी अवस्था हो — विश्राम, कर्म या निरीक्षण — साधक उन सबको शान्त करने की शक्ति का आह्वान करता है।
“तेषां सं दध्मो अक्षीणि” — हम उनकी आँखें बंद कर देते हैं।
यहाँ “आँखें बंद करना” केवल शाब्दिक अर्थ में नहीं है। यह जागरूकता को निष्क्रिय करना, बाहरी सतर्कता को शांत करना, और गतिविधि को रोकना है।
प्राचीन वैदिक समाज में यह मंत्र रात्रि-कालीन सुरक्षा, शत्रु-निरोध या विशेष अनुष्ठानों के समय उच्चरित किया जाता था, ताकि बाहरी विघ्न न हों।
“यथेदं हर्म्यं तथा” — जैसे यह भवन है, वैसे ही।
“हर्म्य” का अर्थ है — महल, विशाल भवन, प्रासाद।
एक भवन की विशेषता क्या है?
✔ वह स्थिर है
✔ उसकी दीवारें बंद हैं
✔ भीतर शांति है
✔ बाहर का शोर भीतर नहीं आता
साधक चाहता है कि बाहरी संसार की जागरूकता उसी प्रकार स्थिर और बंद हो जाए जैसे एक मजबूत भवन।
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दार्शनिक अर्थ
इस मंत्र का गूढ़ अर्थ अत्यंत सूक्ष्म है।
बैठा हुआ = मन
चलने वाला = इन्द्रियाँ
देखने वाला = अहंकार या निरीक्षण-भाव
जब तक ये तीनों सक्रिय हैं, तब तक चित्त स्थिर नहीं हो सकता।
योग-दर्शन में कहा गया है—
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”
चित्त की वृत्तियों को रोकना ही योग है।
यह मंत्र उसी दिशा में एक वैदिक प्रयास है।
“अक्षीणि सं दध्मः” — आँखों को बंद करना = ज्ञानेंद्रियों का प्रत्याहार।
जब बाहरी दृष्टि बंद होती है, तभी आंतरिक दृष्टि खुलती है।
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आध्यात्मिक दृष्टिकोण
यह मंत्र साधना की उस अवस्था का प्रतीक है जहाँ—
✔ बाहरी गतिविधि रुक जाती है
✔ इन्द्रियाँ भीतर लौट आती हैं
✔ मन स्थिर हो जाता है
भवन (हर्म्य) यहाँ ध्यान-गृह का प्रतीक भी हो सकता है।
जब साधक ध्यान में बैठता है, वह अपने भीतर एक आंतरिक “हर्म्य” बनाता है—
एक ऐसा सुरक्षित स्थान जहाँ बाहरी संसार प्रवेश नहीं कर सकता।
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आधुनिक संदर्भ
आज के समय में—
✔ कोई बैठा है, पर मोबाइल देख रहा है।
✔ कोई चल रहा है, पर मन व्याकुल है।
✔ कोई खड़ा है, पर भीतर चिंता चल रही है।
यह मंत्र हमें सिखाता है—
कभी-कभी सब कुछ बंद कर देना आवश्यक है।
दृष्टि को विश्राम देना,
मन को विराम देना,
चेतना को शांत करना।
जैसे घर का दरवाज़ा बंद कर हम विश्राम करते हैं,
वैसे ही इन्द्रियों के द्वार बंद करना भी आवश्यक है।
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English Insight
Whether one sits, walks, or stands observing—
we close their eyes,
as firmly as a well-built mansion stands enclosed.
The verse symbolizes the sealing of external awareness,
establishing profound stillness and protection.
शब्दार्थ
स्वप्तु = सो जाए
माता = माता
पिता = पिता
श्वा = कुत्ता
विश्पतिः = कुलपति / गृहस्वामी / समुदाय का प्रधान
स्वपन्तु = सो जाएँ
अस्यै = इसके लिए / इस (कार्य) हेतु
ज्ञातयः = संबंधी, कुटुम्बी
स्वप्तु = सो जाए
अयम् = यह
अभितः = चारों ओर
जनः = लोग
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सरल हिन्दी अर्थ
माता सो जाए, पिता सो जाए,
कुत्ता सो जाए, गृहस्वामी भी सो जाए।
इसके लिए (इस कार्य की सिद्धि हेतु)
सभी संबंधी सो जाएँ,
और चारों ओर के लोग भी सो जाएँ।
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विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
यह मंत्र स्वापन-सूक्त का अत्यंत मानवीय और व्यापक भाग है। यहाँ साधक केवल सामान्य जन को ही नहीं, बल्कि परिवार, समाज और आसपास के सभी व्यक्तियों को शांति और निद्रा में लीन होने का आह्वान करता है।
“स्वप्तु माता, स्वप्तु पिता” — माता और पिता का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैदिक समाज में माता-पिता सुरक्षा, जागरूकता और संरक्षण के प्रतीक माने जाते थे। यदि वे जाग्रत हैं, तो घर सचेत है। यहाँ साधक चाहता है कि घर का प्रत्येक संरक्षक भी विश्राम में चला जाए।
“स्वप्तु श्वा” — कुत्ता प्राचीन समाज में रात्रि का प्रहरी था। उसका जागना सतर्कता और संभावित विघ्न का संकेत था। इसलिए उसका भी शांत होना आवश्यक है।
“स्वप्तु विश्पतिः” — ‘विश्पति’ का अर्थ है समुदाय या गृह का स्वामी, मुखिया, नेता। यदि वह जाग रहा है, तो गतिविधि संभव है। अतः उसकी भी निद्रा की कामना की जाती है।
फिर मंत्र और व्यापक हो जाता है—
“स्वपन्त्वस्यै ज्ञातयः” — इसके (साधक के प्रयोजन) लिए सभी संबंधी सो जाएँ।
यहाँ “अस्यै” शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। इसका अर्थ हो सकता है — इस स्त्री के लिए, इस उद्देश्य के लिए, इस कर्म के लिए। वैदिक अनुष्ठानों में कभी-कभी यह मंत्र विशेष प्रयोजन, विशेष कर्म या रात्रि के गुप्त अनुष्ठान के संदर्भ में प्रयुक्त होता था।
“स्वप्त्वयमभितो जनः” — चारों ओर का जन-समुदाय भी सो जाए।
अब दायरा केवल घर तक सीमित नहीं है; पूरा परिवेश, पूरा समाज, चारों दिशाओं का लोक — सब शान्त हो जाए।
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दार्शनिक दृष्टि
यदि हम इसे आंतरिक साधना के संदर्भ में देखें, तो इसका अर्थ अत्यंत गूढ़ हो जाता है।
माता = भावनाएँ
पिता = बुद्धि
श्वा = इन्द्रियों की सतर्कता
विश्पति = अहंकार (आंतरिक शासक)
ज्ञातयः = स्मृतियाँ, संबंध, मानसिक बंधन
अभितो जनः = बाहरी संसार के विचार
साधक कहता है —
मेरी भावनाएँ शांत हों।
मेरी बुद्धि विश्राम ले।
मेरी इन्द्रियाँ स्थिर हों।
मेरा अहंकार शांत हो।
मेरी स्मृतियाँ मौन हों।
और बाहरी विचारों की भीड़ रुक जाए।
यह ध्यान की गहन अवस्था की तैयारी है।
जब तक मन में संबंधों, भूमिकाओं, पहचान और सामाजिक चेतना की हलचल है, तब तक आत्म-निष्ठ मौन संभव नहीं।
यह मंत्र पूर्ण आंतरिक मौन की स्थापना का आह्वान है।
---
आधुनिक संदर्भ
आज के जीवन में—
✔ परिवार की जिम्मेदारियाँ
✔ सामाजिक अपेक्षाएँ
✔ मोबाइल की सूचनाएँ
✔ मानसिक संवाद
ये सब “अभितो जनः” हैं — चारों ओर के लोग और विचार।
यह मंत्र हमें सिखाता है कि—
कभी-कभी संपूर्ण विश्राम आवश्यक है।
डिजिटल मौन, मानसिक मौन, सामाजिक मौन।
जब हम स्वयं को थोड़ी देर के लिए संसार से अलग करते हैं, तभी ऊर्जा पुनः संचित होती है।
---
आध्यात्मिक निष्कर्ष
यह मंत्र किसी के प्रति द्वेष का नहीं, बल्कि शांति की स्थापना का मंत्र है।
यह उस मौन की स्थापना है जहाँ—
✔ कोई विघ्न न हो
✔ कोई जागरूकता बाधा न बने
✔ केवल साधक और उसका लक्ष्य रह जाए
यह बाहरी और आंतरिक दोनों स्तरों पर शांति का आह्वान है।
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English Insight
Let the mother sleep, let the father sleep.
Let the watchdog and the lord of the house sleep.
Let the relatives sleep,
and all the people around fall into rest.
This verse symbolizes the establishment of total environmental and psychological silence,
creating the perfect condition for focused intention or deep meditation.
शब्दार्थ
स्वप्न = हे निद्रा / स्वप्न-देवता
स्वप्न-अभिकरणेन = अपनी निद्रा-शक्ति द्वारा
सर्वम् = सबको
नि स्वापय = गहन निद्रा में सुला दे
जनम् = लोगों को
उत् = और / आगे
सूर्यम् = सूर्य के उदय तक
अन्यान् = अन्य सबको
स्वापय = सुला दे
अव्युषम् = जब तक प्रभात न हो
जागृतात् = जाग्रत रहे
अहम् = मैं
इन्द्र इव = इन्द्र के समान
अरिष्टः = अहित रहित, सुरक्षित
अक्षितः = अक्षुण्ण, अविनाशी
---
सरल हिन्दी अर्थ
हे निद्रा! अपनी शक्ति से सब लोगों को सुला दे।
सूर्योदय तक अन्य सभी को सोए रहने दे।
और जब तक प्रभात न हो,
मैं जाग्रत रहूँ—
इन्द्र के समान सुरक्षित और अक्षुण्ण।
---
विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
यह मंत्र स्वापन-सूक्त का अत्यंत रोचक और गूढ़ भाग है। पहले के मंत्रों में साधक सबको सुलाने का आह्वान करता है; यहाँ वह स्वयं को जाग्रत और सुरक्षित रखने की बात करता है।
“स्वप्न स्वप्नाभिकरणेन” — हे निद्रा, अपनी शक्ति से।
यहाँ निद्रा को एक सजीव, सक्रिय शक्ति के रूप में संबोधित किया गया है। वैदिक दृष्टि में स्वप्न और निद्रा केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि दैवीय ऊर्जा है।
“सर्वं नि स्वापया जनम्” — सबको सुला दे।
यह पूर्ण शांति की कामना है—कोई जागता न रहे, कोई विघ्न न बने।
“उत्सूर्यम् अन्यान् स्वापय” — सूर्य के उदय तक अन्य सब सोए रहें।
अर्थात् पूरी रात्रि तक बाहरी संसार शांत रहे।
परंतु इसके बाद मंत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ लेता है—
“अव्युषं जागृतादहम्” — प्रभात तक मैं जाग्रत रहूँ।
यहाँ साधक स्वयं को अलग रखता है। वह चाहता है कि बाहरी जगत सो जाए, पर वह स्वयं सजग रहे।
“इन्द्र इव अरिष्टः अक्षितः” — इन्द्र के समान, अहित रहित और अक्षुण्ण।
इन्द्र वैदिक साहित्य में शक्ति, जागरूकता, विजय और संरक्षण के प्रतीक हैं। स्वयं को इन्द्र के समान कहना आत्मबल और आत्मविश्वास का द्योतक है।
---
गूढ़ दार्शनिक अर्थ
इस मंत्र का गहन आध्यात्मिक संकेत अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यहाँ दो अवस्थाएँ हैं—
✔ बाहरी जगत — निद्रा में
✔ साधक — जाग्रत
यह अद्वैत चेतना की ओर संकेत करता है।
जब संसार अज्ञान (निद्रा) में है, तब साधक ज्ञान (जागरण) में है।
यह केवल शारीरिक जागरण नहीं है; यह चेतना का जागरण है।
“स्वप्न” यहाँ माया या अज्ञान का भी प्रतीक हो सकता है।
साधक कहता है—
संसार अपने स्वप्न में रहे,
पर मैं आत्म-जागरण में रहूँ।
---
योगिक दृष्टिकोण
ध्यान की उच्च अवस्था में साधक बाहरी इन्द्रियों को विश्राम देता है,
पर भीतर की जागरूकता प्रखर रहती है।
इसे “योग-निद्रा” की अवस्था से जोड़ा जा सकता है—
जहाँ शरीर विश्राम में, पर चेतना जाग्रत।
यहाँ “इन्द्र इव” का प्रयोग बताता है कि जागरण में शक्ति, निर्भयता और संरक्षण होना चाहिए।
---
आधुनिक संदर्भ
आज के समय में यह मंत्र अत्यंत प्रेरणादायक है।
दुनिया शोर, भ्रम और मानसिक स्वप्नों में उलझी है।
लोग भीड़ का अनुसरण करते हैं, पर जाग्रत कम होते हैं।
यह मंत्र कहता है—
✔ भीड़ सोती रहे
✔ भ्रम चलता रहे
✔ पर तुम जागो
आंतरिक जागरूकता ही वास्तविक सुरक्षा है।
---
आध्यात्मिक निष्कर्ष
यह मंत्र पूर्ण संतुलन सिखाता है—
बाहरी शांति + आंतरिक जागरण
साधक चाहता है कि विघ्न शांत हों,
पर उसकी चेतना जाग्रत रहे।
इसी अवस्था में साधना सफल होती है।
---
English Insight
O Sleep, by your power lull all people to rest.
Let others sleep until sunrise.
But let me remain awake until dawn—
safe and unharmed like Indra.
The verse reflects a profound state where the world rests in unconsciousness,
while the seeker remains inwardly awakened and protected.
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