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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

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AtharvaVeda, kand 4 sukta 6

शब्दार्थ

ब्राह्मणः = ब्रह्मज्ञानी / ब्रह्मस्वरूप पुरुष जज्ञे = उत्पन्न हुआ प्रथमः = सर्वप्रथम दश-शीर्षः = दस सिर वाला दश-आस्यः = दस मुख वाला सः = वह सोमम् = सोमरस / अमृततत्त्व प्रथमः = सबसे पहले पपौ = पिया सः = उसी ने चकार = बनाया अरसम् = रसहीन विषम् = विष ---

सरल हिन्दी अर्थ

ब्रह्मस्वरूप पुरुष सबसे पहले उत्पन्न हुआ— दस सिर और दस मुखों वाला। उसी ने सबसे पहले सोमरस पिया, और उसी ने विष को रसहीन कर दिया। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र अत्यंत गूढ़ और प्रतीकात्मक है। यहाँ “ब्राह्मण” शब्द जाति-सूचक नहीं, बल्कि ब्रह्म के ज्ञाता, आद्य पुरुष, ब्रह्मांडीय चेतना का द्योतक है। “ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो” — ब्रह्मस्वरूप चेतना सर्वप्रथम प्रकट हुई। यह वैदिक सृष्टि-दर्शन की मूल अवधारणा है कि चेतना पहले है, पदार्थ बाद में। ब्रह्म ही सृष्टि का आद्य तत्त्व है। “दशशीर्षो दशास्यः” — दस सिर और दस मुख। यह प्रतीकात्मक संख्या है। “दश” पूर्णता का सूचक है। यह दस दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, चार उपदिशाएँ, ऊपर, नीचे) का भी संकेत हो सकता है। दस सिर = सर्वज्ञता दस मुख = सर्वव्यापक अभिव्यक्ति अर्थात् वह चेतना सभी दिशाओं में देखती है और सभी दिशाओं में बोलती है। यहाँ यह स्मरणीय है कि वैदिक साहित्य में बहु-शीर्ष या बहु-मुख रूप व्यापकता और अनंत शक्ति का प्रतीक होता है। “स सोमं प्रथमः पपौ” — उसी ने सोमरस का प्रथम पान किया। सोम केवल एक पेय नहीं, बल्कि आनंद, अमरत्व और दिव्य चेतना का प्रतीक है। ब्रह्मस्वरूप पुरुष ही उस दिव्य आनंद का प्रथम अनुभव करता है। अर्थात् चेतना स्वयं में आनंदस्वरूप है। “स चकार अरसं विषम्” — उसी ने विष को रसहीन कर दिया। यह अत्यंत गूढ़ वाक्य है। विष = पीड़ा, अज्ञान, नकारात्मकता अरसम् = प्रभावहीन अर्थात् जो ब्रह्म को जान लेता है, उसके लिए विष भी निष्प्रभावी हो जाता है। यह आध्यात्मिक रूपांतरण का संकेत है— ज्ञान विष को अमृत में बदल देता है। ---

दार्शनिक दृष्टि

इस मंत्र में सृष्टि, आनंद और रूपांतरण—तीनों का समन्वय है। ✔ चेतना पहले है ✔ आनंद उसका स्वभाव है ✔ ज्ञान से विष भी निष्प्रभावी हो जाता है यह उपनिषदों की उस शिक्षा से मेल खाता है— “रसॊ वै सः” — ब्रह्म ही रस है। जो ब्रह्म को जानता है, वह भय से मुक्त हो जाता है। ---

आध्यात्मिक संकेत

दस सिर = इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण दस मुख = कर्म और वाणी की पूर्णता सोम पान = आत्मानंद की प्राप्ति विष का अरस होना = द्वैत का लोप जब साधक आत्मज्ञान प्राप्त करता है, तब संसार का विष उसे प्रभावित नहीं करता। ---

आधुनिक संदर्भ

आज “विष” अनेक रूपों में है— ✔ तनाव ✔ क्रोध ✔ ईर्ष्या ✔ भय यदि चेतना जाग्रत हो जाए, तो यही विष निष्प्रभावी हो सकता है। ज्ञान और आत्मबोध मानसिक विषहरण (detox) का कार्य करते हैं। ---

English Insight

The primordial Brahmana arose first, with ten heads and ten mouths. He first drank Soma, and rendered poison tasteless. The verse symbolizes primordial consciousness— all-seeing, all-expressing— that experiences divine bliss and transforms poison into harmlessness through knowledge.

शब्दार्थ

यावती = जितनी व्यापक द्यावा-पृथिवी = आकाश और पृथ्वी वरिम्णा = विस्तार में यावत् = जितने सप्त सिन्धवः = सात नदियाँ वितष्ठिरे = फैली हुई हैं / प्रवाहित हैं वाचम् = वाणी विषस्य = विष की दूषणीम् = दूषित करने वाली / हानिकारक ताम् = उस (वाणी को) इतः = यहाँ से / इस स्थान से निरवादिषम् = दूर कर दिया / निष्कासित किया ---

सरल हिन्दी अर्थ

जितनी व्यापक यह द्युलोक और पृथ्वी है, और जितनी दूर तक सात नदियाँ फैली हुई हैं— उस विष को दूषित करने वाली वाणी को मैंने यहाँ से दूर कर दिया। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र अत्यंत गूढ़ और प्रभावशाली है। यहाँ कवि या साधक ब्रह्मांड की व्यापकता का आह्वान करता है—आकाश और पृथ्वी का विस्तार, सात नदियों का प्रवाह—और उस विराट संदर्भ में “विषस्य दूषणी वाच्” अर्थात् विषैली वाणी को निष्कासित करने की घोषणा करता है। “यावती द्यावापृथिवी वरिम्णा” — जितना विशाल यह आकाश और पृथ्वी है। वैदिक साहित्य में “द्यावा-पृथिवी” संपूर्ण सृष्टि का प्रतीक है। आकाश ऊर्ध्व चेतना का, और पृथ्वी स्थूल जगत का प्रतीक है। “यावत्सप्त सिन्धवो वितष्ठिरे” — जितनी दूर तक सात नदियाँ फैली हैं। “सप्त सिन्धवः” केवल भौगोलिक नदियाँ नहीं, बल्कि जीवन-ऊर्जा के सात प्रवाहों का भी संकेत हो सकता है। सात संख्या पूर्णता, संतुलन और आध्यात्मिक संरचना का प्रतीक है। इन दोनों पंक्तियों द्वारा कवि ब्रह्मांडीय विस्तार की साक्षी देता है— जैसे सृष्टि व्यापक है, वैसे ही उसका संकल्प भी व्यापक है। फिर मुख्य कथन आता है— “वाचं विषस्य दूषणीम्” — वह वाणी जो विष को दूषित करती है, या स्वयं विषैली है। यहाँ “विष” केवल भौतिक जहर नहीं, बल्कि नकारात्मकता, अपशब्द, शाप, निंदा, कटुता और मानसिक विष का प्रतीक है। वाणी में अपार शक्ति है। ✔ वह अमृत बन सकती है ✔ वह विष भी बन सकती है कटु वचन हृदय को घायल कर सकते हैं। इस मंत्र में साधक घोषणा करता है— “तामितो निरवादिषम्” — मैंने उसे यहाँ से निकाल दिया, दूर कर दिया। यह केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संकल्प है। ---

दार्शनिक अर्थ

वेदों में वाणी (वाक्) को दैवी शक्ति माना गया है। वाणी सृष्टि का माध्यम है। यदि वाणी शुद्ध है, तो चेतना शुद्ध होती है। यदि वाणी विषैली है, तो मानसिक वातावरण दूषित हो जाता है। यह मंत्र वाणी-शुद्धि का मंत्र है। जैसे ब्रह्मांड विशाल है, वैसे ही हमारा संकल्प भी विशाल हो— और हम अपने जीवन से विषैली वाणी को निष्कासित कर दें। ---

आंतरिक साधना का संकेत

यह मंत्र बाहरी शत्रु-वचन को शांत करने के साथ-साथ आंतरिक नकारात्मक संवाद को भी शांत करने का संकेत देता है। हमारे भीतर भी एक वाणी है— ✔ आत्म-आलोचना ✔ भय ✔ हीनता ✔ क्रोध यह आंतरिक “विषस्य दूषणी वाच्” है। साधक कहता है— मैं इसे दूर करता हूँ। यह आत्म-शुद्धि की घोषणा है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज सोशल मीडिया, राजनीति और दैनिक जीवन में वाणी का विष व्यापक है। नकारात्मक शब्द मानसिक वातावरण को प्रदूषित कर देते हैं। यह मंत्र सिखाता है— ✔ शब्दों का चयन सावधानी से करो ✔ कटु वचन से बचो ✔ अपने परिवेश को शुद्ध रखो शब्द ही वास्तविक शक्ति हैं। ---

आध्यात्मिक निष्कर्ष

जैसे आकाश और पृथ्वी व्यापक हैं, वैसे ही हमारा आत्मबल व्यापक हो। हम अपने जीवन से— ✔ विषैले शब्द ✔ नकारात्मक विचार ✔ दूषित भाव सबको दूर कर दें। तभी वाणी अमृत बनेगी। ---

English Insight

As vast as heaven and earth, as far as the seven rivers flow— I have driven away from here the speech that poisons like venom. The verse affirms the purification of speech, removing toxic words and harmful expression to restore harmony and inner clarity.

शब्दार्थ

सुपर्णः = सुंदर पंखों वाला, दिव्य पक्षी गरुत्मान् = गरुत्मान् (गरुड़स्वरूप) त्वा = तुझे विष = हे विष प्रथमम् = सबसे पहले आवयत् = निगल लिया / नष्ट किया न = नहीं अमीमदः = तू आनंदित हुआ न = नहीं अरूरुपः = बढ़ सका / फैल सका उत = और अस्मा = उसके लिए अभवः = हुआ पितुः = पिता के लिए ---

सरल हिन्दी अर्थ

हे विष! तुझे सबसे पहले सुपर्ण गरुत्मान ने निगल लिया। तू न बढ़ सका, न फैल सका, और न ही अपने जनक के लिए उपयोगी हुआ। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र विष-निवारण सूक्त का एक महत्वपूर्ण भाग है। यहाँ “सुपर्ण” और “गरुत्मान” का उल्लेख है—जो वैदिक साहित्य में दिव्य पक्षी, आकाशगामी शक्ति और विष-नाशक ऊर्जा के प्रतीक हैं। “सुपर्णस्त्वा गरुत्मान् विष प्रथममावयत्” — हे विष! तुझे गरुत्मान सुपर्ण ने सबसे पहले निगल लिया। गरुत्मान (गरुड़) भारतीय परंपरा में सर्प-विनाशक और विष-नाशक के रूप में प्रसिद्ध है। वह तेज, बल और दिव्य संरक्षण का प्रतीक है। यहाँ यह कथन प्रतीकात्मक है— दिव्य चेतना विष को उत्पन्न होते ही निष्प्रभावी कर देती है। “प्रथमम्” शब्द महत्वपूर्ण है। विष को फैलने का अवसर ही नहीं दिया गया। यह दर्शाता है कि सजगता (awareness) यदि प्रारंभ में ही सक्रिय हो जाए, तो नकारात्मकता फैल नहीं पाती। --- “नामीमदो नारूरुप” — तू न आनंदित हुआ, न बढ़ सका। विष का स्वभाव फैलना है। परंतु यहाँ उसे रोका गया है। अर्थात् दुष्प्रभाव को जड़ से समाप्त कर दिया गया। “उतास्मा अभवः पितुः” — और तू अपने जनक के लिए भी उपयोगी न हुआ। यहाँ “पिता” उस स्रोत या कारण का प्रतीक हो सकता है जहाँ से विष उत्पन्न हुआ। अर्थात् विष अपनी उत्पत्ति के उद्देश्य को भी पूर्ण न कर सका। ---

गूढ़ दार्शनिक अर्थ

यह मंत्र केवल भौतिक विष की बात नहीं करता। यह जीवन के मानसिक और आध्यात्मिक विषों की ओर संकेत करता है— ✔ क्रोध ✔ ईर्ष्या ✔ द्वेष ✔ अपशब्द ✔ भय यदि सजगता (गरुत्मान) जाग्रत है, तो विष प्रारंभ में ही नष्ट हो जाता है। गरुत्मान यहाँ उच्च चेतना का प्रतीक है। सुपर्ण = विस्तृत पंखों वाला अर्थात् व्यापक दृष्टि। जब दृष्टि व्यापक होती है, तो छोटे-छोटे विषैले भाव प्रभाव नहीं डालते। ---

आध्यात्मिक संकेत

गरुत्मान आकाश में उड़ता है— ऊँचाई से देखने पर समस्याएँ छोटी प्रतीत होती हैं। यह मंत्र सिखाता है— ✔ ऊँचा दृष्टिकोण अपनाओ ✔ प्रतिक्रिया देने से पहले सजग बनो ✔ नकारात्मकता को फैलने से पहले रोक दो यह आत्म-संयम और मानसिक शक्ति का मंत्र है। ---

योगिक दृष्टिकोण

योग में कहा गया है— साक्षीभाव ही विषहरण है। जब साधक साक्षी बन जाता है, तो भावनाएँ उसे विषाक्त नहीं कर पातीं। गरुत्मान = साक्षी चेतना विष = आवेग ---

आधुनिक संदर्भ

आज “विष” डिजिटल माध्यमों से भी फैलता है— ✔ अफवाह ✔ घृणा ✔ नकारात्मक समाचार ✔ मानसिक तनाव यदि हम प्रारंभ में ही विवेक से उन्हें रोक दें, तो वे हमारे जीवन में प्रवेश नहीं कर पाएँगे। ---

आध्यात्मिक निष्कर्ष

यह मंत्र हमें तीन शिक्षाएँ देता है— 1. सजगता प्रारंभ में सक्रिय हो। 2. नकारात्मकता को बढ़ने का अवसर न दो। 3. उच्च चेतना ही वास्तविक संरक्षण है। ---

English Insight

O poison, Garutman the divine bird swallowed you first. You neither grew nor spread, nor did you fulfill the purpose of your source. The verse symbolizes the power of awakened consciousness that neutralizes negativity at its very origin.

शब्दार्थ

यः = जो त्वा = तुझे आस्यत् = बैठा / प्रविष्ट हुआ पञ्चाङ्गुरिः = पाँच अँगुलियों वाला (हाथ) वक्रात् = टेढ़े से / वक्र स्थान से चित् = भी अधि = ऊपर / भीतर धन्वनः = धनुष / शरीर (तनावग्रस्त अंग) अपस्कम्भस्य = अवरोध के / अटके हुए स्थान से शल्यान् = काँटे / बाण / शल्य (फँसे हुए कण) निरवोचम् = निकाल दिया / अलग किया अहम् = मैंने विषम् = विष ---

सरल हिन्दी अर्थ

जो विष पाँच अँगुलियों वाले हाथ से, टेढ़े स्थान में या धनुष (तनावयुक्त अंग) में प्रवेश कर बैठा था— उस अवरोध के काँटों (शल्य) को मैंने निकाल दिया है, हे विष! ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र प्रत्यक्ष रूप से विष-निवारण की प्रक्रिया का वर्णन करता है। यहाँ प्रतीक और यथार्थ दोनों स्तरों पर अर्थ निहित हैं। “यस्त आस्यत्पञ्चाङ्गुरिः” — जो पाँच अँगुलियों वाले हाथ से बैठ गया था। यह संकेत उस विष का हो सकता है जो किसी जीव या सर्प के दंश से शरीर में प्रवेश करता है। “पञ्चाङ्गुरि” मनुष्य के हाथ का प्रतीक है। यहाँ यह भी अर्थ लिया जाता है कि उपचारकर्ता अपने पाँच अँगुलियों से शल्य निकाल रहा है। “वक्राच्चिदधि धन्वनः” — टेढ़े स्थान या तनावयुक्त भाग में जो बैठ गया था। “धन्वन्” का अर्थ धनुष भी है, और तनकर खिंचा हुआ अंग भी। जब विष शरीर में प्रवेश करता है, तो वह स्नायु या नसों में फैल सकता है— जो धनुष की डोरी की भाँति तनी होती हैं। यह सूक्ष्म चिकित्सा-प्रतीक है। “अपस्कम्भस्य शल्यान्” — जो अवरोध उत्पन्न करने वाले काँटे (शल्य) हैं। यहाँ “शल्य” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। आयुर्वेद में “शल्य” का अर्थ है— शरीर में फँसी हुई बाह्य वस्तु (काँटा, बाण, विषदंश)। यह मंत्र शल्य-चिकित्सा का वैदिक रूप भी प्रतीत होता है। “निरवोचमहं विषम्” — मैंने उसे निकाल दिया है, हे विष! यह केवल शारीरिक निष्कासन नहीं, बल्कि मंत्रबल से विषहरण का संकल्प है। ---

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह मंत्र बाहरी विष के साथ-साथ आंतरिक “शल्य” की ओर भी संकेत करता है। जीवन में अनेक “काँटे” होते हैं— ✔ कटु वचन ✔ अपमान ✔ असफलता ✔ मानसिक आघात ये भीतर बैठ जाते हैं। वे स्नायु की तरह तन जाते हैं— तनाव (stress) बन जाते हैं। यह मंत्र घोषणा है— मैं इन आंतरिक काँटों को निकालता हूँ। ---

योगिक एवं मनोवैज्ञानिक संकेत

“पञ्चाङ्गुरि” पाँच कर्मेन्द्रियों का प्रतीक भी हो सकता है। ✔ कर्म ✔ स्पर्श ✔ क्रिया जब सजगता से कार्य किया जाता है, तो भीतर जमे हुए विषैले संस्कार निकाले जा सकते हैं। तनाव (धन्वन्) = मानसिक खिंचाव यदि शल्य न निकाला जाए, तो वह पीड़ा देता रहता है। यह मंत्र उपचार, विमोचन और शुद्धि का मंत्र है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज का “विष” केवल सर्पदंश नहीं है। यह हो सकता है— ✔ नकारात्मक विचार ✔ आत्मग्लानि ✔ पुराने आघात ✔ भावनात्मक चोट यदि उन्हें भीतर दबा दिया जाए, तो वे शल्य की भाँति चुभते रहते हैं। हमें उन्हें पहचानकर निकालना होगा। ---

आध्यात्मिक निष्कर्ष

यह मंत्र हमें सिखाता है— 1. विष को पहचानो। 2. उसके स्रोत तक पहुँचो। 3. उसे जड़ से निकालो। केवल सतही उपचार पर्याप्त नहीं। भीतर बैठे काँटे को निकालना ही वास्तविक मुक्ति है। ---

English Insight

That poison which entered through the five-fingered hand, which lodged even in the curved and tense part— its barbed shafts I have extracted, I have removed the poison. The verse symbolizes the removal of embedded negativity— both physical and psychological— through conscious healing and decisive action.

शब्दार्थ

शल्यात् = काँटे / बाण / फँसी हुई वस्तु से विषम् = विष निरवोचम् = निकाल दिया / दूर किया प्राञ्जनात् = लेप / मलहम / स्पर्श द्वारा उत = तथा पर्णधेः = पत्ते के समान आवरण से / त्वचा से अपाष्ठात् = पीछे के भाग से शृङ्गात् = नुकीले स्थान से / शिखर से कुल्मलान् = गांठों / सूजे हुए भागों से निरवोचम् = निकाल दिया अहम् = मैंने विषम् = विष ---

सरल हिन्दी अर्थ

मैंने शल्य (काँटे) से विष को निकाल दिया, लेप और त्वचा से भी उसे दूर किया। पीछे के भाग से, नुकीले स्थान से, और सूजी हुई गांठों से भी मैंने विष को निकाल दिया है। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र विष-निवारण की प्रक्रिया का और अधिक विस्तृत वर्णन करता है। इसमें उपचार की क्रमबद्ध पूर्णता का भाव है—मानो साधक या वैद्य शरीर के प्रत्येक स्तर से विष को हटाने की घोषणा कर रहा हो। “शल्याद्विषं निरवोचम्” — काँटे या बाण से विष को निकाल दिया। यह सीधा संकेत है उस विष का जो दंश, काँटे या शल्य के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है। वैदिक काल में शल्य-चिकित्सा का ज्ञान था। यहाँ मंत्र और चिकित्सा का समन्वय दिखाई देता है। “प्राञ्जनादुत पर्णधेः” — लेप द्वारा और त्वचा के आवरण से भी। “प्राञ्जन” का अर्थ है लेप लगाना। आयुर्वेद में विषहर औषधियों का लेप प्रयोग किया जाता था। “पर्णधि” पत्ते या त्वचा के आवरण का संकेत हो सकता है। अर्थात् बाहरी सतह पर जो विष का प्रभाव था, उसे भी समाप्त किया गया। यह उपचार केवल भीतर का नहीं, बाहरी स्तर का भी है। --- “अपाष्ठाच्छृङ्गात्कुल्मलान्” — पीछे के भाग से, नुकीले स्थान से और गांठों से भी। “कुल्मल” सूजन या गाँठ का प्रतीक है। विष के कारण शरीर में सूजन या फोड़ा उत्पन्न हो सकता है। यहाँ घोषणा है— विष को हर दिशा और हर स्तर से हटाया गया है। ---

समग्र उपचार का सिद्धांत

यह मंत्र हमें एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सिखाता है— उपचार आधा नहीं, पूर्ण होना चाहिए। ✔ स्रोत से हटाओ ✔ सतह से हटाओ ✔ गहराई से हटाओ ✔ सूजन और अवशेष से भी हटाओ यह समग्र चिकित्सा (holistic healing) का वैदिक दृष्टिकोण है। ---

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

“शल्य” केवल काँटा नहीं, जीवन के भीतर बैठा हुआ दुःख भी है। “प्राञ्जन” केवल लेप नहीं, सकारात्मक स्पर्श और प्रेम भी है। “कुल्मल” केवल सूजन नहीं, भीतर की गांठें— ✔ आघात ✔ कुंठा ✔ दबी हुई भावनाएँ यह मंत्र आत्म-चिकित्सा का भी संकेत है। साधक कहता है— मैं अपने भीतर से हर स्तर का विष निकालता हूँ। ---

मनोवैज्ञानिक संकेत

मानसिक विष कई स्तरों पर रहता है— 1. सतही प्रतिक्रिया 2. गहरी स्मृति 3. अवचेतन गाँठ यदि केवल सतही स्तर पर उपचार किया जाए, तो समस्या पुनः उभर सकती है। यह मंत्र बताता है— समस्या की जड़ तक जाओ। ---

आधुनिक संदर्भ

आज का विष हो सकता है— ✔ तनाव ✔ डिजिटल नकारात्मकता ✔ संबंधों की कटुता ✔ आत्म-संदेह उसे हटाने के लिए— ✔ आत्म-चिंतन ✔ संवाद ✔ उपचार ✔ ध्यान सबकी आवश्यकता है। ---

आध्यात्मिक निष्कर्ष

यह मंत्र समग्र शुद्धि की घोषणा है। केवल बाहरी उपचार पर्याप्त नहीं। भीतर की गाँठें भी खुलनी चाहिए। जब विष पूर्णतः निकल जाता है— तब शरीर, मन और आत्मा तीनों में संतुलन लौटता है। ---

English Insight

From the embedded barb I removed the poison, from the ointment and from the skin I removed it. From the back, from the pointed part, from the swelling knots— I have drawn out the poison completely. The verse expresses total purification— removing toxicity from every layer of being.

शब्दार्थ

अरसः = रसहीन, शक्तिहीन ते = तेरा इषः = बाण शल्यः = काँटा / फँसा हुआ शस्त्र अथो = तथा ते = तेरा अरसं = रसहीन, निष्प्रभाव विषम् = विष उत = और अरसस्य = रसहीन के वृक्षस्य = वृक्ष के धनुः = धनुष ते = तेरा अरसारसम् = पूर्णतः रसहीन, प्रभावशून्य ---

सरल हिन्दी अर्थ

तेरा बाण रसहीन हो गया है, तेरा काँटा भी निष्प्रभाव है। तेरा विष भी रसहीन हो गया है। जैसे रसहीन वृक्ष का धनुष शक्तिहीन होता है, वैसे ही तू पूर्णतः प्रभावहीन हो गया है। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र विष-निवारण सूक्त का अत्यंत सशक्त चरण है। यहाँ साधक केवल विष को निकालने की बात नहीं करता, बल्कि उसके मूल बल को समाप्त करने की घोषणा करता है। “अरसस्त इषो शल्यः” — तेरा बाण रसहीन हो गया है, तेरा काँटा भी शक्तिहीन है। यहाँ “रस” शब्द अत्यंत गूढ़ है। वैदिक और आयुर्वेदिक परंपरा में “रस” का अर्थ है— जीवन-शक्ति, प्रभाव, सक्रिय तत्व। जब किसी वस्तु का “रस” निकल जाता है, तो वह निष्प्राण और प्रभावहीन हो जाती है। अर्थात् विष का सार ही समाप्त कर दिया गया है। --- “अथो ते अरसं विषम्” — तेरा विष भी रसहीन हो गया। यह केवल निष्कासन नहीं, बल्कि विष की आंतरिक ऊर्जा का नाश है। यहाँ साधक विष को संबोधित कर घोषणा करता है— तू अब प्रभाव नहीं डाल सकता। --- “उतारसस्य वृक्षस्य धनुः ते अरसारसम्” — जैसे रसहीन वृक्ष का धनुष शक्तिहीन होता है, वैसे ही तू पूर्णतः रसविहीन हो गया है। यह अत्यंत सुंदर उपमा है। यदि वृक्ष में रस न हो, तो उससे बना धनुष कठोर और निर्जीव होगा— उसमें लोच, शक्ति और जीवन नहीं होगा। उसी प्रकार विष भी यदि रसहीन हो जाए, तो उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है। ---

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह मंत्र केवल शारीरिक विष की बात नहीं करता। “विष” यहाँ प्रतीक है— ✔ क्रोध ✔ द्वेष ✔ ईर्ष्या ✔ भय ✔ नकारात्मकता इनका “रस” क्या है? भावनात्मक ऊर्जा। यदि हम उन्हें ऊर्जा देना बंद कर दें, तो वे स्वतः शक्तिहीन हो जाते हैं। जब प्रतिक्रिया नहीं दी जाती, तो विष का “रस” सूख जाता है। ---

योगिक दृष्टि

योग कहता है— वैराग्य से विष का नाश होता है। जब मन आसक्ति और द्वेष से मुक्त होता है, तो नकारात्मक भावों का पोषण नहीं होता। वे रसहीन हो जाते हैं। यह मंत्र वैराग्य और आत्म-नियंत्रण का मंत्र है। ---

मनोवैज्ञानिक संकेत

नकारात्मक विचार तब तक प्रभावी रहते हैं जब तक हम उन्हें ध्यान और ऊर्जा देते हैं। यदि हम— ✔ प्रतिक्रिया न दें ✔ सजग रहें ✔ शांति बनाए रखें तो वे धीरे-धीरे शक्तिहीन हो जाते हैं। यह “अरस” की अवस्था है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज विष का रूप है— ✔ ट्रोलिंग ✔ अपमान ✔ आलोचना ✔ डिजिटल नकारात्मकता यदि हम हर बात पर प्रतिक्रिया दें, तो वह विष सक्रिय रहता है। यदि हम उसे महत्व न दें, तो उसका रस सूख जाता है। ---

आध्यात्मिक निष्कर्ष

यह मंत्र हमें सिखाता है— विष को केवल हटाओ नहीं, उसकी शक्ति भी समाप्त करो। ✔ सजगता ✔ वैराग्य ✔ आत्मबल से हर विष रसहीन हो सकता है। जब भीतर की चेतना प्रबल होती है, तो बाहरी विष का कोई प्रभाव नहीं रहता। ---

English Insight

Your arrow is sapless, your barb powerless. Your poison has lost its essence. Like a bow made from a lifeless tree, you are entirely without force. The verse declares the neutralization of toxicity by removing its very vitality and strength.

शब्दार्थ

ये = जो अपीषन् = पीड़ित करते थे / दबाते थे ये = जो अदिहन् = काटते थे / दंश करते थे यः = जो आस्यन् = बैठते थे / प्रवेश करते थे ये = जो अवासृजन् = छोड़ते थे / फैलाते थे सर्वे = सभी ते = वे वध्रयः = शक्तिहीन / नपुंसक / निष्प्रभाव कृताः = बना दिए गए वध्रिः = शक्तिहीन विषगिरिः = विषधारी / विष छोड़ने वाला कृतः = बना दिया गया ---

सरल हिन्दी अर्थ

जो दबाते थे, जो दंश करते थे, जो भीतर बैठते थे, और जो विष फैलाते थे— वे सब अब शक्तिहीन कर दिए गए हैं। विष छोड़ने वाला भी निष्प्रभाव बना दिया गया है। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र विष-निवारण सूक्त का अंतिम और निर्णायक चरण है। यहाँ साधक सम्पूर्ण शक्ति के साथ घोषणा करता है कि विष और उसके सभी कारणों को निष्प्रभाव बना दिया गया है। “ये अपीषन्” — जो पीड़ित करते थे, दबाते थे। यह उस विष के प्रभाव का संकेत है जो शरीर या मन पर दबाव बनाता है। “ये अदिहन्” — जो काटते थे, दंश करते थे। यह प्रत्यक्ष सर्पदंश या विषैले जीवों की ओर संकेत हो सकता है। “य आस्यन्” — जो भीतर बैठ जाते थे। विष केवल प्रवेश नहीं करता, वह भीतर बैठकर कार्य करता है। “ये अवासृजन्” — जो फैलाते थे। विष का स्वभाव है— फैलना और प्रभाव बढ़ाना। यहाँ मंत्र उन सभी अवस्थाओं को संबोधित करता है— ✔ दंश ✔ प्रवेश ✔ स्थापन ✔ प्रसार --- “सर्वे ते वध्रयः कृता” — वे सब शक्तिहीन बना दिए गए हैं। “वध्रि” का अर्थ है— निष्क्रिय, बलहीन, कार्य-असमर्थ। यह केवल आंशिक नियंत्रण नहीं, पूर्ण निष्क्रियता की घोषणा है। --- “वध्रिर्विषगिरिः कृतः” — विष छोड़ने वाला भी शक्तिहीन कर दिया गया है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। साधक केवल विष को नहीं हटाता, वह स्रोत को भी निष्प्रभाव करता है। ---

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह मंत्र बाहरी विष के साथ-साथ भीतर के विषों पर भी लागू होता है। जीवन में कई तत्व हमें पीड़ित करते हैं— ✔ कटु शब्द ✔ अपमान ✔ भय ✔ मानसिक आघात ये भीतर बैठ जाते हैं और फैलते हैं। यह मंत्र आत्मबल की घोषणा है— मैं उन्हें शक्तिहीन करता हूँ। ---

योगिक संकेत

जब साधक साक्षीभाव में स्थापित हो जाता है, तो बाहरी घटनाएँ उसे आहत नहीं कर पातीं। वे भीतर प्रवेश तो कर सकती हैं, पर टिक नहीं पातीं। वह उन्हें “वध्रि” बना देता है— शक्तिहीन। ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

आधुनिक मनोविज्ञान कहता है— घटना से अधिक हमारी प्रतिक्रिया हमें प्रभावित करती है। यदि प्रतिक्रिया नियंत्रित हो, तो विष का प्रभाव कम हो जाता है। यह मंत्र प्रतिक्रिया पर नियंत्रण का भी संकेत देता है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज विष के रूप हैं— ✔ नकारात्मक समाचार ✔ सोशल मीडिया विवाद ✔ आलोचना ✔ अफवाह यदि हम हर बात को भीतर बैठने दें, तो वह फैलती है। यदि हम सजग रहें, तो वह शक्तिहीन हो जाती है। ---

आध्यात्मिक निष्कर्ष

यह मंत्र पूर्ण विजय की घोषणा है। ✔ विष हटाया गया ✔ उसकी शक्ति नष्ट की गई ✔ उसके स्रोत को भी निष्प्रभाव किया गया यह आत्म-बल, मंत्र-बल और सजगता की पराकाष्ठा है। जब चेतना दृढ़ होती है, तो कोई भी विष स्थायी प्रभाव नहीं डाल सकता। ---

English Insight

Those who pressed, who bit, who entered and who spread— all of them are rendered powerless. The poison-bearer itself is made impotent. The verse proclaims total neutralization— not only of toxicity, but of its very source and capacity to harm.

शब्दार्थ

वध्रयः = शक्तिहीन, निष्प्रभाव ते = तेरे खनितारः = खोदने वाले / निकालने वाले / उत्पन्न करने वाले वध्रिः = शक्तिहीन त्वम् = तू अस्य = इस ओषधे = हे औषधि वध्रिः = शक्तिहीन सः = वह पर्वतः = पर्वत गिरिः = गिरि, पहाड़ यतः = जहाँ से जातम् = उत्पन्न हुआ इदं = यह विषम् = विष ---

सरल हिन्दी अर्थ

तेरे उत्पन्न करने वाले शक्तिहीन हैं, हे औषधि, तू भी निष्प्रभाव हो जा। वह पर्वत भी शक्तिहीन हो जाए जहाँ से यह विष उत्पन्न हुआ। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र विष-निवारण सूक्त का अत्यंत गूढ़ और समापन श्लोक है। यहाँ साधक केवल विष और उसके दंश को नहीं, बल्कि उसके मूल स्रोत को भी निष्प्रभाव करने की घोषणा करता है। “वध्रयस्ते खनितारः” — तेरे उत्पन्न करने वाले शक्तिहीन हैं। “खनितार” शब्द का अर्थ है— जो खोदते हैं, जो निकालते हैं, या जो उत्पन्न करते हैं। यह संकेत उन शक्तियों की ओर है जो विष को जन्म देती हैं— चाहे वह सर्प हो, विषैला जीव हो, या विषैली वनस्पति। साधक कहता है— तुम्हारे जनक भी शक्तिहीन हैं। --- “वध्रिस्त्वमस्योषधे” — हे औषधि, तू भी शक्तिहीन हो जा। यहाँ “औषधि” शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। संभव है कि यह उस विषैली वनस्पति को संबोधित कर रहा हो जिससे विष उत्पन्न होता है। अर्थात्— विष का मूल तत्व भी अब निष्प्रभाव है। --- “वध्रिः स पर्वतो गिरिः” — वह पर्वत भी शक्तिहीन हो जाए। प्राचीन काल में अनेक विषैली वनस्पतियाँ पर्वतीय क्षेत्रों में उत्पन्न होती थीं। यहाँ पर्वत स्रोत का प्रतीक है। --- “यतो जातमिदं विषम्” — जहाँ से यह विष उत्पन्न हुआ। यह घोषणा केवल तत्कालिक उपचार नहीं है, यह मूल कारण तक पहुँचने की प्रक्रिया है। ---

समग्र निष्क्रियता का सिद्धांत

यह मंत्र हमें सिखाता है— समस्या का समाधान तभी पूर्ण होता है जब उसके स्रोत को भी निष्क्रिय कर दिया जाए। ✔ परिणाम को हटाओ ✔ कारण को पहचानो ✔ स्रोत को समाप्त करो ---

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यहाँ “पर्वत” केवल भौतिक पर्वत नहीं है। यह प्रतीक है— ✔ अहंकार ✔ गहरे संस्कार ✔ जड़ मानसिक प्रवृत्तियाँ विष वहीं से उत्पन्न होता है। यदि केवल लक्षणों का उपचार किया जाए, तो समस्या लौट सकती है। पर यदि “पर्वत” ही शक्तिहीन हो जाए, तो विष पुनः उत्पन्न नहीं होगा। ---

योगिक संकेत

योग कहता है— “बीज रूपेण दोषों का नाश करो।” जब तक बीज जीवित है, वृक्ष पुनः उग सकता है। यह मंत्र बीज-नाश की घोषणा है। ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

मानसिक विष का स्रोत हो सकता है— ✔ बचपन का आघात ✔ गहरी असुरक्षा ✔ अहंकार यदि केवल वर्तमान प्रतिक्रिया पर काम किया जाए, तो जड़ बनी रहती है। पर यदि मूल कारण पर कार्य किया जाए, तो स्थायी परिवर्तन संभव है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज का विष केवल जैविक नहीं है। यह हो सकता है— ✔ सामाजिक विभाजन ✔ डिजिटल घृणा ✔ वैचारिक कट्टरता यदि हम केवल लक्षणों पर प्रतिक्रिया दें, तो समस्या बनी रहती है। यदि हम शिक्षा, संवाद और चेतना से मूल स्रोत को बदलें— तभी वास्तविक शांति संभव है। ---

आध्यात्मिक निष्कर्ष

यह मंत्र अंतिम विजय की घोषणा है। ✔ विष निष्प्रभाव ✔ उसका दंश निष्प्रभाव ✔ उसका जनक निष्प्रभाव ✔ उसका स्रोत भी निष्प्रभाव यह पूर्ण शुद्धि और सुरक्षा का मंत्र है। जब चेतना दृढ़ और जाग्रत होती है, तो कोई भी विष, चाहे वह कहीं से भी उत्पन्न हो, स्थायी प्रभाव नहीं डाल सकता। ---

English Insight

Powerless are your producers; powerless are you, O herb. Powerless is that mountain from which this poison was born. The verse declares not only the removal of poison but the neutralization of its very origin.

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