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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

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AtharvaVeda, kand 4 sukta 7

शब्दार्थ

वारिदम् = जल देने वाला / मेघ / जलयुक्त तत्व वारयातै = रोकने वाला, अवरुद्ध करने वाला वरणावत्याम् = वरणावती नामक जलधारा / नदी / स्थान में अधि = पर / भीतर तत्र = वहाँ अमृतस्य = अमृत का आसिक्तम् = सींचा हुआ, अभिषिक्त तेन = उससे ते = तेरा वारये = मैं रोकता हूँ विषम् = विष ---

सरल हिन्दी अर्थ

जो जलयुक्त तत्व विष को रोकता है, जो वरणावती में स्थित है, जो वहाँ अमृत से सींचा गया है— उसी से मैं तेरे विष को रोकता हूँ। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र एक नई दिशा प्रस्तुत करता है। पूर्व सूक्त में विष को शक्तिहीन घोषित किया गया था। यहाँ जल और अमृत के माध्यम से विष को रोकने और शुद्ध करने का संकेत मिलता है। “वारिदं वारयातै” — जो जल प्रदान करता है और जो रोकता है। “वारि” अर्थात् जल। जल का स्वभाव है— ✔ शुद्ध करना ✔ शांत करना ✔ शीतलता देना ✔ विष को पतला करना आयुर्वेद में जल और औषधि का संयोजन विषहर चिकित्सा का महत्वपूर्ण अंग था। --- “वरणावत्यामधि” — वरणावती में स्थित। यह संभवतः किसी पवित्र नदी या औषधीय जलधारा का संकेत है। वेदों में नदियाँ केवल भौतिक जलधाराएँ नहीं, बल्कि जीवन-शक्ति और शुद्धि का प्रतीक हैं। --- “तत्रामृतस्यासिक्तम्” — वहाँ अमृत से सींचा गया। यह अत्यंत गूढ़ पद है। अमृत का अर्थ है— ✔ जीवनदायी तत्व ✔ दिव्य शक्ति ✔ रोगनाशक तत्व अर्थात् यह जल अमृततुल्य है। --- “तेना ते वारये विषम्” — उसी से मैं तेरे विष को रोकता हूँ। यहाँ साधक विष को संबोधित कर कहता है— मैं दिव्य, अमृतमय जल से तुझे रोकता हूँ। यह रोकना केवल अवरोध नहीं, शुद्धिकरण भी है। ---

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यहाँ “जल” केवल भौतिक जल नहीं है। यह प्रतीक है— ✔ करुणा ✔ प्रेम ✔ शांति ✔ चित्त की निर्मलता जब जीवन में विष (क्रोध, द्वेष, तनाव) उत्पन्न होता है, तो उसका समाधान कठोरता से नहीं, शीतलता से होता है। अग्नि से अग्नि नहीं बुझती, जल से बुझती है। ---

योगिक दृष्टि

योग में चित्त को “निर्मल सरोवर” कहा गया है। जब मन शांत और पारदर्शी होता है, तो नकारात्मकता स्वयं शांत हो जाती है। ध्यान और प्राणायाम मन के भीतर “अमृत” का प्रवाह उत्पन्न करते हैं। ---

मनोवैज्ञानिक संकेत

तनाव का समाधान है— ✔ शांति ✔ विश्राम ✔ भावनात्मक संतुलन जब मन अमृतमय (सकारात्मक) विचारों से भरा हो, तो नकारात्मकता टिक नहीं पाती। ---

आधुनिक संदर्भ

आज का विष हो सकता है— ✔ मानसिक दबाव ✔ डिजिटल आक्रामकता ✔ सामाजिक तनाव उसका समाधान है— ✔ आत्म-चिंतन ✔ प्रकृति से जुड़ाव ✔ ध्यान ✔ सकारात्मक संवाद यह सब आधुनिक “अमृत” हैं। ---

आध्यात्मिक निष्कर्ष

यह मंत्र बताता है— विष को रोकने के लिए दिव्य अमृतमय शक्ति की आवश्यकता है। जल शांति का प्रतीक है। अमृत अमरता और जीवन का। जब जीवन में शांति और चेतना का प्रवाह होता है, तो विष का प्रभाव रुक जाता है। ---

English Insight

In the waters that restrain, in Varana-vatī, sprinkled with immortality— with that nectar-filled flow I restrain your poison. The verse invokes purifying waters as a symbol of divine healing power.

शब्दार्थ

अरसं = रसहीन, शक्तिहीन प्राच्यम् = पूर्व दिशा का विषम् = विष अरसं = निष्प्रभाव यत् = जो उदीच्यम् = उत्तर दिशा का अथ = और इदम् = यह अधराच्यम् = दक्षिण दिशा का करम्भेण = करम्भ (जौ/अनाज का औषधीय मिश्रण) द्वारा वि कल्पते = विभक्त किया जाता है, निष्क्रिय किया जाता है ---

सरल हिन्दी अर्थ

पूर्व दिशा का विष रसहीन हो जाए, उत्तर दिशा का विष भी निष्प्रभाव हो जाए। और यह दक्षिण दिशा का विष करम्भ के द्वारा नष्ट या विभक्त किया जाए। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र विष-निवारण की प्रक्रिया को दिशात्मक विस्तार देता है। पहले मंत्र में जल और अमृत द्वारा विष को रोका गया था। यहाँ चारों दिशाओं से आने वाले विष को निष्प्रभाव करने की घोषणा की गई है। “अरसं प्राच्यं विषम्” — पूर्व दिशा का विष रसहीन हो जाए। पूर्व दिशा सूर्य का उदय स्थान है। यह प्रकाश और जागरण का प्रतीक है। अर्थात् ज्ञान के प्रकाश से विष की शक्ति समाप्त हो। --- “अरसं यदुदीच्यम्” — उत्तर दिशा का विष भी निष्प्रभाव हो। उत्तर दिशा हिमालय और तपस्या की दिशा मानी जाती है। यह स्थिरता और धैर्य का प्रतीक है। अर्थात् धैर्य और संयम से विष की शक्ति कम हो। --- “अथेदमधराच्यम्” — और दक्षिण दिशा का यह विष। दक्षिण दिशा मृत्यु और परिवर्तन से जुड़ी मानी जाती है। यह कर्मफल और यम का संकेत देती है। अर्थात् विष का परिणाम भी नियंत्रित हो। --- “करम्भेण वि कल्पते” — करम्भ के द्वारा विभक्त या निष्क्रिय किया जाए। “करम्भ” जौ या अनाज से बना औषधीय मिश्रण है, जिसका प्रयोग वैदिक चिकित्सा में किया जाता था। यहाँ करम्भ प्रतीक है— ✔ औषधीय उपचार ✔ पोषण ✔ धरातलीय चिकित्सा अर्थात् केवल मंत्र नहीं, भौतिक औषधि भी आवश्यक है। ---

समग्र दृष्टि

यह मंत्र तीन स्तरों पर कार्य करता है— 1. दिशात्मक सुरक्षा 2. आध्यात्मिक निष्क्रियता 3. भौतिक उपचार यह वैदिक चिकित्सा की समग्र प्रणाली को दर्शाता है। ---

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

चारों दिशाएँ जीवन के चार आयाम हैं— ✔ पूर्व – ज्ञान ✔ उत्तर – तपस्या ✔ दक्षिण – कर्मफल ✔ पश्चिम (अंतर्निहित) – अनुभव विष जीवन के किसी भी आयाम से आ सकता है। यह मंत्र घोषणा करता है— हर दिशा से आने वाला विष निष्प्रभाव है। ---

योगिक संकेत

योग में “दिग्बन्ध” की अवधारणा है— चारों दिशाओं में सुरक्षा का संकल्प। यह मंत्र वैदिक दिग्बन्ध की तरह है। साधक अपने चारों ओर संरक्षण का आवरण निर्मित करता है। ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

विष केवल बाहरी नहीं होता। यह हो सकता है— ✔ भूतकाल से (पूर्व) ✔ भविष्य की चिंता से (उत्तर) ✔ कर्मफल के भय से (दक्षिण) यह मंत्र आंतरिक संतुलन का अभ्यास है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज विष चारों दिशाओं से आ सकता है— ✔ मीडिया ✔ समाज ✔ कार्यस्थल ✔ डिजिटल संसार समाधान है— ✔ ज्ञान ✔ धैर्य ✔ चिकित्सा ✔ आत्म-देखभाल ---

आध्यात्मिक निष्कर्ष

यह मंत्र बताता है— विष कहीं से भी आए, उसे ज्ञान, संयम और उपचार से निष्प्रभाव किया जा सकता है। यह संपूर्ण सुरक्षा और संतुलन का वैदिक विधान है। ---

English Insight

May the poison from the East be sapless; may that from the North lose its force. And this from the South— let it be neutralized by the healing mixture. The verse extends protection in all directions, uniting spiritual intent with physical remedy.

शब्दार्थ

करम्भम् = जौ/अनाज से बना औषधीय मिश्रण कृत्वा = बनाकर तिर्यम् = आड़े/विस्तृत रूप में / सर्वत्र पीबस् = पीने योग्य / अवशोषित पाकम् = पकाया हुआ / पचाया हुआ उदारथिम् = उदर में जाने योग्य / पेट में स्थित क्षुधा = भूख किल = निश्चय ही त्वा = तुझे दुष्टनः = दुष्ट स्वभाव वाला / हानिकारक जक्षिवान् = खा गया / भक्षण कर लिया सः = वह न = नहीं रूरुपः = हानि पहुँचाने वाला / पीड़ा देने वाला ---

सरल हिन्दी अर्थ

करम्भ बनाकर उसे पचाया और ग्रहण किया गया। भूख ने तुझे खा लिया, हे दुष्ट विष। जिसने तुझे खाया, वह पीड़ित नहीं हुआ। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र वैदिक चिकित्सा की एक अत्यंत रोचक और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। यहाँ करम्भ—अर्थात् जौ या अनाज से बना औषधीय मिश्रण—का प्रयोग विषनाश के साधन के रूप में किया गया है। “करम्भं कृत्वा” — करम्भ बनाकर। करम्भ प्राचीन वैदिक आहार था, जो पौष्टिक और औषधीय गुणों से युक्त माना जाता था। यहाँ यह केवल भोजन नहीं, बल्कि औषधीय उपचार का प्रतीक है। --- “तिर्यं पीबस्पाकमुदारथिम्” — जिसे पकाकर उदर में ग्रहण किया गया। यह संकेत देता है कि विष का उपचार केवल बाहरी उपायों से नहीं, आंतरिक पाचन और संतुलन से भी होता है। आयुर्वेद कहता है— अग्नि (पाचन शक्ति) मजबूत हो तो विष का प्रभाव कम होता है। --- “क्षुधा किल त्वा दुष्टनो जक्षिवान्” — हे दुष्ट विष, भूख ने तुझे खा लिया। यह अत्यंत गूढ़ और काव्यमय वाक्य है। यहाँ भूख (क्षुधा) प्रतीक है— ✔ पाचन अग्नि ✔ जीवन शक्ति ✔ आंतरिक ऊर्जा अर्थात् शरीर की शक्ति ने विष को ही पचा लिया। --- “स न रूरुपः” — वह पीड़ित नहीं हुआ। यह विजय की घोषणा है। जिसने विष को ग्रहण किया, वह हानि से बच गया। ---

आयुर्वेदिक संकेत

आयुर्वेद में कहा गया है— यदि जठराग्नि प्रबल हो, तो विष का प्रभाव न्यून होता है। यह मंत्र आंतरिक अग्नि की महिमा का सूचक है। ---

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

विष केवल भौतिक नहीं होता। जीवन में अपमान, कटु अनुभव, असफलता—ये भी “विष” हैं। यदि व्यक्ति के भीतर आत्मबल और विवेक है, तो वह इन अनुभवों को “पचा” सकता है। वे उसे तोड़ते नहीं, बल्कि मजबूत बनाते हैं। ---

योगिक दृष्टि

योग में “तप” और “अग्नि” की अवधारणा है। जब साधक भीतर की अग्नि को जाग्रत करता है, तो नकारात्मकता उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती। यह मंत्र उसी आंतरिक शक्ति का स्मरण है। ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

मानसिक दृढ़ता (resilience) का अर्थ है— विपरीत परिस्थितियों को आत्मसात कर लेना। कुछ लोग छोटी आलोचना से टूट जाते हैं, कुछ लोग बड़े आघात को भी सह लेते हैं। अंतर है— भीतर की शक्ति। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के जीवन में विष के रूप— ✔ तनाव ✔ प्रतिस्पर्धा ✔ नकारात्मकता यदि हमारा शरीर स्वस्थ है और मन संतुलित है, तो ये हमें कमजोर नहीं करते। बल्कि अनुभव हमें परिपक्व बनाता है। ---

आध्यात्मिक निष्कर्ष

यह मंत्र सिखाता है— ✔ बाहरी औषधि आवश्यक है ✔ पर आंतरिक शक्ति उससे भी अधिक आवश्यक है जब भीतर की अग्नि जाग्रत हो, तो विष भी भोजन बन जाता है। यह आत्मबल और जीवनशक्ति की महिमा का मंत्र है। ---

English Insight

Having prepared the healing mixture and digested it, the inner fire devoured the poison. The harmful one was consumed, and no injury arose. The verse symbolizes resilience— the power to digest and transform toxicity into strength.

शब्दार्थ

वि = अलग, दूर ते = तेरा मदम् = उन्माद, प्रभाव, नशा मदावति = उन्मादकारी, मदयुक्त शरम् = बाण इव = जैसे पातयामसि = गिरा देते हैं, नीचे कर देते हैं प्र = आगे त्वा = तुझे चरुम् = हवि, यज्ञ में अर्पित आहुति इव = जैसे येषन्तम् = ले जाते हुए, अग्रसर वचसा = वचन से, मंत्र से स्थापयामसि = स्थिर करते हैं, नियंत्रित करते हैं ---

सरल हिन्दी अर्थ

हे विष, तेरे उन्मादकारी प्रभाव को हम बाण की तरह गिरा देते हैं। तुझे हम यज्ञ की आहुति की भाँति वचन (मंत्र) से नियंत्रित और स्थिर कर देते हैं। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र अत्यंत शक्तिशाली है। यहाँ विष के “मद” — अर्थात् उसके उन्मादकारी प्रभाव — को लक्ष्य किया गया है। “वि ते मदं मदावति” — तेरे मद को हम अलग कर देते हैं। विष केवल शारीरिक क्षति नहीं करता, वह भ्रम, चक्कर, उन्माद और चेतना-विकृति भी उत्पन्न करता है। यहाँ साधक विष के उस प्रभाव को ही समाप्त करने की घोषणा करता है। --- “शरमिव पातयामसि” — बाण की तरह गिरा देते हैं। यह एक अत्यंत सशक्त उपमा है। जैसे आकाश में उड़ता हुआ बाण लक्ष्य से टकराकर नीचे गिरता है, वैसे ही विष का प्रभाव शरीर और चेतना से नीचे गिर जाए। यह सक्रिय प्रतिरोध है, निष्क्रिय प्रार्थना नहीं। --- “प्र त्वा चरुमिव येषन्तम्” — तुझे हम चरु (यज्ञ आहुति) की तरह आगे ले जाते हैं। चरु यज्ञ में अर्पित होने वाला पवित्र अन्न है। यहाँ विष को चरु की तरह यज्ञाग्नि में समर्पित करने का भाव है। अर्थात्— विष को दिव्य अग्नि में समर्पित कर दिया गया। --- “वचसा स्थापयामसि” — वचन से तुझे स्थिर करते हैं। यहाँ “वचन” का अर्थ है— ✔ मंत्र शक्ति ✔ संकल्प ✔ वाणी की ऊर्जा वेदों में वाणी को सृजनात्मक शक्ति माना गया है। शब्द केवल ध्वनि नहीं, चेतना का कंपन हैं। यह मंत्र बताता है— वाणी से भी विष को नियंत्रित किया जा सकता है। ---

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

“मद” केवल विष का नशा नहीं, अहंकार का नशा भी है। जब अहंकार उन्मत्त हो जाता है, तो व्यक्ति संतुलन खो देता है। यह मंत्र उस मद को गिराने की घोषणा है। ---

योगिक संकेत

योग में कहा गया है— “वाक्-शक्ति” अत्यंत प्रभावशाली है। सकारात्मक मंत्र, सकारात्मक संकल्प, मन और शरीर पर वास्तविक प्रभाव डालते हैं। ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

जब व्यक्ति कहता है— “मैं ठीक हो जाऊँगा” “मैं सक्षम हूँ” तो यह आत्म-सुझाव (self-suggestion) है। यह आधुनिक मनोविज्ञान में भी स्वीकार किया गया सिद्धांत है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज का “मद” हो सकता है— ✔ क्रोध ✔ शक्ति का अहंकार ✔ नशा ✔ डिजिटल उत्तेजना उसे गिराना आवश्यक है। और उसे गिराने का साधन है— ✔ सजगता ✔ संयम ✔ सकारात्मक वाणी ---

आध्यात्मिक निष्कर्ष

यह मंत्र तीन स्तरों पर कार्य करता है— ✔ विष का उन्माद गिराना ✔ उसे अग्नि में समर्पित करना ✔ वाणी से नियंत्रित करना यह पूर्ण नियंत्रण और जागरूकता का मंत्र है। जब चेतना स्थिर और वाणी शुद्ध होती है, तो कोई भी विष — शारीरिक या मानसिक — स्थायी प्रभाव नहीं डाल सकता। ---

English Insight

We cast down your intoxication like an arrow falling to the ground. Like an offering placed in sacred fire, we steady you with the power of the Word. The verse highlights the mastery of awareness and the transformative power of speech.

शब्दार्थ

परि = चारों ओर, आसपास ग्रामम् = गाँव, समुदाय, या क्षेत्र इव = जैसे आचितम् = घेरा हुआ, सुरक्षित किया हुआ वचसा = वचन, मंत्र, या शब्द से स्थापयामसि = स्थिर करता हूँ, सुरक्षित करता हूँ तिष्ठा = खड़ा रहो, स्थिर हो जाओ वृक्ष = पेड़ इव = जैसे स्थाम्नि = भूमि पर, मजबूत अभ्रि = बादल खाते = शाखाएँ फैलाती हैं न = नहीं रूरुपः = हानि पहुँचाने वाला, प्रभावकारी ---

सरल हिन्दी अर्थ

हे विष या हानिकारक शक्ति, जैसे गाँव सुरक्षित और घेरा हुआ है, वैसे ही तुझे वचन (मंत्र) से स्थिर करता हूँ। तुम वृक्ष की तरह खड़ा रहो, जमीन में मजबूत और बादलों में फैलती शाखाओं के साथ, पर हानि पहुँचाने वाला न बनो। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र विष या हानिकारक तत्व को स्थिर करने और नियंत्रित करने की प्रक्रिया को दर्शाता है। “परि ग्राममिवाचितं” — जैसे एक गाँव चारों ओर से सुरक्षित और घेरा हुआ होता है, वैसे ही विष को मंत्र द्वारा नियंत्रित किया गया। गाँव की तरह यह सुरक्षा— ✔ बाहरी हमलों से ✔ अवांछित प्रभाव से ✔ हानि से संपूर्ण और समग्र है। --- “वचसा स्थापयामसि” — मंत्र और वचन से स्थिर करना। वाणी की शक्ति वैदिक परंपरा में अत्यधिक महत्व रखती है। मंत्र केवल ध्वनि नहीं, बल्कि चेतना और ऊर्जा का माध्यम हैं। इससे विष का प्रभाव केवल दबाया नहीं जाता, बल्कि उसे नियंत्रित और स्थिर किया जाता है। --- “तिष्ठा वृक्ष इव” — विष को वृक्ष की तरह खड़ा रहने का निर्देश। वृक्ष प्रतीक है— ✔ स्थिरता ✔ मजबूती ✔ जीवन शक्ति ✔ विस्तार और संतुलन वृक्ष जमीन में जड़ें जमाता है और शाखाएँ फैलाता है। यही स्थायित्व और संतुलन यहाँ दर्शाया गया है। --- “स्थाम्न्यभ्रिखाते” — भूमि में मजबूत और बादलों तक फैली शाखाएँ। यह विष या हानिकारक शक्ति को नियंत्रित करने की गहराई दिखाता है। इसका प्रभाव सीमित और संरक्षित है, कहीं भी अनियंत्रित नहीं। --- “न रूरुपः” — अर्थात् यह हानि नहीं पहुँचाएगा। विष को केवल स्थिर किया गया, उसे निष्क्रिय कर दिया गया। ---

आध्यात्मिक दृष्टि

विष केवल बाहरी नहीं होता। मानसिक या भावनात्मक विष भी इस प्रकार नियंत्रित किया जा सकता है। ✔ विचारों की शक्ति ✔ मानसिक संतुलन ✔ वाणी की शुद्धता इनसे नकारात्मक प्रभाव स्थिर और नियंत्रित हो जाते हैं। ---

योगिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि

योग में स्थिरता (स्थिरता और संतुलन) का महत्व है। वृक्ष की तरह— ✔ जड़ें गहरी ✔ शाखाएँ विस्तृत ✔ स्थिरता और संतुलन मनोविज्ञान में इसे “resilience” कहा जा सकता है। जब व्यक्ति आंतरिक रूप से मजबूत होता है, तो बाहरी विष उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के जीवन में विष— ✔ तनाव ✔ नकारात्मक सूचना ✔ सामाजिक दबाव इनसे प्रभावित होने के बजाय, इसे नियंत्रित करना आवश्यक है। मंत्र, सकारात्मक सोच, और आंतरिक स्थिरता इसका समाधान हैं। ---

आध्यात्मिक निष्कर्ष

यह मंत्र सिखाता है कि— विष को पूरी तरह से नष्ट करने के बजाय, उसको नियंत्रित और स्थिर करना भी एक शक्ति है। ✔ चारों ओर सुरक्षा ✔ आंतरिक स्थिरता ✔ संतुलित विस्तार इसी में सच्ची विजय है। ---

English Insight

As a village is surrounded and secured, so we stabilize you, O harmful force, with the power of the Word. Stand like a tree, rooted in the earth, branches stretching to the sky, but causing no harm. The verse emphasizes resilience, containment, and transforming potential harm into stability.

शब्दार्थ

पवस्ता = पवन, हवा, ऊर्जा त्वा = तुम्हें पर्यक्रीणन् = फैलाना, विखंडित करना, वितरित करना दूर्शेभिः = दुष्ट शक्तियों, हानिकारक तत्वों अजिनैः = असुर, जड़ी-बूटियों के शत्रु, हानिकारक जीव उत् = तथा प्रक्रीरसि = फैल, निष्क्रिय कर, विघटित कर त्वम् = तुम ओषधे = औषधि, पवित्र जड़ी-बूटियाँ अभ्रिखाते = वृक्ष की शाखाओं की तरह, फैलते हुए न = नहीं रूरुपः = हानि पहुँचाने वाला, असरदार ---

सरल हिन्दी अर्थ

हे विष या हानिकारक शक्ति, तुम हवा की तरह फैलते हुए दुष्ट और अनियंत्रित शक्तियों से दूर हो जाओ। तुम औषधियों की शाखाओं की तरह फैलो, पर किसी को हानि न पहुँचाओ। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र वैदिक औषधि और प्रकृति की शक्ति का अद्भुत मिश्रण है। “पवस्तैस्त्वा पर्यक्रीणन्” — विष या हानिकारक शक्ति को पवन की तरह फैलाना। पवन हमेशा चलती और गतिशील ऊर्जा है। यह न केवल फैलाता है, बल्कि विष को कमजोर भी करता है। --- “दूर्शेभिरजिनैः” — हानिकारक शक्तियों, असुरों, या नकारात्मक ऊर्जा से दूर। मंत्र के माध्यम से यह संदेश है कि हानिकारक प्रभाव को सक्रिय न होने देना चाहिए। --- “प्रक्रीरसि त्वमोषधेऽभ्रिखाते” — तुम औषधियों की शाखाओं की तरह फैलो। यह बहुत सुंदर उपमा है। जैसे वृक्ष की शाखाएँ फैलती हैं, वैसे ही औषधियाँ शरीर और मन में फैलें। लेकिन ध्यान रहे, यह फैलाव सुरक्षित और लाभकारी हो। --- “न रूरुपः” — किसी को हानि न पहुँचाओ। इससे स्पष्ट है कि इस मंत्र का उद्देश्य केवल नियंत्रण है, विनाश नहीं। विष की शक्ति को सकारात्मक दिशा में मोड़ना ही मंत्र का मूल उद्देश्य है। ---

आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ

विष केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी हो सकता है। ✔ क्रोध ✔ द्वेष ✔ अहंकार इनका असर भी पवन की तरह फैल सकता है। यदि व्यक्ति जागरूक और सतर्क हो, तो नकारात्मकता को नियंत्रित किया जा सकता है, और सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। ---

योगिक दृष्टि

योग में पवन (प्राण) का प्रवाह शरीर और मन की ऊर्जा का प्रतीक है। सही दिशा में प्राण का प्रवाह हानिकारक तत्वों को निष्क्रिय कर देता है। इस मंत्र में भी यही संदेश है— विष का प्रभाव फैलता है, लेकिन नुकसान नहीं पहुँचाता। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के जीवन में विष के रूप— ✔ तनाव ✔ नकारात्मक समाचार ✔ सामाजिक दबाव इनका फैलाव प्राकृतिक पवन की तरह होता है। इस मंत्र से सीख— हम अपनी चेतना और सकारात्मक ऊर्जा के माध्यम से इस फैलाव को नियंत्रित और सुरक्षित बना सकते हैं। ---

सारांश

✔ विष को फैलने दो, लेकिन नियंत्रित और सुरक्षित रूप में। ✔ नकारात्मक शक्तियों से दूर करो। ✔ सकारात्मक औषधियों और ऊर्जा के माध्यम से फैलाओ। ✔ हानि न पहुँचने दो। यह मंत्र जीवन में संतुलन, सुरक्षा और जागरूकता का प्रतीक है। ---

English Insight

Like the wind, disperse the harmful forces, and carry them away from malevolent influences. Spread like the branches of medicinal plants, but cause no harm. The verse highlights the principle of controlled dispersion, transforming potential danger into a protective, beneficial flow.

शब्दार्थ

अनाप्ता = पूरी नहीं हुई, अधूरी ये = जो वः = तुम्हारी प्रथमा = प्रारंभिक, पहली यानि = जो कर्माणि = कर्म, क्रियाएँ चक्रिरे = उन्होंने किए, संपन्न किए वीरान् = शक्तिशाली, हानिकारक, वीर नो = हमारे, हमें अत्र = यहाँ मा = न दभन् = न मारें, न हानि पहुँचाएँ तत् = वह एतत् = यह पुरो = पूर्व, पहले दधे = रखा, नियंत्रित किया ---

सरल हिन्दी अर्थ

हे हानिकारक शक्तियाँ, जो पहले आपने कर्म किए, जो अधूरे रह गए, वे हमें हानि न पहुँचाएँ। इन्हें हम पहले की तरह सुरक्षित रूप में पूर्ववत रख देते हैं। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र हानिकारक शक्तियों और कर्मों को नियंत्रित करने का वर्णन करता है। “अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे” — वे कर्म जो शुरू किए गए थे लेकिन पूरी तरह संपन्न नहीं हुए, या जिनका प्रभाव अभी बाकी है। यह जीवन में अपूर्ण कर्मों, अधूरी क्रियाओं या नकारात्मक शक्तियों का प्रतीक है। कभी-कभी कोई व्यक्ति या शक्ति अधूरी क्रियाओं के माध्यम से हानि पहुँचा सकती है। --- “वीरान् नो अत्र मा दभन्” — हे शक्तिशाली तत्व, हमें हानि न पहुँचाओ। यह एक सक्रिय सुरक्षा प्रार्थना है। साधक यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी अधूरी क्रिया या नकारात्मक शक्ति उसके लिए हानिकारक न हो। --- “तद्व एतत्पुरो दधे” — हम उन कर्मों को पूर्ववत रखते हैं, जैसे पहले रखे गए थे। अर्थात्, न तो नष्ट करना, न तो हानि पहुँचाना। संतुलित और नियंत्रित रूप में उन्हें स्थापित करना। ---

आध्यात्मिक अर्थ

यह मंत्र हमें जीवन में संतुलन बनाए रखने की सीख देता है। ✔ अधूरी समस्याओं और नकारात्मक अनुभवों को दबाने के बजाय, ✔ उन्हें नियंत्रित और स्थिर रखना इसी में वास्तविक शक्ति है। यह जीवन में “अधूरे अनुभवों” या “पुराने संघर्षों” के प्रति संतुलनपूर्ण दृष्टिकोण का प्रतीक है। ---

योगिक और मानसिक दृष्टि

योग में कहा गया है— पूर्व अनुभवों को नकारना या दबाना नहीं, बल्कि उन्हें नियंत्रित रूप से स्वीकार करना आवश्यक है। इससे मन में संतुलन, जागरूकता और स्थिरता आती है। ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

अधूरी या अपूर्ण घटनाएँ अक्सर तनाव उत्पन्न करती हैं। यदि उन्हें समझदारी और संयम से नियंत्रित किया जाए, तो वे नकारात्मक प्रभाव नहीं डालती। मंत्र इस बात की शिक्षा देता है— हानिकारक अनुभवों को स्थिर करना और उन्हें नियंत्रित रखना। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के जीवन में अधूरी क्रियाएँ— ✔ अधूरी परियोजनाएँ ✔ अपूर्ण रिश्ते ✔ अधूरा मनोबल इनसे जीवन में तनाव बढ़ सकता है। इस मंत्र से सीख— इन सबको नियंत्रित और संतुलित तरीके से संभालना चाहिए। ---

सारांश

✔ अधूरी और हानिकारक शक्तियों से बचाव करें। ✔ उन्हें नष्ट न करें, बल्कि नियंत्रित रूप में स्थिर रखें। ✔ संतुलन और जागरूकता से जीवन में स्थिरता बनाएँ। ---

English Insight

O powerful forces, the deeds you began but did not complete— do not harm us. We place them as before, controlled and balanced, so that past actions do not create chaos or danger. The verse emphasizes awareness, control, and balance over incomplete or potentially harmful forces.

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