जीवन वास्तव में परमात्मा का सबसे सुन्दर, दुर्लभ और बहुमूल्य उपहार है। यह कोई साधारण संयोग नहीं, बल्कि एक सुविचारित, सुसंयोजित और नियमबद्ध व्यवस्था है। किंतु विडम्बना यह है कि मनुष्य इस अमूल्य उपहार को पाकर भी उसे जीना नहीं जानता।
मनुष्य जीवन को स्वेच्छा से, अपनी मनमानी के अनुसार चलाने योग्य समझ लेता है, जबकि जीवन स्वयं एक नियमबद्ध यंत्र (मशीन) के समान है। जिस प्रकार किसी नाव को जल में चलने के लिए बनाया गया है, यदि वही नाव हम पर्वत, रेत या सूखी भूमि पर घसीटने का प्रयास करें, तो नाव का अस्तित्व ही नष्ट हो जाता है। दोष नाव में नहीं होता, दोष उसके उपयोग की दिशा में होता है।
ठीक इसी प्रकार मानव जीवन भी है।
यदि जीवन के स्वाभाविक, आध्यात्मिक और नैसर्गिक नियमों के विपरीत जीवन जिया जाए, तो जीवन का संतुलन बिगड़ जाता है। परिणामस्वरूप मनुष्य का मानसिक, भावनात्मक और आत्मिक ढाँचा टूटने लगता है। यही कारण है कि आज जीवन होते हुए भी जीवन का रस समाप्त हो गया है।
मानव जीवन केवल शरीर नहीं है।
यह शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का संयुक्त तंत्र है। यदि इस तंत्र के किसी एक स्तर की उपेक्षा की जाए, तो संपूर्ण जीवन असंतुलित हो जाता है।
आज का मनुष्य जीवन को केवल भौतिक उपलब्धियों से जोड़कर देखता है—
धन, पद, सुख-सुविधा, भोग, संबंध और प्रतिष्ठा।
किन्तु वह यह भूल जाता है कि यह सब जीवन के साधन हैं, जीवन का उद्देश्य नहीं।
जब जीवन का उद्देश्य ही विकृत हो जाता है, तब मनुष्य:
यही कारण है कि आधुनिक युग में साधन बढ़े हैं, लेकिन शांति घट गई है।
शाश्वत सुख एवं शान्ति की चाहना मानव स्वभाव में अंतर्निहित है।
कोई भी मनुष्य दुखी होना नहीं चाहता।
हर व्यक्ति भीतर से शांति चाहता है — स्थायी, अडिग और अविचल।
परन्तु इस लक्ष्य को पाने के लिए मनुष्य जिस मार्ग का चयन करता है, वही उसकी सबसे बड़ी भूल बन जाता है। वह शांति को भौतिक सुखों में खोजने लगता है।
भौतिक सुखों की स्थिति वैसी ही है जैसे:
अग्नि में घी डालना
घी डालने से अग्नि बुझती नहीं, बल्कि और प्रज्वलित हो जाती है।
इसी प्रकार:
इच्छा → भोग → और इच्छा
यह चक्र कभी समाप्त नहीं होता।
इसलिए शान्ति कभी प्राप्त नहीं होती।
यह सम्पूर्ण जगत् मोहात्मक है।
वेदांत के अनुसार यह त्रिगुणात्मिका अव्यक्त प्रकृति से उत्पन्न है—
सत्त्व, रज और तम।
जहाँ त्रिगुण हैं, वहाँ:
क्योंकि प्रेम का शुद्ध स्वरूप त्रिगुणातीत होता है।
जहाँ शुद्ध प्रेम नहीं, वहाँ आनन्द नहीं।
और जहाँ आनन्द नहीं, वहाँ शान्ति की कल्पना भी व्यर्थ है।
मनुष्य संसार में प्रेम खोजता है, परन्तु उसे केवल:
ही प्राप्त होते हैं।
महान वैराग्यशील भर्तृहरि कहते हैं:
हमने भोगों को नहीं भोगा,
भोगों ने ही हमें भोग डाला।
हमने तप नहीं किया,
त्रिविध तापों ने ही हमें तपा डाला।
काल नहीं बीता,
हमारी ही आयु बीत गई।
तृष्णा बूढ़ी नहीं हुई,
हम ही बूढ़े हो गए।
यह श्लोक मानव जीवन की सबसे गहरी त्रासदी को उजागर करता है।
मनुष्य जीवन भर कुछ पाने में लगा रहता है,
पर अंततः वह स्वयं ही खो जाता है।
बृहदारण्यक उपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते हैं:
यदि सम्पूर्ण पृथ्वी को रत्नों से भरकर भी किसी को दे दिया जाए,
तो भी उसे शाश्वत शान्ति और अमरत्व प्राप्त नहीं हो सकता।
क्यों?
क्योंकि संसार में:
इसलिए याज्ञवल्क्य कहते हैं— एकमात्र परब्रह्म ही:
परब्रह्म को जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है।
कठोपनिषद् स्पष्ट कहता है:
जिसने अपनी आत्मा द्वारा परब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया,
शाश्वत सुख केवल उसी के पास है — अन्य के पास नहीं।
यह कथन किसी दर्शन का प्रचार नहीं, बल्कि अनुभवजन्य सत्य है।
यहाँ प्रश्न उठता है—
यदि आत्मा और परब्रह्म ही शान्ति का स्रोत हैं,
तो ब्रह्मज्ञान की आवश्यकता क्यों?
उत्तर स्पष्ट है:
जब तक:
तब तक:
ब्रह्मज्ञान वह दीपक है,
जो अज्ञान के अंधकार को नष्ट करता है।
दर्शन शास्त्र भी कहता है—
शुद्ध ज्ञान के बिना अखण्ड मुक्ति नहीं
और अज्ञानता ही संसार बंधन का कारण है
जीवन को:
बल्कि:
ब्रह्मज्ञान कोई विलास नहीं,
यह जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है।
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